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वास्तुविद् अधिनियम, 1972 ( Architects Act, 1972 )


 

वास्तुविद् अधिनियम, 1972

(1972 का अधिनियम संख्यांक 20)

[31 मई, 1972]

वास्तुविदों के रजिस्ट्रीकरण का तथा

उससे सम्बन्धित विषयों का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वास्तुविद् अधिनियम, 1972 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है । 

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) वास्तुविद्" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका नाम रजिस्टर में तत्समय प्रविष्ट है; 

(ख) परिषद्" से धारा 3 के अधीन गठित वास्तुकला परिषद् अभिप्रेत है; 

(ग) भारतीय वास्तुविद् संस्थान" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत भारतीय वास्तुविद् संस्थान अभिप्रेत है; 

(घ) मान्य अर्हता" से वास्तुकला में ऐसी कोई अर्हता अभिप्रेत है जो तत्समय अनुसूची में सम्मिलित है अथवा  धारा 15 के अधीन अधिसूचित है; 

(ङ) रजिस्टर" से धारा 23 के अधीन रखा गया वास्तुविदों का रजिस्टर अभिप्रेत है; 

(च) विनियम" से परिषद् द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया कोई विनियम अभिप्रेत है; 

(छ) नियम" से केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया कोई नियम अभिप्रेत है । 

अध्याय 2

वास्तुकला परिषद्

3. वास्तुकला परिषद् का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, एक परिषद् गठित करेगी जो वास्तुकला परिषद् कहलाएगी और जो शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली निगमित निकाय होगी, जिसे जंगम तथा स्थावर दोनों ही प्रकार की सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन करने की तथा संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद ला सकेगी और उस पर वाद लाया जा सकेगा । 

(2) परिषद् का प्रधान कार्यालय दिल्ली में अथवा ऐसे अन्य स्थान पर होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।

(3) परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-

() भारतीय वास्तुविद् संस्थान द्वारा अपने सदस्यों में से निर्वाचित ऐसे पांच वास्तुविद् जिनके पास मान्य अर्हताएं हैं

(ख) भारत सरकार के भूतपूर्व शिक्षा मंत्रालय के 30 नवम्बर, 1945 के संकल्प सं० फा० 16-10/44-ई०-iii' द्वारा स्थापित अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् द्वारा नामनिर्देशित दो व्यक्ति; 

(ग) भारत में मान्य अर्हताओं के लिए पूर्णकालिक शिक्षा देने वाली वास्तु-सम्बन्धी संस्थाओं के प्रधानों द्वारा अपने में से निर्वाचित पांच व्यक्ति; 

(घ) केन्द्रीय सरकार के उन मंत्रालयों के मुख्य वास्तुविद् जिन्हें रक्षा तथा रेल सम्बन्धी सरकारी कार्य आबंटित किया गया है तथा केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग के वास्तु-सम्बन्धी संगठन का प्रधान, पदेन; 

(ङ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित एक व्यक्ति; 

(च) प्रत्येक राज्य से एक ऐसा वास्तुविद् जिसे उस राज्य की सरकार नामनिर्देशित करे; 

(छ) इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स (इण्डिया) द्वारा अपने सदस्यों में से नामनिर्देशित दो व्यक्ति; तथा 

(ज) इंस्टीट्यूशन आफ सर्वेअर्स आफ इण्डिया द्वारा अपने सदस्यों में से नामनिर्देशित एक व्यक्ति ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,- 

(क) इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स (इण्डिया)" से इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) के अधीन प्रथम बार 1920 में रजिस्ट्रीकृत तथा तत्पश्चात् 1935 में रायल चार्टर द्वारा निगमित इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स (इण्डिया) अभिप्रेत है । 

(ख) इंस्टीट्यूशन आफ सर्वेअर्स आफ इंडिया" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत सर्वेक्षक संस्था अभिप्रेत है । 

(4) उपधारा (3) के खण्ड (क) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार रजिस्टर के तैयार होने तक, भारतीय वास्तुविद् संस्थान के परामर्श से, प्रथम परिषद् में, उक्त खण्ड (क) में निर्दिष्ट ऐसे व्यक्तियों को नामनिर्देशित कर सकेगी जो धारा 25 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित है और इस प्रकार नामनिर्देशित व्यक्ति उतनी अवधि तक पद धारण करेंगे जितनी केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे । 

(5) उपधारा (3) के खण्ड (च) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार रजिस्टर तैयार होने तक, सम्बद्ध राज्य सरकारों के परामर्श से, प्रथम परिषद् में, उक्त खण्ड (च) में निर्दिष्ट ऐसे व्यक्तियों को नामनिर्देशित कर सकेगी जो धारा 25 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित हैं और इस प्रकार नामनिर्देशित व्यक्ति उतनी अवधि तक पद धारण करेंगे जितनी केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे । 

4. परिषद् के सभापति और उपसभापति-(1) परिषद् के सदस्य अपने में से परिषद् के सभापति और उपसभापति का निर्वाचन करेंगे :

परन्तु परिषद् के प्रथम गठन पर तथा सभापति के निर्वाचित होने तक, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित परिषद् का कोई सदस्य सभापति के कृत्यों का निर्वहन करेगा । 

(2) परिषद् का निर्वाचित सभापति या उपसभापति तीन वर्ष की अवधि तक अथवा परिषद् की अपनी सदस्यता छोड़ देने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करेगा, किन्तु यदि वह परिषद् का सदस्य बना रहे, तो वह पुनःनिर्वाचन का पात्र होगा : परन्तु- 

() सभापति उपसभापति को और उपसभापति सभापति को सम्बोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा

(ख) सभापति या उपसभापति अपनी तीन वर्ष की अवधि का अवसान हो जाने पर भी तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक कि उसका उत्तरवर्ती पद ग्रहण न कर ले । 

(3) परिषद् के सभापति और उपसभापति ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

5. निर्वाचन का ढंग-(1) इस अध्याय के अधीन निर्वाचन ऐसी रीति से संचालित किए जाएंगे जो नियमों द्वारा विहित की जाए  

(2) जहां ऐसे किसी निर्वाचन के बारे में कोई विवाद उत्पन्न होता है वहां परिषद् वह मामला ऐसे अधिकरण को निर्देशित करेगी जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियुक्त करे और अधिकरण का विनिश्चय अन्तिम होगा :

