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मानव अंग और ऊतक प्रतिरोपण अधिनियम, 1994 ( Transplantation of Human Organs and Tissues Act, 1994 )


 

मानव अंग और ऊतक प्रतिरोपण अधिनियम, 1994

(1994 का अधिनियम संख्यांक 42)

[8 जुलाई, 1994]

[मानव अंगों और ऊतकों के चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए

निकाले जाने, भंडारकरण और प्रतिरोपण का विनियमन

करने और मानव अंगों तथा ऊतकों में वाणिज्ियक

व्यवहार का निवारण करने] तथा उनसे

संसक्त या उनके आनुषंगिक

विषयों का उपबन्ध

करने के लिए

 अधिनियम

                यह समीचीन है कि मानव अंगों के चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए निकाले जाने, उनके भंडारकरण और प्रतिरोपण का विनियमन करने के लिए और मानव अंगों में वाणिज्ियक व्यवहार का निवारण करने के लिए उपबंध किया जाए ;

                और संसद् को संविधान के अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 250  में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय पूर्वोक्त विषयों में से किसी के संबंध में राज्यों के लिए विधियां बनाने की कोई शक्ति नहीं है ;

और संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अनुसरण में गोवा, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों के विधान-मंडलों के सभी सदनों द्वारा इस आशय के संकल्प पारित किए गए हैं कि पूर्वोक्त विषयों को उन राज्यों में संसद् द्वारा विधि द्वारा नियमित किया जाना चाहिए ;

भारत गणराज्य के पैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, लागू होना और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम  [मानव अंग और ऊतक] प्रतिरोपण अधिनियम, 1994 है ।

                (2) यह प्रथमतः सम्पूर्ण गोवा, हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों और सभी संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होता है और यह ऐसे अन्य राज्य को भी लागू होगा जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अधीन इस निमित्त पारित संकल्प द्वारा इस अधिनियम को अंगीकार करता है ।

                (3) यह गोवा, हिमालचल प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों में तथा सभी संघ राज्यक्षेत्रों में उस तारीख को, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे और ऐसे किसी अन्य राज्य में, जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अधीन इस अधिनियम को अंगीकार करता है, ऐसे अंगीकार किए जाने की तारीख को, प्रवृत्त होगा, और किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, इस अधिनियम में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी निर्देश से वह तारीख अभिप्रेत है जिसको यह अधिनियम ऐसे राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त होता है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ, से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) विज्ञापन" के अन्तर्गत किसी भी प्रकार का विज्ञापन है, चाहे वह साधारणतया जनता के लिए हो अथवा जनता के किसी वर्ग या वैयक्तिक रूप से चुने हुए व्यक्तियों के लिए हो ;

(ख) समुचित प्राधिकारी" से धारा 13 के अधीन नियुक्त समुचित प्राधिकारी अभिप्रेत है ;

(ग) प्राधिकरण समिति" से धारा 9 की उपधारा (4) के खंड (क) या खंड (ख) के अधीन गठित समिति अभिप्रेत है ;

(घ) मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु" से वह अवस्था अभिप्रेत है जब मस्तिष्क स्तंभ की सभी क्रियाएं स्थायी रूप से और अपरावर्ती रूप से बंद हो गई हों और ऐसा धारा 3 की उपधारा (6) के अधीन प्रमाणित किया गया हो ;

(ङ) मृत व्यक्ति" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसमें जीवंत जन्म के पश्चात् किसी भी समय मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु के कारण या हृदय-फुप्फुस संवेद में जीवन के सभी लक्षण स्थायी रूप से समाप्त हो जाते हैं ;

(च) दाता" से कम से कम अठारह वर्ष की आयु का ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो धारा 3 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अपने किसी मानव अंग के चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए निकाले जाने का स्वैच्छया प्राधिकार देता है ;

(छ) अस्पताल" के अन्तर्गत चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए कोई परिचर्यागृह, क्लिनिक, चिकित्सा केन्द्र, चिकित्सा या अध्यापन संस्था और उसी प्रकार की अन्य संस्था हैं ;

(ज) मानव अंग" से उत्तकों की संरचित विन्यास से मिलकर बनने वाला मानव शरीर का कोई ऐसा भाग अभिप्रेत है जो, यदि पूर्णतः निकाला जाता है तो, उसे शरीर द्वारा प्रतिकृत नहीं किया जा सकता ;

 [(जक) मानव अंग सुधार केन्द्र" से ऐसा कोई अस्पताल अभिप्रेत है,-

(i) जिसमें ऐसे गंभीर रूप से रुग्ण रोगियों के उपचार के लिए पर्याप्त सुविधाएं हैं, जो मृत्यु की दशा में, अंगों के संभाव्य दाता हो सकते हैं ; और

(ii) जो धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन मानव अंगों के सुधार के लिए रजिस्ट्रीकृत है ;

(जख) अप्राप्तवय" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसने अठारह वर्ष की आयु पूरी नहीं की है ;]

 [(झ) निकट नातेदार" से पति या पत्नी, पुत्र, पुत्री, पिता, माता, भाई, बहिन, पितामह-मातामह,पितामही-मातामही, पौत्र-दौहित्र या पौत्री-दौहित्री अभिप्रेत हैं ;]

(ञ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(ट) संदाय" से धन या नकद मूल्य की वस्तु के रूप में संदाय अभिप्रेत है किन्तु इसके अंतर्गत निम्नलिखित को चुकाने या उनकी प्रतिपूर्ति करने संबंधी कोई संदाय नहीं है,-

                (i) प्रदाय किए जाने वाले मानव अंग के निकाले जाने, परिवहन या परिरक्षण करने का खर्च ; या

                (ii) किसी व्यक्ति द्वारा उपगत कोई व्यय या उपार्जनों की हानि, जहां तक उसे युक्तियुक्त और प्रत्यक्ष रूप से उसके द्वारा अपने शरीर में किसी मानव अंग का प्रदाय करने से हुआ माना जा सकता है ;

(ठ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(ड) प्राप्तिकर्ता" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जिसमें कोई मानव अंग प्रतिरोपित किया जाता है या किए जाने की प्रस्थापना है ;

(ढ) रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी" से ऐसा चिकित्सा व्यवसायी अभिप्रेत है जिसके पास भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) की धारा 2 के खंड (ज) में यथापरिभाषित कोई मान्यता प्राप्त आयुर्विज्ञान अर्हता है और जो उस धारा के खंड (ट) में यथापरिभाषित राज्य चिकित्सक रजिस्टर में प्रविष्ट है ;

(ण) चिकित्सीय प्रयोजन" से किसी विशिष्ट पद्धति या रीति के अनुसार किसी रोग का क्रमबद्ध उपचार या स्वास्थ्य सुधारने के उपाय अभिप्रेत हैं 2[;]

1[(णक) ऊतक" से मानव शरीर में विशिष्ट कृत्य करने वाला रक्त के सिवाय कोशिकाओं का समूह अभिप्रेत है ;

