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योजना और वास्तुकला विद्यालय अधिनियम, 2014 ( School of Planning and Architecture Act, 2014 )


 

योजना और वास्तुकला विद्यालय अधिनियम, 2014

(2014 का अधिनियम संख्यांक 37)

[18 दिसम्बर, 2014]

वास्तुकला अध्ययनों में, जिनमें मानव उपनिवेशों की योजना भी है, शिक्षा

और अनुसंधान को प्रोन्नत करने के लिए योजना और वास्तुकला

विद्यालयों को स्थापित करने और उन्हें राष्ट्रीय महत्व की

संस्थाओं के रूप में घोषित

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के पैंसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम योजना और वास्तुकला विद्यालय अधिनियम, 2014 है

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रारंभ होने के प्रति निर्देश है ।

2. कतिपय विद्यालयों की राष्ट्रीय महत्व की संस्थाओं के रूप में घोषणा-अनुसूची में वर्णित विद्यालयों के उद्देश्य इस प्रकार के हैं जो उन्हें राष्ट्रीय महत्व की संस्थाएं बनाते हैं, अतः यह घोषित किया जाता है कि ऐसा प्रत्येक विद्यालय राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) बोर्ड" से, किसी विद्यालय के संबंध में, उसका शासक बोर्ड अभिप्रेत है;

(ख) अध्यक्ष" से बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ग) तत्समान विद्यालय" से, अनुसूची के स्तंभ (3) में वर्णित किसी विद्यालय के संबंध में, अनुसूची के स्तंभ (5) में उक्त विद्यालय के सामने यथा विनिर्दिष्ट विद्यालय अभिप्रेत है;

(घ) परिषद्" से धारा 33 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित परिषद् अभिप्रेत है;

(ङ) निदेशक" से किसी विद्यालय के संबंध में, उसका निदेशक अभिप्रेत है;

(च) विद्यमान विद्यालय" से अनुसूची के स्तंभ (3) के अधीन वर्णित विद्यालय अभिप्रेत है;

(छ) सदस्य" से बोर्ड का कोई सदस्य अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत अध्यक्ष भी है;

(ज) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है और अधिसूचित करना" पद का तदनुसार उसके व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों सहित अर्थ लगाया जाएगा;

(झ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ञ) कुल-सचिव" से, किसी विद्यालय के संबंध में, उसका कुल-सचिव अभिप्रेत है;

(ट) अनुसूची" से इस अधिनियम के साथ उपाबद्ध अनुसूची अभिप्रेत है;

(ठ) विद्यालय" से अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित विद्यालयों में से कोई भी विद्यालय और इस अधिनियम के अधीन स्थापित ऐसे अन्य विद्यालय अभिप्रेत हैं;

(ड) सिनेट" से, किसी विद्यालय के संबंध में, उसकी सिनेट अभिप्रेत है;

(ढ) सोसाइटी" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन या संबंधित राज्य सरकारों के अधीन रजिस्ट्रीकृत और अनुसूची के स्तंभ (3) में वर्णित सोसाइटियों में से कोई सोसाइटी अभिप्रेत है;

(ण) परिनियम" और अध्यादेश" से, किसी विद्यालय के संबंध में, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए उस विद्यालय के परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।

अध्याय 2

विद्यालय

4. विद्यालयों की स्थापना और निगमन-इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से ही, अनुसूची के स्तंभ (3) में विनिर्दिष्ट विद्यालय निगमित निकाय होंगे, जिनका शाश्वत उत्तराधिकार होगा और एक सामान्य मुद्रा होगी और उन्हें इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए जंगम तथा स्थावर दोनों प्रकार की संपत्ति का अर्जन करने, उसे धारण करने तथा उसका व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी तथा वे अनुसूची के स्तंभ (5) में वर्णित अपने-अपने नामों से वाद लाएंगे या उन पर वाद लाया जाएगा ।

5. विद्यालय के उद्देश्य-प्रत्येक विद्यालय के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे, अर्थात्: -

(i) योजना और वास्तुकला विद्यालय की स्थापना और विकास का समर्थन करना;

(ii) वास्तुकला, योजना और सहबद्ध क्षेत्रों में सार्वभौमिक नेतृत्व प्रदान करना ।

6. विद्यालयों के निगमन का प्रभाव-इस अधिनियम के प्रारंभ से ही, -

(क) किसी संविदा या अन्य लिखत में किसी विद्यमान विद्यालय के प्रति किसी निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह तत्समान विद्यालय के प्रति निर्देश है;

(ख) प्रत्येक विद्यमान विद्यालय की या उससे संबद्ध सभी जंगम और स्थावर संपत्तियां अनुसूची के स्तंभ (5) के अधीन वर्णित तत्समान विद्यालय में निहित हो जाएंगी;

(ग) प्रत्येक विद्यमान विद्यालय के सभी अधिकार, ऋण तथा अन्य दायित्व तत्समान विद्यालय को अंतरित हो जाएंगे और उसके अधिकार और दायित्व हो जाएंगे;

(घ) प्रत्येक विद्यमान द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा तत्समय विद्यालय में उसी सेवाधृति सहित, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर तथा पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य मामलों के संबंध में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसे कि वह उस दशा धारण करता यदि यह अधिनियम अधिनियमित नहीं किया गया होता और तब तक ऐसा पद धारण करता रहेगा जब तक कि उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक ऐसी सेवाधृति, पारिश्रमिक तथा निबंधनों और शर्तों को परिनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दिया जाता है :

परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसके नियोजन को विद्यालय द्वारा कर्मचारी के साथ की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार या यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया हो तो विद्यालय द्वारा स्थायी कर्मचारियों की दशा में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारियों की दशा में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर उसे प्रतिकर देकर समाप्त किया जा सकेगा:

परन्तु यह और कि तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या किसी लिखत या अन्य दस्तावेज में किसी विद्यमान विद्यालय के निदेशक, कुल-सचिव और अन्य अधिकारियों के प्रति, किन्हीं भी शब्द रूपों द्वारा, किए गए किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह तत्समान विद्यालय के निदेशक, कुल-सचिव और अन्य अधिकारियों के प्रति निर्देश है ;

(ङ) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व, प्रत्येक विद्यमान विद्यालय में कोई शिक्षण या अनुसंधान पाठ्यक्रम का अध्ययन करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे प्रारंभ पर तत्समान विद्यालय में, उस विद्यालय से, जिससे ऐसा व्यक्ति स्थानांतरित हुआ है, अध्ययन के उसी स्तर पर स्थानांतरित और रजिस्ट्रीकृत किया गया समझा जाएगा;  

(च) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व किसी विद्यमान विद्यालय द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित या संस्थित किए जा सकने वाले सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां तत्समान विद्यालय द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रहेंगी या संस्थित की जाएंगी ।

7. विद्यालय की शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक विद्यालय उन शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करेगा, जो नीचे विनिर्दिष्ट की गई हैं, अर्थात्: -

(क) वास्तुकला, योजना, डिजाइन और संबद्ध क्रियाकलापों में ऐसी रीति में, जो विद्यालय उचित समझे, जिसमें किसी अन्य विद्यालय, शिक्षा संस्था, अनुसंधान संगठन या निगमित निकाय के साथ सहयोग या सहयोजन भी है, अनुसंधान और नए खोज कार्यों का आयोजन और जिम्मा लेना;  

(ख) परीक्षाएं आयोजित करना और डिग्रियां, डिप्लोमे, प्रमाणपत्र और अन्य डिग्रियां प्रदान करना;

(ग) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां स्थापित करना और पुरस्कार, मानद डिग्रियां या अन्य शैक्षणिक उपाधियां या अभिधान प्रदान करना;

(घ) फीस और अन्य प्रभार नियत करना, उनकी मांग करना और उन्हें प्राप्त करना;

(ङ) छात्रों के निवास के लिए हालों और छात्रावासों की स्थापना करना, उनका अनुरक्षण और प्रबंध करना;

(च) विद्यालय के छात्रों के निवास का पर्यवेक्षण और नियंत्रण करना तथा उनके अनुशासन को विनियमित करना तथा उनके स्वास्थ्य, सामान्य कल्याण और सांस्कृतिक तथा सामूहिक जीवन के संवर्धन की व्यवस्था करना;

(छ) केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से शैक्षणिक और अन्य पदों को अधिसूचित करना और उन पदों पर, निदेशक के पद को छोड़कर, नियुक्ति करना;

(ज) किसी अन्य विद्यालय या शिक्षा संस्था में कार्यरत या विद्यालय के अनुबद्ध, अतिथि या अभ्यागत शिक्षकों के रूप में किसी उद्योग में महत्वपूर्ण अनुसंधान में लगे व्यक्तियों की ऐसे निबंधनों पर और ऐसी अवधि के लिए, जो विद्यालय द्वारा विनिश्चित की जाए, नियुक्ति करना; 

(झ) परिनियम और अध्यादेश बनाना तथा उन्हें परिवर्तित, उपांतरित या विखंडित करना;

(ञ) ऐसी अवसंरचना की स्थापना और अनुरक्षण करना जो आवश्यक हो;

(ट) विद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने में विद्यालय से संबद्ध या उसमें निहित किसी संपत्ति के विषय में, ऐसी रीति में, जो विद्यालय उचित समझे, संव्यवहार करना;

(ठ) विद्यालय की निधि का प्रबंध करना तथा सरकार से दान, अनुदान, संदान या उपकृतियां प्राप्त करना तथा, यथास्थिति, वसीयतकर्ताओं, दाताओं या अंतरकों से जंगम या स्थावर संपत्तियों की वसीयतें, संदान और अंतरण प्राप्त करना;

(ड) विश्व के किसी भाग में की ऐसी शैक्षणिक या अन्य संस्थाओं के साथ, जिनके पूर्णतः या भागतः वही उद्देश्य हैं जो उस विद्यालय के हैं, शिक्षकों, छात्रों और विद्वानों की अदला-बदली करके और साधारणतया ऐसी रीति में, जो उनके समान उद्देश्यों में सहायक हो, ऐसे निबंधनों पर, जो सिनेट द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किए जाएं, सहयोग करना;

(ढ) विद्यालय के समान उद्देश्यों की अभिवृद्धि के लिए उससे संबंधित क्षेत्रों या शाखाओं से परामर्श लेना; और

(ण) ऐसी सभी बातें करना जो विद्यालय के सभी या किन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, विद्यालय केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के बिना किसी भी स्थावर संपत्ति का किसी भी रीति में व्ययन नहीं करेगा ।

8. विद्यालय का सभी मूलवंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुला होना-(1) प्रत्येक विद्यालय स्त्री या पुरुष सभी व्यक्तियों के लिए, चाहे वे किसी भी मूलवंश, पंथ, जाति या वर्ग, धर्म, निर्योग्यता, अधिवास, नस्ल, सामाजिक या आर्थिक पृष्ठभूमि के हों, खुला रहेगा ।

(2) किसी भी विद्यालय द्वारा किसी संपत्ति की ऐसी कोई वसीयत, संदान या अंतरण स्वीकार नहीं किया जाएगा, जिसमें परिषद् की राय में इस धारा के भाव और उद्देश्य के विपरीत शर्तें या बाध्यताएं अन्तर्वलित हैं ।

9. विद्यालय में अध्यापन-प्रत्येक विद्यालय में सभी अध्यापन कार्य इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार विद्यालय द्वारा या उसके नाम से किए जाएंगे ।