परन्तु ऐसा कोई निर्देश निर्वाचन के परिणाम की घोषणा की तारीख से तीस दिन के भीतर, व्यथित पक्षकार द्वारा परिषद् को किए गए आवेदन पर ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं । 

(3) अधिकरण के व्यय परिषद् द्वारा वहन किए जाएंगे । 

6. पदावधि और आकस्मिक रिक्तियां-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते है, निर्वाचित या नामनिर्देशित सदस्य अपने निर्वाचन या नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि तक अथवा अपने उत्तरवर्ती के सम्यक् रूप से निर्वाचित या नामनिर्देशित होने तक, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, पद धारण करेगा ।

(2) कोई निर्वाचित या नामनिर्देशित सदस्य, किसी भी समय, सभापति को या उसकी अनुपस्थिति में उपसभापति को सम्बोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे सकेगा और तब उस सदस्य का स्थान रिक्त हो जाएगा । 

(3) किसी सदस्य के बारे में निम्नलिखित दशाओं में यह समझा जाएगा कि उसने अपना स्थान रिक्त कर दिया है, अर्थात् :-

(i) यदि वह परिषद् के तीन क्रमवर्ती साधारण अधिवेशनों से ऐसे किसी हेतुक के बिना अनुपस्थित रहे जो परिषद् की राय में पर्याप्त हो; अथवा 

(ii) यदि वह धारा 3 की उपधारा (3) के खण्ड (क), खण्ड (छ) या खण्ड (ज) में निर्दिष्ट उस निकाय का, जिसके द्वारा वह, यथास्थिति, निर्वाचित या नामनिर्देशित किया गया हो, सदस्य न रह जाए; अथवा 

(iii) उस दशा में जब वह धारा 3 की उपधारा (3) के खण्ड (ग) के अधीन निर्वाचित हुआ हो, यदि उक्त खण्ड में निर्दिष्ट किसी संस्था के प्रधान के रूप में उसकी नियुक्ति समाप्त हो जाए । 

(4) परिषद् में कोई आकस्मिक रिक्ति, यथास्थिति, नए निर्वाचन या नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और उस रिक्ति को भरने के लिए इस प्रकार निर्वाचित या नामनिर्देशित व्यक्ति उस शेष अवधि के लिए पद धारण करेगा जिसके लिए वह सदस्य जिसका स्थान वह लेता है, निर्वाचित या नामनिर्देशित किया गया था ।

(5) परिषद् के सदस्य, तीन क्रमवर्ती अवधियों से अनधिक के लिए पुनः निर्वाचन या पुनः नामनिर्देशन के पात्र होंगे

7. परिषद्, कार्यपालिका समिति या अन्य समितियों के कार्य अथवा कार्यवाहियों की विधिमान्यता का केवल रिक्ति, आदि के कारण अविधिमान्य होना-परिषद्, कार्यपालिका समिति या किसी अन्य समिति का कोई कार्य अथवा उसकी कोई कार्यवाही केवल-

() परिषद्, कार्यपालिका समिति या अन्य किसी समिति में किसी रिक्ति अथवा उसके गठन में किसी त्रुटि के कारण, अथवा

() उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के निर्वाचन या नामनिर्देशन में किसी त्रुटि के कारण, अथवा 

() प्रक्रिया में किसी ऐसी अनियमितता के कारण जिससे मामले के गुणागुण पर कोई प्रभाव पड़ता हो,

अविधिमान्य होगी  

8. निर्योग्यताएं-कोई व्यक्ति परिषद् के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नामनिर्देशित किए जाने का उस दशा में पात्र न होगा जब वह- 

(क) अनुन्मोचित दिवालिया हो; अथवा 

() भारत में किसी न्यायालय द्वारा किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया हो और उसे दो वर्ष से अन्यून कारावास से दण्डादिष्ट किया गया हो और वह अपने छूटने के पश्चात् पांच वर्ष की अतिरिक्त अवधि तक अपात्र बना रहेगा  

9. परिषद् के अधिवेशन-(1) परिषद् का अधिवेशन हर छह मास में कम से कम एक बार ऐसे स्थान और समय पर होगा तथा वह अपने अधिवेशनों में कार्य संचालन के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं । 

(2) जब तक कि विनियमों द्वारा अन्यथा विहित न किया जाए, परिषद् के नौ सदस्यों से उसकी गणपूर्ति होगी तथा परिषद् के सभी कार्यों का विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा । 

(3) मतों के बराबर होने की दशा में सभापति का या उसकी अनुपस्थिति में उपसभापति का या, उन दोनों की अनुपस्थिति में, अधिवेशन का सभापतित्व करने वाले सदस्य का द्वितीय या निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा

10. कर्यपालिका समिति और अन्य समितियां-(1) परिषद् अपने सदस्यों में से एक कार्यपालिका समिति गठित करेगी और वह ऐसे अन्य साधारण या विशेष प्रयोजनों के लिए जो परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों को करने के लिए आवश्यक समझे, अन्य समितियां भी गठित कर सकेगी ।

(2) कार्यपालिका समिति, परिषद् के सभापति और उपसभापति से, जो उसके पदेन सदस्य होंगे, और पांच अन्य सदस्यों से, जो परिषद् द्वारा अपने सदस्यों में से निर्वाचित किए जाएंगे, मिलकर बनेगी ।

(3) परिषद् के सभापति और उपसभापति कार्यपालिका समिति के क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होंगे ।

(4) कार्यपालिका समिति का कोई सदस्य परिषद् के सदस्य के रूप में अपनी अवधि के अवसान तक उस रूप में कार्य करता रहेगा किन्तु यदि वह परिषद् का सदस्य बना रहे तो वह पुनः निर्वाचन का पात्र होगा ।

(5) इस अधिनियम द्वारा कार्यपालिका समिति को प्रदत्त शक्तियों और उस पर अधिरोपित कर्तव्यों के अतिरिक्त वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करेगी जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

11. सभापति, उपसभापति और सदस्यों की फीस और भत्ते-परिषद् के सभापति, उपसभापति और अन्य सदस्य ऐसी फीस और भत्तों के हकदार होंगे जो परिषद्, केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, इस निमित्त नियत करे । 