(णख) ऊतक बैंक" से ऊतकों के प्रत्यादान, पटेक्षण, परीक्षण, प्रसंस्करण, भंडारकरण और संवितरण से संबंधित किसी क्रियाकलाप को करने के लिए धारा 14क के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई सुविधा अभिप्रेत है, किन्तु इसमें कोई रक्त बैंक सम्मिलित नहीं है ;]

(त) प्रतिरोपण" से चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए किसी जीवित व्यक्ति या मृत व्यक्ति से किसी अन्य जीवित व्यक्ति में किसी मानव अंग का रोपण अभिप्रेत है, और

1[(थ) प्रतिरोपण समन्वयक" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसको धारा 3 के उपबंधों के अनुसार मानव अंगों या ऊतकों या दोनों को निकाले जाने या प्रतिरोपण किए जाने से संबंधित सभी विषयों का समन्वय करने के लिए और मानव अंगों को निकाले जाने के लिए प्राधिकारी की सहायता के लिए अस्पताल द्वारा नियुक्त किया गया है ।]

 

 

 

अध्याय 2

मानव अंगों के निकाले जाने का प्राधिकार

3. मानव अंगों के निकाले जाने का प्राधिकार-(1) कोई भी दाता, ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाए, अपनी मृत्यु के पूर्व, अपने शरीर के किसी मानव अंग का चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए निकाले जाने का प्राधिकार दे सकेगा ।

 [(1क) ऐसे मानव अंगों या ऊतकों या दोनों के, जो विहित किए जाएं, निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण के प्रयोजन के लिए प्रतिरोपण समन्वयक के, यदि ऐसा प्रतिरोपण समन्वयक उपलब्ध है, परामर्श से अस्पताल में कार्यरत रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी के निम्नलिखित कर्तव्य होंगे,-

(i) गहन चिकित्सा केन्द्र में भर्ती किए गए व्यक्ति या उसके निकट नातेदार से यह सुनिश्चित करना कि ऐसे व्यक्ति ने उसकी मृत्यु से पूर्व किसी समय उपधारा (2) के अधीन उसके शरीर के किसी मानव अंग या ऊतक या दोनों को निकाले जाने के लिए प्राधिकृत किया था तो अस्पताल ऐसे प्राधिकरण के लिए प्रलेखीकरण को अभिप्राप्त करने के लिए, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, कार्यवाही करेगा ;

(ii) जहां उपधारा (2) में यथानिर्दिष्ट ऐसा कोई प्राधिकार, ऐसे व्यक्ति द्वारा नहीं किया गया है वहां उस व्यक्ति या निकट नातेदार को मानव अंगों या ऊतकों या दोनों के संदान के लिए प्राधिकृत करने या इंकार करने के विकल्प के बारे में, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, जानकारी देगा ;

(iii) खंड (i) और खंड (ii) में पहचान किए गए दाता के मानव अंगों या ऊतकों या दोनों के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण के लिए मानव अंग सुधार केन्द्र को ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, लिखित में सूचना देने की अस्पताल से अपेक्षा करना ।

(1ख) उपधारा (1क) के खंड (i) से खंड (iii) तक के अधीन वर्णित कर्तव्य उस तारीख से जो विहित की जाए, किसी ऐसे अस्पताल में जो इस अधिनियम के अधीन मानव अंगों या ऊतकों या दोनों के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण के प्रयोजन के लिए रजिस्ट्रीकृत नहीं हैं, किसी गहन चिकित्सा केन्द्र में कार्यरत रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी की दशा में भी लागू होंगे ।]

(2) यदि किसी दाता ने, अपनी मृत्यु से पूर्व किसी भी समय लिखित रूप में और दो या अधिक साक्षियों की उपस्थिति में (जिनमें से कम से कम एक उस व्यक्ति का निकट नातेदार हो) अपनी मृत्यु के पश्चात् अपने शरीर के किसी मानव अंग का चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए निकाले जाने का प्राधिकार स्पष्ट रूप से दिया था, तो दाता के शव का विधिपूर्वक कब्जा रखने वाला व्यक्ति, जब तक कि उसके पास यह विश्वास करने का कारण न हो कि दाता ने पूर्वोक्त प्राधिकार तत्पश्चात् प्रतिसंहृत कर दिया था, रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी को दाता के शव से उस मानव अंग के चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए निकाले जाने के लिए सभी उचित         सुविधाएं देगा ।

(3) जहां किसी व्यक्ति ने अपनी मृत्यु के पूर्व कोई ऐसा प्राधिकार जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट है, नहीं दिया था, किन्तु ऐसे व्यक्ति ने अपने मानव अंगों में से किसी का अपनी मृत्यु के पश्चात् चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने की बाबत कोई आपत्ति भी प्रकट नहीं की थी, वहां ऐसे व्यक्ति के शव का विधिपूर्वक कब्जा रखने वाला व्यक्ति, जब तक कि उसके पास यह विश्वास करने का कारण न हो कि मृत व्यक्ति के किसी निकट नातेदार को मृत व्यक्ति के मानव अंगों में से किसी का चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने की बाबत आपत्ति है, मृत व्यक्ति के किसी मानव अंग के चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए उसके उपयोग किए जाने के लिए निकाले जाने का प्राधिकार दे सकेगा ।

(4) यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन दिया गया प्राधिकार, मानव अंग के चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए निकाले जाने के लिए पर्याप्त आधार होगा, किन्तु ऐसा अंग रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी से भिन्न किसी अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं निकाला जाएगा :

1[परंतु ऐसा कोई तकनीशियन, जिसके पास ऐसी अर्हताएं और अनुभव हैं, जो विहित किए जाएं, किसी कार्निया को निकाल सकेगा ।]

(5) जहां कोई मानव अंग किसी मृत व्यक्ति के शरीर से निकाला जाता है, वहां रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी ऐसे निकाले जाने के पूर्व उस शरीर की, जिससे किसी मानव अंग को निकाला जाना है, व्यक्तिगत परीक्षा करके अपना यह समाधान करेगा कि उस शरीर में से जीवन समाप्त हो गया है या जहां वह मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु का कोई मामला प्रतीत होता है वहां, ऐसी मृत्यु उपधारा (6) के अधीन प्रमाणित कर दी गई है ।

(6) जहां किसी व्यक्ति और मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु की दशा में उसके शरीर से किसी मानव अंग को निकाला जाना है वहां उसे तब तक नहीं निकाला जाएगा जब तक कि ऐसी मृत्यु ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों और अपेक्षाओं की जो निम्नलिखित से मिलकर बने चिकित्सा विशेषज्ञ बोर्ड द्वारा विहित की जाएं, के पूरा करने पर प्रमाणित न कर दी जाएं, अर्थात् :-

                (i) उस अस्पताल का, जिसमें मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु हुई है, भारसाधक रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी ;

                (ii) एक स्वतंत्र रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी, जो विशेषज्ञ हैं, जिसे खंड (i) में विनिर्दिष्ट रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा समुचित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित नामों के पैनल में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;

(iii) तंत्रिका विज्ञानी या तंत्रिका शल्य चिकित्सक, जिसे खंड (i) में विनिर्दिष्ट रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा समुचित प्राधिकारी द्वारा अनुमोदित नामों के पैनल में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा :  । । ।

