उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (वेतन और
सेवा शर्त) अधिनियम, 1958
(1958 का अधिनियम संख्यांक 41)
झ्र्17 अक्तूबर, 1958ट
उच्चतम न्यायाल के झ्र्न्यायाधीशों के वेतन और
उनकी सेवा की कुछ शर्तोंट का विनियमन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के नौवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो : द्भद्भ
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नामद्भद्भइस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश झ्र्(वेतन और सेवा शर्त)ट अधिनियम, 1958 है ।
2. परिभाषाएंद्भद्भइस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,द्भद्भ
(क) कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपतिञ्ज् से भारत के मुख्य न्यायाधिपति के कर्तव्यों का पालन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 126 के अधीन नियुक्त न्यायाधीश अभिप्रेत है;
(ख) वास्तविक सेवाञ्ज् के अन्तर्गत निम्नलिखित आते हैं :द्भद्भ
(त्) न्यायाधीश के रूप में कर्तव्य पर रहते हुए, अथवा ऐसे अन्य कृत्यों के पालन में, जिनका निर्वहन करने का वह, राष्ट्रपति के अनुरोध पर जिम्मा ले, किसी न्यायाधीश द्वारा बिताया गया समय; और
(त्त्) दीर्घवकाश;
(ग) मुख्य न्यायाधिपतिञ्ज् से भारत का मुख्य न्यायाधिपति अभिप्रेत है किन्तु इसके अन्तर्गत कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति नहीं है;
(घ) उच्च न्यायालयञ्ज् से किसी राज्य का उच्च न्यायालय अभिप्रेत है;
(ङ) न्यायाधीशञ्ज् से उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत मुख्य न्यायाधिपति और कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति भी हैं ;
(च) विहितञ्ज् से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(छ) भारत में न्यायाधीश के रूप में सेवाञ्ज् से ऐसी सेवा अभिप्रेत है जो झ्र्उच्चतम न्यायालय मेंट और एक या अधिक उच्च न्यायालयों में की गई है और भारत में न्यायाधीशञ्ज् तथा भारत में न्यायाधीश के रूप में पेंशन के लिए सेवाञ्ज् का अर्थ तद्नुसार किया जाएगा;
(ज) पेंशन के लिए सेवाञ्ज् के अन्तर्गत निम्नलिखित हैं,द्भद्भ
(त्) वास्तविक सेवा;
(त्त्) संविधान के अनुच्छेद 127 के अधीन तदर्थ न्यायाधीश के रूप में उच्चतम न्यायालय की बैठकों में उपस्थित होने में उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा बिताया गया समय, यदि उसे बाद में न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है;
झ्र्(त्त्त्) वेतन की मासिक दर के बराबर दर से पूरे भत्तों पर छुट्टी की प्रत्येक अवधि की वस्तुतः ली गई मात्रा;ट
(झ) दीर्घावकाशञ्ज् से किसी वर्ष के दौरान ऐसी अवधि या अवधियां अभिप्रेत हैं जो राष्ट्रपति के पूर्वानुमोदन से बनाए गए उच्चतम न्यायालय के नियमों द्वारा या उनके अधीन दीर्घावकाश के रूप में नियत की जाएं ।
अध्याय 2
छुट्टी
3. न्यायाधीश को अनुज्ञेय छुट्टी की किस्मेंद्भद्भ(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधीश को मंजूर की गई छुट्टी, उसके विकल्प पर,द्भद्भ
झ्र्(क) पूरे भत्तों पर छुट्टी (जिसके अन्तर्गत आधे भत्तों पर छुट्टी को चिकित्सा प्रमाणपत्र पर पूरे भत्तों पर छुट्टी के रूप में परिवर्तित छुट्टी भी है); अथवाट
(ख) आधे भत्तों पर छुट्टी; अथवा
(ग) अंशतः पूरे भत्तों पर छुट्टी और अंशतः आधे भत्तों पर छुट्टी,
हो सकेगी ।
(2) इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, पूरे भत्तों पर छुट्टी की अवधि आधे भत्तों पर छुट्टी की उसी अवधि से दूनी गिनी जाएगी ।
झ्र्(3) इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए किसी न्यायाधीश को किसी कलेण्डर वर्ष में इतने दिनों की और ऐसी शर्तों के अध्यधीन, जो विहित की जाएं, आकस्मिक छुट्टी अनुज्ञेय हो सकेगी ।ट
4. शोध्य छुट्टी दर्शित करने वाला छुट्टी-खाताद्भद्भ(1) प्रत्येक न्यायाधीश के लिए एक छुट्टी-खाता रखा जाएगा जिसमें आधे भत्तों पर की छुट्टी के रूप में उसे शोध्य छुट्टी की अवधि दिखाई जाएगी ।
(2) किसी न्यायाधीश की छुट्टी के खाते में,द्भद्भ