12. अधिकारी और अन्य कर्मचारी-परिषद्-

(क) एक रजिस्ट्रार नियुक्त करेगी जो उसके सचिव के रूप में कार्य करेगा और जो उस दशा में, जब परिषद् ऐसा विनिश्चय करे, उसके कोषाध्यक्ष के रूप में भी कार्य कर सकेगा; 

(ख) ऐसे अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी नियुक्त करेगी जो परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों को करने में समर्थ होने की दृष्टि से आवश्यक समझे; 

(ग) केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से परिषद् के अधिकारियों तथा कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें नियत करेगी । 

(2) उपधारा (1) के खण्ड (क) में किसी बात के होते भी, परिषद् के प्रथम बार गठित होने से प्रथम तीन वर्ष के लिए, परिषद् का रजिस्ट्रार केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया गया व्यक्ति होगा जो केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।

(3) इस धारा के अधीन नियुक्त किए गए सभी व्यक्ति परिषद् के कर्मचारी होंगे ।

13. परिषद् की वित्त व्यवस्था-(1) परिषद् के प्रबन्ध और नियंत्रण के अधीन एक निधि स्थापित की जाएगी जिसमें परिषद् को प्राप्त सभी धन जमा किए जाएंगे और परिषद् द्वारा उचित रूप से उपगत सभी व्यय और दायित्व उसमें से पूरे किए जाएंगे ।

(2) परिषद् निधि में तत्समय जमा किसी भी धन को किसी सरकारी प्रतिभूति में अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किसी अन्य प्रतिभूति में विनिहित कर सकेगी ।

(3) परिषद् निधि के उचित लेखे, आमदनी से पूंजी को सुभिन्न रखते हुए, रखेगी ।

(4) परिषद् के वार्षिक लेखाओं की संपरीक्षा ऐसे संपरीक्षक द्वारा की जा सकेगी जिसे परिषद् प्रतिवर्ष नियुक्त करे

(5) प्रत्येक वर्ष के अन्त में, यथासाध्य शीघ्र, किन्तु ठीक अगले वर्ष के सितम्बर के तीसवें दिन के अपश्चात्, परिषद् उस वर्ष के लिए परिषद् के संपरीक्षित लेखाओं की प्रति तथा परिषद् की रिपोर्ट राजपत्र में प्रकाशित कराएगी और उक्त लेखाओं तथा रिपोर्ट की प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी ।

(6) निधि निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-

(क) केन्द्रीय सरकार से अनुदान, दान या निक्षेप के रूप में प्राप्त सभी धन; 

(ख) इस अधिनियम के अधीन प्राप्त कोई राशियां, चाहे वे फीस के रूप में हों या अन्यथा । 

(7) परिषद् के नाम जमा सभी ऐसा धन, जिसका तुरन्त उपयोजन नहीं किया जा सकता, भारतीय स्टेट बैंक में अथवा बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की प्रथम अनुसूची के स्तम्भ 2 में विनिर्दिष्ट किसी अन्य बैंक में जमा किया जाएगा । 

14. भारत में प्राधिकारियों द्वारा दी गई अर्हताओं की मान्यता-(1) अनुसूची में सम्मिलित अथवा धारा 15 के अधीन अधिसूचित अर्हताएं इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्य अर्हताएं होंगी । 

(2) भारत में कोई प्राधिकारी, जो ऐसी वास्तु-सम्बन्धी अर्हता देता है, जो अनुसूची में सम्मिलित नहीं है, उस अर्हता को मान्यता दिलाने के लिए केन्द्रीय सरकार से आवेदन कर सकेगा, और केन्द्रीय सरकार, परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, अनुसूची का संशोधन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस प्रकार कर सकेगी कि वह अर्हता उसमें सम्मिलित की जा सके, और ऐसी किसी अधिसूचना में यह निदेश भी हो सकेगा कि उस वास्तु-सम्बन्धी अर्हता के सामने अनुसूची में ऐसी प्रविष्टि की जाए जिसमें यह घोषित किया गया हो कि वह अर्हता केवल उस दशा में मान्य होगी जब वह किसी विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् दी जाए :

परन्तु जब तक प्रथम परिषद् का गठन नहीं किया जाता, केन्द्रीय सरकार, यथापूर्वोक्त कोई अधिसूचना जारी करने के पूर्व, ऐसे तीन सदस्यों से मिलकर बनी विशेषज्ञ समिति से परामर्श करेगी जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त करे । 

15. विदेशों में प्राधिकारियों द्वारा दी गई वास्तु-सम्बन्धी अर्हताओं की मान्यता-(1) केन्द्रीय सरकार, परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि भारत से बाहर के किसी ऐसे देश के, जिसकी बाबत वास्तु-सम्बन्धी अर्हता की मान्यता के लिए पारस्परिकता की कोई स्कीम प्रवृत्त न हो, किसी विश्वविद्यालय या अन्य संस्था द्वारा दी गई वास्तु-सम्ब्न्धी अर्हता इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्य अर्हता होगी अथवा वह अर्हता केवल उस दशा में मान्य होगी जब वह किसी विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् या किसी विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व दी जाए :

परन्तु जब तक प्रथम परिषद् का गठन नहीं किया जाता, केन्द्रीय सरकार, यथापूर्वोक्त कोई अधिसूचना जारी करने के पूर्व, उस विशेषज्ञ समिति से परामर्श करेगी जो धारा 14 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन गठित की जाए  

(2) परिषद् भारत से बाहर के किसी राज्य या देश में किसी ऐसे प्राधिकारी के साथ जिसे ऐसे राज्य या देश की विधि द्वारा वास्तुविदों का रजिस्टर रखने का कार्य सौंपा गया हो, वास्तु-सम्बन्धी अर्हताओं की मान्यता के लिए पारस्परिकता की स्कीम तय करने के लिए बातचीत कर सकेगी और ऐसी किसी स्कीम के अनुसरण में केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि ऐसी किसी वास्तु-सम्बन्धी अर्हता के बारे में, जिसके लिए परिषद् ने यह विनिश्चय किया है कि वह मान्य होनी चाहिए, यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्य अर्हता है और ऐसी किसी अधिसूचना में यह निदेश भी हो सकेगा कि ऐसी कोई वास्तु-सम्बन्धी अर्हता केवल उस दशा में मान्य होगी जब वह किसी विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् या किसी विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व दी जाए ।