 [परंतु जहां कोई तंत्रिका विज्ञानी या तंत्रिका शल्य चिकित्सक उपलब्ध नहीं है, वहां रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी ऐसे किसी स्वतंत्र रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी को जो शल्य चिकित्सक या चिकित्सक और निश्चेतना विज्ञानी या गहन चिकित्सा विज्ञानी है, इस शर्त के अधीन रहते हुए कि वे संबद्ध प्राप्तिकर्ता के लिए प्रतिरोपण दल के सदस्य नहीं हैं और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, नामनिर्दिष्ट कर सकेगा ;]

(iv) ऐसा रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी, जो उस व्यक्ति का उपचार कर रहा था जिसकी मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु   हुई हैं ।

                (7) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, जहां अठारह वर्ष से कम आयु के किसी व्यक्ति की मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु हुई है और उसे उपधारा (6) के अधीन प्रमाणित कर दिया गया है वहां मृत व्यक्ति के माता पिता में से कोई भी ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, मृत व्यक्ति के शरीर से किसी मानव अंग के निकाले जाने का प्राधिकार दे सकेगा ।

4. कतिपय दशाओं में मानव अंगों के निकाले जाने का प्राधिकार दिया जाना-(1) मृत व्यक्ति के शरीर से किसी मानव अंग के निकाले जाने के लिए धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन कोई सुविधा नहीं दी जाएगी और उस धारा की उपधारा (3) के अधीन कोई प्राधिकार नहीं दिया जाएगा, यदि ऐसी सुविधा देने के लिए अपेक्षित या ऐसा प्राधिकार देने के लिए सशक्त व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंधों के अनुसरण में ऐसे शव के संबंध में मृत्यु समीक्षा की जानी अपेक्षित है ।

                (2) किसी मृत व्यक्ति के शरीर से किसी मानव अंग के निकाले जाने के लिए किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा प्राधिकार नहीं दिया जाएगा, जिसे ऐसे शव को केवल दफन, दाह-संस्कार या अन्य अंत्येष्टि के प्रयोजन के लिए, सौंपा गया है ।

5. अस्पताल या कारागार में लावारिस शवों की दशा में मानव अंगों के निकाले जाने का प्राधिकार-(1) किसी अस्पताल या कारागार में पड़े हुए किसी ऐसे शव की दशा में, जिसके बारे में मृत व्यक्ति के निकट नातेदारों में से किसी ने संबंधित व्यक्ति की मृत्यु के समय से अड़तालीस घंटे के भीतर दावा नहीं किया है, ऐसे लावारिस शव से किसी मानव अंग के निकाले जाने का प्राधिकार, विहित प्ररूप में, ऐसे अस्पताल या कारगार के प्रबंध या नियंत्रण के उस समय भारसाधक व्यक्ति द्वारा या ऐसे अस्पताल या कारगार के किसी ऐसे कर्मचारी द्वारा, जिसे अस्पताल या कारागार के प्रबंध या नियंत्रण के भारसाधक व्यक्ति द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया है, दिया जा सकता है ।

(2) यदि ऐसा प्राधिकार देने के लिए सशक्त व्यक्ति के पास यह विश्वास करने का कारण है कि मृत व्यक्ति के किसी निकट नातेदार द्वारा शव का दावा किए जाने की संभावना है, यद्यपि ऐसे निकट नातेदार ने उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर मृत व्यक्ति के शव का दावा नहीं किया है, तो उपधारा (1) के अधीन कोई प्राधिकार नहीं दिया जाएगा ।

6. चिकित्सा-विधिक या विकृति विज्ञान के प्रयोजनों के लिए शव-परीक्षण के लिए भेजे गए शवों से मानव अंगों के निकाले जाने का प्राधिकार-जहां किसी व्यक्ति का शव-

(क) चिकित्सा-विधिक प्रयोजनों के लिए, यदि उस व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना या किसी अन्य अप्राकृतिक कारण से हुई है, या

(ख) विकृति विज्ञान के प्रयोजनों के लिए,

शव-परीक्षण के लिए भेजा गया है वहां ऐसे शव से किसी मानव अंग के निकाले जाने का प्राधिकार देने के लिए इस अधिनियम के अधीन सक्षम व्यक्ति, यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसे मानव अंग की उस प्रयोजन के लिए अपेक्षा नहीं होगी, जिसके लिए ऐसा शव, शव-परीक्षा के लिए भेजा गया है, ऐसे मृत व्यक्ति के उस मानव अंग का चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए निकाला जाना प्राधिकृत कर सकेगा, परन्तु यह तब जब कि उसका यह समाधान हो जाता है कि मृत व्यक्ति ने अपनी मृत्यु के पूर्व इस बात पर कोई आपत्ति प्रकट नहीं की थी कि उसकी मृत्यु के पश्चात् उसके किसी मानव अंग का चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाए या जहां उसने अपनी मृत्यु के पश्चात् चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए अपने किसी मानव अंग के उपयोग के लिए प्राधिकार दिया था, वहां उसने ऐसे प्राधिकार को अपनी मृत्यु से पूर्व प्रतिसंहृत नहीं किया था ।

7. मानव अंगों का परिरक्षण-किसी व्यक्ति के शरीर से किसी मानव अंग के निकाले जाने के पश्चात् रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी, इस प्रकार निकाले गए मानव अंग के परिरक्षण के लिए ऐसे उपाय करेगा जो विहित किए जाएं ।

8. व्यावृत्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी मृत व्यक्ति के शव से या शव के किसी भाग से किसी व्यवहार को विधिविरुद्ध बनाती है, यदि ऐसा व्यवहार उस दशा में विधिपूर्ण होता यदि यह अधिनियम पारित नहीं हुआ होता ।

(2) न तो इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किसी मृत व्यक्ति के शव से किसी मानव अंग के निकाले जाने के लिए किसी सुविधा या प्राधिकार का दिया जाना और न ही ऐसे प्राधिकार के अनुसरण में किसी मृत व्यक्ति के शव से किसी मानव अंग का निकाला जाना, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 297 के अधीन दंडनीय अपराध समझा जाएगा ।

9. मानव अंगों के निकाले जाने और प्रतिरोपण के संबंध में निर्बंधन-(1) उपधारा (3) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, किसी दाता के शरीर से उसकी मृत्यु के पहले निकाला गया कोई मानव अंग प्राप्तिकर्ता के शरीर में तब तक प्रतिरोपित नहीं किया जाएगा जब तक कि दाता प्राप्तिकर्ता का कोई निकट नातेदार न हो ।

 [(1क) जहां दाता या प्राप्तिकर्ता जो निकट नातेदार है, विदेशी राष्ट्रिक है वहां प्राधिकार समिति का पूर्वानुमोदन मानव अंग या ऊतक या दोनों को निकालने या प्रतिरोपण करने से पूर्व अपेक्षित होगा :

परंतु यदि प्राप्तिकर्ता विदेशी राष्ट्रिक है और दाता कोई भारतीय राष्ट्रिक है तो प्राधिकार समिति ऐसे निकाले जाने या प्रतिरोपण का जब तक अनुमोदन नहीं करेगी जब तक कि वे निकट नातेदार न हों ।