10. विद्यालय का एक अलाभार्थ सुभिन्न विधिक इकाई होना-प्रत्येक विद्यालय एक अलाभार्थ विधिक इकाई होगा और ऐसे विद्यालय के राजस्व के किसी भी अधिवशेष भाग का, यदि कोई हो, अधिनियम के अधीन उसकी संक्रियाओं के संबंध मं सभी व्ययों को चुकाने के पश्चात्, उस विद्यालय की अभिवृद्धि और विकास या उनमें अनुसंधान करने से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए विनिधान नहीं किया जाएगा ।

11. कुलाध्यक्ष-(1) भारत का राष्ट्रपति प्रत्येक विद्यालय का कुलाध्यक्ष होगा ।

(2) कुलाध्यक्ष किसी विद्यालय के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उसके कार्यकलापों की जांच करने के लिए और उन पर रिपोर्ट देने के लिए, एक या अधिक व्यक्तियों को ऐसी रीति से नियुक्त कर सकेगा, जैसे कुलाध्यक्ष निदेश दे ।

(3) ऐसी किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, कुलाध्यक्ष ऐसी कार्रवाई और ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जो वह रिपोर्ट में वर्णित किन्हीं विषयों की बाबत आवश्यक समझे और विद्यालय ऐसे निदेशों का युक्तियुक्त समय के भीतर पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।

अध्याय 3

विद्यालय के प्राधिकारी

12. विद्यालय के प्राधिकारी-किसी विद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकारी होंगे, अर्थात्: -

(क) शासक बोर्ड;

(ख) सिनेट; और

(ग) ऐसे अन्य प्राधिकारी, जिन्हें परिनियमों द्वारा विद्यालय के प्राधिकारी घोषित किया जाए ।

13. शासक बोर्ड-(1) प्रत्येक विद्यालय का शासक बोर्ड उस विद्यालय का प्रधान कार्यपालक निकाय होगा ।

(2) प्रत्येक विद्यालय का शासक बोर्ड निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात्: -

(क) अध्यक्ष, जिसकी नियुक्ति कुलाध्यक्ष द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा सिफारिश किए गए तीन नामों के एक पैनल में से की जाएगी, जो कि एक विख्यात वास्तुविद् या योजनाकार होगा;

(ख) संबंधित राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र का, जिसमें विद्यालय स्थित है, तकनीकी शिक्षा या उच्चतर शिक्षा का प्रधान सचिव या सचिव;

(ग) नगर योजनाकार संस्थान, भारत से एक प्रतिनिधि, जिसे नगर योजनाकार संस्थान, भारत के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(घ) वास्तुकला परिषद् से एक प्रतिनिधि, जिसे वास्तुकला परिषद् के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(ङ) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् से एक प्रतिनिधि, जिसे अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(च) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का एक प्रतिनिधि;

(छ) वास्तुकला या भू-दृश्य वास्तुकला या नगरीय डिजाइन के व्यवसायों से एक विशेषज्ञ तथा नगरीय और प्रादेशिक योजना से एक विशेषज्ञ, जिसे योजना और वास्तुकला विद्यालय परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(ज) सिनेट से दो प्रतिनिधि, योजना विभाग और वास्तुकला विभाग, दोनों से चक्रानुक्रम द्वारा, ज्येष्ठता क्रम में, दो वर्ष की अवधि के लिए एक-एक प्रतिनिधि;

(झ) दो व्यक्ति, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे के न हों, जिन्हें केन्द्रीय सरकार द्वारा तकनीकी शिक्षा और वित्त से संबद्ध व्यक्तियों या उनके नामनिर्देशितियों में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, पदेन;

(ञ) एक व्यक्ति, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, जिसे शहरी विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(ट) विद्यालय का निदेशक, सदस्य, पदेन;

(ठ) विद्यालय का कुल-सचिव बोर्ड के सचिव के रूप में कार्य करेगा ।

14. बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, उनके बीच रिक्तियां और उनको संदेय भत्ते-इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, -

(क) बोर्ड के अध्यक्ष या किन्हीं अन्य सदस्यों की पदावधि, उसके नामनिर्देशन की तारीख से, पांच वर्ष की होगी;

(ख) किसी पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को, जिसके आधार पर वह ऐसा सदस्य है, धारण किए रहता है;

(ग) धारा 13 के खंड (ज) के अधीन नामनिर्दिष्ट किसी सदस्य की पदावधि उसके नामनिर्देशन की तारीख से दो वर्ष या उसके पद धारण करने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, की होगी;

(घ) किसी सदस्य की आकस्मिक रिक्ति धारा 13 के उपबंधों के अनुसार भरी जाएगी;

(ङ) किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट किसी सदस्य की पदावधि उस सदस्य के, जिसके स्थान पर उसे नामनिर्दिष्ट किया गया है, शेष कार्यकाल तक के लिए बनी रहेगी; और

(च) बोर्ड के सदस्य बोर्ड की या विद्यालय द्वारा बुलाई गई बैठकों में भाग लेने के लिए विद्यालय से ऐसे भत्तों के, यदि कोई हों, हकदार होंगे, जो परिनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, किन्तु धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (ज), खंड (ट) और खंड (ठ) में निर्दिष्ट सदस्यों से भिन्न कोई सदस्य इस खंड के कारण किसी वेतन का हकदार नहीं होगा ।

15. बोर्ड की शक्तियां और कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक विद्यालय का बोर्ड, विद्यालय के कार्यकलापों के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगा और उसे विद्यालय की वे सभी शक्तियां प्राप्त होंगी जिनके लिए इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अन्यथा उपबंध नहीं किया गया है और उसे सिनेट के कार्यों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।

(2) प्रत्येक विद्यालय के बोर्ड को, उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात्: -