16. अनुसूची का संशोधन करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-धारा 14 की उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, अनुसूची का संशोधन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश देते हुए कर सकेगी कि वास्तु-सम्बन्धी अर्हता की बाबत उसमें प्रविष्टि की जाए । 

17. मान्यता का प्रभाव-किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई भी मान्य अर्हता रजिस्टर में नामांकन के लिए पर्याप्त अर्हता होगी ।

18. पाठ्यक्रमों और परीक्षा के बारे में जानकारी की अपेक्षा करने की शक्ति-भारत में प्रत्येक प्राधिकारी, जो मान्य अर्हता देता है, उन पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं के बारे में, जिन्हें उस अर्हता को प्राप्त करने के लिए पूरा करना होगा तथा देना होगा, उस आयु के बारे में, जिस पर ऐसे पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं को पूरा करना तथा देना होगा और जिस पर वह अर्हता दी जाती है, तथा उस अर्हता को प्राप्त करने से सम्बद्ध अपेक्षाओं के बारे में, साधारणतः ऐसी जानकारी प्रस्तुत करेगा जिसकी परिषद्, समय-समय पर, अपेक्षा करे । 

19. परीक्षाओं का निरीक्षण-(1) कार्यपालिका समिति, परिषद् द्वारा बनाए गए विनियमों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, उतने निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी जितने वह किसी ऐसे महाविद्यालय या संस्था का, जिसमें वास्तु-सम्बन्धी शिक्षा दी जाती है, निरीक्षण करने के लिए, अथवा किसी महाविद्यालय या संस्था द्वारा ली जाने वाली परीक्षा में हाजिर रहने के लिए इस प्रयोजन से आवश्यक समझे कि वह उस महाविद्यालय या संस्था द्वारा दी जाने वाली वास्तु-सम्बन्धी अर्हता की मान्यता के लिए केन्द्रीय सरकार से सिफारिश कर सके । 

(2) निरीक्षक किसी प्रशिक्षण या परीक्षा के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे किन्तु वास्तु-सम्बन्धी शिक्षा के स्तरों की पर्याप्तता पर, जिनके अन्तर्गत कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, आवास, प्रशिक्षण तथा ऐसी अन्य सुविधाएं भी हैं जो ऐसी शिक्षा देने के लिए विनियमों द्वारा विहित की जाएं, अथवा प्रत्येक ऐसी परीक्षा की पर्याप्तता पर, जिसमें वे हाजिर रहें, कार्यपालिका समिति की रिपोर्ट देंगे ।

(3) कार्यपालिका समिति ऐसी रिपोर्ट की प्रति महाविद्यालय या संस्था को भेजेगी और उसकी प्रतियां, उस पर महाविद्यालय या संस्था के टिप्पणों सहित, यदि कोई हों, केन्द्रीय सरकार को भी भेजेगी ।

20. मान्यता का वापस लिया जाना-(1) यदि कार्यपालिका समिति को रिपोर्ट पर परिषद् को यह प्रतीत हो कि- 

(क) पाठ्यक्रम या वह परीक्षा जिसे किसी महाविद्यालय या संस्था से पूरा करना है या देना है, अथवा किसी महाविद्यालय या संस्था द्वारा ली जाने वाली परीक्षा में अभ्यर्थियों से अपेक्षित दक्षता, अथवा 

(ख) ऐसे महाविद्यालय या संस्था में उपबन्धित कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, आवास, प्रशिक्षण तथा कर्मचारिवृन्द और प्रशिक्षण के लिए अन्य सुविधाएं, विनियमों द्वारा विहित स्तरों के अनुरूप नहीं हैं तो परिषद् उस आशय का अभ्यावेदन समुचित सरकार से करेगी ।  

(2) ऐसे अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात् समुचित सरकार, वह अभ्यावेदन और ऐसे टिप्पण जो वह करे, सम्बद्ध महाविद्यालय या संस्था को उस अवधि की संसूचना सहित भेजेगी जिसके भीतर, यथास्थिति, महाविद्यालय या संस्था समुचित सरकार को अपना स्पष्टीकरण भेज सकती है ।

(3) स्पष्टीकरण के प्राप्त होने पर या जहां नियत अवधि के भीतर कोई स्पष्टीकरण न दिया जाए वहां उस अवधि के अवसान पर, राज्य सरकार उपधारा (5) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट महाविद्यालय या संस्था के बारे में केन्द्रीय सरकार से अपनी सिफारिश करेगी । 

(4) केन्द्रीय सरकार- 

(क) उपधारा (3) में निर्दिष्ट महाविद्यालय या संस्था के बारे में ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात्, यदि कोई हो, जो वह ठीक समझे, अथवा 

(ख) उपधारा (5) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट महाविद्यालय या संस्था से स्पष्टीकरण प्राप्त होने पर, अथवा जहां नियत अवधि के भीतर कोई स्पष्टीकरण न दिया जाए वहां उस अवधि के अवसान पर,

राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि, यथास्थिति, ऐसे महाविद्यालय या संस्था द्वारा दी जाने वाली वास्तु-सम्बन्धी अर्हता के सामने अनुसूची में ऐसी प्रविष्टि की जाए जिसमें यह घोषित किया गया हो कि वह अर्हता केवल उस दशा में मान्य होगी जब वह किसी विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व दी गई हो और अनुसूची के बारे में यह समझा जाएगा कि वह तद्नूसार संशोधित हो गई है  ।

(5) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, समुचित सरकार" से- 

(क) संसद् के किसी अधिनियम द्वारा स्थापित अथवा केन्द्रीय सरकार के प्रबन्ध या नियंत्रण में के अथवा उसके द्वारा वित्तपोषित किसी महाविद्यालय या संस्था के सम्बन्ध में, केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है, तथा 

(ख) किसी अन्य दशा में, राज्य-सरकार अभिप्रेत है । 

21. वास्तु-सम्बन्धी शिक्षा का न्यूनतम स्तर-परिषद् वास्तु-सम्बन्धी शिक्षा के वे न्यूनतम स्तर विहित कर सकेगी जो भारत में महाविद्यालयों या संस्थाओं द्वारा मान्य अर्हताओं को देने के लिए अपेक्षित हैं । 