(1ख) किसी अप्राप्तवय के शरीर से उसकी मृत्यु से पूर्व कोई मानव अंग या ऊतक या दोनों, प्रतिरोपण के प्रयोजन के लिए उस रीति के सिवाय, जो विहित की जाए, निकाले नहीं जाएंगे ।

(1ग) किसी मानसिक रुग्णता से ग्रस्त व्यक्ति के शरीर से उसकी मृत्यु के पहले प्रतिरोपण के प्रयोजन के लिए कोई मानव अंग या ऊतक या दोनों नहीं निकाले जाएंगे ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजन के लिए,-

(i) मानसिक रुग्णता से ग्रस्त व्यक्ति" पद के अंतर्गत, यथास्थिति, मानसिक रुग्णता या मानसिक मंदता भी है ;

(ii) मानसिक रुग्णता" पद के अंतर्गत मनोभ्रंश, खंडित मनस्कता और ऐसी अन्य मानसिक दशा भी है, जो व्यक्ति को बौद्धिक रूप से निःशक्त बनाती है ;

(iii) मानसिक मंदता" पद का वह अर्थ होगा, जो निःशक्त व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 (1996 का 1) की धारा 2 के खंड (द) में है ।]

                (2) जहां कोई दाता, धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन अपनी मृत्यु के पश्चात् अपने मानव अंगों में से किसी के निकाले जाने के लिए प्राधिकृत करता है या कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी मृत व्यक्ति के शरीर से किसी मानव अंग के निकाले जाने के लिए प्राधिकार देने के लिए सक्षम या सशक्त है, ऐसे निकाले जाने को प्राधिकृत करता है, वहां मानव अंग निकाला जा सकेगा और किसी ऐसे प्राप्तिकर्ता के, जिसे ऐसे मानव अंग की आवश्यकता हो, शरीर में प्रतिरोपित किया जा सकेगा ।

                (3) यदि कोई दाता, धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन अपनी मृत्यु के पहले अपने मानव अंगों में से किसी के ऐसे प्राप्तिकर्ता के, जो निकट नातेदार नहीं है, जैसा कि दाता द्वारा प्राप्तिकर्ता के प्रति स्नेह या लगाव के कारण या किसी अन्य विशेष कारण से विनिर्दिष्ट किया गया है, शरीर के प्रतिरोपण के लिए निकाले जाने के लिए प्राधिकृत करता है, तो ऐसा मानव अंग, प्राधिकरण समिति के पूर्व अनुमोदन के बिना, निकाला और प्रतिरोपित नहीं किया जाएगा ।

                 1[(3क) उपधारा (3) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां-

(क) कोई दाता अपनी मृत्यु के पहले किसी प्राप्ितकर्ता को, जो उसका निकट नातेदार है, अपने मानव अंग या ऊतक या दोनों का संदान करने के लिए सहमत होता है किन्तु ऐसा दाता प्राप्तिकर्ता के लिए दाता के रूप में जैविक रूप से अनुरूप नहीं है ; और

(ख) द्वितीय दाता अपनी मृत्यु के पहले ऐसे प्राप्तिकर्ता को जो उसका निकट नोतदार है, अपने मानव अंग या ऊतक या दोनों का संदान करने के लिए सहमत है किन्तु ऐसा दाता, प्राप्तिकर्ता के लिए दाता के रूप से जैविक रूप से अनुरूप नहीं है ; वहां

(ग) प्रथम दाता, जो द्वितीय प्राप्तिकर्ता के लिए दाता के रूप में जैविक रूप से अनुरूप है और द्वितीय दाता, प्रथम प्राप्तिकर्ता के लिए मानव अंग या ऊतक या दोनों के दाता के रूप में जैविक रूप से अनुरूप है और दाता और प्राप्तिकर्ता के पूर्वोक्त समूह में दोनों दाता तथा दोनों प्राप्तिकर्ता, समूह में ऐसी जैविक अनुरूपता के अनुसार उस समूह में ऐसे मानव अंग या ऊतक या दोनों का संदान करने और प्राप्त करने के लिए एकल करार करते हैं, तो, ऊपर निर्दिष्ट करार के अनुसार मानव अंग या ऊतक या दोनों का निकाला जाना और प्रतिरोपण, प्राधिकार समिति के पूर्वानुमोदन के बिना नहीं किया जाएगा ।]

                 [(4) (क) प्राधिकार समितियों की संरचना ऐसी होगी, जो समय-समय पर केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए ।

(ख) राज्य सरकार और संघ राज्यक्षेत्र, अधिसूचना द्वारा, इस धारा के प्रयोजनों के लिए एक या अधिक प्राधिकार समितियां गठित करेंगी, जो ऐसे सदस्यों से मिलकर बनेंगी, जिनको राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों द्वारा ऐसे निबंधनों और शर्तों पर नामनिर्दिष्ट किया जाए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं ।]

(5) दाता और प्राप्तिकर्ता द्वारा संयुक्त रूप से ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, किए गए आवेदन पर, प्राधिकार समिति, जांच करने के पश्चात् और स्वयं का यह समाधान हो जाने के पश्चात् कि आवेदकों ने इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों की सभी अपेक्षाओं का अनुपालन कर दिया है, आवेदकों की मानव अंग के निकाले जाने और प्रतिरोपण के लिए अनुमोदन दे सकेगी ।

(6) यदि, जांच के पश्चात् और आवेदकों की सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् प्राधिकार समिति का यह समाधान हो जाता है कि आवेदकों ने इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं किया है, तो वह अनुमोदनार्थ आवेदन को ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, नामंजूर कर देगी ।

अध्याय 3

अस्पतालों का विनियमन

10. मानव अंगों के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण का प्रबन्ध करने वाले अस्पतालों का विनियमन-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही,-

(क) कोई भी अस्पताल, जब तक कि वह इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत न हो, किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण का प्रबंध नहीं करेगा या उससे सहयुक्त नहीं होगा या उसमें सहायता नहीं करेगा ;

(ख) कोई भी चिकित्सा व्यवसायी या कोई अन्य व्यक्ति, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्थान से भिन्न किसी स्थान पर किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण से संबंधित किसी क्रियाकलाप का न तो स्वयं,  न ही किसी अन्य व्यक्ित के माध्यम से प्रबंध करेगा या कराएगा या उसका प्रबंध करने में सहायता करेगा,  । । ।

(ग) कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थान का, जिसके अन्तर्गत धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत अस्पताल भी है, चिकित्सीय प्रयोजनों के सिवाय किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण के संबंध में, न तो उपयोग करेगा न कराएगा ;  [और]

3[(घ) कोई ऊतक बैंक, जब तक इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत न हो, ऊतकों के प्रत्यादान, पटेक्षण, परीक्षण, प्रसंस्करण, भंडारकरण और संवितरण से संबंधित कोई क्रियाकलाप नहीं केरगा ।]

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी किसी दाता के शव से किसी भी स्थान पर, चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए, नेत्र या कर्ण निकाल सकेगा ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए कर्ण" के अन्तर्गत कर्ण पटह और कर्ण अस्थि है ।