(क) विद्यालय के प्रशासन और कार्यकरण से संबंधित नीति विषयक प्रश्नों का विनिश्चय करना;

(ख) विभागों, संकायों अथवा अध्ययन विद्यालयों की स्थापना करना तथा विद्यालय में अध्ययन कार्यक्रम और पाठ्यक्रम आरंभ करना;

(ग) ऐसे विद्यालय के प्रशासन, प्रबंधन और संक्रियाओं को शासित करने संबंधी परिनियम बनाना;

(घ) विद्यालय के शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक अनुभाग में व्यक्तियों को नियुक्त करना;

(ङ) अध्यादेशों पर विचार करना और उन्हें उपांतरित या रद्द करना;

(च) विद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट, संपरीक्षित लेखाओं और अगले वित्तीय वर्ष के बजट प्राक्कलनों पर विचार करना तथा ऐसे संकल्प पारित करना जो वह उचित समझे और उन्हें अपनी विकास योजनाओं के विवरण के साथ परिषद् को प्रस्तुत करना;

(छ) ऐसे विद्यालय में अध्यापन और अन्य पदों पर नियुक्ति के लिए, परिनियमों द्वारा, अर्हताओं, मापदंडों और प्रक्रियाओं का उपबंध करना;

(ज) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करना जो उसे इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।

(3) बोर्ड को उतनी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी, जितनी वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।

(4) बोर्ड, निदेशक के कार्यपालन का, विद्यालय के उद्देश्यों की पूर्ति के संदर्भ में उसके नेतृत्व के प्रति विनिर्दिष्ट निर्देश करते हुए, वार्षिक पुनर्विलोकन कराएगा ।

(5) बोर्ड, शक्तियों के प्रयोग और कृत्यों के निर्वहन में सिनेट और विद्यालय के, यथास्थिति, विभागों या संकायों को शैक्षणिक मामलों में स्वायतत्ता प्रदान करने का यथासंभव प्रयास करेगा ।

(6) जहां निदेशक या अध्यक्ष की राय में स्थिति इतनी आपातिक है कि विद्यालय के हित में तुरन्त विनिश्चय किए जाने की आवश्यकता है, वहां अध्यक्ष, निदेशक की सिफारिश पर, अपनी राय में उन आधारों को अभिलेखबद्ध करके, ऐसे आदेश जारी कर सकेगा जो आवश्यक हों:

परन्तु ऐसे आदेशों को बोर्ड की अगली बैठक में उसके अनुसमर्थन के लिए प्रस्तुत किया जाएगा ।

16. सिनेट-(1) प्रत्येक विद्यालय की सिनेट निम्नलिखित व्यक्तियों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -

(क) विद्यालय का निदेशक, सिनेट का अध्यक्ष, पदेन;

(ख) ख्यातिप्राप्त शिक्षाविदों या विख्यात वृत्तिकों में से पांच ऐसे व्यक्ति, जो विद्यालय की सेवा में न हों, जिन्हें शासक बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(ग) नगर योजनाकार संस्थान, भारत का एक नामनिर्देशिती;

(घ) वास्तुकला परिषद् का एक नामनिर्देशिती;

(ङ) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् का एक नामनिर्देशिती;

(च) शैक्षणिक अनुसंधान, छात्र क्रियाकलाप, संकाय कल्याण और विद्यालय की योजना और विकास का भारसाधक संकायाध्यक्ष;

(छ) सभी विभागाध्यक्ष;

(ज) विभागाध्यक्षों से भिन्न सभी आचार्य;

(झ) विद्यालय के सह-आचार्यों और सहायक आचार्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले अध्यापन कर्मचारिवृन्द के, चक्रानुक्रम से, दो वर्ष की अवधि के लिए, चार सदस्यः

परन्तु विद्यालय का कोई कर्मचारी खंड (ख), खंड (ग), खंड (घ) और खंड (ङ) में निर्दिष्ट सदस्यता के लिए पात्र नहीं होगा ।

(2) सिनेट के पदेन सदस्यों से भिन्न सदस्यों की पदावधि दो वर्ष की होगी ।

17. सिनेट के कृत्य-(1) इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विद्यालय की सिनेट विद्यालय की प्रधान शिक्षण निकाय होगी और विद्यालय में शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा के स्तर बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगी और उसे ऐसी अन्य शक्तियां प्राप्त होंगी और वह ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी जो परिनियमों द्वारा उसे प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, सिनेट को निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात्: -

(क) विद्यालय द्वारा चलाए जा रहे अध्ययन पाठ्यक्रमों या कार्यक्रमों के लिए मानदंड और प्रक्रिया विनिर्दिष्ट   करना;

(ख) बोर्ड को अध्यापन और अन्य शैक्षणिक पदों का सृजन करने की सिफारिश करना, ऐसे पदों की संख्या और उपलब्धियों का अवधारण करना और शिक्षकों तथा अन्य शैक्षणिक पदों के कर्तव्यों और सेवा शर्तों को परिभाषित करना;

(ग) बोर्ड को नए अध्ययन कार्यक्रम और पाठ्यक्रम प्रारंभ करने की सिफारिश करना;

(घ) अध्ययन कार्यक्रमों और पाठ्यक्रमों की शैक्षणिक अन्तर्वस्तु बोर्ड को विनिर्दिष्ट करना और उसमें उपांतरण करना;

(ङ) शैक्षणिक कैलेंडर विनिर्दिष्ट करना और डिग्रियां, डिप्लोमे और अन्य शैक्षणिक उपाधियां या अभिधान दिए जाने का अनुमोदन करना;

(च) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करना जो परिनियमों द्वारा या बोर्ड द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

18. बोर्ड का अध्यक्ष-(1) अध्यक्ष साधारणतया, बोर्ड की बैठक की और विद्यालय के दीक्षांत समारोहों की अध्यक्षता करेगा ।