22. वृत्तिक आचरण-(1) परिषद् वास्तुविदों के लिए वृत्तिक आचरण तथा शिष्टाचार के स्तर तथा आचार संहिता विनियमों द्वारा विहित कर सकेगी । 

(2) परिषद् द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाए गए विनियमों में यह विनिर्दिष्ट किया जा सकेगा कि उनके कौन से उल्लंघनों से वृत्तिक दृष्टि से गर्हित आचरण अर्थात् वृत्तिक अवचार होगा और तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी ऐसा उपबन्ध प्रभावी होगा । 

अध्याय 3

वास्तुविदों का रजिस्ट्रीकरण

23. रजिस्टर का तैयार किया जाना और रखा जाना-(1) केन्द्रीय सरकार, यथाशीघ्र, भारत के वास्तुविदों का एक रजिस्टर इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से तैयार कराएगी । 

(2) परिषद् अपना गठन हो जाने पर इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार रजिस्टर को बनाए रखने का कार्य ग्रहण कर लेगी ।

(3) रजिस्टर में निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात् :-

(क) वास्तुविद् के जन्म की तारीख, उसकी राष्ट्रिकता और उसके आवास के पते सहित उसका पूरा नाम; 

(ख) रजिस्ट्रीकरण के लिए उसकी अर्हता और वह तारीख जिसको उसने वह अर्हता प्राप्त की तथा वह प्राधिकारी जिसने वह प्रदत्त की; 

(ग) रजिस्टर में उसके प्रथम बार प्रविष्ट किए जाने की तारीख;

(घ) उसका वृत्तिक पता; और 

(ङ) ऐसी अन्य विशिष्टियां जो नियमों द्वारा विहित की जाएं ।

24. रजिस्टर का प्रथम बार तैयार किया जाना-(1) वास्तुविदों के रजिस्टर को प्रथम बार तैयार करने के प्रयोजनों के लिए, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक रजिस्ट्रीकरण अधिकरण गठित करेगी जो ऐसे तीन व्यक्तियों में मिलकर बनेगा जिन्हें केन्द्रीय सरकार की राय में, वास्तुकला का ज्ञान अथवा अनुभव है, और धारा 12 के अधीन नियुक्त रजिस्ट्रार, अधिकरण के सचिव के रूप में कार्य करेगा । 

(2) केन्द्रीय सरकार, उसी अथवा वैसी ही अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख नियत करेगी जिसको या जिसके पूर्व रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन, जिसके साथ ऐसी फीस होगी, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, रजिस्ट्रीकरण अधिकरण को किया जा सकेगा । 

(3) रजिस्ट्रीकरण अधिकरण नियत दिन को या उसके पूर्व प्राप्त प्रत्येक आवेदन की परीक्षा करेगा और यदि उसका यह समाधान हो जाए कि आवेदक धारा 25 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित है तो वह आवेदक का नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किए जाने का निदेश देगा । 

(4) इस प्रकार तैयार किया गया प्रथम रजिस्टर तत्पश्चात् ऐसी रीति से प्रकाशित किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट करे और इस प्रकार प्रकाशित रजिस्टर में रजिस्ट्रीकरण अधिकरण के अभिव्यक्त या विवक्षित विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे प्रकाशन की तारीख से तीस दिन के भीतर उस विनिश्चय के विरुद्ध अपील, केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियुक्त प्राधिकारी को, कर सकेगा । 

(5) उपधारा (4) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी, प्रभावित होने वाले व्यक्ति को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और सुसंगत अभिलेखों को मंगाने के पश्चात् ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

(6) रजिस्ट्रार, जहां आवश्यक हो, रजिस्ट्रार का संशोधन उपधारा (4) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी के विनिश्चयों के अनुसार करेगा । 

(7) प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को, जिसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट हो, एक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसे प्ररूप में दिया जाएगा जो नियमों द्वारा विहित किया जाए । 

(8) परिषद् का गठन हो जाने पर रजिस्टर उसकी अभिरक्षा में दे दिया जाएगा, और केन्द्रीय सरकार निदेश दे सकेगी कि प्रथम रजिस्टर में रजिस्ट्रीकरण से सम्बद्ध सम्पूर्ण आवेदन फीस या उसका कोई विनिर्दिष्ट भाग परिषद् के जमाखाते में जमा किया जाए । 

25. रजिस्टर में प्रविष्ट किए जाने के लिए अर्हता-कोई भी व्यक्ति ऐसी फीस के संदाय पर, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट कराने का उस दशा में हकदार होगा जब वह भारत में निवास करता हो अथवा वास्तुविद् की वृत्ति करता हो और-

(क) उसके पास मान्य अर्हता हो, अथवा 

(ख) उसके पास ऐसी कोई अर्हता न हो किन्तु उसने, भारत का नागरिक होते हुए, धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख के पूर्व कम से कम पांच वर्ष की अवधि तक वास्तुविद् के रूप में व्यवसाय किया हो, अथवा 

(ग) उसके पास ऐसी अन्य अर्हताएं हों जो नियमों द्वारा विहित की जाएं :

परन्तु भारत के नागरिक से भिन्न कोई अन्य व्यक्ति किसी ऐसी अर्हता के आधार पर- 

(क) जो धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन मान्य हो, रजिस्ट्रीकरण का हकदार न होगा जब तक कि भारत से बाहर उस देश की, जिसका कि वह व्यक्ति है, विधि तथा पद्धति से भारत के वे नागरिक जो उस देश में रजिस्ट्रीकरण योग्य वास्तु-सम्बन्धी अर्हता रखते हों, उस देश में वास्तुविद् की वृत्ति में प्रवेश करने और वास्तुविद् की वृत्ति करने के लिए अनुज्ञात न हों, अथवा

(ख) रजिस्ट्रीकरण का हकदार न होगा जब तक कि केन्द्रीय सरकार ने पारस्परिकता की किसी स्कीम के अनुसरण में या अन्यथा, उस अर्हता को धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन मान्य अर्हता घोषित न किया हो । 

