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बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण ( Recovery Of Debts Due To Banks And Financial Institutions Act, 1993 (Repealed) )


 

बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण

वसूली अधिनियम, 1993

(1993 का अधिनियम संख्यांक 51)

[27 अगस्त, 1993]

बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋणों के शीघ्र न्यायनिर्णयन

और वसूली के लिए अधिकरणों की स्थापना का

तथा उससे संबंधित या आनुषंगिक

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के चवालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारंभ और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण वसूली अधिनियम, 1993 है ।

                (2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।

                (3) यह 24 जून, 1993 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।

                (4) इस अधिनियम के उपबन्ध वहां लागू नहीं होंगे जहां किसी बैंक या वित्तीय संस्था को अथवा किन्हीं बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के संघ को शोध्य ऋण की रकम दस लाख रुपए से या एक लाख रुपए से अन्यून ऐसी अन्य रकम से कम है जो केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो: -

                                (क) अपील अधिकरण" से धारा 8 की उपधारा (1) अधीन स्थापित अपील अधिकरण अभिप्रेत है;

                                (ख) आवेदन" से धारा 19 के अधीन अधिकरण को किया गया आवेदन अभिप्रेत है;

                (ग) नियत दिन" से अधिकरण या अपील अधिकरण के संबंध में वह तारीख अभिप्रेत है जिसको ऐसा अधिकरण, यथास्थिति, धारा 3 की उपधारा (1) या धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित किया जाता है;

                (घ) बैंक" से अभिप्रेत है, -

                                (i) कोई बैंककारी कंपनी;

                                (ii) कोई तत्स्थानी नया बैंक;

                                (iii) भारतीय स्टेट बैंक;

                                (iv) कोई समनुषंगी बैंक;

                                (v) कोई प्रादेशिक ग्रामीण बैंक; या

                                 [(vi) कोई बहुराज्य सरकारी बैंक;]

(ङ) बैंककारी कम्पनी" का वही अर्थ है जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (ग) में है;

 

 [(ङक) अध्यक्ष" से धारा 9 के अधीन नियुक्त किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;]

(च) तत्स्थानी नया बैंक" का वही अर्थ है जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (घक) में है;

 [(छ) ऋण" से कोई ऐसा दायित्व (जिसके अंतर्गत ब्याज है) अभिप्रेत है जिसके बारे में किसी बैंक या किसी वित्तीय संस्था या बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के किसी संघ द्वारा यह दावा किया जाता है कि वह तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन बैंक या वित्तीय संस्था अथवा संघ द्वारा हाथ में लिए गए किसी कारबार-क्रियाकलाप के अनुक्रम के दौरान किसी व्यक्ति से नकदी में या अन्यथा शोध्य है, चाहे वह प्रतिभूत या अप्रतिभूत या नियत हो अथवा किसी सिविल न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश या किसी माध्यस्थम् अधिनिर्णय या अन्यथा के अधीन अथवा किसी बंधक के अधीन संदेय हो, तथा वह आवेदन की तारीख को विद्यमान हो और वैध रूप से वसूल किए जाने योग्य हो ;]

(ज) वित्तीय संस्था" से अभिप्रेत है, -

                (i) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क के अर्थ में कोई लोक वित्तीय संस्था;

                 [(iक) प्रतिभूतिकरण कंपनी या पुनर्गठन कंपनी, जिसने वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002(2002 का 54) की धारा 3 की उपधारा (4) के अधीन रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र प्राप्त किया है;]

                (ii) कोई ऐसी अन्य संस्था जिसे केन्द्रीय सरकार, अपने कारबारी क्रियाकलाप और भारत में अपने कार्यक्षेत्र को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे;

(झ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ञ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

1[(ञक) पीठासीन अधिकारी" से धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त ऋण वसूली अधिकरण का पीठासीन अधिकारी अभिप्रेत है;]

(ट) वसूली अधिकारी" से धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अधिकरण के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा, नियुक्त वसूली अधिकारी अभिप्रेत है;

(ठ) प्रादेशिक ग्रामीण बैंक" से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अभिप्रेत है;

(ड) भारतीय स्टेट बैंक" से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक अभिप्रेत है;

(ढ) समनुषंगी बैंक" का वही अर्थ है जो भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 के खंड (ट) में है;

(ण) अधिकरण" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित अधिकरण अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

अधिकरण और अपील अधिकरण की स्थापना

3. अधिकरण की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन ऋण वसूली अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए, अधिसूचना द्वारा एक या अधिक अधिकरण स्थापित करेगी, जिसका नाम ऋण वसूली अधिकरण होगा ।

                (2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अधिसूचना में ऐसे क्षेत्रों को भी विनिर्दिष्ट करेगी, जिनके भीतर अधिकरण, अपने समक्ष फाइल किए गए आवेदनों को ग्रहण करने और उनका विनिश्चय करने के लिए अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगा ।

4. अधिकरण की संरचना-(1) अधिकरण केवल एक व्यक्ति से (जिसे इसमें इसके पश्चात् पीठासीन अधिकारी कहा गया है) मिलकर बनेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार एक अधिकरण के पीठासीन अधिकारी को अन्य अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगी ।

5. पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं-कोई व्यक्ति, [किसी अधिकरण के पीठसीन अधिकारी] रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह जिला न्यायाधीश है या रहा है या जिला न्यायाधीश होने के लिए अर्हित है ।

6. पदावधि-अधिकरण का पीठासीन अधिकारी अपने पद ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि या [बासठ वर्ष] की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, अपना पद धारण करेगा ।

7. अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिकरण के लिए [एक या अधिक वसूली अधिकारी] तथा ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों का उपबंध करेगी जो वह सरकार ठीक समझे ।

                (2) अधिकरण के 3[वसूली अधिकारियोंट तथा अन्य अधिकारी, और कर्मचारी, पीठासीन अधिकारी के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।

                (3) अधिकरण के 3[वसूली अधिकारियों] तथा अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।

8. अपील अधिकरण की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अपील अधिकरणों को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक अपील अधिकरण स्थापित करेगी, जिसका नाम ऋण वसूली अपील अधिकरण होगा ।

                (2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिसूचना में ऐसे अधिकरणों को भी विनिर्दिष्ट करेगी जिनके संबंध में अपील अधिकरण, अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगा ।

                 [(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार किसी एक अपील अधिकरण के अध्यक्ष को, अन्य अपील अधिकरण के अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगी ।]

9. अपील अधिकरण की संरचना-अपील अधिकरण केवल एक व्यक्ति से (जिस इसमें इसके पश्चात् 1[अपील अधिकरण का अध्यक्ष] कहा गया है) मिलकर बनेगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, नियुक्त किया जाएगा ।

10. अपील अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं-कोई व्यक्ति, 1[अपील अधिकरण के अध्यक्ष] के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा, जब-

                                (क) वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या न्यायाधीश होने के लिए अर्हित है; या