(2) अध्यक्ष का यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य होगा कि बोर्ड द्वारा किए गए विनिश्चयों को कार्यान्वित किया जाए ।

(3) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

19. निदेशक-(1) विद्यालय का निदेशक केन्द्रीय सरकार द्वारा, कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से, सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं ।

(2) निदेशक, विद्यालय का प्रधान शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा और बोर्ड तथा सिनेट के विनिश्चयों के क्रियान्वयन तथा विद्यालय के दिन-प्रतिदिन के प्रशासन के लिए उत्तरदायी होगा ।

(3) निदेशक ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौंपे जाएं अथवा बोर्ड या सिनेट अथवा अध्यादेशों द्वारा उसे प्रत्यायोजित किए जाएं ।

(4) निदेशक बोर्ड को वार्षिक रिपोर्टें तथा संपरीक्षित लेखा प्रस्तुत करेगा ।

20. कुल-सचिव-(1) प्रत्येक विद्यालय का कुल-सचिव ऐसे निबंधनों तथा शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाएं और वह विद्यालय के अभिलेखों, उसकी सामान्य मुद्रा, निधियों और विद्यालय की ऐसी अन्य संपत्ति का अभिरक्षक होगा, जो बोर्ड उसके भारसाधन में सुपुर्द करे ।

(2) कुल-सचिव बोर्ड, सिनेट और ऐसी समितियों के, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, सचिव के रूप में कार्य करेगा ।

(3) कुल-सचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।

(4) कुल-सचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा या निदेशक द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

21. अन्य प्राधिकारी और अधिकारी-ऊपर वर्णित प्राधिकारियों और अधिकारियों से भिन्न प्राधिकारियों और अधिकारियों की शक्तियों और कर्तव्यों का अवधारण परिनियमों द्वारा किया जाएगा ।

22. विद्यालय के कार्यपालन का पुनर्विलोकन-(1) प्रत्येक विद्यालय, इस अधिनियम के अधीन विद्यालय की स्थापना और उसके निगमन से सात वर्ष के भीतर और तत्पश्चात् प्रत्येक पांचवें वर्ष की समाप्ति पर, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, उक्त अवधि में विद्यालय के उद्देश्यों की पूर्ति में उसके कार्यपालन का मूल्यांकन और पुनर्विलोकन करने के लिए एक समिति का गठन करेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन गठित समिति में शैक्षणिक या उद्योग जगत के माने हुए ख्यातिप्राप्त सदस्य होंगे जिन्हें ज्ञान के ऐसे क्षेत्रों से लिया जाएगा जिनकी उस विद्यालय में अध्यापन, विद्यार्जन और अऩुसंधान से सुसंगति है ।

(3) समिति, विद्यालय के कार्यपालन का निर्धारण करेगी और बोर्ड को परिनियमों में अधिकथित उपबंधों के अनुसार सिफारिशें करेगी ।

23. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-विद्यालयों को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्ण निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोजन के पश्चात् प्रत्येक विद्यालय को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि का ऐसी रीति से, संदाय करेगी, जो वह उचित समझे ।

अध्याय 4

लेखा और संपरीक्षा

24. विद्यालय की निधि-(1) प्रत्येक विद्यालय एक निधि रखेगा, जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे, -

(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए सभी धन;

(ख) विद्यालय द्वारा प्राप्त सभी फीसें तथा अन्य प्रभार;

(ग) विद्यालय द्वारा अऩुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत अथवा अंतरणों के रूप में प्राप्त सभी धन;

(घ) विद्यालय द्वारा किए गए अनुसंधान से उद्भूत बौद्धिक संपदा के उपयोग से या उसके द्वारा सलाहकारी या परामर्शकारी सेवाओं का उपबंध करने से प्राप्त सभी धन; और

(ङ) विद्यालय द्वारा किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त सभी धन ।

(2) प्रत्येक विद्यालय की निधि में जमा किए गए सभी धन, ऐसे बैंकों में जमा या ऐसी रीति से विनिहित किए जाएंगे, जो विद्यालय वित्त समिति और शासी निकाय के अनुमोदन से विनिश्चित करे ।

(3) किसी विद्यालय की निधि का उपयोग विद्यालय के व्ययों को, जिनके अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग में और कृत्यों के निर्वहन में किए गए व्यय भी हैं, चुकाने के लिए किया जाएगा ।

25. लेखा और संपरीक्षा-(1) प्रत्येक विद्यालय उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अन्तर्गत तुलनपत्र भी है, ऐसे प्ररूप और लेखांकन मानक में तैयार करेगा जैसा केन्द्रीय सरकार द्वारा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट किया जाए ।

(2) जहां विद्यालय के आय-व्यय का विवरण और तुलनपत्र लेखांकन मानकों के अनुरूप नहीं है, वहां विद्यालय अपने आय-व्यय के विवरण और तुलनपत्र में निम्नलिखित का प्रकटन करेगा, अर्थात्: -

(क) लेखांकन मानकों से विचलन;

(ख) ऐसे विचलन के कारण; और

(ग) ऐसे विचलन से उद्भूत वित्तीय प्रभाव, यदि कोई हो ।

(3) प्रत्येक विद्यालय के लेखाओं की संपरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में संपरीक्षा दल द्वारा उपगत कोई व्यय विद्यालय द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और विद्यालय के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियां, लेखे, संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागजपत्र पेश किए जाने की मांग करने और विद्यालय के कार्यालयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(5) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रत्येक विद्यालय के यथाप्रमाणित लेखे, उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ, प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें ऐसी प्रक्रिया के अनुसार, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिकथित की जाए, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

26. पेंशन और भविष्य निधि-(1) प्रत्येक विद्यालय अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी भविष्य निधि और पेंशन निधि स्थापित कर सकेगा या ऐसी बीमा स्कीम का उपबंध कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।