26. पश्चात्वर्ती रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रक्रिया-(1) वास्तुविदों के प्रथम रजिस्टर में रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदनों की प्राप्ति के लिए नियत तारीख के पश्चात्, रजिस्ट्रीकरण के लिए, सभी आवेदन परिषद् के रजिस्ट्रार को सम्बोधित किए जाएंगे और उनके साथ ऐेसी फीस होगी जो नियमों द्वारा विहित की जाए । 

(2) यदि ऐसे आवेदन पर रजिस्ट्रार की यह राय हो कि आवेदक रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट कराने का हकदार है तो वह आवेदक का नाम उसमें प्रविष्ट कर देगा :

परन्तु कोई ऐसा व्यक्ति, जिसका नाम इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर में से हटा दिया गया है, परिषद् के अनुमोदन के बिना रजिस्टर में अपना नाम पुनः प्रविष्ट कराने का हकदार न होगा । 

(3) कोई व्यक्ति, जिसका रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन रजिस्ट्रार द्वारा नामंजूर कर दिया जाए, ऐसी नामंजूरी की तारीख से तीन मास के भीतर, परिषद् को अपील कर सकेगा ।

(4) इस धारा के अधीन रजिस्टर में किसी नाम के प्रविष्ट किए जाने पर, रजिस्ट्रार एक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसे प्ररूप में देगा जो नियमों द्वारा विहित किया जाए । 

27. नवीकरण फीस-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि उस वर्ष के, जिसमें नाम प्रथम बार रजिस्टर में प्रविष्ट किया जाता है, ठीक बाद के वर्ष के दिसम्बर के इकतीसवें दिन के पश्चात् रजिस्टर में नाम बनाए रखने के लिए परिषद् को प्रतिवर्ग उतनी नवीकरण फीस संदत्त की जाएगी जो नियमों द्वारा विहित की जाए और जहां ऐसा कोई निदेश किया गया हो वहां नवीकरण फीस उस वर्ष के, जिससे वह सम्बद्ध है, अप्रैल के प्रथम दिन के पूर्व संदत्त किए जाने के लिए शोध्य हो जाएगी । 

(2) जहां नियत तारीख के पूर्व नवीकरण फीस संदत्त नहीं की जाती वहां रजिस्ट्रार व्यतिक्रमी का नाम रजिस्टर में से हटा देगा :

परन्तु इस प्रकार हटाया गया नाम रजिस्टर में ऐसी शर्तों पर, जिन्हें नियमों द्वारा विहित किया जाए, पुनः स्थापित किया जा सकेगा ।

(3) नवीकरण फीस का संदाय कर दिए जाने पर रजिस्ट्रार ऐसी रीति से, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को तदुनसार पृष्ठांकित कर सकेगा । 

28. अतिरिक्त अर्हता का प्रविष्ट किया जाना-कोई वास्तुविद् ऐसी फीस का संदाय कर देने पर, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, रजिस्टर में ऐसी किसी अतिरिक्त मान्य अर्हता को प्रविष्ट कराने का हकदार होगा जो वह प्राप्त करे  

29. रजिस्टर से हटाया जाना-(1) परिषद्, आदेश द्वारा, किसी ऐसे वास्तुविद् का नाम रजिस्टर से हटा सकेगी-

                (क) जिससे उस आशय का कोई अनुरोध प्राप्त हुआ है, अथवा

(ख) जिसकी रजिस्टर के अन्तिम प्रकाशन के पश्चात् मृत्यु हो गई है । 

(2) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह है कि यदि परिषद् का, किसी वास्तुविद् को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और ऐसी अतिरिक्त जांच के पश्चात्, यदि कोई हो, जो वह करना ठीक समझे, यह समधान हो जाए कि-

() रजिस्टर में उसका नाम भूल से अथवा दुर्व्यपदेशन या किसी तात्त्विक तथ्य के दबाने के कारण प्रविष्ट हो गया है; या 

(ख) उसे किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अन्तर्वलित है; या 

(ग) वह अनुन्मोचित दिवालिया है; या 

(घ) वह किसी सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त न्यायनिर्णीत किया गया है,

तो वह आदेश दे सकेगी कि उसका नाम रजिस्टर से हटा दिया जाए । 

(3) उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश में यह निदेश हो सकेगा कि ऐसा कोई वास्तुविद् जिसके नाम को रजिस्टर से हटाए जाने के लिए आदेश किया जाता है, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए ऐसी अवधि तक, जो विनिर्दिष्ट की जाए, अपात्र रहेगा । 

(4) उपधारा (2) के अधीन किया गया कोई आदेश तब तक प्रभावी न होगा जब तक कि उसके किए जाने की तारीख से तीन मास समाप्त न हो जाएं । 

30. अवचार से सम्बद्ध जांच में प्रक्रिया-(1) यदि परिषद् को किए गए किसी परिवाद की प्राप्ति पर उसकी यह राय हो कि कोई वास्तुविद् ऐसे वृत्तिक अवचार का दोषी रहा है, जो यदि साबित हो जाए, तो वास्तुविद् के रूप में व्यवसाय करने के लिए उसे अयोग्य बना देगा तो परिषद् ऐसी रीति से जांच कर सकेगी जो नियमों द्वारा विहित की जाए  

(2) उपधारा (1) के अधीन जांच करने के पश्चात् और वास्तुविद् की सुनवाई करने के पश्चात्, परिषद् आदेश द्वारा, उक्त वास्तुविद् को धिग्दण्ड दे सकेगी अथवा उसे वास्तुविद् के रूप में व्यवसाय करने से निलम्बित कर सकेगी अथवा रजिस्टर से उसका नाम हटा सकेगी अथवा ऐसा अन्य आदेश पारित कर सकेगी जो वह ठीक समझे  

31. प्रमाणपत्रों का अभ्यर्पण-कोई व्यक्ति जिसका नाम रजिस्टर से धारा 27 की उपधारा (2), धारा 29 की उपधारा (1) या उपधारा (2) अथवा धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन हटा दिया गया है अथवा जहां ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हो गई है वहां सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 2 के खण्ड (11) में यथापरिभाषित उसका विधिक प्रतिनिधि, उसका रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र तत्काल रजिस्ट्रार को अभ्यर्पित करेगा और इस प्रकार हटाया गया नाम राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा । 