(क) उसके नाम में निम्नलिखित जमा किए जाएंगे,द्भद्भ
(त्) वास्तविक सेवा में उसके द्वारा बिताए गए समय का चतुर्थांश; । । ।
(त्त्) जहां कोई न्यायाधीश, इस कारण कि उसे ऐसे कर्तव्यों का जो उच्चतम न्यायालय से सम्बन्धित नहीं हैं, पालन करने के लिए रोका गया है, किसी ऐसे दीर्घावकाश का उपभोग नहीं कर सकता जिसका उपभोग करने का वह उस दशा में अन्यथा, हकदार होता जब उसे इस प्रकार रोका न गया होता, ऐसे दीर्घावकाश के लिए, जिसका उसने उपभोग नहीं किया है, क्षतिपूर्ति के रूप में उतनी अवधि से दूनी अवधि, जितनी एक मास में से वह दीर्घावकाश कम करके बचती हो जिसका उसने किसी एक वर्ष में उपभोग किया है; और
झ्र्(त्त्त्) जहां न्यायाधीश, इस रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो वहां, उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उसके द्वारा अर्जित छुट्टी की अवधि ; । । । औरट
(ख) उसके द्वारा भत्तों सहित ली गई सभी छुट्टी उसके नामे डाली जाएंगी ।
(3) यह धारा 1 मई, 1958 से प्रवृत्त हुई समझी जाएगी ।
झ्र्4क. छुट्टी भुनानाद्भद्भकोई न्यायाधीश अपने पूर्ण सेवा काल में, जिसके अन्तर्गत सेवा की वह अवधि भी है जो उसने किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में या संघ या किसी राज्य के अधीन किसी पेंशन वाले पद पर या पुनर्नियोजन पर, यदि कोई हो, की है, झ्र्पूरे भत्तों के आधार पर संगणित अपने खाते में उपार्जित छुट्टी की अवधि की बाबतट अपनी सेवानिवृत्ति पर छुट्टी वेतन के नकद समतुल्य का अखिल भारतीय सेवा (छुट्टी) नियम, 1955 के अधीन ऐसी छुट्टी के भुनाए जाने के लिए विहित अधिकतम अवधि की सीमा तक दावा करने का हकदार होगा ।ट
5. जितनी छुट्टी मंजूर की जा सकती है उसका योगद्भद्भ(1) वह छुट्टी, जो किसी न्यायाधीश को, उस रूप में उसकी सेवा की सम्पूर्ण अवधि के दौरान मंजूर की जा सकती है, आधे भत्तों पर छुट्टी के रूप में, उन अवधियों के, यदि कोई हों, योग सहित, झ्र्जिसके अन्तर्गत वह अवधि भी सम्मिलित है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में उसके द्वारा अर्जित छुट्टी के रूप में धारा 4 की उपधारा (2)(क) (त्त्त्) के अधीन उसके छुट्टी के खाते में जमा की गई है,ट जो धारा 4 की उपधारा (2) (क) (त्त्) के अधीन उसके छुट्टी-खाते में उस दीर्घावकाश की, जिसका उपभोग नहीं किया गया है, क्षतिपूर्ति के रूप में जमा की गई हो, तीन वर्ष से अधिक की नहीं होगी ।
(2) पूरे भत्तों पर की कुल छुट्टी, जो किसी न्यायाधीश को उस रूप में उसकी सेवा की पूरी अवधि के दौरान मंजूर की जा सकती है, वास्तविक सेवा पर उसके द्वारा बिताई गई अवधि के, यदि कोई हो, योग सहित जोद्भद्भ
झ्र्(क) धारा 4 की उपधारा (2)(क)(त्त्) के अधीन, उस दीर्घावकाश की जिसका उपभोग नहीं किया गया है, क्षतिपूर्ति के रूप में; और
(ख) धारा 4 की उपधारा (2)(क)(त्त्त्) के अधीन उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अर्जित छुट्टी, उसके छुट्टी के खाते में जमा की गई हो, एक बटा चौबीस से अधिक नहीं होगी ।ट
झ्र्(3) धारा 5क की उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उस छुट्टी की, अधिकतम अवधि, जो एक बार में मंजूर की जाए, पूरे भत्तों पर छुट्टी की दशा में पांच मास, और किसी भी प्रकार के भत्तों सहित छुट्टी की दशा में सोलह मास, होगी ।ट
झ्र्5क. आधे भत्तों पर छुट्टी का पूरे भत्तों पर छुट्टी में परिवर्तित किया जानाद्भद्भ(1) धारा 5 की उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, किसी न्यायाधीश को, न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा की कुल अवधि के दौरान, आधे भत्तों पर छुट्टी को चिकित्सा प्रमाणपत्र पर, अधिक से अधिक तीन मास की, पूरे भत्तों पर छुट्टी के रूप में परिवर्तित करने के लिए अनुज्ञात किया जा सकेगा ।
(2) पूरे भत्तों पर छुट्टी की अधिकतम अवधि की, जो धारा 5 की उपधारा (3) के अधीन किसी न्यायाधीश को एक ही समय में मंजूर की जा सकती है, गणना करने में, इस धारा के अधीन उसे अनुज्ञात परिवर्तित छुट्टी की अवधि को हिसाब में नहीं लिया जाएगा ।ट
