दिल्ली उच्च न्यायालय अधिनियम, 1966
(1966 का अधिनियम संख्यांक 26)
[5 सितम्बर, 1966]
दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक उच्च न्यायालय के गठन का, उस न्यायालय की अधिकारिता के हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र पर विस्तार का, और उससे संबद्ध विषयों का, उपबन्ध करने के लिए अधिनियम
भारत गणराज्य के सत्रहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम दिल्ली उच्च न्यायालय अधिनियम, 1966 कहा जा सकेगा ।
(2) धारा 17 उस तारीख को प्रवृत्त होगी, जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, तथा इस अधिनियम के शेष उपबन्ध तुरन्त प्रवृत्त होंगे ।
2. परिभाषाएं- इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अभिप्रेत न हो,-
(क) “नियत दिन" से धारा 3 के अधीन नियत तारीख अभिप्रेत है;
(ख) “अधिसूचित आदेश" से शासकीय राजपत्र में अधिसूचित आदेश अभिप्रेत है ।
3. उच्च न्यायालय-(1) उस तारीख से, जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के लिए एक उच्च न्यायालय (जिसे इसमें इसके पश्चात् दिल्ली उच्च न्यायालय कहा गया है) होगा ।
(2) दिल्ली उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान दिल्ली में या अन्य ऐसे स्थान में, जिसे राष्ट्रपति अधिसूचित आदेश द्वारा नियत करे, होगा ।
(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश तथा खंड न्यायालय उसके मुख्य स्थान से भिन्न ऐसे अन्य स्थान या स्थानों में बैठ सकेंगे, जिन्हें मुख्य न्यायाधिपति राष्ट्रीय के अनुमोदन से, नियत करे ।
[3क. न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि पर भारित व्यय होंगे-दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतनों और भत्तों की बाबत व्यय भारत की संचित निधि पर भारित व्यय होगा ।]
4. वे अपवाद और उपान्तर, जिनके अध्यधीन रहते हुए संविधान के भाग 6 के अध्याय 5 के उपबन्ध दिल्ली उच्च न्यायालय को लागू होंगे-(1) संविधान के भाग 6 के अध्याय 5 के उपबन्ध, दिल्ली उच्च न्यायालय को लागू होने में, निम्नलिखित अपवादों और उपान्तरों के साथ प्रभावी होंगे, अर्थात् :-
(क) अनुच्छेद 217 में, “उस राज्य के राज्यपाल से" शब्दों का लोप कर दिया जाएगा और उपधारा (2) के अधीन की जाने वाली नियुक्तियों के सम्बन्ध में, उस अनुच्छेद का अर्थ इस प्रकार लगाया जाएगा मानो तथा मुख्य न्यायाधिपति को छोड़कर अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में उस राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति से" शब्दों का भी लोप कर दिया गया हो;
(ख) अनुच्छेद 219 में, राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देश का और अनुच्छेद 227 के खण्ड (3) के परन्तुक में राज्यपाल के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश है;
(ग) अनुच्छेद 225 के उपबन्ध लागू नहीं होंगे;
(घ) अनुच्छेद 229 में,-
(i) राज्य के राज्यपाल के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश हैं;
(ii) राज्य लोक सेवा आयोग, राज्य के विधान-मण्डल और राज्य की संचित निधि के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे क्रमशः संघ लोक सेवा आयोग, संसद् और भारत की संचित निधि के प्रति निर्देश हैं;
(ङ) अनुच्छेद 230 के उपबन्ध निम्नलिखित उपान्तरों के साथ लागू होंगे :-
(i) उसके खण्ड (1) में “उच्च न्यायालय" शब्दों के स्थान पर, जहां वे दो स्थलों पर आए हैं, संघ राज्यक्षेत्र के उच्च न्यायालय" शब्द और किसी संघ राज्यक्षेत्र" शब्दों के स्थान पर “किसी अन्य संघ राज्यक्षेत्र" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उसके खण्ड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खण्ड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-
(2) जहां किसी संघ राज्यक्षेत्र का उच्च न्यायालय किसी अन्य संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करता है वहां अनुच्छेद 227 में दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश का अर्थ, उस अन्य संघ राज्यक्षेत्र के अधीनस्थ न्यायालयों के लिए किन्हीं नियमों, प्ररूपों या सारणियों के सम्बन्ध में यह लगाया जाएगा कि वह उस अन्य संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रति निर्देश हैं ।" ।
(2) इस धारा के प्रवृत्त होने और नियत दिन के बीच राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधिपति से परामर्श के पश्चात्, दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति की और उक्त उच्च न्यायालय के उतने अन्य न्यायाधीशों की, जितने वह ठीक समझे, नियुक्ति कर सकेगा, तथा ऐसे की गई कोई नियुक्तियां नियत दिन से प्रभावी होंगी ।
5. दिल्ली उच्च न्यायालय की अधिकारिता-(1) दिल्ली उच्च न्यायालय को, दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र में तत्समय सम्मिलित राज्यक्षेत्रों की बाबत वह सब आरंभिक, अपीली और अन्य अधिकारिता होगी, जो नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि के अधीन पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा उक्त राज्यक्षेत्रों की बाबत प्रयोक्तव्य हो ।