                (ख) वह भारतीय विधिक सेवा का सदस्य रहा है और जिसने उस सेवा की श्रेणी 1 का पद, कम से कम तीन वर्ष तक धारण किया है; या

                (ग) जिसने 1[किसी अधिकरण के अध्यक्ष] का पद कम से कम तीन वर्ष तक धारण किया है ।

11. पदावधि-1[किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष] अपने पद ग्रहण करने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक या [पैंसठ वर्ष] की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, अपना पद धारण करेगा ।

12. अपील अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-धारा 7 के उपबंध (उनके सिवाय जो वसूली अधिकारी से संबंधित हैं), जहां तक हो सके अपील अधिकरण को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे अधिकरण को लागू होते हैं और तद्नुसार उस धारा में, अधिकरण" के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे अपील अधिकरण" के प्रति निर्देश हैं और वसूली अधिकारी" के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनका लोप कर दिया गया है ।

13. पीठासीन अधिकारी के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें-1[किसी अधिकरण या अपील अधिकरण के अध्यक्ष] को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अन्तर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे हैं) ऐसी होंगी जो विहित की जाएं:

परन्तु [किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष] के वेतन और भत्तों में तथा सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उनकी नियुक्ति के पश्चात् उनके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

14. रिक्तियों का भरा जाना-यदि [किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या किसी अपील अधिकरण के अध्यक्ष] के पद में कोई रिक्ति अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न किसी कारण हो जाती है तो केन्द्रीय सरकार रिक्ति को भरने के लिए अन्य व्यक्ति की इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्ति करेंगी और कार्यवाहियां उस प्रक्रम से जब रिक्ति भरी जाती है, अधिकरण या अपील अधिकरण के समक्ष चालू रखी जा सकेंगी ।

15. पदत्याग और हटाया जाना-(1) 1[किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या किसी अपील अधीकरण का अध्यक्ष] केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित, लिखित सूचना द्वारा, अपना पद त्याग सकेगा:

परन्तु [किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष] जब तक कि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा उससे पहले अपना पद त्यागने की अनुज्ञा नहीं दी जाती है, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास का अवसान होने तक या उसके पदोत्तरवर्ती के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा पद ग्रहण कर लेने तक या अपनी पदावधि का अवसान होने तक, इसमें से जो भी पूर्वतर हो अपना पद धारण करता रहेगा ।

(2) 1[किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष] के-

                (क) 1[किसी अधिकरण के अध्यक्ष] की दशा में, किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा;

                (ख) 1[किसी अपील अधिकरण के अध्यक्ष] की दशा में, किसी उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा,

की गई जांच के पश्चात् जिसमें 2[किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष] को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की जानकारी दी गई हो और उन अरोपों की बाबत उसे सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो, केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए आदेश से ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं:

                 [परंतु यदि केन्द्रीय सरकार का, यथास्थिति, पीठासीन अधिकारी या किसी अध्यक्ष के विरुद्ध जांच के लंबित रहने के दौरान, पीठासीन अधिकारी या अध्यक्ष के चयन के लिए गठित चयन समिति के अध्यक्ष से परामर्श करने के पश्चात् यह समाधान हो जाता है कि, यथास्थिति, उसे पीठासीन अधिकारी या अध्यक्ष के रूप में अपने कृत्यों का निर्वहन करने से प्रविरत रहना चाहिए तो वह पीठासीन अधिकारी या अध्यक्ष को निलंबित करने संबंधी आदेश पारित कर सकेगी ।]

                (3) केन्द्रीय सरकार, 2[किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष] के कदाचार, या असमर्थता के अन्वेषण करने की प्रक्रिया का नियमों द्वारा विनियमन कर सकेगी ।

16. अधिकरण या अपील को अधिकरण के गठन संबंधी आदेशों का अंतिम होना और उससे कार्यवाही का अविधिमान्य होना-1[किसी अधिकरण या अपील अधिकरण के अध्यक्ष] के रूप में किसी व्यक्ति को नियुक्त करने वाला केन्द्रीय सरकार कोई आदेश, किसी भी रीति से प्रश्नगत नहीं किया जाएगा और किसी अधिकरण या अपील अधिकरण के समक्ष कोई कार्य या कार्यवाही किसी भी रीति से केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि किसी अधिकरण या अपील अधिकरण के गठन में कोई त्रुटि है ।

अध्याय 3

अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार

17. अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-(1) कोई अधिकरण, नियत दिन से ही बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋणों की वसूली के लिए ऐसे बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से आवेदन ग्रहण करने और उनका विनिश्चय करने की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।

                (2) कोई अपील अधिकरण, नियत दिन से ही, इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण द्वारा किए गए या किए गए समझे गए किसी आदेश के विरुद्ध अपील ग्रहण करने की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।

 [17क. अपील अधिकरण के अध्यक्ष की शक्ति-(1) किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष अपनी अधिकारिता के अधीन अधिकरणों के पर्यवेक्षण और नियंत्रण की साधारण शक्ति का प्रयोग करेगा जिसके अंतर्गत कार्य को आंकने तथा पीठासीन अधिकारी की वार्षिक गोपनीय रिपोर्टों को लेखबद्ध करने की शक्ति सम्मिलित है ।

                (2) अधिकरणों पर अधिकारिता रखने वाले किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष, किसी पक्षकार के आवेदन पर या स्वप्रेरणा से पक्षकारों को सूचना देने और उनकी सुनवाई के पश्चात् किसी मामले को निपटाने के लिए एक अधिकरण से किसी अन्य अधिकरण को अंतरित कर सकेगा ।]

18. अधिकारिता का वर्जन-नियत दिन से ही, (उच्चतम न्यायालय और संविधान के अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी उच्च न्यायालय के सिवाय) किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी को धारा 17 में विनिर्दिष्ट विषयों के संबंध में कोई अधिकारिता, शक्ति या प्राधिकार नहीं होगा या वह उसका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा:

                 [परंतु प्रतिभूति हित का प्रवर्तन और ऋण वसूली विधि (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ की तारीख के पूर्व बहुराज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 (2002 का 39) के अधीन किसी बहुराज्य सहकारी बैंक को शोध्य ऋणों की वसूली के संबंध में ऐसी कोई कार्यवाहियां जारी रखी जाएंगी और इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात, ऐसे प्रारंभ के पश्चात्, ऐसी कार्यवाहियों को लागू नहीं होगी ।]

अध्याय 4

अधिकरणों की प्रक्रिया

 [19. अधिकरण को आवेदन-(1) जहां किसी बैंक या वित्तीय संस्था को किसी व्यक्ति से कोई ऋण वसूल करना है, वहां वह ऐसे अधिकरण को आवेदन कर सकेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर, -

(क) प्रतिवादी या जहां एक से अधिक प्रतिवादी हैं वहां प्रत्येक प्रतिवादी, आवेदन किए जाने के समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है; या