32. रजिस्टर में पुनः स्थापन-परिषद् ऐसे कारणों से, जो पर्याप्त प्रतीत हों, और केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन रहते हुए, किसी भी समय, आदेश दे सकेगी कि ऐसी फीस के संदाय पर, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, रजिस्टर से हटाए गए किसी व्यक्ति का नाम उसमें पुनःस्थापित किया जाए । 

33. प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति का दिया जाना-जहां रजिस्ट्रार को समाधानप्रद रूप में यह दर्शित कर दिया जाता है कि कोई रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र खो गया है या नष्ट हो गया है वहां रजिस्ट्रार ऐसी फीस के संदाय पर, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति नियमों द्वारा विहित प्ररूप में दे सकेगा ।

34. रजिस्टर का मुद्रण-प्रत्येक वर्ष के अप्रैल के प्रथम दिन के पश्चात्, यथाशीघ्र, रजिस्ट्रार, रजिस्टर की, जैसा कि वह उक्त तारीख को हो, प्रतियां मुद्रित कराएगा और ऐसी प्रतियां, उनके लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों को ऐसी फीस के संदाय पर, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, उपलब्ध की जाएंगी और इस बात का साक्ष्य होंगी कि वे व्यक्ति जिनमें नाम उसमें प्रविष्ट हैं, उक्त तारीख को वास्तुविद् थे ।

35. रजिस्ट्रीकरण का प्रभाव-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी वास्तुविद् के प्रति किसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी वास्तुविद् के प्रति निर्देश है । 

(2) धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख से दो वर्ष के अवसान के पश्चात् ऐसे किसी व्यक्ति को, जो रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत है, केन्द्रीय या राज्य सरकार के अधीन अथवा किसी अन्य स्थानीय निकाय या संस्था में, जो लोक या स्थानीय निधियों से वित्तपोषित है या सहायता पा रही है अथवा केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त किसी संस्था में वास्तुविद् के रूप में नियुक्ति के लिए अधिमान मिलेगा ।  

अध्याय 4

प्रकीर्ण

36. रजिस्ट्रीकृत होने का मिथ्या दावा करने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम तत्समय रजिस्टर में प्रविष्ट हो, यह मिथ्या व्यपदेशन करेगा कि वह इस प्रकार प्रविष्ट है अथवा अपने नाम या अभिधान के सम्बन्ध में ऐसे किन्हीं शब्दों या अक्षरों का प्रयोग करेगा जो इस बात को दर्शित करने के लिए युक्तियुक्त रूप से प्रकल्पित हों कि उसका नाम इस प्रकार प्रविष्ट है, तो वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा

37. अभिधान के प्रयोग के विरुद्ध प्रतिषेध-(1) धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख से एक वर्ष के अवसान के पश्चात्, रजिस्ट्रीकृत वास्तुविद् से भिन्न कोई व्यक्ति, अथवा वास्तुविदों की कोई फर्म, वास्तुविद् के अभिधान और अभिनाम का प्रयोग नहीं करेगी :

परन्तु इस धारा के उपबन्ध निम्नलिखित को लागू नहीं होंगे, अर्थात् :- 

(क) दृश्यभूमि वास्तुविद्" अथवा पोत वास्तुविद्" के रूप में पदाभिहित किसी व्यक्ति द्वारा वास्तुविद् की वृत्ति का किया जाना; 

() ऐसा कोई व्यक्ति जो भारत से बाहर किसी देश में वास्तुविद् की वृत्ति कर रहा हो और जो केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुज्ञा से किसी विनिर्दिष्ट परियोजना के लिए भारत में परामर्शी या डिजाइनकार का काम अपने हाथ में लेता है

स्पष्टीकरण-खण्ड (क) के प्रयोजनों के लिए,-

(i) दृश्यभूमि वास्तुविद्" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो वनस्पतियों, पेड़ों तथा दृश्यभूमि से सम्बद्ध खुले स्थानों के डिजाइनों के सम्बन्ध में कार्य करता हो; 

(ii) पोत वास्तुविद्" से ऐसा वास्तुविद् अभिप्रेत है जो पोतों के डिजाइन और सन्निर्माण के सम्बन्ध में कार्य करता हो  

(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो वह प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए से अधिक का नहीं होगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

38. रजिस्ट्रीकरण प्रामणपत्र अभ्यर्पित करने में असफलता-यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम रजिस्टर से हटा दिया गया है, अपना रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र तत्काल अभ्यर्पित करने में पर्याप्त हेतुक के बिना असफल रहेगा तो वह जुर्माने से, जो एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, और असफलता जारी रहने की दशा में अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान वह असफल रहेगा, दस रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा

39. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान परिषद् के आदेश अथवा परिषद् द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं   

(2) प्रेसिन्डेन्सी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई मजिस्ट्रेट इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा । 

40. परिषद् द्वारा प्रस्तुत की जाने वाली जानकारी और उसका प्रकाशन-(1) परिषद् ऐसी रिपोर्टें, अपने कार्यवृत्त की प्रतियां तथा अन्य जानकारी केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगी, जिनकी वह सरकार अपेक्षा करे । 

(2) केन्द्रीय सरकार इस धारा के अधीन अपने को प्रस्तुत की गई किसी रिपोर्ट, प्रति या अन्य जानकारी को ऐसी रीति से प्रकाशित करेगी जो वह ठीक समझे । 

41. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम या विनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के, परिषद् अथवा परिषद् के किसी सदस्य के, कार्यपालिका समिति अथवा किसी अन्य समिति के अथवा परिषद् के अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों के विरुद्ध होगी

42. परिषद् के सदस्यों तथा अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-परिषद् के सदस्य तथा परिषद् के अधिकारी और अन्य कर्मचारी भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे  

43. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध बना सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत हों और उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :

परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से दो वर्ष  के अवसान के पश्चात् नहीं  किया जाएगा ।  

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद्  के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा और धारा 44 की उपधारा (3) के उपबन्ध ऐसे आदेश की बाबत ऐसे लागू होंगे जैसे वे इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम की बाबत लागू होते हैं । 

44. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी । 

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) वह रीति जिससे अध्याय 2 के अधीन निर्वाचन संचालित किए जाएंगे, धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त अधिकरण के सदस्य की सेवा के निबन्धन और शर्तें तथा वह प्रक्रिया जिसका अधिकरण द्वारा अनुसरण किया जाएगा;