6. अनर्जित छुट्टी मंजूर किया जानाद्भद्भधारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अधिकतम सीमा के अधीन रहते हुए, किसी न्यायाधीश को, उसकी जमा छुट्टी से अधिक आधे भत्तों पर छुट्टी,द्भद्भ
(त्) चिकित्सा प्रमाणपत्र पर मंजूर की जा सकती है, अथवा
(त्त्) चिकित्सा प्रमाणपत्र पर देने से अन्यथा, न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा की कुल अवधि के दौरान, छह मास से अनधिक के लिए, अथवा कुल मिलाकर छह मास से अनधिक की दो या अधिक अवधियों के लिए मंजूर की जा सकती है :
परन्तु यदि ऐसी संभावना न हो कि न्यायाधीश अपने कर्तव्यों पर लौटेगा और मंजूर की गई छुट्टी अर्जित करेगा तो ऐसी छुट्टी मंजूर नहीं की जाएगी ।
7. विशेष निःशक्तता छुट्टीद्भद्भन्यायाधीश को ऐसी परिस्थितियों में, ऐसे भत्तों पर, और ऐसी अवधियों के लिए, जो विहित की जाएं, विशेष निःशक्तता छुट्टी मंजूर की जा सकती है ।
8. असाधारण छुट्टीद्भद्भन्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा की कुल अवधि के दौरान छह मास से अनधिक की अथवा कुल मिलाकर छह मास से अनधिक की दो या अधिक अवधियों के लिए, असाधारण छुट्टी, इस अध्याय के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन अनुज्ञेय छुट्टी के अतिरिक्त किसी न्यायाधीश को मंजूर की जा सकती है किंतु ऐसी छुट्टी के दौरान या उसकी बाबत कोई भी वेतन या भत्ते संदेय नहीं होंगे ।
झ्र्9. छुट्टी भत्तेद्भद्भकिसी न्यायाधीश को संदेय छुट्टी वेतन की मासिक दर धारा 3 की उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार होगी ।ट
10. दीर्घावकाश के साथ छुट्टी का जोड़ा जानाद्भद्भन्यायाधीश को छुट्टी के साथ पूरे वेतन पर के दीर्घवकाश को मिला लेने की, अनुज्ञा दी जा सकती है, यदिद्भद्भ
(क) जहां दीर्घावकाश एक निरन्तर अवधि के लिए है वहां, वह छुट्टी या तो दीर्घावकाश के प्रारम्भ पर ली गई हो या उसके अन्त में, किन्तु दोनों ही दशाओं में नहीं;
(ख) जहां दीर्घावकाश दो अलग-अलग अवधियों में विभाजित किया जाता है वहां, छुट्टी उस दीर्घावकाश की दो अवधियों के बीच की अन्तरावधि या अन्तवधि के एक भाग के लिए, या उस दीर्घवकाश की दूसरी अवधि और ठीक अगले दीर्घावकाश के प्रारम्भ के बीच की अन्तरावधि या अन्तरावधि के एक भाग के लिए ली जाए :
परन्तु दीर्घावकाश को छुट्टी के साथ मिलाने की ऐसी कोई अनुज्ञा उस दशा में नहीं दी जाएगी जब दीर्घावकाश की अवधि के दौरान किसी कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति को नियुक्त करना आवश्यक हो जाता है अथवा उस न्यायाधीश के ऐसी छुट्टी के अन्त में अपने कर्तव्य पर लौटने की संभावना न हो ।
11. छुट्टी या दीर्घावकाश से अधिक ठहरने के परिणामद्भद्भ(1) यदि कोई न्यायाधीश अपनी छुट्टी या किसी दीर्घावकाश के, चाहे उसमें छुट्टी मिलाई गई हो या नहीं, बाद भी छुट्टी पर बना रहता है तो, यथास्थिति, उसे, उतनी छुट्टी से, जितनी उसे मंजूर की गई है, अधिक की अवधि में उसकी अनुपस्थिति के लिए या दीर्घावकाश की समाप्ति के बाद की उसकी अनुपस्थिति के लिए, कोई वेतन नहीं मिलेगा :
परन्तु यदि ऐसी अनुपस्थिति उन परिस्थितियों के कारण हुई है जो उसके नियंत्रण के बाहर हैं तो अनुपस्थिति की अवधि को छुट्टी माना जा सकता है और उसे उसके छुट्टी के खाते में डाला जा सकता है ।
(2) इस अधिनियम की किसी भी बात का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकेगा कि वह किसी न्यायाधीश से यह अपेक्षा करती है कि वह अपनी छुट्टी की अवधि की समाप्ति पर, जब वह अवधि किसी दीर्घावकाश के प्रारम्भ से ठीक पूर्व समाप्त हो रही हो, पुनः पद ग्रहण करे और न ही वह किसी कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति को इस बात के लिए प्राधिकृत करती है कि वह दीर्घावकाश के दौरान कार्यकारी नियुक्ति पर बना रहे ।
12. छुट्टी मंजूर करने के लिए सक्षम प्राधिकारीद्भद्भकिसी न्यायाधीश को छुट्टी मंजूर करने या नामंजूर करने अथवा उसे पहले ही मंजूर की गई छुट्टी प्रतिसंहृत करने या कम करने के लिए सक्षम प्राधिकारी राष्ट्रपति होगा जो इस शक्ति का प्रयोग मुख्य न्यायाधिपति से परामर्श करने के पश्चात् करेगा ।