(ख) जहां एक से अधिक प्रतिवादी हैं वहां प्रतिवादियों में से कोई भी प्रतिवादी, आवेदन किए जाने के समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है; या

(ग) वाद-हेतुक पूर्णतः या भागतः पैदा होता है:

                 [परंतु बैंक या वित्तीय संस्था उसके द्वारा किए गए आवेदन पर ऋण वसूली अधिकरण की अनुमति से, आवेदन को वापस ले सकेगी, चाहे वह वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 (2002 का 54) के अधीन कार्रवाई करने के प्रयोजन के लिए प्रतिभूति हित और ऋण वसूली विधि (संशोधन) अधिनियम, 2004 के प्रवर्तन से पूर्व या उसके पश्चात् किया गया हो, यदि उस अधिनियम के अधीन पहले कोई कार्रवाई नहीं की गई हो:

परंतु यह और कि उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन को वापस लेने के लिए ऋण वसूली अधिकरण से अनुमति लेने के लिए पहले परंतुक के अधीन किए गए किसी आवेदन पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्रवाई की जाएगी और ऐसे आवेदन की तारीख से तीस दिन के भीतर उसका निपटारा किया जाएगा:

परंतु यह भी कि ऋण वसूली अधिकरण द्वारा इस उपधारा के अधीन फाइल किए गए आवेदन को वापस लेने के लिए अनुमति देने से इन्कार की दशा में, वह उसके लिए कारण लेखबद्ध करते हुए ऐसे आदेश पारित करेगा ।]

 [(1क) ऐसा प्रत्येक बैंक, जो धारा 2 के खंड (घ) के उपखंड (vi) में निर्दिष्ट बहुराज्य सहकारी बैंक है, अपने विकल्प पर इस अध्याय में आवेदन करने के बजाय किसी व्यक्ति से ऋणों को, चाहे वह प्रतिभूति हित का प्रवर्तन और ऋण वसूली विधि (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ की तारीख से पूर्व या उसके पश्चात् शोध्य हों, वसूल करने के लिए बहुराज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 (2002 का 39) के अधीन कार्यवाहियां आरंभ करने का विकल्प अपना सकेगा ।

(1ख) यदि ऐसे किसी बैंक ने, जो धारा 2 के खंड (घ) के उपखंड (vi) में निर्दिष्ट बहुराज्य सहकारी बैंक है, इस अध्याय के अधीन कोई आवेदन फाइल किया है, और तत्पश्चात् ऋण वसूल करने हेतु कार्यवाही बहुराज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 (2002 का 39) के अधीन आरंभ करने के प्रयोजन के लिए आवेदन वापस लेने का विकल्प अपनाता है, तो वह ऐसा अधिकरण की अनुज्ञा से कर सकेगा और उपधारा (1क) के अधीन किए गए आवेदन को वापस लेने के लिए अधिकरण से अनुज्ञा की ईप्सा करने संबंधी ऐसे प्रत्येक आवेदन पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता के साथ कार्रवाई की जाएगी और उसका निपटारा, ऐसे आवेदन की तारीख से तीस दिन के भीतर किया जाएगा : 

परंतु यदि अधिकरण, इस उपधारा के अधीन फाइल किए गए आवेदन को वापस लिए जाने की अनुज्ञा देने से इंकार कर देता है तो वह उसके कारण अभिलिखित करने के पश्चात् ऐसे आदेश पारित करेगा ।]

(2) जहां किसी ऐसे बैंक या वित्तीय संस्था ने जिसे किसी व्यक्ति से ऋण वसूल करना है, उपधारा (1) के अधीन अधिकरण को आवेदन फाइल कर दिया है और उसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी अन्य बैंक या वित्तीय संस्था ने भी अपना ऋण वसूल करने का दावा किया है, वहां पश्चात्वर्ती बैंक या वित्तीय संस्था आवेदक बैंक या वित्तीय संस्था की कार्यवाहियों में किसी प्रक्रम पर अंतिम आदेश पारित करने से पूर्व उस अधिकरण को आवेदन करके सम्मिलित हो सकेगी ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा और उसके साथ ऐसे दस्तावेज या अन्य साक्ष्य तथा ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए:

परन्तु ऐसी फीस, वसूल किए जाने वाले ऋण की रकम को ध्यान में रखते हुए विहित की जा सकेगी:

परन्तु यह और कि फीस के संबंध में इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई बात धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन अधिकरण को अंतरित मामलों के संबंध में लागू नहीं होगी ।

                 [(3क) यदि अधिकरण के समक्ष किसी ऋण की वसूली के लिए फाइल किए गए किसी आवेदन का उस अधिकरण के समक्ष सुनवाई प्रारंभ होने के पूर्व या अंतिम आदेश पारित किए जाने के पूर्व की कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर निपटारा हो जाता है, तो आवेदक को, उसके द्वारा संदत्त फीस का, ऐसी दरों पर, जो विहित की जाएं, प्रतिदाय मंजूर किया जा सकेगा ।]

                (4) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर अधिकरण, प्रतिवादी से यह अपेक्षा करते हुए समन जारी करेगी कि वह समन की तामील किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर यह हेतुक दर्शित करे कि प्रार्थित अनुतोष क्यों न मंजूर किया जाए ।

                 [(5) प्रतिवादी समन की तामील की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर अपनी प्रतिरक्षा में एक लिखित कथन प्रस्तुत करेगा:

परंतु जहां प्रतिवादी तीस दिन की उक्त अवधि के भीतर लिखित कथन फाइल करने में असफल रहता है, वहां पीठासीन अधिकारी ऐसे आपवादिक मामलों में और ऐसी विशेष परिस्थितियों में, जो लेखबद्ध की जाएं, प्रतिवादी को लिखित कथन फाइल करने के लिए दो से अनधिक समय विस्तार अनुज्ञात कर सकेगा ।]

1[(5क) आवेदन की सुनवाई प्रारंभ हो जाने के पश्चात्, यह सुनवाई की समाप्ति तक, दिन-प्रतिदिन जारी रखी जाएगी:

परंतु यदि पर्याप्त हेतुक दर्शाया जाता है तो अधिकरण स्थगन मंजूर कर सकेगा किन्तु किसी पक्षकार को ऐसा स्थगन तीन से अधिक बार मंजूर नहीं किया जाएगा और जहां तीन या उससे अधिक पक्षकार हैं, वहां ऐसे स्थगनों की कुल संख्या छह से अधिक नहीं होगी:

परंतु यह और कि पीठासीन अधिकारी, ऐसे स्थगन, ऐसे खर्चे, जो आवश्यक समझे जाएं, अधिरोपित करने पर मंजूर कर सकेगा ।]