(2) किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में किसी बात के होते हुए भी, दिल्ली उच्च न्यायालय की उक्त राज्यक्षेत्रों की बाबत प्रत्येक वाद में, जिसका मूल्य [दो करोड़ रुपए] से अधिक हो, मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता भी होगी ।
6. विधि-व्यवसायियों को नामावलिगत करने आदि की शक्ति-(1) दिल्ली उच्च न्यायालय को विधि व्यवसायियों को उस रूप में अनुमोदित करने, उन्हें प्रविष्ट करने, नामावलिगत करने, हटाने और निलम्बित करने की तथा उनकी बाबत नियम बनाने की वैसी ही शक्तियां होंगी, जो नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि के अधीन पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य हों ।
(2) दिल्ली उच्च न्यायालय में सुने जाने का अधिकार उन्हीं सिद्धान्तों के अनुसार विनियमित किया जाएगा जो पंजाब उच्च न्यायालय में सुने, जाने के अधिकार की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त हों :
परन्तु इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए किसी नियम या दिए गए किसी निदेश के अध्यधीन यह है कि जो व्यक्ति नियत दिन के ठीक पहले पंजाब उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने का हकदार अधिवक्ता या कार्य करने का हकदार अटर्नी हो, वह दिल्ली उच्च न्यायालय में, यथास्थिति, विधि व्यवसाय करने या कार्य करने का हकदार, अधिवक्ता या अटर्नी माना जाएगा ।
7. दिल्ली उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया-इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि पंजाब उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि दिल्ली उच्च न्यायालय के सम्बन्ध में, आवश्यक उपान्तरों सहित, लागू होगी तथा तदनुसार दिल्ली उच्च न्यायालय को पद्धति और प्रक्रिया की बाबत नियम बनाने और आदेश करने की वे सब शक्तियां होंगी, जो नियत दिन के ठीक पहले पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य हों, तथा उसे अपनी मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग के लिए पद्धति और प्रक्रिया की बाबत नियम बनाने और आदेश करने की शक्तियां भी होंगी :
परन्तु जो नियम या आदेश नियत दिन के ठीक पहले पंजाब उच्च न्यायालय में की पद्धति और प्रक्रिया की बाबत प्रवृत्त हों, वे, जब तक दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों या किए गए आदेशों द्वारा उनमें फेरफार या उनका प्रतिसंहरण न किया जाए, आवश्यक उपान्तरों सहित, दिल्ली उच्च न्यायालय में की पद्धति और प्रक्रिया के सम्बन्ध में ऐसे लागू होंगे मानो वे उस उच्च न्यायालय द्वारा बनाए या किए गए हों ।
8. दिल्ली उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा-पंजाब उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि आवश्यक उपान्तरों सहित दिल्ली उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा की बाबत लागू होगी ।
9. रिटों तथा अन्य आदेशिकाओं का प्ररूप-पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों और अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों और अन्य आर्देशिकाओं के प्ररूप की बाबत लागू होगी ।
10. न्यायाधीशों की शक्तियां-(1) जहां दिल्ली उच्च न्यायालय का एकल न्यायाधीश धारा 5 की उपधारा (2) द्वारा उस न्यायालय को प्रदत्त मामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करे, वहां एकल न्यायाधीश के निर्णय से अपील उस उच्च-न्यायालय के खण्ड न्यायालय को होगी ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि पंजाब के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति, एकल न्यायाधीशों और खण्ड न्यायालयों की शक्तियों से सम्बन्धित तथा उन शक्तियों के प्रयोग के आनुषंगिक सभी विषयों की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि दिल्ली उच्च न्यायालय के सम्बन्ध में, आवश्यक उपांतरों सहित लागू होगी ।
11. उच्चतम न्यायालय में अपीलों की बाबत प्रक्रिया-पंजाब उच्च न्यायालय और उसके न्यायाधीशों और खण्ड न्यायालयों से उच्चतम न्यायालय को अपीलों से सम्बन्धित जो विधित नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त हो, वह दिल्ली के उच्च न्यायालय के सम्बन्ध में, आवश्यक उपान्तरों सहित, लागू होगी ।
12. पंजाब उच्च न्यायालय से दिल्ली उच्च न्यायालय को कार्यवाहियों का अन्तरण-(1) इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित के सिवाय, पंजाब उच्च न्यायालय को नियत दिन से दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र की बाबत कोई अधिकारिता नहीं होगी ।
(2) नियत दिन के ठीक पहले पंजाब उच्च न्यायालय में लम्बित ऐसी कार्यवाहियां, जिनके बारे में उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति ने, चाहे उस दिन के पूर्व या पश्चात्, वाद हेतुक के पैदा होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, यह प्रमाणित किया हो कि वे ऐसी कार्यवाहियां हैं जो दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिएं, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, दिल्ली उच्च न्यायालय को अन्तरित कर दी जाएंगी ।