(2) जहां कोई ऐसी भविष्य निधि या पेंशन निधि इस प्रकार स्थापित की गई है, वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह कोई सरकारी भविष्य निधि हो ।

27. नियुक्तियां-प्रत्येक विद्यालय के कर्मचारिवृन्द की सभी नियुक्तियां, निदेशक की नियुक्ति के सिवाय, परिनियमों में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार निम्नलिखित द्वारा की जाएंगी, -

(क) बोर्ड द्वारा, यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के संबंध में सहायक आचार्य के पद पर की जाती है या यदि नियुक्ति गैर-शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के संबंध में ऐसे प्रत्येक काडर में की जाती है, जिसका अधिकतम वेतनमान समूह स्त्र्कऱ् अधिकारियों के विद्यमान ग्रेड वेतनमान से अधिक है;

(ख) किसी अन्य दशा में, निदेशक द्वारा ।

28. परिनियम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) सम्मानिक डिग्रियां प्रदान किया जाना;

(ख) शिक्षण विभागों और अनुसंधान केन्द्रों का बनाया जाना;

(ग) विद्यालय में अध्ययन पाठ्यक्रमों के लिए और विद्यालय की डिग्री और डिप्लोमा परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीस;

(घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;

(ङ) विद्यालय के अधिकारियों की पदावधि और नियुक्ति की पद्धति;

(च) विद्यालय के शिक्षकों की अर्हताएं;

(छ) विद्यालय के शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृन्द का वर्गीकरण, नियुक्ति की पद्धति और सेवा के निबंधनों और शर्तों का अवधारण;

(ज) विद्यालय के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृन्द के फायदे के लिए पेंशन, बीमा और भविष्य निधियों की स्थापना;

(झ) विद्यालय के प्राधिकारियों का गठन, शक्तियां और कर्तव्य;

(ञ) हालों और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;

(ट) विद्यालय के छात्रों के निवास की शर्तें और हालों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीस और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण;

(ठ) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को संदत्त किए जाने वाले भत्ते;

(ड) बोर्ड के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन; और

(ढ) बोर्ड, सिनेट या किसी समिति की बैठकें, ऐसी बैठकों में गणपूर्ति और उनके कार्य संचालन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ।

29. परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) प्रत्येक विद्यालय के प्रथम परिनियम केन्द्रीय सरकार द्वारा कुलाध्यक्ष के अनुमोदन से विरचित किए जाएंगे और उनकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

(2) बोर्ड, समय-समय पर नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या इस धारा में उपबंधित रीति में परिनियमों को संशोधित या निरसित कर सकेगा ।

(3) प्रत्येक नए परिनियम या परिनियमों में परिवर्धन या परिनियमों के किसी संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष का पूर्व अनुमोदन अपेक्षित होगा, जो उसके लिए अनुमति दे सकेगा या अनुमति रोक सकेगा या उसे बोर्ड को विचारार्थ भेज सकेगा ।

(4) नए परिनियम या किसी विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला कोई परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष द्वारा उसे अनुमति नहीं दे दी जाती है:

परन्तु केन्द्रीय सरकार कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से विद्यालय के लिए परिनियम बना सकेगी या उनमें संशोधन कर सकेगी, यदि ऐसा किया जाना एकरूपता के लिए अपेक्षित हो और उसकी एक प्रति यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

30. अध्यादेश-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक विद्यालय के अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) विद्यालय में छात्रों का प्रवेश;

(ख) विद्यालय की सभी डिग्रियों और डिप्लोमाओं के लिए अधिकथित किए जाने वाले अध्ययन पाठ्यक्रम;

(ग) वे शर्तें जिनके अधीन छात्रों को डिग्री या डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में और विद्यालय की परीक्षाओं में प्रवेश दिया जाएगा और वे डिग्री और डिप्लोमा के लिए पात्र होंगे;

(घ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायता वृत्तियां, पदक और पुरस्कार प्रदान किए जाने की शर्तें;

(ङ) परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग तथा उनके कर्तव्य;

(च) परीक्षाओं का संचालन;

(छ) विद्यालय के छात्रों में अनुशासन बनाए रखना; और

(ज) कोई अन्य विषय, जिसके लिए इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा, अध्यादेशों में उपबंध किया जाना है या किया जाए ।

31. अध्यादेश किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे ।

(2) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश ऐसी तारीख से प्रभावी होंगे, जो वह निदिष्ट करे, किन्तु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश, यथाशीघ्र बोर्ड को प्रस्तुत किया जाएगा और बोर्ड द्वारा उस पर उसकी आगामी बैठक में विचार किया जाएगा ।

(3) बोर्ड को ऐसे किसी अध्यादेश को संकल्प द्वारा उपांतरित या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसे संकल्प की तारीख से ऐसा अध्यादेश, यथास्थिति, तदनुसार उपांतरित या रद्द हो जाएगा ।

32. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) विद्यालय और उसके किन्हीं कर्मचारियों के बीच किसी संविदा से उद्भूत होने वाला कोई विवाद संबद्ध कर्मचारी के अनुरोध पर या विद्यालय की प्रेरणा पर ऐसे किसी माध्यस्थम् अधिकरण को, जिसमें विद्यालय द्वारा नियुक्त एक सदस्य, कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य तथा कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक हो, निर्दिष्ट किया जाएगा ।

(2) अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

(3) ऐसे किसी मामले की बाबत, जिसे उपधारा (1) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है, किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।

(4) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी:

परंतु अधिकरण ऐसी प्रक्रिया बनाते समय नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखेगा ।