(6) जहां प्रतिवादी आवेदक की मांग के विरुद्ध मुजरा करने का दावा करता है; वहां ऐसे आवेदक से उसके द्वारा विधिक रूप से वसूल किए जाने वाले किसी धन की कोई निश्चित राशि के मुजरा करने का दावा करता है, वहां प्रतिवादी, आवेदन की पहली सुनवाई पर, किन्तु उसके पश्चात् नहीं, जब तक कि अधिकरण द्वारा उसे अनुज्ञात न किया गया हो, मुजरा किए जाने के लिए चाहे गए ऋण की विशिष्टियों को अन्तर्विष्ट करने वाला एक लिखित कथन प्रस्तुत कर सकेगा ।

(7) लिखित कथन का प्रभाव प्रतीपवाद में के वाद पत्र के समान ही होगा जिससे अधिकरण मूल दावे और मुजरा दोनों के संबंध में अंतिम आदेश पारित करने के लिए समर्थ हो जाए ।

(8) किसी आवेदन में प्रतिवादी उपधारा (6) के अधीन मुजरा के अभिवचन के अपने अधिकार के अतिरिक्त आवेदक के दावे के विरुद्ध प्रतिदावे के रूप में किसी ऐसे अधिकार या दावे को, जो आवेदक के विरुद्ध प्रतिवादी को आवेदन फाइल किए जाने के पूर्व या पश्चात् किन्तु प्रतिवादी द्वारा अपनी प्रतिरक्षा परिदत्त किए जाने के पूर्व या अपनी प्रतिरक्षा परिदत्त किए जाने के लिए परिसीमित समय का अवसान हो जाने के पूर्व, किसी वाद-हेतुक के बारे में प्रोद्भूत हुआ हो, उठा सकेगा चाहे ऐसा प्रतिदावा नुकसानी के दावे के रूप में हो या नहीं ।

(9) उपधारा (8) के अधीन ऐसे प्रतिदावे का प्रभाव प्रतीपवाद के प्रभाव के समान ही होगा जिससे अभिकरण एक ही आवेदन में मूल दावे और प्रतिदावे दोनों के संबंध में अन्तिम आदेश सुनाने के लिए समर्थ हो जाए ।

(10) आवेदक को इस बात की स्वतंत्रता होगी कि वह प्रतिवादी के प्रतिदावे के उत्तर में लिखित तथा ऐसी अवधि के भीतर जो अधिकरण द्वारा नियत की जाए, फाइल करे ।

(11) जहां प्रतिवादी कोई प्रतिदावा उठाता है और आवेदक यह दलील देता है कि उसके द्वारा उठाए गए दावे का निपटारा प्रतिदावे के रूप में नहीं वरन् स्वतंत्र कार्यवाही के रूप में किया जाना चाहिए, वहां आवेदक प्रतिदावे के संबंध में विवाद्यकों के तय किए जाने के पूर्व किसी भी समय अधिकरण से इस आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा कि ऐसे प्रतिदावे का अपवर्जन किया जाए और अधिकरण ऐसे आवेदन की सुनवाई करने पर ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

(12) अधिकरण प्रतिवादी को अधिकरण की पूर्व अनुज्ञा के बिना अपनी सम्पत्ति और आस्तियों का अन्तरण, अन्य संक्रामण या उसके विषय में अन्यथा व्यवहार करने या उसका व्ययन करने से उसे विवर्जित करने के लिए प्रतिवादी के विरुद्ध (व्यादेश या रोक या कुर्की के रूप में) कोई अन्तरिम आदेश कर सकेगा ।

(13) (क) जहां कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर अधिकरण का शपथपत्र द्वारा या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि, प्रतिवादी ऋण की वसूली के लिए किसी आदेश जो उसके विरुद्ध पारित किया जाए, के निष्पादन को बाधित या विलम्ब करने या उसे निष्फल करने के आशय से-

                (i) अपनी पूरी संपत्ति या उसके किसी भाग को व्यनित करने ही वाला है; या

                (ii) अपनी पूरी सम्पत्ति या उसके किसी भाग को अधिकरण की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं से हटा देने ही वाला है; या

                (iii) संपत्ति को नुकसान या रिष्टि करने वाला हो या उसके दुरुपयोग द्वारा या तृतीय पक्षकार का हित सृजित करके उसके मूल्य को प्रभावित करने वाला ही है,

वहां अधिकरण, प्रतिवादी को निदेश दे सकेगा कि उस समय के भीतर जो अधिकरण द्वारा नियत किया जाएगा या तो वह उक्त सम्पत्ति को या उसके मूल्य को या उसके ऐसे भाग को जो ऋण वसूली के प्रमाणपत्र को तुष्ट करने के लिए पर्याप्त हो, अपेक्षा की जाने पर पेश करने के लिए और अधिकरण के व्ययनाधीन रखने के लिए, ऐसी राशि की जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए प्रतिभूति दे या उपसंजात हो और यह हेतुक दर्शित करे कि उसे प्रतिभूति क्यों नहीं देनी चाहिए ।

                (ख) जहां प्रतिवादी, अधिकरण द्वारा नियत समय के भीतर यह हेतुक दर्शित करने में असफल रहता है कि उसे प्रतिभूति क्यों नहीं देनी चाहिए, या अपेक्षित प्रतिभूति देने में असफल रहता है वहां अधिकरण यह आदेश दे सकेगा कि आवेदक द्वारा दावा की गई पूरी संपत्ति या उसके ऐसे भाग को, जो प्रतिवादी द्वारा उसके पक्ष में प्रतिभूत संपत्तियां हैं, या अन्यथा उसके स्वामित्वाधीन हैं जो ऋण की वसूली के किसी प्रमाणपत्र का समाधान करने के लिए पर्याप्त प्रतीत होती हों, कुर्क कर ली जाए ।

                (14) जिस सम्पत्ति की कुर्की की अपेक्षा की गई है, उसको और उसके प्राक्कलित मूल्य को, जब तक कि प्राधिकरण अन्यथा निदिष्ट न करे, आवेदक विनिर्दिष्ट करेगा ।

                (15) अधिकरण, आदेश में यह निदेश भी दे सकेगा कि उपधारा (14) में विनिर्दिष्ट की गई पूरी संपत्ति या उसके भाग की सशर्त कुर्की की जाए ।

                (16) यदि उपधारा (13) के उपबंधों का अनुपालन किए बिना कुर्की का आदेश किया जाता है तो ऐसी कुर्की शून्य होगी ।

                (17) उपधारा (12), उपधारा (13) और उपधारा (18) के अधीन अधिकरण द्वारा किए गए किसी आदेश की अवज्ञा की दशा में या ऐसे किसी निबंधन के भंग की दशा में अधिकरण यह आदेश दे सकेगा कि ऐसी अवज्ञा या भंग करने के दोषी व्यक्ति की सम्पत्ति कुर्क की जाए और यह भी आदेश दे सकेगा कि वह व्यक्ति तीन मास से अनधिक अवधि के लिए सिविल कारागार में तब तक निरुद्ध किया जाए जब तक कि इस बीच में अधिकरण उसकी नियुक्ति के लिए निदेश न दे दे ।

