हिन्दू विद्याधन अधिनियम, 1930
(1930 का अधिनियम संख्यांक 30)
[25 जुलाई, 1930]
अपनी विद्या द्वारा अर्जित सम्पत्ति में हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब के सदस्य के
अधिकारों के बारे में शंका दूर करने के लिए
अधिनियम
अपनी विद्या द्वारा अर्जित संपत्ति में हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब के सदस्य के अधिकारों के बारे में शंका दूर करना और एक समान नियम का उपबन्ध करना समीचीन है ; अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम हिन्दू विद्याधन अधिनियम, 1930 है ।
(2) इसका विस्तार [जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय] सम्पूर्ण भारत पर है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,-
(क) “अर्जनकर्ता" से हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब का ऐसा सदस्य अभिप्रेत है, जो विद्याधन अर्जित करता है
(ख) “विद्याधन" से सम्पत्ति के वे सब अर्जन अभिप्रेत हैं जो पर्याप्त रूप से विद्या द्वारा प्राप्त किए गए हों, चाहे ऐसे अर्जन इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् किए गए हों और चाहे ऐसे अर्जन ऐसी विद्या के साधारण या असाधारण परिणाम हों ; और
(ग) “विद्या" से ऐसी शिक्षा अभिप्रेत है चाहे वह प्रारंभिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, विशेष या साधारण हो, और प्रत्येक प्रकार का ऐसा प्रशिक्षण अभिप्रेत है, जो प्रायिक रूप से किसी व्यक्ति को जीवन में कोई व्यापार, उद्योग, वृत्ति या उप-व्यवसाय करने के लिए समर्थ बनाने के लिए आशयित है ।
3. केवल कतिपय कारणों से ही विद्याधन का अर्जनकर्ता की पृथक् सम्पत्ति न माना जाना-हिन्दू विधि की किसी रूढ़ि, नियम या निर्वचन के होते हुए भी केवल इस कारण से कि,-
(क) अर्जनकर्ता की विद्या, पूर्णतः या अंशतः, उसके कुटुम्ब के किसी जीवित या मृत सदस्य द्वारा या उसके कुटुम्ब की संयुक्त निधि की सहायता से या उसके किसी सदस्य की निधि की सहायता से दी गई थी, या
(ख) जब अर्जनकर्ता विद्या का अर्जन कर रहा था, तब स्वयं उसका या उसके कुटुम्ब का भरणपोषण या भारवहन, पूर्णतः या अंशतः, उसके कुटुम्ब की संयुक्त निधि से या उसके किसी सदस्य की निधि से किया गया था,
यह नहीं माना जाएगा कि कोई विद्याधन अर्जनकर्ता की अनन्य तथा पृथक् सम्पत्ति नहीं है ।
4. व्यावृत्ति-इस अधिनियम के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी प्रकार से,-
(क) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किए गए या प्रभावी किए गए संपत्ति के किसी अन्तरण के निबंधनों या प्रसंगतियों पर प्रभाव डालता है,
(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व, पहले ही सहन की गई या की गई किसी भी बात की विधिमान्यता, अविधिमान्यता, इसके प्रभाव या परिणाम पर प्रभाव डालता है,
(ग) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किए गए संयुक्त कुटुम्ब की सम्पत्ति के विभाजन या विभाजन के लिए किसी करार के अधीन सृजित किसी अधिकार या दायित्व पर प्रभाव डालता है, अथवा
(घ) ऐसे अधिकार या दायित्व की बाबत किसी उपचार या कार्यवाही पर प्रभाव डालता है ; या इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व, किसी न्यायालय में ऐसे प्रारम्भ पर लम्बित किसी कार्यवाही में की गई किसी बात को अविधिमान्य बनाता है या किसी प्रकार से उस पर प्रभाव डालता है ; और इसमें यथा-निर्दिष्ट कोई ऐसा उपचार और कोई ऐसी कार्यवाही इस प्रकार, यथास्थिति, प्रवर्तित, संस्थित या चालू रखी जा सकेगी, मानो यह अधिनियम पारित ही नहीं हुआ था ।
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