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मुखतारनामा अधिनियम, 1882 ( Powers of Attorney Act, 1882 )


 

संसद‌ के अधिनियम

मुखतारनामा अधिनियम, 1882

(1882 का अधिनियम संख्यांक 7)1

[24 फरवरी,1882]

मुखतारनामों से सम्बन्धित विधि का संशोधन

करने के लिए

अधिनियम

 

मुखतारनामों से सम्बन्धित विधि का संशोधन करने के प्रयोजन के लिए एतद‌द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैं:

 

  1. संक्षिप्त नाम - इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम मुखतारनामा अधिनियम, 1882 हैं; 

 

स्थानीय विस्तार - इसका विस्तार २[जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय] सम्पूर्ण भारत पर हैं; 

  

प्रारंभ - और यह 1882 की मई के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा ।

 

3 [1क. परिभाषा - इस अधिनियम में, "मुखतारनामा" के अन्तर्गत ऐसी लिखत भी हैं जो किसी विनिर्दिष्ट व्यक्ति को उस व्यक्ति की ओर से और उसके नाम से, जो उसका निष्पादन करता हैं, कार्य करने के लिए सशक्त करती है ।  

 

 

 

  1.  दादरा और नागर हवेली (विधि) विनियम, 1963 (1963 का 6) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा दादरा और नागर हवेली पर 1965 के विनियम सं. 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप पर और पांडिचेरी (विधि विस्तारण) अधिनियम, 1968 (1968 का 26) द्वारा पांडिचेरी पर विस्तार किया गया यह अधिनियम का. . 650 (), तारीख 24.8.1984, भारत का राजपत्र, भाग 2, अनुभाग 3(त्त्) द्वारा सिक्किम राज्य में प्रवृत्त होगा
  2. 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग राज्यों के सिवाय के स्थान पर प्रतिस्थापित
  3. 1982 के अधिनियम सं. 55 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित

 

 

 

2. मुखतारनामे के अधीन निष्पादन - किसी मुखतारनामे का आदाता, यदि वह ठीक समझता हैं तो, मुखतारनामे के दाता के प्राधिकार से कोई 1॥। लिखत या बात अपने नाम और हस्ताक्षर से और अपनी मुद्रा से, जहां मुद्रा लगाना अपेक्षित हैं, कर सकता हैं या निष्पादित कर सकता हैं; और इस प्रकार निष्पादित और कृत प्रत्येक 1॥। लिखत और बात विधि में इस प्रकार प्रभावशील होगी मानो वह मुखतारनामे के आदाता द्वारा उसके दाता के नाम में और हस्ताक्षर और मुद्रा से कृत या निष्पादित हैं ।

 

 

यह धारा उन सभी मुखतारनामों को लागू होती हैं जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पूर्व या पश्चात‌ निष्पादित लिखतों द्वारा सृजित किए गए हैं ।

 

 

3. मृत्यु आदि की सूचना के बिना मुखतारनामे के अधीन अटर्नी द्वारा किए गए संदायों का मान्य होना - मुखतारनामे के अनुसरण में सद्‌भावपूर्वक संदाय या कार्य करने वाला कोई व्यक्ति उस संदाय या कार्य की बाबत इस कारण दायी नहीं होगा कि उस संदाय या कार्य के पहले, मुखतारनामे का दाता मर गया है या 2॥। विकृत चित्त 2॥। या शोधक्षम हो गया है या उसने मुखतारनामा प्रतिसंहृत कर लिया है, यदि मृत्यु 2॥। चित्तविकृति, 2॥। शोधक्षमता या प्रतिसंहरण का तथ्य संदाय या कार्य के समय उसे करने वाले व्यक्ति को ज्ञात नहीं था ।

 

 

किन्तु यह धारा इस प्रकार संदत्त किसी धन में हितबद्ध किसी व्यक्ति के ऐसे धन पाने वाले के विरुद्ध किसी अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी, और उस व्यक्ति को ऐसे पाने वाले के विरुद्ध वैसा ही उपचार प्राप्त होगा जैसा कि उसे संदाय करने वाले के विरुद्ध प्राप्त होता, यदि उसके द्वारा संदाय नहीं किया जाता ।

 