                (18) जहां अधिकरण को यह न्यायसंगत और सुविधापूर्ण प्रतीत होता है वहां अधिकरण आदेश द्वारा-

(क) संपत्ति का रिसीवर, चाहे ऋण की वसूली के लिए प्रमाणपत्र की मंजूरी के पहले या पश्चात् नियुक्त कर सकेगा;

(ख) किसी संपत्ति पर से किसी व्यक्ति का कब्जा या अभिरक्षा हटा सकेगा;

(ग) इसे रिसीवर के कब्जे, अभिरक्षा या प्रबंध सुपुर्द कर सकेगा;

(घ) न्यायालयों में वादों के लाने और वादों की प्रतिरक्षा करने के बारे में या अधिकरण के समक्ष आवेदन फाइल करने और उसमें प्रतिरक्षा करने के लिए और सम्पत्ति के आपन, प्रबन्ध, संरक्षण, परिरक्षण और सुधार, उसके भाटकों और लाभों के संग्रहण, ऐसे भाटकों और लाभों के उपयोजन और व्ययन तथा दस्तावेजों के निष्पादन के लिए सभी ऐसी शक्तियां जो स्वयं स्वामी की हों, या उन शक्तियों में से ऐसी शक्ति जो अधिकरण ठीक समझे, रिसीवर को प्रदत्त कर सकेगा; और

(ङ) प्रतिवादी की संपत्तियों की तालिका बनाने के लिए या उसके विक्रय लिए आयुक्त नियुक्त कर सकेगा ।

(19) जहां, वसूली का कोई प्रमाणपत्र कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी कंपनी के विरुद्ध जारी किया जाता है, वहां अधिकरण ऐसी कंपनी के विक्रय आगमों को कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 529क के उपबंधों के अनुसार उसके प्रतिभूत लेनदारों के बीच वितरण करने और अधिशेष का, यदि कोई हो, कंपनी को संदाय करने का आदेश कर सकेगा ।

(20) अधिकरण, आवेदक और प्रतिवादी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् आवेदन कर ऐसा अंतरिम या अंतिम आदेश पारित कर सकेगा जो वह न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए ठीक समझे, जिसके अंतर्गत रकम के संदाय का उस तारीख को या उसके पूर्व की तारीख से जिसको वसूली या वास्तविक संदाय शोध्य पाया जाता है, आदेश भी है ।

 [(20क) जहां अधिकरण के समाधानप्रद रूप में यह साबित कर दिया जाता है कि आवेदक के दावे का लिखित में किए गए और पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित किसी ऐसे विधिपूर्ण करार या समझौते द्वारा पूर्णतः या भागतः समायोजन कर दिया गया है या जहां प्रतिवादी ने आवेदक के दावे का प्रतिसंदाय कर दिया है या प्रतिसंदाय करने का करार किया है, वहां अधिकरण दावे के ऐसे करार, समझौते या तुष्टि को लेखबद्ध करके आदेश पारित करेगा ।]

(21) अधिकरण अपने द्वारा पारित प्रत्येक आदेश की एक प्रति आवेदक और प्रतिवादी को भेजेगा ।

(22) पीठासीन अधिकारी, अधिकरण के आदेश के आधार पर अपने हस्ताक्षर सहित एक प्रमाणपत्र ऐसे प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट ऋण की रकम की वसूली के लिए वसूली अधिकारी को जारी करेगा ।

(23) जहां ऐसे अधिकरण का, जिसने वसूली के लिए प्रमाणपत्र जारी किया है, यह समाधान हो जाता है कि संपत्ति को दो या अधिक अधिकरणों की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर अवस्थित है वह वहां वसूली के प्रमाणपत्र की प्रतियां निष्पादन के लिए ऐसे अन्य अधिकरणों को भेज सकेगा जहां संपत्ति अवस्थित है:

परंतु उस दशा में जहां अधिकरण जिसे वसूली का प्रमाणपत्र निष्पादन के लिए भेजा जाता है यह पाता है कि वह वसूली के प्रमाणपत्र के अनुपालन के लिए अधिकारिता नहीं रखता तो वह इसे उस अधिकरण को वापस करेगा जिसे इसने जारी किया है ।

(24) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अधिकरण को किए गए आवेदन के बारे में उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्रवाई की जाएगी और आवेदन प्राप्त करने की तारीख से एक सौ अस्सी दिन के भीतर उसके द्वारा आवेदन को अंतिम रूप से निपटाने का प्रयास किया जाएगा ।

(25) अधिकरण ऐसे आदेश कर सकेगा और ऐसे निदेश दे सकेगा जो इसके आदेश को प्रभावी करने के लिए या उसकी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए या न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक या समीचीन हों ।]

20. अपील अधिकरण को अपील-(1) उपधारा (2) में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण द्वारा किए गए या किए गए समझे गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति किसी ऐसे अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा जिसको उस विषय में अधिकारिता है ।

                (2) किसी अधिकरण द्वारा पक्षकारों की सहमति से किए गए किसी आदेश से अपील अधिकरण को कोई अपील नहीं होगी ।

                (3) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से, जिसको अधिकरण द्वारा किए गए या किए गए समझे गए किसी आदेश की प्रति उसे प्राप्त होती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और वह ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए:

                परन्तु अपील अधिकरण उक्त पैंतालीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् कोई अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर उसे फाइल न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।

                (4) उपधारा (1) के अधीन किसी अपील की प्राप्ति पर, अपील अधिकरण, अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उस आदेश को जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट, उपांतरित या अपास्त कर उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

                (5) अपील अधिकरण अपने द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति अपील के पक्षकारों को और संबंधित अधिकरण को भेजेगा ।

                (6) उपधारा (1) के अधीन अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील के बारे में उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्रवाई की जाएगी और अपील की प्राप्ति की तारीख से छह मास के भीतर उसके द्वारा अंतिम रूप से अपील को निपटाने का प्रयास किया जाएगा ।

21. अपील फाइल किए जाने पर शोध्य ऋण की रकम का निक्षेप किया जाना-जहां कोई अपील ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा की जाती है जिससे ऋण की रकम किसी बैंक या वित्तीय संस्था को अथवा बैंकों या वित्तीय संस्थाओं के किसी संघ को शोध्य है वहां ऐसी अपील, अपील अधिकरण द्वारा तभी ग्रहण की जाएगी जब ऐसा व्यक्ति अपने द्वारा इस प्रकार शोध्य ऋण की रकम का, जो धारा 19 के अधीन अधिकरण द्वारा अवधारित की जाए, पचहत्तर प्रतिशत, अपील अधिकरण के पास निक्षिप्त कर देता है:

                परन्तु अपील अधिकरण, ऐसे कारणों से जो लखबद्ध किए जाएंगे, इस धारा के अधीन निक्षिप्त की जाने वाली रकम का अधित्यजन कर सकेगा या उसे बढ़ा सकेगा ।