11. चिकित्सीय प्रयोजनों से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए मानव अंगों के निकाले जाने या प्रतिरोपण का प्रतिषेध-कोई भी दाता और कोई भी ऐसा व्यक्ति, जो किसी मानव अंग के निकाले जाने के लिए प्राधिकार देने के लिए सशक्त है, चिकित्सीय प्रयोजनों से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए किसी मानव अंग का निकाला जाना प्राधिकृत नहीं करेगा ।

12. दाता और प्राप्तिकर्ता को प्रभावों आदि के बारे में स्पष्ट करना-कोई भी रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी किसी मानव अंग को तब तक न तो निकालेगा, न ही प्रतिरोपण करेगा, जब तक कि उसने, ऐसी रीति से जो विहित की जाए, निकाले जाने और प्रतिरोपण से संबंधित सभी संभव प्रभावों, जटिलताओं और परिसंकटों के बारे में क्रमशः दाता और प्राप्तिकर्ता को स्पष्ट न कर दिया हो ।

अध्याय 4

समुचित प्राधिकारी

13. समुचित प्राधिकारी-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक या अधिक अधिकारियों को समुचित प्राधिकारी नियुक्त करेगी ।

                (2) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक या अधिक अधिकारियों को समुचित प्राधिकारी नियुक्त करेगी ।

                (3) समुचित प्राधिकारी, निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात् :-

(i) धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण मंजूर करना या उस धारा की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण करना ;

(ii) धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण का निलंबन या रद्द करना ;

 [(iii) निम्नलिखित के संबंध में, ऐसे मानकों को, जो विहित किए जाएं, प्रवृत्त करना,-

(अ) किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण में लगे अस्पतालों के लिए ;

(आ) ऊतकों के प्रत्यादान, पटेक्षण, परीक्षण, प्रसंस्करण, भंडारकरण और संवितरण में लगे ऊतक बैंकों   के लिए ;]

(iv) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबन्धों में से किसी के भंग होने से संबंधित किसी परिवाद का अन्वेषण करना और समुचित कार्रवाई करना ;

                                 [(त्ध्क) आवधिक रूप से ऊतक बैंकों का निरीक्षण करना ;]

(ध्) प्रतिरोपण की क्वालिटी की जांच करने के लिए और ऐसे व्यक्तियों की, जिन्होंने प्रतिरोपण कराया है, और ऐसे व्यक्तियों की, जिनसे अंग निकाले गए हैं; अनुवर्ती चिकित्सीय देखरेख के लिए कालिकतः अस्पतालों का निरीक्षण करना ; और

                                (ध्त्) ऐसे अन्य अध्युपाय करना, जो विहित किए जाएं ।

 [13क. समुचित प्राधिकारी को सलाह देने के लिए सलाहकार समितियां-(1) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकारें, अधिसूचना द्वारा, समुचित प्राधिकारी को उसके कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता और सलाह देने के लिए दो वर्ष की अवधि के लिए एक सलाहकार समिति का गठन करेगी ।

(2) सलाहकार समिति निम्नलिखित से मिलकर बनेगी,-

(क) सलाहकार समिति के अध्यक्ष के रूप में नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला, राज्य सरकार के सचिव की पंक्ति से अन्यून पंक्ति का एक प्रशासनिक विशेषज्ञ ;

(ख) दो चिकित्सा विशेषज्ञ, जिनके पास ऐसी अर्हताएं हैं, जो विहित की जाएं ;

(ग) सदस्य-सचिव के रूप में अभिहित किया जाने वाला, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय या विभाग का प्रतिनिधित्व करने के लिए संयुक्त निदेशक की पंक्ति से अन्यून पंक्ति का कोई एक अधिकारी ;

(घ) उच्च सामाजिक ख्याति और सत्यनिष्ठा के दो विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता, जिनमें से एक, महिला संगठनों के प्रतिनिधियों में से होगा ;

(ङ) एक विधि विशेषज्ञ, जो अपर जिला न्यायाधीश या समतुल्य का पद धारण करता हो ;

(च) ऐसे गैर-सरकारी संगठनों या संगमों, जो अंग या ऊतक संदानों या मानव अधिकारों के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक व्यक्ति ;

(छ) मानव अंग प्रतिरोपण के क्षेत्र में एक विशेषज्ञ, परंतु वह प्रतिरोपण दल का सदस्य नहीं हो ।

(3) सलाहकार समिति की नियुक्ति के लिए निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

13ख. समुचित प्राधिकारी की शक्तियां-समुचित प्राधिकारी को, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय और विशिष्टतया, निम्नलिखित विषयों की बाबत सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी, अर्थात् :-

(क) किसी ऐसे व्यक्ति को समन करना जिसके कब्जे में इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के उल्लंघन के संबंध में कोई सूचना है ;

(ख) किसी दस्तावेज या सारवान् वस्तु का प्रकटीकरण और उसको पेश करना ;

(ग) किसी ऐसे स्थान के लिए तलाशी वारंट जारी करना जिसका मानव अंगों या ऊतकों या दोनों के अप्राधिकृत निकालने, उपापन और प्रतिरोपण करने में अंतर्वलित होना संदिग्ध है ; और

(घ) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।

13ग. मानव अंगों और ऊतकों के निकाले जाने और भंडारकरण के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक स्थानों पर मानव अंगों और ऊतकों के निकाले जाने और भंडारकरण के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क और प्रादेशिक नेटवर्क को ऐसी रीति में और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करने के लिए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं, स्थापित कर सकेगी ।

13घ. राष्ट्रीय रजिस्ट्री-केन्द्रीय सरकार, मानव अंगों और ऊतकों के दाताओं और प्राप्तिकर्ताओं की एक राष्ट्रीय रजिस्ट्री का अनुरक्षण करेगी और ऐसी रजिस्ट्री में ऐसी जानकारी होगी जो मानव अंगों और ऊतकों के वैज्ञानिक और नैदानिक प्रास्थिति के किए जा रहे मूल्यांकन के लिए विहित की जाए ।]

अध्याय 5

अस्पतालों का रजिस्ट्रीकरण

14. मानव अंगों के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण में लगे अस्पतालों का रजिस्ट्रीकरण-(1)  [कोई भी अस्पताल (जिसके अंतर्गत मानव अंग सुधार केन्द्र भी है)] इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण से संबंधित कोई क्रियाकलाप तब तक प्रारम्भ नहीं करेगा जब तक कि ऐसा अस्पताल उस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत न हो :

                परन्तु इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण से संबंधित किसी क्रियाकलाप में, भागतः या अनन्य रूप से लगा प्रत्येक अस्पताल, ऐसे प्रारंभ की तारीख से साठ दिन के भीतर रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करेगा :

                परन्तु यह और कि किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण से संबंधित किसी क्रियाकलाप में लगा प्रत्येक अस्पताल का इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से तीन मास की समाप्ति पर किसी ऐसे क्रियाकलाप में लगा रहना समाप्त हो जाएगा, जब तक कि ऐसे अस्पताल ने रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन न किया हो और इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत न हो या तब तक जब तक कि ऐसे आवेदन का निपटारा न कर दिया गया हो, इनमें से जो भी पहले हो ।