यह धारा केवल उन्हीं संदायों और कार्यों को लागू होती है जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पश्चात्‌ किए गए हैं ।

 

 

  1. मुखतारनामा सृजित करने वाली मूल लिखतों का जमा किया जाना - (क) मुखतारनामा सृजित करने वाली लिखत, उसका निष्पादन

 

 

 

 

 

  1. 1982 के अधिनियम सं. 55 की धारा 3 द्वारा हस्तांतरणपत्र शब्द का लोप किया गया
  2. 1982 के अधिनियम सं. 55 की धारा 4 द्वारा पागल, या दिवालिया, पागलपन और दिवालियापन शब्दों का लोप किया गया

 शपथपत्र द्वारा, कानूनी घोषणा द्वारा या अन्य पर्याप्त साक्ष्य द्वारा सत्यापित करके, ऐसे शपथपत्र या घोषणा सहित, यदि कोई हो, उस उच्च न्यायालय १[या जिला न्यायालय] में जमा की जा सकती है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर वह लिखत हो ।

 

 

(ख) इस प्रकार जमा की गई लिखतों की एक पृथक‌ फाइल रखी जाएगी; और कोई भी व्यक्ति उस फाइल की जांच कर सकता है, और इस प्रकार जमा की गई प्रत्येक लिखत का निरीक्षण कर सकता है; और अनुरोध किए जाने पर उसे उसकी एक प्रमाणित प्रति दी जाएगी ।

 

 

(ग) इस प्रकार जमा की गई किसी लिखत की प्रति कार्यालय में प्रस्तुत की जा सकती है और उसे प्रमाणित प्रति के रूप में स्टाम्पित या चिह्नित किया जा सकता है और इस प्रकार स्टाम्पित या चिह्नित कर दिए जाने पर वह प्रमाणित प्रति बन जाएगी और होगी ।

 

 

(घ) इस प्रकार जमा की गई किसी लिखत की प्रमाणित प्रति, बिना अतिरिक्त सबूत के, लिखत की अंतर्वस्तु का और उच्च न्यायालय [१या जिला न्यायालय] में उसके जमा किए जाने का पर्याप्त साक्ष्य होगी ।

 

(ङ) उच्च न्यायालय, समय-समय पर, इस धारा के प्रयोजनों के लिए, और राज्य सरकार की सहमति से, खण्ड (क), (ख) और (ग) के अधीन ली जाने वाली फीस विहित करने के लिए नियम बना सकता है ।

2।                   ।                   ।                     ।                   

(छ) यह धारा मुखतारनामे सृजित करने वाली लिखतों को लागू होती है, चाहे वे इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पूर्व निष्पादित की गई हों या चाहे उसके पश्चात्‌ ।

 

  1. विवाहित स्त्री का मुखतारनामा - ३किसी विवाहित स्त्री को, जो वयस्क हैट इस अधिनियम के आधार पर, किसी निर्वसीयती लिखत द्वारा अपनी ओर से कोई निर्वसीयती लिखत निष्पादित करने के या कोई अन्य

 

 

 

 

  1. 1982 के अधिनियम सं. 55 की धारा 5 द्वारा अंतःस्थापित
  2. 1900 के अधिनियम सं. 6 की धारा 48 और अनुसूची 2 द्वारा खंड () निरसित
  3. 1982 के अधिनियम सं. 55 की धारा 6 द्वारा (22.10.1982 से) कपितय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित  

कार्य करने के प्रयोजन के लिए जो वह स्वतः निष्पादित कर सकती हो या अपनी ओर से उसी प्रकार एक अटर्नी नियुक्त करने की शक्ति होगी१मानो वह अविवाहित हैट और मुखतारनामे को सृजित करने वाली लिखतों के सम्बन्ध में इस अधिनियम के उपबन्ध उसे लागू होंगे ।

यह धारा केवल उन्हीं लिखतों को लागू होती है जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने के पश्चात्‌ निष्पादित किए गए हैं ।

6.[1886 के अधिनियम सं. 28 की धारा 39 निरसित ।] - संशोधन अधिनियम, 1891 (1891 का 12) की धारा 2 तथा अनुसूची द्वारा निरसित ।

 

 

 

 

 

    1. 1982 के अधिनियम सं. 55 की धारा 6 द्वारा (22.10.1982 से) कपितय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित

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