22. अधिकरण और अपील अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अधिकरण और अपील अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होंगे किन्तु वे नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करेंगे और इस अधिनियम के और किन्हीं नियमों के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण और अपील अधिकरण को अपनी प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत वे स्थान हैं जिन पर उनकी बैंठकें होंगी, विनियमन करने की शक्तियां होंगी ।

                (2) अधिकरण और अपील अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -

                                (क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

                                (ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

                                (ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

                                (घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

                                (ङ) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

                                (च) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करना या उसका एक पक्षीय रूप से विनिश्चय करना;

                (छ) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करने के किसी आदेश को या अपने द्वारा एक पक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना;

                (ज) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।

(3) किसी अधिकरण या अपील अधिकरण के समक्ष कोई कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और अधिकरण या अपील अधिकरण, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के सभी प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

23. विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार और प्रस्तुतीकरण अधिकारी-(1) अधिकरण को कोई आवेदन या अपील अधिकरण को कोई अपील करने वाला कोई बैंक या वित्तीय संस्था, एक या अधिक विधि व्यवसायियों को या अपने किसी अधिकारी को प्रस्तुतीकरण अधिकारियों के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी और उसके द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत प्रत्येक व्यक्ति अधिकरण या अपील अधिकरण के समक्ष उसका पक्षकथन प्रस्तुत कर सकेगा ।

(2) प्रतिवादी अधिकरण या अपील अधिकरण के समक्ष अपना पक्षकथन प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या एक या अधिक विधि व्यवसायियों को या अपने किसी अधिकारी को प्राधिकृत कर सकेगा ।

24. परिसीमा-परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपबंध जहां तक हो सके, किसी अधिकरण को किए गए आवेदन को लागू होंगे ।

अध्याय 5

अधिकरण द्वारा अवधारित ऋणों की वसूली

25. ऋणों की वसूली के ढंग-वसूली अधिकारी, धारा 19 की उपधारा (7) के अधीन प्रमाणपत्र की प्रति की प्राप्ति पर, प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट ऋण की रकम को निम्नलिखित ढंगों में से किसी एक या अधिक द्वारा वसूल करने के लिए कार्यवाही करेगा, अर्थात्: -

                                (क) प्रतिवादी की जंगम या स्थावर सम्पत्ति की कुर्की और विक्रय;

                                (ख) प्रतिवादी की गिरफ्तारी और उसका कारागार में निरोध;

                                (ग) प्रतिवादी की जंगम या स्थावर संपत्तियों के प्रबंध के लिए रिसीवर की नियुक्ति ।

26. प्रमाणपत्र की विधिमान्यता और उसका संशोधन-(1) प्रतिवादी को प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम के सही होने के संबंध में वसूली अधिकारी के समक्ष कोई विवाद उठाने का अधिकार नहीं होगा और साथ ही प्रमाणपत्र के संबंध में किसी अन्य आधार पर कोई भी आक्षेप वसूली अधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।

                (2) वसूली अधिकारी को प्रमाणपत्र जारी किए जाने पर भी, वसूली अधिकारी को एक संसूचना भेजकर प्रमाणपत्र को वापस लेने या प्रमाणपत्र में किसी लिपिकीय और गणित संबंधी भूल को शुद्ध करने की पीठासीन अधिकारी को शक्ति होगी ।

                (3) पीठासीन अधिकारी, प्रमाणपत्र को वापस लेने या रद्द करने वाले किसी आदेश या उपधारा (2) के अधीन उसके द्वारा की गई किसी शुद्धि के बारे में वसूली अधिकारी को संसूचना देगा ।

27. प्रमाणपत्र के अधीन कार्यवाहियों का रोका जाना और उनका संशोधन या वापस लिया जाना-(1) इस बात के होते हुए भी कि किसी रकम की वसूली के लिए वसूली अधिकारी को कोई प्रमाणपत्र जारी किया गया है, पीठासीन अधिकारी ऐसी रकम के संदाय के लिए समय दे सकेगा और तब वसूली अधिकारी कार्यवाहियों को तब तक रोके रेखेगा जब तक कि इस प्रकार दिए गए समय का अवसान नहीं हो जाता है ।

                (2) जहां रकम की वसूली के लिए कोई प्रमाणपत्र जारी किया गया है वहां पीठासीन अधिकारी, वसूली अधिकारी को ऐसे प्रमाणपत्र के जारी किए जाने के पश्चात्, संदत्त किसी रकम या ऐसे संदाय के लिए दिए गए समय की जानकारी वसूली अधिकारी को देता रहेगा ।

                (3) जहां ऐसा आदेश, जिससे ऋण की वसूली के लिए रकम की जांच पैदा होती है, अपील में उपांतरित किया गया है और उसके परिणामस्वरूप मांग घटा दी जाती है वहां पीठासीन अधिकारी, प्रमाणपत्र की रकम के ऐसे भाग की जो उक्त घटाए जाने के संबंध में है, वसूली को उस अवधि तक रोके रखेगा जिस तक अपील लंबित रहती है ।

(4) जहां ऋण की वसूली के लिए कोई प्रमाणपत्र वसूली अधिकारी को प्राप्त हो गया है और उसके पश्चात् परादेय मांग की रकम अपील के परिणामस्वरूप [घटा दी जाती है या वर्धित कर दी जाती हैट वहां पीठासीन अधिकारी, उस दशा में जिसमें वह आदेश, जो ऐसी अपील का विषय था, अंतिम और निश्चायक हो गया है, ऐसे प्रमाणपत्र का, यथास्थिति, संशोधन करेगा या उसे वापस लेगा ।

28. वसूली के अन्य ढंग-(1) जहां धारा 19 की उपधारा (7) के अधीन वसूली अधिकारी को कोई प्रमाणपत्र जारी किया गया है वहां वसूली अधिकारी, धारा 25 में विनिर्दिष्ट वसूली के ढंगों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस धारा के अधीन उपबंधित ढंगों में से किसी एक या अधिक द्वारा ऋण की रकम को वसूल कर सकेगा ।

(2) यदि किसी व्यक्ति से प्रतिवादी की कोई रकम शोध्य है तो वसूली अधिकारी ऐसे व्यक्ति से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उक्त रकम में से इस अधिनियम के अधीन प्रतिवादी से शोध्य ऋण की रकम की कटौती कर ले और ऐसा व्यक्ति ऐसी किसी अध्यपेक्षा का अनुपालन करेगा और इस प्रकार कटौती की गई राशि को वसूली अधिकारी के खाते में संदत्त करेगा:

परन्तु इस उपधारा की कोई बात सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 60 के अधीन किसी सिविल न्यायालय की किसी डिक्री के निष्पादन में कुर्की से छूट प्राप्त रकम के किसी भाग को लागू नहीं होगी ।