(3) इस धारा की उपधारा (1) और (2) में और धारा 5 में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् यथा उपबन्धित के सिवाय, अपीलों, अपील की इजाजत के लिए आवेदनों, जिनके अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय में अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन भी हैं, पुनर्विलोकन के लिए आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों को, जहां किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, नियत दिन के पहले, पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश की बाबत कोई अनुतोष चाहा गया हो, ग्रहण करने, सुनने या निपटाने की अधिकारिता पंजाब उच्च न्यायालय को होगी और दिल्ली उच्च न्यायालय को न होगी :
परन्तु यदि ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण किए जाने के पश्चात्, उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत हो कि वे दिल्ली उच्च न्यायालय को अन्तरित की जानी चाहिएं, तो वह आदेश देगा कि वे इस प्रकार अन्तरित कर दी जाएं, और तब ऐसी कार्यवाहियां तदनुसार अन्तरित कर दी जाएंगी ।
(4) (क) उपधारा (2) के आधार पर दिल्ली उच्च न्यायालय को अन्तरित किन्हीं कार्यवाहियों में, नियत दिन के पहले;
(ख) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनकी बाबत पंजाब उच्च न्यायालय की अधिकारिता उपधारा (3) के आधार पर बनी रहती हैं,
पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा किया गया कोई आदेश समस्त प्रयोजनों के लिए केवल पंजाब उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं, किन्तु दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा किए गए आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
13. दिल्ली उच्च न्यायालय को अन्तरित कार्यवाहियों में हाजिर होने या कार्य करने का अधिकार-किसी व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पहले पंजाब उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने का हकदार अधिवक्ता या कार्य करने का हकदार अटर्नी हो, और उस उच्च न्यायालय से दिल्ली उच्च न्यायालय को धारा 12 के अधीन अन्तरित किन्हीं कार्यवाहियों में हाजिर होने या कार्य करने के लिए प्राधिकृत किया गया हो, उन कार्यवाहियों के सम्बन्ध में, यथास्थिति, हाजिर होने या कार्य करने का अधिकार होगा ।
14. निर्वचन-धारा 12 और 17 के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कार्यवाहियां न्यायालय में तब तक लम्बित समझी जाएंगी जब तक उस न्यायालय ने पक्षकारों के बीच के सभी विवाद्यकों को, जिनके अन्तर्गत कार्यवाहियों के खर्चों के विनिर्धारण की बाबत विवाद्यक भी हैं, निपटा न दिया हो, तथा उनके अन्तर्गत अपीलें उच्चतम न्यायालय में अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के लिए आवेदन, पुनरीक्षण के लिए अर्जियां और रिटों के लिए अर्जियां भी होंगी;
(ख) उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत, उसके न्यायाधीश या खण्ड न्यायालय के प्रति निर्देश भी हैं, तथा न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा किए गए आदेश के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उस न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा पारित या किए गए दण्डादेश, निर्णय या डिक्री के प्रति निर्देश भी हैं ।
15. व्यावृत्तियां-धारा 4 में यथा उपबन्धित के सिवाय, इस अधिनियम की किसी बात का प्रभाव संविधान के किन्हीं उपबन्धों के दिल्ली उच्च न्यायालय को लागू होने पर नहीं पड़ेगा, तथा यह अधिनियम किसी ऐसे उपबन्ध के अध्यधीन रहते हुए प्रभाव होगा जिसे ऐसा उपबन्ध करने की शक्ति करने रखने वाला कोई विधान-मण्डल या अन्य प्राधिकारी नियत दिन को या उसके पश्चात्, उस उच्च न्यायालय की बाबत बनाए ।
16. दिल्ली में अधीनस्थ न्यायालयों के समक्ष लम्बित कार्यवाहियां-धारा 5 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रकार के किसी सिविल वाद में, या उसके सम्बन्ध में, दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के किसी अधीनस्थ न्यायालय में, नियत दिन के ठीक पहले लम्बित सभी कार्यवाहियां उस दिन दिल्ली उच्च न्यायालय को अन्तरित हो जाएंगी जो उस मामले का विचारण, सुनवाई और अवधारण करने की कार्यवाही उसी प्रकार करेगा मानो वह उस उच्च न्यायालय में लम्बित रहा हो ।
17. दिल्ली उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तारण-(1) उस तारीख से, जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे (जिसे इसमें इसके पश्चात् विहित तारीख कहा गया है), दिल्ली उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र पर होगा ।