अध्याय 3
झ्र्वेतन और पेंशनट
झ्र्12क. न्यायाधीशों के वेतनद्भद्भ(1) भारत के मुख्य न्यायमूर्ति को वेतन के रूप में झ्र्एक लाख रुपए प्रति मासट संदाय किया जाएगा ।
(2) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को वेतन के रूप में 3झ्र्नब्बे हजार रुपए प्रति मासट का संदाय किया जाएगा ।ट
13. न्यायाधीशों को संदेय पेंशनद्भद्भइस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को, उसकी सेवानिवृत्ति पर पेंशन, अनुसूची के भाग 1 के उपबन्धों के अनुसार और केवल तभी संदेय होगी जब तकद्भद्भ
। । । । । ।
(ख) उसने पैंसठ वर्ष की आयु न प्राप्त कर ली हो; अथवा
(ग) चिकित्सीय दृष्टि से यह प्रमाणित न कर दिया गया हो कि उसकी सेवानिवृत्ति अस्वस्थ्य रहने के कारण आवश्यक हो गई है ।
झ्र्स्पष्टीकरणद्भद्भइस धारा में स्त्र्न्यायाधीशऱ् से ऐसा न्यायाधीश अभिप्रेत है जिसने संघ या किसी राज्य के अधीन कोई अन्य पेंशन योग्य पद धारण न किया हो और इसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है, जो 20 मई, 1954 को न्यायाधीश के रूप में सेवा में था और इसके अंतर्गत ऐसा न्यायाधीश भी है, जिसने संघ या राज्य के अधीन कोई अन्य पेंशन योग्य पद धारण कर लेने पर, अनुसूची के भाग 1 के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन किया है ।ट
झ्र्13क. सेवा में परिवर्धित वर्षों का फायदाद्भद्भइस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे न्यायाधीश की जो संविधान के अनुच्छेद 124 के खंड (3) के उपखंड (ख) के अधीन ऐसे न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हित था, सेवा में उसकी पेंशन के प्रयोजनों के लिए दस वर्ष की अवधि जोड़ी जाएगी ।ट
14. ऐसे न्यायाधीशों की बाबत जो सेवा के सदस्य हैं पेंशन के लिए विशेष उपबन्धद्भद्भ झ्र्(1) ऐसे प्रत्येक न्यायाधीश को, जिसने संघ या किसी राज्य के अधीन कोई अन्य पेंशन योग्य पद धारण किया है, उसकी निवृत्ति पर अनुसूची के भाग 3 के उपबंधों के अनुसार पेंशन संदत्त होगी :
परन्तु ऐसा प्रत्येक न्यायाधीश, यथास्थिति, या तो अनुसूची के भाग 1 या अनुसूची के भाग 3 के अधीन उसको संदेय पेंशन प्राप्त करने का चयन करेगा और उसको संदेय पेंशन तद्नुसार संगणित की जाएगी ।ट
झ्र्(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायाधीश, जिसको वह उपधारा लागू होती है और जो 1974 के अक्तूबर के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् सेवा में है, यदि उसने अनुसूची के, । । । भाग 3 के अधीन अपने को संदेय पेंशन प्राप्त करने का चयन उस उपधारा के परन्तुक के अधीन उस तारीख के पूर्व, जिसको उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) संशोधन अधिनियम, 1976 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, कर लिया है तो, ऐसे चयन को रद्द कर सकता है और अनुसूची के भाग 1 के अधीन संदेय पेंशन प्राप्त करने का फिर से चयन कर सकता है और ऐसे किसी न्यायाधीश के बारे में, जिसकी मृत्यु ऐसी अनुमति की तारीख से पूर्व हो जाती है, यह समझा जाएगा कि उसने उक्त भाग 1 के उपबन्धों द्वारा शासित होने के लिए फिर से चयन उस दशा में किया है जिसमें उस भाग के उपबन्ध उसके लिए अधिक अनुकूल हैं ।ट
15. पेंशन के लिए सेवा में कोई अवधि जोड़ने की राष्ट्रपति की शक्तिद्भद्भराष्ट्रपति विशेष कारणों से यह निदेश दे सकेगा कि तीन मास से अनधिक की कोई भी अवधि किसी न्यायाधीश की पेंशन के लिए सेवा में जोड़ दी जाएगी और इस प्रकार जोड़ी गई किसी अवधि की संगणना पेंशन के प्रयोजनों के लिएद्भद्भ
(क) ऐसे न्यायाधीश की दशा में, जिसने मुख्य न्यायाधिपति के रूप में उच्चतम न्यायालय में सेवा की है, मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा के रूप में;
(ख) किसी अन्य न्यायाधीश की दशा में, किसी अन्य न्यायाधीश के रूप में की गई सेवा के रूप में,
की जाएगी ।
16. असाधारण पेंशनद्भद्भकिसी न्यायाधीश को ऐसी परिस्थितियों में और ऐसे मापमानों पर, जो विहित किए जाएं, असाधारण पेंशन और उपदान दिए जा सकते हैं ।