(3) (i) वसूली अधिकारी, किसी भी समय या समय-समय पर, लिखित सूचना द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति से, जिससे प्रतिवादी को कोई धन शोध्य है या शोध्य हो जाए अथवा किसी ऐसे व्यक्ति से, जो प्रतिवादी के लिए या उसके लेखे में कोई धन धारण करता है या उसके पश्चात् धारण करे, यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह वसूली अधिकारी को धन शोध्य हो जाने पर या धारित किए जाने पर तत्काल या सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर (जो धन के शोध्य होने या धारण किए जाने से पहले का नहीं है) उतने धन का जितना प्रतिवादी से शोध्य ऋण की रकम का संदाय करने के लिए पर्याप्त है या उस रकम के बराबर, या उससे कम, होने की दशा में, संपूर्ण धन का संदाय करे ।

(ii) इस उपधारा के अधीन कोई सूचना ऐसे किसी व्यक्ति को जारी की जा सकेगी जो प्रतिवादी के लिए या उसके लेखे किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से कोई धन धारण करता है या उसके पश्चात् धारण करे और इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ऐसी रकम में संयुक्त धारकों के अंशों के बारे में जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, उपधारणा की जाएगी कि वे बराबर हैं ।

(iii) सूचना की एक प्रति, प्रतिवादी को उसके अंतिम पते पर जो वसूली अधिकारी को ज्ञात हो और संयुक्त लेखे की दशा में सभी संयुक्त धारकों को उसके अंतिम पतों पर जो वसूली अधिकारी को ज्ञात हो, भेजी जाएगी ।

(iv) इस उपधारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जिसे इस उपधारा के अधीन सूचना जारी की जाती है, ऐसी सूचना का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा और विशिष्टतया, जहां ऐसी कोई सूचना किसी डाकघर, बैंक, वित्तीय संस्था या किसी बीमाकर्ता को जारी की जाती है वहां संदाय करने के पूर्व कोई प्रविष्टि, पृष्ठांकन या वैसी ही कोई कार्रवाई करने के प्रयोजन के लिए कोई पासबुक, निक्षेप रसीद, पालिसी या कोई अन्य दस्तावेज पेश करना, इसके प्रतिकूल किसी नियम, प्रथा या अपेक्षा के होते हुए भी आवश्यक नहीं होगा ।

(v) किसी ऐसी संपत्ति की बाबत, जिसके संबंध में इस उपधारा के अधीन कोई सूचना जारी की गई है, कोई ऐसा दावा, जो सूचना की तारीख के पश्चात् उद्भूत होता है, सूचना में अन्तर्विष्ट किसी मांग के विरुद्ध शून्य होगा ।

(vi) जहां ऐसा कोई व्यक्ति जिसे इस उपधारा के अधीन सूचना भेजी गई है, शपथ पर कथन द्वारा उसके बारे में यह आक्षेप करता है कि मांगी गई राशि या उसका कोई भाग प्रतिवादी को शोध्य नहीं है या वह प्रतिवादी के लिए या उसके लेखे कोई धन धारण नहीं करता है वहां इस उपधारा की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसे व्यक्ति से, यथास्थिति, ऐसी किसी राशि या उसके किसी भाग का संदाय करने की अपेक्षा करती है ; किन्तु यदि यह पता चलता है कि ऐसा कथन किसी तात्त्विक विशिष्टि में मिथ्या है तो ऐसा व्यक्ति सूचना की तारीख को प्रतिवादी के प्रति अपने दायित्व के परिमाण तक या इस अधिनियम के अधीन शोध्य किसी राशि के लिए प्रतिवादी के दायित्व के परिमाण तक, इसमें से जो भी कम हो, वसूली अधिकारी के प्रति व्यक्तिगत रूप से दायी होगा ।

(ध्त्त्) वसूली अधिकारी, किसी भी समय या समय-समय पर, उसे इस उपधारा के अधीन जारी की गई किसी सूचना का संशोधन कर सकेगा या वापस ले सकेगा या ऐसी सूचना के अनुसरण में कोई संदाय करने के लिए समय बढ़ा सकेगा ।

(ध्त्त्त्) वसूली अधिकारी, इस उपधारा के अधीन जारी की गई सूचना के अनुपालन में संदत्त किसी रकम के लिए रसीद देगा और ऐसा संदाय करने वाला व्यक्ति, इस प्रकार संदत्त रकम के परिमाण तक प्रतिवादी के प्रति अपने दायित्व से पूर्णतः उन्मोचित हो जाएगा ।

(त्न्) इस उपधारा के अधीन किसी सूचना की प्राप्ति के पश्चात् प्रतिवादी के प्रति किसी दायित्व का उन्मोचन करने वाला कोई व्यक्ति इस प्रकार उन्मोचित प्रतिवादी के प्रति अपने दायित्व के परिमाण तक या इस अधिनियम के अधीन शोध्य किसी ऋण के लिए प्रतिवादी के दायित्व के परिमाण तक, इसमें से जो भी कम हो, वसूली अधिकारी के प्रति व्यक्तिगत रूप से दायी होगा ।

(न्) यदि ऐसा कोई व्यक्ति जिसे इस उपधारा के अधीन कोई सूचना भेजी गई है, उसके अनुसरण में वसूली अधिकारी को कोई संदाय करने में असफल रहता है तो उसे सूचना में विनिर्दिष्ट रकम की बाबत व्यतिक्रम करने वाला प्रतिवादी समझा जाएगा और उस रकम की वसूली के लिए उसके विरुद्ध आगे की कार्यवाही धारा 25, धारा 26 और धारा 27 में उपबंधित रीति से इस प्रकार की जा सकेगी मानो वह उससे शोध्य ऋण हो और ऐसी सूचना का वही प्रभाव होगा जो वसूली अधिकारी द्वारा धारा 25 के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करने में किसी ऋण की कुर्की का होता है ।

(4) वसूली अधिकारी उस न्यायालय को, जिसकी अभिरक्षा में प्रतिवादी का धन है, ऐसे धन की पूरी रकम का या यदि वह शोध्य ऋण की रकम से अधिक है तो उतनी रकम का जितनी इस प्रकार शोध्य ऋण की रकम के उन्मोचन के लिए पर्याप्त है, यह आवेदन कर सकेगा कि उसको संदाय किया जाए ।

 [(4क) वसूली अधिकारी आदेश द्वारा वसूली के प्रमाणपत्र के निष्पादन के किसी प्रक्रम पर, किसी व्यक्ति से और किसी कंपनी की दशा में इसके अधिकारियों में से ऐसे किसी अधिकारी से जिसके विरुद्ध या जिसको वसूली का प्रमाणपत्र जारी किया गया है, शपथ पत्र पर अपनी या उसकी आस्तियों की विशिष्टियां घोषित करने की अपेक्षा कर सकेगा ।]

(5) वसूली अधिकारी, प्रतिवादी से शोध्य ऋण की किसी रकम की वसूली आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की तृतीय अनुसूची में अधिकथित रीति से उसकी जंगम संपत्ति के करस्थम् और विक्रय द्वारा कर सकेगा ।

