राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए और ऐसे अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र के लिए अभियोजना-(1) कोई न्यायालय,-
(क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 6 के अधीन या धारा 153क, [धारा 295क या धारा 505 की उपधारा (1)] के अधीन दंडनीय किसी अपराध का ; अथवा
(ख) ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र का ; अथवा
(ग) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 108क में यथावर्णित किसी दुष्प्रेरण का,
संज्ञान केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
[(1क) कोई न्यायालय,-
(क) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 153ख या धारा 505 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, अथवा
(ख) ऐसा अपराध करने के लिए आपराधिक षड्यंत्र का,
संज्ञान केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।]
(2) कोई न्यायालय भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 120ख के अधीन दंडनीय किसी आपराधिक षड्यंत्र के किसी ऐसे अपराध का, जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कठिन कारावास से दंडनीय [अपराध] करने के आपराधिक षड्यंत्र से भिन्न है, संज्ञान तब तक नहीं करेगा जब तक राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट ने कार्यवाही शुरू करने के लिए लिखित सम्मति नहीं दे दी है :
परंतु जहां आपराधिक षड्यंत्र ऐसा है जिसे धारा 195 के उपबंध लागू हैं वहां ऐसी कोई सम्मति आवश्यक न होगी ।
(3) केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, [उपधारा (1) या उपधारा (1क) के अधीन मंजूरी देने के पूर्व और जिला मजिस्ट्रेट, उपधारा (1क) के अधीन मंजूरी देने से पूर्व,ट और राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट, उपधारा (2) के अधीन सम्मति देने के पूर्व, ऐसे पुलिस अधिकारी द्वारा जो निरीक्षक की पंक्ति से नीचे का नहीं है, प्रारंभिक अन्वेषण किए जाने का आदेश दे सकता है और उस दशा में ऐसे पुलिस अधिकारी की वे शक्तियां होंगी जो धारा 155 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट हैं ।