झ्र्16क. कुटुम्ब पेंशन और उपदानद्भद्भ झ्र्(1) जहां किसी ऐसे न्यायाधीश की, जो उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) संशोधन अधिनियम, 1986 के प्रारम्भ पर या उसके पश्चात् सेवा में है,द्भद्भ
(क) सेवानिवृत्ति के पूर्व मृत्यु हो जाती है जहां उसकी मृत्यु की तारीख को झ्र्उसके वेतन के पचास प्रतिशतट की दर से संगणित कुटुम्ब पेंशनट । । । उसके हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों को संदेय होगी और इस प्रकार संदेय रकम न्यायाधीश की मृत्यु की तारीख के अगले दिन से सात वर्ष की अवधि के लिए या उस तारीख तक की अवधि के लिए, जिसको, यदि वह न्यायाधीश जीवित रहता तो, उसने पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त की होती, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, 5झ्र्और उसके पश्चात्, उसके वेतन के तीस प्रतिशत 6। । । की दर सेट संदत्त की जाएगी, और
झ्र्(ख) पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने पर सेवानिवृत्ति के पश्चात् मृत्यु हो जाती है 5झ्र्वहां कुटुम्ब पेंशन उसके वेतन का झ्र्तीस प्रतिशतट 6। । । होगीट और उसके हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों को संदेय होगी;
(ग) समयपूर्व सेवानिवृत्ति लेने के पश्चात् और पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने के पूर्व सेवानिवृत्ति के पश्चात् मृत्यु हो जाती है वहां कुटुंब पेंशन की संगणना खंड (क) में विनिर्दिष्ट दरों से की जाएगी और उसके हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों को संदेय होगी :ट
झ्र्परंतु किसी भी दशा में, इस उपधारा के अधीन संगणित कुटुंब पेंशन की रकम इस अधिनियम के अधीन न्यायाधीश को संदेय पेंशन से अधिक नहीं होगी ।ट
स्पष्टीकरणद्भद्भइस उपधारा के अधीन कुटुम्ब पेंशन के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों का अवधारण करने के प्रयोजनों के लिए, द्भद्भ
(त्) किसी ऐसे न्यायाधीश के संबंध में, जो अनुसूची के भाग 1 के अधीन पेंशन लेने का चयन करता है या पेंशन पाने का पात्र है, केन्द्रीय सिविल सेवा, समूह स्त्र्कऱ् के किसी अधिकारी के संबंध में कुटुम्ब पेंशन के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों की बाबत तत्समय प्रवृत्त नियम, अधिसूचनाएं और आदेश लागू होंगे;
(त्त्) किसी ऐसे न्यायाधीश के संबंध में, जो अनुसूची के । । । भाग 3 के अधीन पेंशन लेने का चयन करता है, कुटुम्ब पेंशन के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों की बाबत, यदि वह न्यायाधीश नियुक्त न किया गया होता तो, उसकी सेवा के साधारण नियम लागू होंगे और न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा उसमें की गई सेवा मानी जाएगी ।ट
(2) ऐसे नियम, अधिसूचाएं और आदेश, जो केन्द्रीय सिविल सेवा के प्रथम वर्ग के अधिकारी को या उसके सम्बन्ध में, मृत्यु तथा निवृत्ति उपदान फायदा प्रदान किए जाने की बाबत तत्समय प्रवृत्त है (जिनके अन्तर्गत इस प्रयोजन के लिए पेंशन की कटौतियों से सम्बन्धित उपबन्ध भी हैं) ऐसे न्यायाधीश के सम्बन्ध में, जो 1974 के अक्तूबर के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् सेवा में है और जिसकी निवृत्ति या मृत्यु उन परिस्थितियों में हो जाती है जिनको धारा 16 लागू नहीं होती है, मृत्यु तथा निवृत्ति उपदान फायदा प्रदान किए जाने के लिए या उसके संबंध में इन उपांतरों के अधीन रहते हुए लागू होंगे किद्भद्भ
(त्) उपदान का हकदार होने के प्रयोजन के लिए न्यूनतम अर्हक सेवा दो वर्ष छह मास होगी;
(त्त्) उपदान की रकम की संगणना न्यायाधीश के रूप में झ्र्प्रत्येक संपूरित छह मास की अवधिट की सेवा के लिए 1झ्र्दस दिनट के वेतन के आधार पर की जाएगी; । । ।
2। । । । । ।
स्पष्टीकरणद्भद्भ झ्र्उपधारा (2) मेंट न्यायाधीशञ्ज् पद का वही अर्थ है जो धारा 13 में है ।ट