29. आय-कर अधिनियम के कतिपय उपबंधों का लागू होना-तत्समय यथा प्रवृत्त आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की द्वितीय अनुसूची और तृतीय अनुसूची के उपबंध और आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962 जहां तक संभव हो, आवश्यक उपांतरणों सहित वैसे ही लागू होंगे मानो उक्त उपबंधों और नियमों में आय-कर के स्थान पर इस अधिनियम के अधीन शोध्य ऋण की रकम निर्दिष्ट हो:

परन्तु उक्त उपबंधों और नियमों के अधीन निर्धारिती" के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इस अधिनियम के अधीन प्रतिवादी के प्रति निर्देश है ।

 [30. वसूली अधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपील-(1) धारा 29 में किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के अधीन वसूली अधिकारी द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उस तारीख से जिसको आदेश की प्रति उसे जारी की गई है, तीस दिन के भीतर अधिकरण को अपील कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी अपील की प्राप्ति पर अधिकरण अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे धारा 25 से धारा 28 (जिसके अंतर्गत ये दोनों धाराएं हैं) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए वसूली अधिकारी द्वारा किए गए आदेश की पुष्टि, उसे उपांरतरित या अपास्त कर सकेगा ।]

अध्याय 6

प्रकीर्ण

31. लंबित मामलों का अंतरण-(1) इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण की स्थापना की तारीख के ठीक पूर्व किसी न्यायालय के समक्ष लंबित प्रत्येक वाद या अन्य कार्यवाही, जो ऐसा वाद या कार्यवाही है जिसमें वह वाद हेतुक, जिस पर वह आधारित है, ऐसा है कि वह यदि ऐसी स्थापना के पश्चात् उद्भूत हुआ होता तो ऐसे अधिकरण की अधिकारिता के भीतर होता, उस तारीख को ऐसे अधिकरण को अंतरित हो जाएगा:

                परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी न्यायालय के समक्ष पूर्वोक्त लंबित किसी अपील को लागू नहीं होगी:

 [परंतु यह और कि प्रतिभूति हित का प्रवर्तन और ऋण वसूली विधि (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ की तारीख के पूर्व बहुराज्य सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 2002 (2002 का 39) के अधीन किसी बहुराज्य सहकारी बैंक को शोध्य ऋणों की वसूली के संबंध में लंबित वसूली की कार्यवाहियां जारी रखी जाएंगी और इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात ऐसी कार्यवाहियों को लागू नहीं होगी ।]

(2) जहां कोई वाद या अन्य कार्यवाही उपधारा (1) के अधीन किसी न्यायालय से किसी अधिकरण को अंतरित हो जाती है वहां-

(क) ऐसा न्यायालय, ऐसे अंतरण के पश्चात् यथाशीघ्र, ऐसे वाद या अन्य कार्यवाही के अभिलेख अधिकरण को भेजेगा, और

(ख) ऐसा अधिकरण, ऐसे अभिलेखों की प्राप्ति पर, ऐसे वाद या अन्य कार्यवाही के संबंध में, जहां तक हो सके, उसी रीति से जिसमें धारा 19 के अधीन किए गए किसी आवेदन की दशा में कोई कार्यवाही की जाती है उसी प्रक्रम से जिस पर वह ऐसे अंतरण के पूर्व थी या किसी पूर्वतर प्रक्रम से । । । जो अधिरकण ठीक समझे, आगे कार्यवाही कर सकेगा ।

[31क. डिक्री या आदेश की दशा में वसूली का प्रमाणपत्र जारी करने की अधिकरण की शक्ति-(1) जहां, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण वसूली (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारंभ से पूर्व कोई डिक्री या आदेश किसी न्यायालय द्वारा पारित किया गया था किन्तु अभी तक उसका निष्पादन नहीं हुआ है, वहां डिक्री धारक अधिकरण को रकम की वसूली के लिए आदेश पारित करने के लिए आवेदन कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर अधिकरण किसी वसूली अधिकारी को वसूली के लिए प्रमाणपत्र जारी कर सकेगा ।

(3) वसूली अधिकारी, उपधारा (2) के अधीन प्रमाणपत्र की प्राप्ति पर रकम को वसूल करने के लिए इस प्रकार कार्यवाही करेगा मानो वह इस अधिनियम के अधीन वसूली योग्य किसी ऋण की बाबत प्रमाणपत्र हो ।]

 [32. अपील अधिकरण और अधिकरण के अध्यक्ष, पीठासीन अधिकारी और कर्मचारिवृन्द का लोक सेवक होना-किसी अपील अधिकरण का अध्यक्ष, किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी, किसी अपील अधिकरण तथा किसी अधिकरण का वसूली अधिकारी तथा अन्य अधिकारी और कर्मचारी, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थांतर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे ।]

33. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी बात, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध अथवा । [किसी अधिकरण का पीठासीन अधिकारी या अपील अधिकरण के अध्यक्ष] के विरुद्ध अथवा किसी वसूली अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

34. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-(1) उपधारा (2) के अधीन जैसा उपबन्धित है, उसके सिवाय, इस अधिनियम के उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।

(2) इस अधिनियम के उपबन्ध या इसके अधीन बनाए गए नियम, औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948 (1948 का 15), राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52), भारतीय औद्योगिक पुनर्निमाण बैंक अधिनियम, 1984 (1984 का 62), [रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 (1986 का 1) और भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39)] के अतिरिक्त होंगे, न कि उनके अल्पीकरण में ।

35. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:

                परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

                (2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

36. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

                (2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) धारा 7, धारा 12 और धारा 13 के अधीन अधिकरण और अपील अधिकरण के [अध्यक्षों, पीठासीन अधिकारियों,] वसूली अधिकारियों तथा अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें;

(ख) धारा 15 की उपधारा (3) के अधीन 1[अपील अधिकरणों के अध्यक्षों और अधिकरणों के पीठासीन अधिकारियों] के कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण की प्रक्रिया;

(ग) वह प्ररूप जिसमें धारा 19 के अधीन आवेदन किया जा सकेगा, दस्तावेज और अन्य साक्ष्य जो ऐसे आवेदन के साथ होंगे तथा वह फीस जो ऐसे आवेदन के फाइल किए जाने की बाबत संदेय होगी;

 [(गग) अधिनियम की धारा 19 की उपधारा (3क) के अधीन आवेदक को प्रतिदाय की जाने वाली फीस की दर;]

(घ) वह प्ररूप जिसमें धारा 20 के अधीन अपील अधिकरण के समक्ष अपील फाइल की जा सकेगी और वह फीस जो ऐसी अपील की बाबत संदेय होगी;

(ङ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए ।   

1[(3) धारा 1 की उपधारा (4), धारा 3 और धारा 8 के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना और इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना या नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना नहीं निकाली जानी चाहिए या वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु अधिसूचना या नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

37. निरसन और व्यावृत्ति-(1) बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को शोध्य ऋण वसूली अध्यादेश, 1993 (1993 का अध्यादेश संख्यांक 25) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

                (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

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