  (5) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी । 

अध्याय 5

परिषद्

33. विद्यालयों के लिए परिषद् की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अनुसूची के स्तंभ (3) में विनिर्दिष्ट सभी विद्यालयों के लिए परिषद् नामक एक केन्द्रीय निकाय की स्थापना की जाएगी ।

(2) परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -

(क) तकनीकी शिक्षा का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केन्द्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग का भारसाधक मंत्री, पदेन, अध्यक्ष;

(ख) भारत की संसद् के दो सदस्य (लोक सभा अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला एक सदस्य और राज्य सभा के सभापति द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाला एक सदस्य), पदेन;

(ग) तकनीकी शिक्षा का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केन्द्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग का भारसाधक सचिव, भारत सरकार, पदेन, उपाध्यक्ष;

(घ) प्रत्येक बोर्ड का अध्यक्ष, पदेन;

(ङ) प्रत्येक विद्यालय का निदेशक, पदेन;

(च) अध्यक्ष, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, पदेन;

(छ) प्रधान, वास्तुकला परिषद्, नई दिल्ली, पदेन;

(ज) प्रधान, नगर योजनाकार संस्थान, भारत, पदेन;

(झ) अध्यक्ष, भारतीय वास्तुविद् संस्थान, पदेन;

(ञ) प्रधान, भारतीय सर्वेक्षक संस्था, पदेन;

(ट) शहरी विकास और रक्षा से संबद्ध केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों या विभागों का प्रतिनिधित्व करने के लिए भारत सरकार के दो सचिव, पदेन;

(ठ) अध्यक्ष, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, पदेन;

(ड) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले तीन व्यक्ति, जिनमें से कम से कम एक महिला होगी और एक नगरीय और प्रादेशिक योजना से होगा जिनके पास वास्तुकला या भू-दृश्य वास्तुकला या नगरीय डिजाइन की बाबत विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो, पदेन;

(ढ) राज्य सरकार के, जहां विद्यालय अवस्थित हैं, तकनीकी शिक्षा से संबद्ध उस सरकार के मंत्रालयों या विभागों में से दो सचिव, पदेन;

(ण) केन्द्रीय सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संबद्ध विभाग का वित्तीय सलाहकार, पदेन; और

(त) तकनीकी शिक्षा का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केन्द्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग में का एक अधिकारी, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, पदेन, सदस्य-सचिव ।

(3) परिषद् का एक सचिवालय होगा, जिसमें परिनियमों द्वारा नियुक्त किए जाने वाले पदधारी होंगे ।

(4) परिषद्, अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के निर्वहन में परिषद् की सहायता करने के लिए योजना और वास्तुकला विद्यालय परिषद् की एक स्थायी समिति का गठन कर सकेगी ।

34. परिषद् के सदस्यों की पदावधि, उनके बीच रिक्तियां और उनको संदेय भत्ते-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, परिषद् के किसी पदेन सदस्य से भिन्न सदस्य की पदावधि, अधिसूचना की तारीख से तीन वर्ष की होगी ।

(2) किसी पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को, जिसके आधार पर वह ऐसा सदस्य है, धारण किए रहता है ।

(3) धारा 33 की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन नामनिर्दिष्ट किसी सदस्य की पदावधि, जैसे ही वह उस सदन का, जिसने उसे निर्वाचित किया है, सदस्य नहीं रहता है, समाप्त हो जाएगी ।

(4) किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए परिषद् के किसी नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य की पदावधि उस सदस्य के, जिसके स्थान पर उसे नियुक्त किया गया है, शेष कार्यकाल तक के लिए बनी रहेगी ।

(5) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, परिषद् का कोई पदावरोही सदस्य, जब तक कि केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निदेश न दिया जाए, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नियुक्त नहीं कर दिया जाता है ।

(6) परिषद् के सदस्य, परिषद् या उसकी समितियों की बैठकों में भाग लेने के लिए ऐसे यात्रा और अन्य भत्तों के हकदार होंगे जो विहित किए जाएं ।

35. परिषद् के कृत्य-(1) परिषद् का यह साधारण कर्तव्य होगा कि वह सभी विद्यालयों के क्रियाकलापों का समन्वय करें ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिषद् निम्नलिखित का पालन करेगी, अर्थात्: -

(क) पाठ्यक्रमों की अवधि, विद्यालयों द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों और अन्य शैक्षणिक उपाधियों, प्रवेश के मानकों और अन्य शैक्षणिक विषयों से संबंधित नीतिगत विषयों पर सलाह देना;

(ख) केंद्रीय सरकार को नए योजना और वास्तुकला विद्यालयों की स्थापना किए जाने संबंधी प्रस्तावों की सिफारिश करना;

(ग) विद्यालयों के सामान्य हित के ऐसे विषयों पर, जो किसी विद्यालय द्वारा उसे निर्दिष्ट किए जाएं, विचार-विमर्श करना;

(घ) कर्मचारियों के काडर, उनकी भर्ती की पद्धतियों और सेवा-शर्तों के, छात्रवृत्तियां और निःशुल्क वृत्तियां संस्थित करने के, फीस के उद्ग्रहण तथा सामान्य हित के अन्य विषयों के संबंध में नीति अधिकथित करना;

(ङ) प्रत्येक विद्यालय की विकास योजनाओं की परीक्षा करना और उनमें से उनका अनुमोदन करना जो आवश्यक समझी जाएं और ऐसी अनुमोदित योजनाओं की वित्तीय विवक्षाओं को भी मोटे तौर पर उपदर्शित करना;

(च) इस अधिनियम के अधीन कुलाध्यक्ष द्वारा पालन किए जाने वाले किसी कृत्य की बाबत उसे सलाह, यदि ऐसी अपेक्षा की जाए, देना; और

(छ) ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे निर्दिष्ट किए जाएं:

परन्तु इस धारा की कोई बात, किसी विद्यालय के बोर्ड या सिनेट या अन्य प्राधिकारियों में निहित शक्तियों और कृत्यों को अल्पीकृत नहीं करेगी ।

36. परिषद् का अध्यक्ष-(1) परिषद् का अध्यक्ष, सामान्यतया, परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा: परन्तु उसकी अनुपस्थिति में, परिषद् का उपाध्यक्ष, परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा ।

(2) परिषद् के अध्यक्ष का यह कर्तव्य होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि परिषद् द्वारा किए गए विनिश्चयों को कार्यान्वित किया जाए ।

(3) अध्यक्ष ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा, जो इस अधिनियम द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

(4) परिषद् का प्रत्येक वर्ष में एक बार अधिवेशन होगा और अपने अधिवेशनों में वह ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगी, जो विहित की जाए ।

37. इस अध्याय के विषयों की बाबत नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, पूर्व प्रकाशन के पश्चात्, अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों की बाबत उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन भविष्य निधि और पेंशन निधि या बीमा स्कीम का उपबंध करने की रीति और शर्तें;

 (ख) धारा 34 की उपधारा (6) के अधीन परिषद् या उसकी समितियों के अधिवेशनों में भाग लेने हेतु सदस्यों के लिए यात्रा और अन्य भत्ते;

 (ग) धारा 36 की उपधारा (4) के अधीन परिषद् के अधिवेशनों में अऩुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ।

(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निप्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निप्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

38. रिक्तियों आदि से कार्रवाइयों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन स्थापित परिषद् अथवा किसी विद्यालय या बोर्ड या सिनेट या किसी अन्य निकाय की कोई कार्रवाई केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि, -

(क) उसमें कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या

(ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या

(ग) उसकी प्रक्रिया में ऐसी कोई अनियमितता है जो मामले के गुणागुण पर कोई प्रभाव नहीं डालती है ।

39. केन्द्रीय सरकार को उपलब्ध कराई जाने वाली विवरणियां और सूचना-प्रत्येक विद्यालय, केन्द्रीय सरकार को, अपनी नीतियों या क्रियाकलापों की बाबत ऐसी विवरणियां या अन्य सूचना देगा, जिसकी केन्द्रीय सरकार, संसद् में रिपोर्ट करने या नीति बनाने के प्रयोजन के लिए समय-समय पर अपेक्षा करे ।

40. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उसे उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:

परंतु ऐसा कोई आदेश, उस तारीख से, जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

41. विद्यालय का, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अधीन लोक प्राधिकरण होना-प्रत्येक विद्यालय को, सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (2005 का 22) के उपबंध उसी प्रकार लागू होंगे मानो कि वह सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2 के खंड (ज) में परिभाषित कोई लोक प्राधिकरण हो ।

42. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, -

(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रत्येक विद्यालय का शासक बोर्ड उसी रूप में तब तक ऐसे कार्य करता रहेगा जब तक कि इस अधिनियम के अधीन उस विद्यालय के लिए एक नए बोर्ड का गठन नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर, ऐसे गठन के पूर्व पद धारण करने वाले बोर्ड के सदस्य पद धारण करने से प्रविरत हो जाएंगे;

(ख) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व प्रत्येक विद्यालय के संबंध में गठित प्रत्येक विद्या परिषद् को तब तक इस अधिनियम के अधीन गठित सिनेट समझा जाएगा जब तक कि इस अधिनियम के अधीन उस विद्यालय के लिए सिनेट का गठऩ नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए सिनेट के गठन पर ऐसे गठन के पूर्व पद धारण करने वाले विद्या परिषद् के सदस्य पद धारण करने से प्रविरत हो जाएंगे;

(ग) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रत्येक विद्यालय का शासक बोर्ड, वित्त समिति, विद्या परिषद्, कार्यकारी परिषद्, भवन और संकर्म समिति और ऐसी अन्य समितियां उस रूप में तब तक ऐसे कार्य करती रहेंगी जब तक इस अधिनियम के अधीन विद्यालय के लिए नए बोर्ड का गठन नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर ऐसे गठन के पूर्व पद धारण करने वाले शासक बोर्ड, वित्त समिति, विद्या परिषद्, भवन और संकर्म समिति और ऐसी अन्य समितियों के सदस्य पद धारण करने से प्रविरत हो   जाएंगे ;

(घ) ऐसे किसी छात्र को, जिसने शैक्षणिक वर्ष 2008-2009 में या उसके पश्चात् विद्यमान विद्यालय की कक्षाओं में प्रवेश लिया है या शैक्षणिक वर्ष 2011-2012 में या उसके पश्चात् पाठ्यक्रम पूरा किया है, धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (ग) के प्रयोजन के लिए केवल तभी भोपाल और विजयवाड़ा स्थित विद्यमान विद्यालयों के पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन करने वाला समझा जाएगा यदि ऐसे छात्र को पहले से उसी पाठ्यक्रम के लिए डिग्री या डिप्लोमा प्रदान नहीं किया गया है ।

 

अनुसूची

[धारा 3 (ट) और धारा 4 देखिए]

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

क्रम सं०

राज्य का नाम

विद्यमान विद्यालय का नाम

अवस्थिति

इस अधिनियम के अधीन सम्मिलित विद्यालय का नाम

1.

दिल्ली

योजना और वास्तुकला विद्यालय, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन एक रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है ।

नई दिल्ली

योजना और वास्तुकला विद्यालय, नई दिल्ली

2.

मध्य प्रदेश

योजना और वास्तुकला विद्यालय, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन एक रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है ।

भोपाल

योजना और वास्तुकला विद्यालय, भोपाल

3.

आंध्र प्रदेश

योजना और वास्तुकला विद्यालय, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन एक रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी है ।

विजयवाड़ा

योजना और वास्तुकला विद्यालय, विजयवाड़ा

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