झ्र्16ख. पेंशन या कुटुंब पेंशन की अतिरिक्त मात्राद्भद्भयथास्थिति, प्रत्येक सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उसकी मृत्यु के पश्चात् कुटुंब, निम्नलिखित मान के अनुसार पेंशन या कुटुंब पेंशन की अतिरिक्त मात्रा का हकदार होगा, अर्थात् :द्भद्भ
पेंशनभोगी या कुटुंब पेंशनभोगी की आयु पेंशन या कुटुंब पेंशन की अतिरिक्त मात्रा
अस्सी वर्ष से लेकर पचासी वर्ष से कम मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का बीस प्रतिशत ।
पचासी वर्ष से लेकर नब्बे वर्ष से कम मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का तीस प्रतिशत ।
नब्बे वर्ष से लेकर पचानवे वर्ष से कम मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का चालीस प्रतिशत ।
पचानवे वर्ष के लेकर सौ वर्ष से कम मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का पचास प्रतिशत ।
एक सौ वर्ष या उससे अधिक मूल पेंशन या कुटुंब पेंशन का सौ प्रतिशत ।ट
17. ऐसे न्यायाधीश को संदेय पेंशन जिसे उस रूप में नियुक्ति के समय पेंशन मिल रही थीद्भद्भयदि उच्चतम न्यायालय में अपनी नियुक्ति के समय किसी न्यायाधीश को, किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में किसी पूवर्तन सेवा की बाबत या संघ या राज्य के अधीन किसी अन्य पेंशन योग्य सिविल पद में पूर्वतन सेवा की बाबत कोई पेंशन मिल रही है तो इस अधिनियम के अधीन उसे संदेय पेंशन उच्चतम न्यायालय में सेवा के लिए अतिरिक्त पेंशन होगी जो उसकी मूल पेंशन और उस पेंशन के बीच के अन्तर के बराबर होगी जिसके लिए वह इस अधिनियम के अधीन तब हकदार होता जब उच्चतम न्यायालय में उसकी सेवा उस पूर्वतन सेवा के पश्चात्, जिसके लिए उसकी मूल पेंशन मंजूर की गई थी, निरंतर की गई होती ।
। । । । । । ।
19. पेंशन का संराशीकरणद्भद्भउस समय प्रवृत्त सिविल पेंशन (संराशीकरण) नियम, आवश्यक उपांतरों सहित, न्यायाधीशों को लागू होंगे ।
20. भविष्य निधिद्भद्भप्रत्येक न्यायाधीश साधारण भविष्य निधि (केन्द्रीय सेवा) में अभिदाय करने का हकदार होगा :
परन्तु ऐसा न्यायाधीश । । । जिसने संघ या राज्य के अधीन कोई अन्य पेंशन योग्य सिविल पद धारण किया है, उस भविष्य निधि में अभिदाय करता रहेगा जिसमें वह न्यायाधीश के रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व अभिदाय करता था :
परन्तु यह और कि ऐसा न्यायाधीश, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व नियुक्त किया गया था, उस भविष्य निधि में अभिदाय करता रहेगा जिसमें वह ऐसे प्रारम्भ से ठीक पूर्व अभिदाय करता था ।
झ्र्20क. निक्षेप सहबद्ध बीमा स्कीमद्भद्भसाधारण भविष्य निधि (केन्द्रीय सेवा) नियम, 1960 के अधीन तत्समय प्रवृत्त निक्षेप सहबद्ध बीमा स्कीम प्रत्येक न्यायाधीश को, चाहे वह साधारण भविष्य निधि (केन्द्रीय सेवा) या धारा 20 में निर्दिष्ट किसी अन्य भविष्य निधि में अभिदाय करता हो, लागू होगी ।ट
21. पेंशन मंजूर करने के लिए सक्षम प्राधिकारीद्भद्भअसाधारण पेंशन और उपदानों को मंजूर किए जाने के संबंध में सुसंगत नियमों द्वारा जैसा अभिव्यक्त रूप से उपबंधित किया जाए उसे छोड़कर, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किसी न्यायाधीश को पेंशन मंजूर करने के लिए सक्षम प्राधिकारी राष्ट्रपति होगा ।
अध्याय 4
प्रकीर्ण
22. न्यायाधीश को यात्रा भत्तेद्भद्भन्यायाधीश को भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर कर्तव्य पर यात्रा करने में हुए व्ययों की प्रतिपूर्ति के लिए ऐसा उचित भत्ता मिलेगा और उसे यात्रा के संबंध में ऐसी उचित सुविधाएं दी जाएंगी जो समय-समय पर विहित की जाएं ।
23. किराया-मुक्त मकानों की सुविधाएं और सेवा की अन्य शर्तेंद्भद्भ(1) प्रत्येक न्यायाधीश को ऐसे नियमों के अनुसार, जो इस निमित्त समय-समय पर बनाए जाएं, रहने के लिए सरकारी मकान के उपयोग का हक होगा ।
झ्र्(1क) यदि कोई न्यायाधीश सरकारी मकान का उपयोग नहीं करता है तो उसे झ्र्उसके वेतन के तीस प्रतिशत ॥। की रकम के बराबरट प्रतिमास भत्ते का संदाय किया जा सकेगा ।ट
(2) प्रत्येक न्यायाधीश और उसके कुटुम्ब के सदस्य ऐसे चिकित्सीय-उपचार के लिए तथा अस्पतालों में वास सुविधा प्राप्त करने के लिए ऐसी सुविधाओं के हकदार होंगे जो समय-समय पर विहित की जाएं ।