                (2) उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन समुचित अधिकारी को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से किया जाएगा और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए ।

                (3) इस अधिनियम के अधीन कोई भी अस्पताल तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं होगा जब तक कि समुचित प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसा अस्पताल ऐसी विशेषित सेवाओं और सुविधओं को उपलब्ध कराने, ऐसे कुशल जनशक्ति और उपस्कर रखने तथा ऐसे स्तरमान बनाए रखने की स्थिति में है जो विहित किए जाएं ।

 [(4) इस अधिनियम के अधीन कोई अस्पताल तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं होगा जब तक समुचित प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसे अस्पताल ने ऐसे प्रतिरोपण समन्वयक की नियुक्ति की है, जिसक पास ऐसी अर्हताएं और अनुभव हैं, जो विहित किए जाएं ।]

 [14क. ऊतक बैंक का रजिस्ट्रीकरण-(1) कोई ऊतक बैंक, मानव अंग प्रतिरोपण (संशोधन) अधिनियम, 2011 के प्रारंभ के पश्चात्, ऊतकों के प्रत्यादान, पटेक्षण, परीक्षण, प्रसंस्करण, भंडारकरण और संवितरण से संबंधित क्रियाकलाप तब तक प्रारंभ नहीं करेगा, जब तक कि वह इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत न हो :

परंतु मानव अंग प्रतिरोपण (संशोधन) अधिनियम, 2011 के प्रारंभ के ठीक पूर्व, ऊतकों के प्रत्यादान, पटेक्षण, परीक्षण, प्रसंस्करण, भंडारकरण और संवितरण से संबंधित क्रियाकलाप में भागतः या अनन्यतः लगी कोई सुविधा, ऐसे प्रारंभ की तारीख से साठ दिन के भीतर ऊतक बैंक के रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए लागू होगी :

परंतु यह और कि मानव अंग प्रतिरोपण (संशोधन) अधिनियम, 2011 के प्रारंभ की तारीख से तीन मास के अवसान पर ऐसी सुविधा, जब तक कि ऐसे ऊतक बैंक ने रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन न कर दिया हो और इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत न हो गया हो या ऐसे आवेदन का निपटान किए जाने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, किसी ऐसे क्रियाकलाप में लगने से प्रविरत हो जाएगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक आवेदन, समुचित प्राधिकारी को, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से किया जाएगा तथा उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए ।

(3) इस अधिनियम के अधीन कोई भी ऊतक बैंक तब तक रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा तब तक समुचित प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसा ऊतक बैंक ऐसी विशेषज्ञ सेवाओं और सुविधाओं को प्रदान करने की स्थिति में है, उसके पास ऐसे कुशल कर्मचारी और उपस्कर हैं तथा वह ऐसे स्तरमान को बनाए रखता है, जो विहित किए जाएं ।]

15. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र-(1) समुचित प्राधिकारी, जांच करने के पश्चात् और अपना यह समाधान हो जाने के पश्चात् कि आवेदक ने इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों की सभी अपेक्षाओं का अनुपालन कर लिया है, [यथास्थिति, अस्पताल या ऊतक बैंक को] रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसे प्ररूप में, ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए देगा, जो विहित की जाएं ।

(2) यदि, जांच के पश्चात् और आवेदक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् समुचित प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक ने इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं किया है तो वह रजिस्ट्रीकरण के आवेदन को, ऐसे कारणों से जो लखबद्ध किए जाएंगे, नामंजूर कर देगा ।

(3) रजिस्ट्रीकरण का प्रत्येक प्रमाणपत्र ऐसी रीति से और ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, नवीकृत किया जाएगा ।

16. रजिस्ट्रीकरण का निलंबन या रद्दकरण-(1) समुचित प्राधिकारी स्वप्रेरणा से या परिवाद पर, किसी  [यथास्थिति, अस्पताल या ऊतक बैंक कोट यह हेतुक दर्शित करने के लिए सूचना जारी कर सकेगा कि इस अधिनियम के अधीन उसका रजिस्ट्रीकरण सूचना में वर्णित कारणों से क्यों नहीं निलंबित या रद्द कर दिया जाए ।

(2) यदि 2[यथास्थिति, अस्पताल या ऊतक बैंक कोट सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, समुचित प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों में से किसी को भंग किया जाता रहा है, तो वह किसी दांडिक कार्रवाई पर, जो वह ऐसे 2[यथास्थिति, अस्पताल या ऊतक बैंक] के विरुद्ध कर सकता है, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसके रजिस्ट्रीकरण को उतनी अवधि के लिए जितनी वह ठीक समझे, निलंबित कर सकेगा या उसका रजिस्ट्रीकरण रद्द कर सकेगा :

परंतु जहां समुचित अधिकारी की यह राय है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, वहां वह, किसी 2[यथास्थिति, अस्पताल या ऊतक बैंक] का रजिस्ट्रीकरण, कोई सूचना जारी किए बिना, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, निलंबित कर सकेगा ।

17. अपील-धारा 9 की उपधारा (6) के अधीन अनुमोदन के लिए आवेदन को नामंजूर करने वाले प्राधिकार समिति के आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति या धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन को नामंजूर करने वाले समुचित अधिकारी के आदेश से या धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के निलंबन या रद्दकरण के आदेश से  [व्यथित, यथास्थिति, कोई अस्पताल या ऊतक बैंक], आदेश की प्राप्ित की तारीख से तीस दिन के भीतर, ऐसे आदेश के विरुद्ध ऐसी रीति से जो विहित की जाए, अपील निम्नलिखित को कर सकेगा-

(i) केन्द्रीय सरकार को, जहां अपील धारा 9 की उपधारा (4) के खंड (क) के अधीन गठित प्राधिकार समिति के आदेश के विरुद्ध है या धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त समुचित प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध हैं ; या

(ii) राज्य सरकार को, जहां अपील धारा 9 की उपधारा (4) के खण्ड (ख) के अधीन गठित प्राधिकार समिति के आदेश के विरुद्ध हैं या धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त समुचित प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध है ।

अध्याय 6

अपराध और शास्तियां

18. प्राधिकार के बिना मानव अंग के निकाले जाने के लिए दंड-(1) कोई व्यक्ति, जो किसी अस्पताल को अपनी सेवाएं अर्पित करेगा या उसमें सेवा करेगा और जो प्रतिरोपण के प्रयोजनों के लिए प्राधिकार के बिना किसी मानव अंग के निकाले जाने के संबंध में किसी भी रीति से प्रबंध करेगा, उससे सहयुक्त होगा या उसमें सहायता करेगा, कारावास से,  [जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो बीस लाख रुपए तक का हो सकेगा,] दण्डनीय होगा ।