(2) विहित तारीख से हिमाचल प्रदेश के न्यायिक आयुक्त का न्यायालय कार्य करना बन्द कर देगा और वह एतद्द्वारा उत्साहित किया जाता है :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात हिमाचल प्रदेश के न्यायिक आयुक्त के न्यायालय द्वारा, जिसे इस उपधारा द्वारा उत्साहित किया गया है, विहित तारीख के पहले तामील की गई सूचना, जारी किए व्यादेश, दिए गए निदेश या की गई कार्यवाहियों का प्रवर्तन चालू रहने पर न तो प्रतिकूल प्रभाव डालेगी, और न उसे प्रभावित करेगी ।
(3) उन राज्यक्षेत्रों की बाबत, जो तत्समय हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्ष्ेत्र में सम्मिलित हों, दिल्ली उच्च न्यायालय को, -
(क) वह सब आरंभिक, अपीली और अन्य अधिकारिता होगी, जो विहित तारीख के ठीक पहले प्रवृत्त विधि के अधीन हिमाचल प्रदेश के न्यायिक आयुक्त के न्यायालय द्वारा उक्त राज्यक्षेत्रों की बाबत प्रयोक्तव्य हों; और
(ख) किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक ऐसे वाद में, जिसका मूल्य [पचास हजार रुपएट से अधिक हो, मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता भी होगी ।
(4) हिमाचल प्रदेश के न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में विहित तारीख के पहले लम्बित सब कार्यवाहियां दिल्ली उच्च न्यायालय को अन्तरित हो जाएंगी ।
(5) उपधारा (4) में निर्दिष्ट न्यायालय द्वारा विहित तारीख के पहले किया गया कोई भी आदेश समस्त प्रयोजनों के लिए, उस न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं, किन्तु दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
(6) शंकाएं दूर करने के लिए एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि धारा 6 से 11 तक के और धारा 13 के उपबन्ध, इस धारा द्वारा दिल्ली उच्च न्यायालय को प्रदत्त अधिकारिता के प्रयोग में, दिल्ली उच्च न्यायालय को, आवश्यक उपान्तरों सहित, लागू होंगे ।
(7) उपधारा (3) के खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रकार के किसी सिविल वाद में, या उसके सम्बन्ध में, हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के किसी अधीनस्थ न्यायालय में विहित तारीख के ठीक पहले लम्बित सभी कार्यवाहियां उस तारीख को दिल्ली उच्च न्यायालय को अन्तरित हो जाएंगी, जो उस मामले का विचारण, सुनवाई और अवधारण करने की कार्यवाही उसी प्रकार करेगा मानो वह उस उच्च न्यायालय में लम्बित रहा हो ।
18. अर्थान्वयन का नियम-(1) दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किसी विधि में पंजाब उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का अर्थ, उस संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में, विहित तारीख से यह लगाया जाएगा कि वे दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रति निर्देश हैं ।
(2) हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त किसी विधि में पंजाब उच्च न्ययालय के प्रति या उस राज्यक्षेत्र के न्यायिक आयुक्त के न्यायालय के प्रति निर्देशों का अर्थ, विहित तारीख से, उस संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में यह लगाया जाएगा कि वे दिल्ली उच्च न्यायालय के प्रति निर्देश हैं ।
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20. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न हो, तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, ऐसा उपबन्ध कर सकेगी जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, उस समय जब वह सत्र में हो, कुल मिलाकर तीस दिन की कालावधि के लिए, जो एक सत्र में या दो क्रमवर्ती सत्रों में समाविष्ट हो सकेगी, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के, जिसमें वह ऐसे रखा गया हो, या ठीक पश्चात्वर्ती सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस आदेश में कोई उपान्तर करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह आदेश नहीं किया जाना चाहिए तो तत्पश्चात्, यथास्थिति, वह आदेश ऐसे उपान्तरित रूप में ही प्रभावशील होगा या उसका कोई भी प्रभाव न होगा, किन्तु इस प्रकार कि ऐसा कोई उपान्तर या बातिलकरण उस आदेश के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा ।
21. विधियों के अनुकूलन की शक्ति-दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र या हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में, किसी विधि का लागू होना सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में, नियत दिन से दो वर्ष समाप्त होने के पूर्व, और हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में, विहित तारीख से दो वर्ष समाप्त होने के पूर्व, विधि के ऐसे अनुकूलन और उपान्तरण, चाहे वे निरसन के तौर पर हों या संशोधन के तौर पर, आदेश द्वारा, कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या समीचीन हों, तथा तब प्रत्येक ऐसी विधि, ऐसे किए गए अनुकूलनों और उपान्तरों के साथ तब तक प्रभावी रहेगी, जब तक वह सक्षम विधान-मण्डल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित न कर दी जाए ।
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