(ख) वह प्रक्रिया जिसका अनुसरण, धारा 14 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन गठित विशेषज्ञ समिति अपना कामकाज करने के लिए करेगी तथा विशेषज्ञ समिति की शक्तियां और कर्तव्य तथा उसके सदस्यों को संदेय यात्रा और अन्य दैनिक भत्ते; 

(ग) वे विशिष्टियां जो धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन वास्तुविदों के रजिस्टर में सम्मिलित की जाएंगी; 

(घ) वह प्ररूप जिसमें धारा 24 की उपधारा (7), धारा 26 की उपधारा (4) तथा धारा 33 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया जाएगा; 

(ङ) वह फीस जो धारा 24, 25, 26, 27, 28, 32 और 33 के अधीन संदत्त की जाएगी ; 

() वे शर्तें जिन पर धारा 27 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन रजिस्टर में नाम पुनःस्थापित किया जा सकेगा

(छ) वह रीति जिससे धारा 27 की उपधारा (3) के अधीन पृष्ठांकन किया जाएगा; 

(ज) वह रीति जिससे परिषद् धारा 30 के अधीन कोई जांच करेगी; 

(झ) वह फीस जो धारा 34 के अधीन रजिस्टर की मुद्रित प्रतियां प्राप्त करने के लिए संदत्त की जाएगी;

() कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा उपन्धित किया जाना है या किया जा सकता है

(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के से परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

45. विनियम बनाने की परिषद् की शक्ति-(1) परिषद् इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से  [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा], ऐसे विनियम बना सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों अथवा तद्धीन बनाए गए नियमों से असंगत न हों ।  

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

() परिषद् की सम्पत्ति का प्रबन्ध

() परिषद् के सभापति और उपसभापति की शक्तियां और कर्तव्य

() परिषद् तथा धारा 10 के अधीन गठित कार्यपालिका समिति अथवा किसी अन्य समिति के अधिवेशन बुलाना और आयोजित करना, वह समय और स्थान जिस पर ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे, उनमें कामकाज का संचालन तथा व्यक्तियों की उतनी संख्या जो गणपूर्ति के लिए आवश्यक हो

() धारा 10 के अधीन गठित कार्यपालिका समिति अथवा किसी अन्य समिति के कृत्य;

() शिक्षा तथा व्यावहारिक प्रशिक्षण के, यदि कोई हो, जिसे पूरा किया जाता है, पाठ्यक्रम तथा अवधियां, परीक्षाओं के विषय तथा उनमें उस दक्षता के स्तर जो मान्य अर्हताओं के दिए जाने के लिए किसी महाविद्यालय या संस्था से प्राप्त करनी होगी

() निरीक्षक की नियुक्ति, शक्तियां और कर्तव्य

() वास्तु-सम्बन्धी शिक्षा से सम्बद्ध कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, आवासप्रशिक्षण तथा अन्य सुविधाओं के स्तर

() वृत्तिक परीक्षाओं का संचालन, परीक्षकों की अर्हताएं और ऐसी परीक्षाओं में प्रवेश पाने की शर्तें

() वृत्तिक आचरण तथा शिष्टाचार के स्तर तथा आचार संहिता जिसका पालन वास्तुविद् करेंगे;

() अन्य कोई विषय जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा उपबन्धित किया जाना है या किया जा सकता है और जिसकी बाबत कोई नियम नहीं बनाए गए हैं   

 [(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए  रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगा । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]     

अनुसूची

(धारा 14 देखिए)

अर्हताएं

1. केन्द्रीय या राज्य विधान-मंडल के किसी अधिनियम द्वारा स्थापित भारतीय विवश्वविद्यालयों द्वारा वास्तुकला में प्रदान की गई स्नातक की उपाधि  

2. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् द्वारा वास्तुकला में प्रदान किया गया राष्ट्रीय डिलोमा (जिसे पहले अखिल भारतीय डिप्लोमा कहा जाता था)  

 [3. प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 (1961 का 59) की धारा 3 के अन्तर्गत सम्मिलित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान द्वारा प्रदान की गई वास्तुकला स्नातक (बी.आर्क) डिग्री ]

4. सर जे० जे० कला विद्यालय, मुम्बई द्वारा 1941 के पश्चात् वास्तुकला में प्रदान किया गया पांच वर्षीय पूर्णकालिक डिप्लोमा  

5. आन्ध्र प्रदेश सरकार के राज्य तकनीकी शिक्षा और प्रशिक्षण बोर्ड द्वारा 1960 से (राजकीय कला और वास्तुकला महाविद्यालय, हैदराबाद में प्रशिक्षित छात्रों के लिए) वास्तुकला में प्रदान किया गया डिप्लोमा

6. राजकीय कला और वास्तुकला महाविद्यालय, हैदराबाद द्वारा 1959 तक वास्तुकला में प्रदान किया गया डिप्लोमा, जो इस शर्त के अधीन होगा कि सम्बद्ध अभ्यर्थियों ने तत्पश्चात् राज्य तकनीकी शिक्षा बोर्ड, आन्ध्र प्रदेश द्वारा वास्तुकला में आयोजित विशेष अन्तिम परीक्षा पास कर ली है और विशेष प्रमाणपत्र प्राप्त कर लिया है  

7. नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा राजकीय पालीटेक्निक, नागपुर में प्रशिक्षित छात्रों को 1965 से वास्तुकला में प्रदान किया गया डिप्लोमा  

8. महाराष्ट्र सरकार (या भूतपूर्व मुम्बई सरकार) द्वारा वास्तुकला में प्रदान किया गया सरकारी डिप्लोमा  

9. कलाभवन तकनीकी संस्थान, बड़ौदा से वास्तुकला में डिप्लोमा  

10. वास्तुकला विद्यालय, अहमदाबाद द्वारा वास्तुकला में प्रदान किया गया डिप्लोमा  

11. भारतीय वास्तुविद् संस्थान की सदस्यता

 [18. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 3 के अन्तर्गतविश्वविद्यालय’ घोषित की गई प्रत्येक उच्चतर शिक्षा संस्थान द्वारा प्रदान की गई वास्तुकला स्नातक डिग्री ]

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