                (2) जहां उपधारा (1) के अधीन सिद्धदोष ठहराया गया कोई व्यक्ति रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी है, वहां उसका नाम समुचित प्राधिकारी द्वारा संबंधित राज्य आयुर्विज्ञान परिषद् को आवश्यक कार्रवाई करने के लिए, जिसके अंतर्गत उसके नाम का परिषद् के रजिस्टर से प्रथम अपराध के लिए 4[तीन वर्ष] की अवधि के लिए और पश्चात्वर्ती अपराध के लिए स्थायी रूप से हटाया जाना है, भेजा जाएगा ।

                 [(3) कोई व्यक्ति, जो किसी अस्पताल को अपनी सेवाएं अर्पित करेगा या उसमें सेवा करेगा और जो प्राधिकार के बिना मानव ऊतकों को निकाले जाने के संबंध में किसी रीति से प्रबंध करेगा, उससे सहयुक्त होगा या उसमें सहायता करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो पांच लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।]

19. मानव अंगों में वाणिज्ियक व्यवहार के लिए दंड-जो कोई,-

                                (क) किसी मानव अंग के प्रदाय के लिए या प्रदाय की प्रस्थापना के लिए कोई संदाय करेगा या प्राप्त करेगा ;

                                (ख) किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करेगा, जो संदाय पर किसी मानव अंग का प्रदाय करने के लिए रजामंद है ;

                                (ग) संदाय पर किसी मानव अंग का प्रदाय करने की प्रस्थापना करेगा ;

                (घ) किसी मानव अंग के प्रदाय के लिए या प्रदाय करने की प्रस्थापना के लिए कोई ऐसा इंतजाम प्रारंभ करेगा या उसके लिए बातचीत करेगा, जिसमें कोई संदाय अन्तर्वलित हो ;

(ङ) किसी ऐसे व्यक्ति निकाय के, चाहे वह सोसाइटी है, फर्म है या कम्पनी है, जिसके क्रियाकलापों के रूप में या उसके अंतर्गत खंड (घ) में निर्दिष्ट किसी इंतजाम का आरंभ करना या बातचीत करना है, प्रबंध या नियंत्रण में भाग लेगा ; या

(च) (क) संदाय करने पर किसी मानव अंग का प्रदाय करने के लिए व्यक्तियों को आमंत्रित करने वाला ; 

(ख) संदाय करने पर किसी मानव अंग का प्रदाय करने की प्रस्थापपना करने वाला ; या

(ग) यह उपदर्शित करने वाला कि विज्ञापनदाता खण्ड (घ) में निर्दिष्ट कोई इंतजाम आरंभ करने या उसके संबंध में बातचीत करने के लिए रजामंद है, कोई विज्ञापन प्रकाशित करेगा या वितरित करेगा, या प्रकाशित या वितरित कराएगा ।

 [(छ) मिथ्या दस्तावेजों को तैयार करने या प्रस्तुत करने में दुष्प्रेरण करेगा, जिसके अंतर्गत यह स्थापित करने के लिए कि दाता, निकट नातेदार के रूप में या प्राप्तिकर्ता के प्रति स्नेह या उससे लगाव के कारण मानव अंगों का दान कर    रहा है, मिथ्या शपथ पत्र देना भी है,]

 [वह कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने का, जो बीस लाख रुपए से कम का नहीं होगा, किंतु जो एक करोड़ रुपए तक का हो सकेगा, दायी होगा ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

 [19क. मानव ऊतकों में अवैध व्यवहार करने के लिए दंड-जो कोई,-

(क) किसी मानव ऊतक के प्रदाय के लिए या प्रदाय करने की किसी प्रस्थापना के लिए कोई संदाय करेगा या प्राप्त करेगा ; या

(ख) किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करेगा, जो संदाय पर किसी मानव ऊतक का प्रदाय करने के लिए रजामंद है ; या

(ग) संदाय पर किसी मानव ऊतक का प्रदाय करने की प्रस्थापना करेगा ; या

(घ) किसी मानव ऊतक के प्रदाय के लिए या प्रदाय करने की प्रस्थापना के लिए कोई ऐसा इंतजाम प्रारंभ करेगा या उसके लिए बातचीत करेगा, जिसमें कोई संदाय अंतर्वलित हो ; या

(ङ) ऐसे किसी व्यक्ति निकाय के, चाहे वह सोसाइटी है, फर्म है या कंपनी है, जिसके क्रियाकलाप के रूप में या उसके अंतर्गत खंड (घ) में निर्दिष्ट किसी इंतजाम का आरंभ करना या बातचीत करना है, प्रबंध या नियंत्रण में भाग लेगा ; या

(च) (i) संदाय करने पर किसी मानव ऊतक का प्रदाय करने के लिए व्यक्तियों को आमंत्रित करने वाला ; या

(ii) संदाय करने पर किसी मानव ऊतक का प्रदाय करने की प्रस्थापना करने वाला ; या 

(iii) यह उपदर्शित करने वाला कि विज्ञापनकर्ता खंड (घ) में निर्दिष्ट कोई इंतजाम आरंभ करने या उसके संबंध में बातचीत करने के लिए रजामंद है, कोई विज्ञापन प्रकाशित करेगा या वितरित करेगा या प्रकाशित या वितरित कराएगा ; या

(छ) मिथ्या दस्तावेजों को तैयार करने या प्रस्तुत करने में दुष्प्रेरण करेगा, जिसके अंतर्गत यह स्थापित करने के लिए कि दाता, निकट नातेदार के रूप में या प्राप्तिकर्ता के प्रति स्नेह या उससे लगाव के कारण दान कर रहा है, मिथ्या शपथपत्र देना भी है,

वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने का, जो पांच लाख रुपए से कम का नहीं होगा, किंतु जो पच्चीस लाख रुपए तक का हो सकेगा, दायी होगा ।]

20. इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के उल्लंघन के लिए दंड-जो कोई इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के किसी उपबंध का अथवा मंजूर किए गए रजिस्ट्रीकरण की किसी शर्त का जिसके लिए इस अधिनियम में पृथक् रूप से कोई दंड उपबंधित नहीं है, उल्लंघन करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि  [पांच वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो बीस लाख रुपए तक का हो सकेगा,] दंडनीय होगा ।

21. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :

                परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण के लिए सभी सम्यक् तत्परता     बरती थी ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-

(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है ; और

(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

22. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान,-

(क) संबंधित समुचित प्राधिकारी द्वारा, या, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या समुचित प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा ; या

(ख) उस व्यक्ति द्वारा, जिसने, संबंधित समुचित प्राधिकारी को, ऐसी रीति से जो विहित की जाए, कथित अपराध की, और न्यायालय को परिवाद करने के अपने आशय की, कम से कम साठ दिन की सूचना दी है,

किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

                (2) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से भिन्न कोई न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

                (3) जहां उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन कोई परिवाद किया गया है वहां न्यायालय, ऐसे व्यक्ति द्वारा मांग किए जाने पर, समुचित प्राधिकारी को उसके कब्जे में के सुसंगत अभिलेखों की प्रतियां ऐसे व्यक्ति को उपलब्ध कराने का निदेश दे सकेगा ।

अध्याय 7

प्रकीर्ण

23. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।

(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के विरुद्ध नहीं होगी ।

24. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-

(क) वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए कोई दाता, धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन अपनी मृत्यु से पूर्व, अपने शरीर के किसी मानव अंग का निकाला जाना प्राधिकृत कर सकेगा ;