(3) किसी न्यायाधीश की सेवा की ऐसी शर्तें, जिनके लिए इस अधिनियम में कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, वे होंगी, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।
झ्र्(4) उपधारा (1), उपधारा (2) और उपधारा (3), 26 जनवरी, 1950 को प्रवृत्त हुई समझी जाएंगी और उपधारा (1क), 9 मई, 1986 को प्रवृत्त हुई समझी जाएगी तथा उक्त उपधाराओं में से किसी के अधीन बनाया गया कोई नियम इस प्रकार बनाया जा सकेगा कि उसे किसी ऐसी तारीख से भूतलक्षी प्रभाव दिया जा सके जो संबंधित उपधाराओं के प्रारंभ से पहले की न हो ।
झ्र् झ्र्23क. सवारी सुविधाद्भद्भप्रत्येक न्यायाधीश स्टॉफ कार और झ्र्दो सौ लीटर प्रतिमास ईंधन या र्इंधन की प्रतिमास वास्तविक खपत,ट इनमें से जो भी कम हो, का हकदार होगा ।ट
23ख. सत्कार भत्ताद्भद्भमुख्य न्यायमूर्ति और प्रत्येक अन्य न्यायाधीश झ्र्क्रमशः झ्र्बीस हजार रुपएट प्रति मास और 9झ्र्पंद्रह हजारट रुपए प्रति मासट सत्कार भत्ता पाने का हकदार होगा ।
23ग. सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए चिकित्सा सुविधाएंद्भद्भप्रत्येक सेवानिवृत्त न्यायाधीश अपने लिए और अपने कुटुंब के लिए उस तारीख से, जिसको उच्चतम न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) संशोधन अधिनियम, 1976 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, चिकित्सीय उपचार के संबंध में वैसी ही सुविधाओं का और वैसी ही शर्तों पर हकदार होगा जिनके लिए और जिन पर केन्द्रीय सिविल सेवा के प्रथम वर्ग का सेवानिवृत्त अधिकारी और उसका कुटुम्ब केन्द्रीय सरकार के किन्हीं तत्समय प्रवृत्त नियमों और आदेशों के अधीन हकदार है ।ट
झ्र्23घ. न्यायाधीश द्वारा प्राप्त कतिपय परिलब्धियों पर आय-कर के संदाय के दायित्व से छूटद्भद्भआय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) में किसी बात के होते हुए भी,द्भद्भ
(क) धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन न्यायाधीश को दिए गए किरायामुक्त झ्र्सरकारी मकान का मूल्य या उस धारा की उपधारा (1क) के अधीन उसे संदत्त भत्ताट;
(ख) धारा 23क के अधीन न्यायाधीश को दी गई सवारी सुविधाओं का मूल्य;
(ग) धारा 23ख के अधीन न्यायाधीश को दिया गया सत्कार भत्ता;
झ्र्(घ) न्यायाधीश और उसके कुटुम्ब के सदस्यों को दी गई छुट्टी यात्रा रियायत का मूल्य,ट
आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 15 के अधीन वेतनञ्ज् शीर्ष के अधीन प्रभार्य उसकी आय की संगणना करने में सम्मिलित नहीं किया जाएगा ।ट
24. नियम बनाने की शक्तिद्भद्भ(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इन नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं भी बातों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :द्भद्भ
(क) किसी न्यायाधीश की अनुपस्थिति छुट्टी जिसके अंतर्गत विशेष निःशक्तता छुट्टी भी है;
झ्र्(कक) आकस्मिक छुट्टियों की संख्या और वे शर्तें, जिनके अध्यधीन इन्हें धारा 3 की उपधारा (3) के अधीन अनुज्ञात किया जा सकेगा;ट
(ख) न्यायाधीश को संदेय पेंशन, जिसके अंतर्गत असाधारण पेंशनें और उपदान भी हैं;
(ग) न्यायाधीश के यात्रा-भत्ते;
(घ) न्यायाधीश द्वारा सरकारी मकान का उपयोग;
(ङ) न्यायाधीश के चिकित्सीय उपचार की सुविधाएं और उसकी सेवा की अन्य शर्तें;
(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
झ्र्(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में, पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।ट
25. व्यावृत्तियांद्भद्भइस अधिनियम की किसी बात का ऐसा प्रभाव नहीं होगा जिससे कि किसी न्यायाधीश को, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर न्यायाधीश के रूप में सेवा कर रहा है, उसकी अनुपस्थिति छुट्टी की बाबत विशेषाधिकारों और भत्तों या उसके अधिकारों (जिनके अंतर्गत छुट्टी-भत्ते भी हैं) या पेंशन के लिए उन निबंधनों की अपेक्षा कम अनुकूल हों जिनके लिए वह हकदार होता यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता ।