 [(कक) मानव अंगों या ऊतकों या दोनों, जिनकी बाबत रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी पर कर्तव्य अधिरोपित किया गया है, धारा 3 की उपधारा (1क) के खंड (i) के अधीन प्राधिकरण के लिए प्रलेखीकरण को अभिप्राप्त करने की रीति ;

(कख) धारा 3 की उपधारा (1क) के खंड (ii) के अधीन दाता या उसके संबंधियों को अवगत कराने की रीति ;

(कग) धारा 3 की उपधारा (1क) के खंड (iii) के अधीन मानव अंग सुधार केन्द्र को सूचना देने की रीति ;

(कघ) वह तारीख, जिससे उपधारा (1क) में उल्लिखित कर्तव्य, धारा 3 की उपधारा (1ख) के अधीन किसी अरजिस्ट्रीकृत अस्पताल में कार्यरत रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी को लागू होते हैं ;

(कङ) धारा 3 की उपधारा (4) के परंतुक के अधीन तकनीशियन की अर्हता और अनुभव ;]

(ख) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 3 की उपधारा (6) के अधीन मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु प्रमाणीत की जाएगी और वे शर्तें तथा अपेक्षाएं जिन्हें उस प्रयोजन के लिए पूरा किया जाना है ;

1[(खक) धारा 3 की उपधारा (6) के खंड (iii) के परंतुक के अधीन चिकित्सा विशेषज्ञ बोर्ड में सम्मिलित किए जाने वाले किसी शल्य चिकित्सक या चिकित्सक और किसी निश्चेतना विज्ञानी या गहन चिकित्सा विज्ञानी के नामनिर्देशन के  लिए शर्तें ;]

(ग) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 3 की उपधारा (7) के अधीन किसी अवयस्क की मस्तिष्क स्तंभ मृत्यु की दशा में, माता-पिता में से कोई, किसी मानव अंग के निकाले जाने का प्राधिकार दे सकेगा ;

(घ) वह प्ररूप जिसमें धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन किसी लावारिस शव से किसी मानव अंग के निकाले जाने का प्राधिकार अस्पताल या कारागार के प्रबंध या निंयत्रण के भारसाधक व्यक्ति द्वारा दिया जा सकेगा ;

(ङ) धारा 7 के अधीन किसी व्यक्ति के शरीर से निकाले गए मानव अंग के परीक्षण के लिए किए जाने वाले उपाय ;

1[(ङक) धारा 9 की उपधारा (1ख) के अधीन प्रतिरोपण के लिए अप्राप्तवय के शरीर से उसकी मृत्यु के पूर्व मानव अंगों या ऊतकों या दोनों के निकालने की रीति ;

(ङख) धारा 9 की उपधारा (4) के अधीन प्राधिकार समितियों की संरचना ;]

(च) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 9 की उपधारा (5) के अधीन कोई आवेदन दाता और प्राप्तिकर्ता द्वारा संयुक्त रूप से किया जा सकेगा ;

(छ) वह रीति जिससे धारा 12 के अधीन किसी मानव अंग के निकाले जाने और प्रतिरोपण से संबंधित सभी संभव प्रभावों, जटिलताओं और परिसंकटों को रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा दाता और प्राप्तिकर्ता को स्पष्ट किया   जाएगा ;

(ज) धारा 13 की उपधारा (3) के खंड (iii) के अधीन वे स्तरमान जो समुचित प्राधिकारी द्वारा किसी मानव अंग के निकाले जाने, भंडारकरण या प्रतिरोपण में लगे हुए अस्पतालों की बाबत प्रवर्तित कराए जाएंगे ;

(झ) धारा 13 की उपधारा (3) के खंड (ध्त्) के अधीन ऐसे अन्य अध्युपाय जो समुचित प्राधिकारी, अपने कृत्यों के अनुपालन में करेगा ;

1[(झक) धारा 13क की उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन सलाहकार समिति में नियुक्ति के लिए चिकित्सा विशेषज्ञों की अर्हताएं और निबंधन तथा शर्तें ;

(झख) धारा 13ख के खंड (घ) के अधीन किसी अन्य विषय में समुचित प्राधिकारी की शक्ति ;

(झग) धारा 13ग के अधीन मानव अंगों और ऊतकों के निकाले जाने और भंडारकरण के लिए राष्ट्रीय नेटवर्क और प्रादेशिक नेटवर्क स्थापित करने की रीति तथा उनके द्वारा निर्वहन किए जाने वाले कृत्य ;

(झघ) धारा 13घ के अधीन मानव अंगों और ऊतकों के दाताओं और प्राप्तिकर्ताओं की राष्ट्रीय रजिस्ट्री में सूचना और सभी जानकारी ;]

(ञ) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 14 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन किया जाएगा और वह फीस जो उसके साथ होगी ;

(ट) धारा 14 की उपधारा (3) के अधीन, किसी अस्पताल द्वारा रजिस्ट्रीकरण के लिए उपलब्ध कराई जाने वाली विशेषित सेवाएं और सुविधाएं, रखी जाने वाली कुशल जनशक्ति और उपस्कर तथा बनाए रखे जाने वाले स्तरमान ;

 [(टक) धारा 14 की उपधारा (4) के अधीन प्रतिरोपण समन्वयक की अर्हताएं और अनुभव ;

(टख) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 14क की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन किया जाएगा और वह फीस जो संलग्न की जाएगी ;

(टग) धारा 14क की उपधारा (3) के अधीन किसी ऊतक बैंक द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली विशेषज्ञ सेवाएं और सुविधाएं, कुशल कर्मचारी और उनके पास उपलब्ध उपस्कर और उनके द्वारा पालन किए जाने वाले मानक ;]

(ठ) वह प्ररूप जिसमें और वह अवधि जिसके लिए और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन किसी  [अस्पताल या ऊतक बैंक] को रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया जाएगा ;

(ड) वह रीति जिससे और वह फीस जिसका संदाय करने पर धारा 15 की उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का नवीकरण किया जाएगा ;

(ढ) वह रीति जिससे धारा 17 के अधीन अपील की जा सकेगी ;

(ण) वह रीति जिससे धारा 22 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन किसी व्यक्ति द्वारा किसी समुचित प्राधिकारी को कथित अपराध की और न्यायालय को परिवाद करने के अपने आशय की सूचना देने की अपेक्षा की जाएगी ; और

(त) कोई अन्य विषय जिसे विहित किए जाने की अपेक्षा है या जो विहित किया जाए ।

(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

25. निरसन और व्यावृत्ति-(1) कर्ण पटह और कर्ण अस्थि (चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए उपयोग का प्राधिकार) अधिनियम, 1982 (1982 का 28) और नेत्र (चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए उपयोग का प्राधिकार) अधिनियम, 1982 (1982 का 29) निरसित किए जाते हैं ।

                (2) तथापि, वह निरसन इस प्रकार निरसित अधिनियमों के पूर्व प्रवर्तन पर या उनके अधीन सम्यक् रूप से की गई या सहन की गई किसी बात पर प्रभाव नहीं डालेगा ।

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