अनुसूची
(धारा 13 और 14 देखिए)
न्यायाधीशों की पेंशनें
भाग 1
झ्र्1. इस भाग के उपबंध ऐसे न्यायाधीश को, जो संघ या किसी राज्य के अधीन किसी अन्य पेंशन योग्य पद पर नहीं रहा है, लागू होंगे और ऐसे व्यक्ति को भी, जो 20 मई, 1954 को न्यायाधीश के रूप में सेवा में था और ऐसे न्यायाधीश को, जिसने संघ या राज्य के अधीन किसी अन्य पेंशन योग्य पद पर रहते हुए इस भाग के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन किया है, लागू होंगे ।ट
2. इस भाग के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे मुख्य न्यायाधिपति को, जिसे यह भाग लागू होता है । । । संदेय पेंशन की रकम वह होगी जो निम्नलिखित रकमों के योग के बराबर हो, अर्थात्द्भद्भ
(क) उस पेंशन के बराबर रकम, जो उसे उच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) अधिनियम, 1954 (1954 का 28) की प्रथम अनुसूची के भाग 1 में दिए गए मापमान और उपबंधों के अनुसार संदेय होती यदि वह सेवा न्यायाधीश के रूप में किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा होती;
(ख) उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के रूप में सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष के लिए झ्र्बारह हजार एक सौ अस्सी रुपएट प्रति वर्ष की अतिरिक्त रकम, जब तक कि वह 5झ्र्तीन लाख उनहत्तर हजार तीन सौ रुपएट प्रति वर्ष की पेंशन पाने का हकदार नहीं हो जाता, और उसके पश्चात् ऐसी सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष के लिए झ्र्इकतीस हजार तीन सौ रुपएट की अतिरिक्त रकमः
परंतु उसकी पेंशन की कुल रकम किसी भी दशा में 1झ्र्छह लाख रुपएट प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी ।
3. किसी अन्य न्यायाधीश को, जिसे यह भाग लागू होता है, । । । संदेय पेंशन वह रकम होगी जो उस पेंशन के बराबर हो जो उसे उच्च न्यायालय न्यायाधीश (सेवा शर्त) अधिनियम, 1954 (1954 का 28) की प्रथम अनुसूची के भाग 1 के मापमान और उपबंधों के अनुसार संदेय होती यदि वह सेवा न्यायाधीश के रूप में किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा होती :
झ्र्परन्तु इस पैरा के अधीन पेंशन किसी भी दशा में 1झ्र्पांच लाख चालीस हजार रुपएट प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी ।ट
4. यदि उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश, जिसने उसके कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति के रूप में सेवा की है, तत्पश्चात् उसका मुख्य न्यायाधिपति नियुक्त हो जाता है तो कार्यकारी मुख्य न्यायाधिपति के रूप में उसकी सेवा, इस भाग के पैरा 2 के प्रयोजनों के लिए मुख्य न्यायाधिपति के रूप में की गई सेवा मानी जाएगी ।ट
2। । । । ।
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भाग 3
1. इस भाग के उपबंध ऐसे न्यायाधीश को लागू होंगे जो संघ या राज्य के अधीन किसी झ्र्पेंशन योग्य पदट पर रहा है (किन्तु भारतीय सिविल सेवा का सदस्य नहीं है) और जिसने भाग 1 के अधीन संदेय पेंशन लेने का चयन नहीं किया है ।
2. ऐसे न्यायाधीश को संदेय पेंशन,द्भद्भ
(क) वह पेंशन होगी, जिसके लिए वह, यदि वह न्यायाधीश के रूप में नियुक्त न किया गया होता तो, अपनी सेवा के साधारण नियमों के अधीन हकदार है और भारत में न्यायाधीश के रूप में उसकी सेवा उस पेंशन की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए उसमें की गई सेवा समझी जाएगी ; और
(ख) पेंशन के लिए भारत में न्यायाधीश के रूप में सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष की बाबत 1झ्र्सोलह हजार बीस रुपएट वार्षिक की विशेष अतिरिक्त पेंशन होगी । । ।
झ्र्परंतु खंड (क) के अधीन पेंशन और खंड (ख) के अधीन अतिरिक्त पेंशन, एक साथ मिलकर किसी भी दशा में, किसी मुख्य न्यायाधिपति की दशा में 1झ्र्छह लाख रुपएट प्रतिवर्ष और किसी अन्य न्यायाधीश की दशा में 1झ्र्पांच लाख चालीस हजार रुपएट प्रतिवर्ष से अधिक नहीं होगी ।ट
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