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राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2007 ( Rajiv Gandhi Institute of Petroleum Technology Act, 2007 )


 

राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2007

(2007 का अधिनियम संख्यांक 54)

[20 दिसंबर, 2007]

राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान के नाम से ज्ञात संस्था को राष्ट्रीय महत्व

की संस्था घोषित करने के लिए और उससे निगमन

तथा उससे संबंधित विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के अठावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 2007 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।

2. राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाना-राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान, जायस, जिला रायबरेली, उत्तर प्रदेश नामक संस्था के उद्देश्य ऐसे हैं, कि वे उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था बनाते हैं, अतः यह घोषित किया जाता है कि राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) नियत दिन" से धारा 1 की उपधारा (2) के अधीन इस अधिनियम के प्रवर्तन में आने के लिए नियत तारीख अभिप्रेत है; 

(ख) बोर्ड" से धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन गठित संस्थान का शासक-बोर्ड अभिप्रेत है;

(ग) अध्यक्ष" से महा-परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(घ) निदेशक" से धारा 20 के अधीन नियुक्त संस्थान का निदेशक अभिप्रेत है;

(ङ) निधि" से धारा 24 के अधीन रखी जाने वाली संस्थान निधि अभिप्रेत है;

(च) महा-परिषद्" से धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित महा-परिषद् अभिप्रेत है; 

(छ) संस्थान" से धारा 4 के अधीन निगमित राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान अभिप्रेत है;

(ज) सभापति" से धारा 5 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन नियुक्त बोर्ड का सभापति अभिप्रेत है; 

(झ) कुल-सचिव" से धारा 21 में निर्दिष्ट संस्थान का कुल-सचिव अभिप्रेत है;

(ञ) सिनेट" से धारा 17 में निर्दिष्ट संस्थान की सिनेट अभिप्रेत है;

(ट) सोसाइटी" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान, जायस, जिला रायबरेली, उत्तर प्रदेश अभिप्रेत है; और

(ठ) परिनियम" और अध्यादेश" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए संस्थान के क्रमशः परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं ।

अध्याय 2

संस्थान

4. संस्थान का निगमन-राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान एक निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने और संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।

5. शासक बोर्ड का गठन-ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा शासक बोर्ड के नाम से ज्ञात बोर्ड का गठन किया जाएगा जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

(क) सभापति, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी रीति में नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाए:

परंतु प्रथम सभापति, केन्द्रीय सरकार द्वारा, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, प्रथम परिनियमों के प्रवर्तन में आने की तारीख से छह मास से अनधिक की अवधि के लिए, नियुक्त किया जाएगा;

(ख) संस्थान का निदेशक, पदेन; 

(ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले संप्रवर्तक कंपनियों के निदेशक बोर्ड से दो व्यक्ति ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए संप्रवर्तक कंपनियों से ऐसी कंपनियां अभिप्रेत हैं जो धारा 25 में निर्दिष्ट विन्यास निधि में अभिदाय कर रही हैं;

(घ) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर के निदेशक द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला उस संस्थान का एक आचार्य;

(ङ) पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में, जिसके अंतर्गत संपूर्ण हाइड्रोकार्बन मान श्रृंखला आती हैं, पांच विख्यात विशेषज्ञ जिनके पास शिक्षा, अनुसंधान, इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी के संबंध में विशेषज्ञीय ज्ञान या प्रचालन का अनुभव हो, जिन्हें संस्थान के निदेशक के परामर्श से महा-परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

(च) संस्थान की सिनेट द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले संस्थान के दो आचार्य; और

(छ) पूर्व छात्र संगम की कार्यकारी समिति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला संस्थान के स्नातकों का एक प्रतिनिधि ।

(2) संस्थान का कुल-सचिव, बोर्ड के सचिव के रूप में कार्य करेगा ।

(3) बोर्ड, सामान्यतः एक कलेन्डर वर्ष के दौरान चार बार अधिवेशन करेगा ।

6. बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियां और उन्हें संदेय भत्ते-(1) इस धारा में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, बोर्ड के सभापति या पदेन सदस्यों से भिन्न किसी अन्य सदस्य की पदावधि, उसकी नियुक्ति या उसके नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष   होगी ।

(2) कोई पदेन सदस्य, जैसे ही वह उस पद को रिक्त कर देता है जिसके आधार पर वह बोर्ड का सदस्य है, बोर्ड का सदस्य नहीं रहेगा ।

(3) किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट सदस्य की पदावधि उस सदस्य की पदावधि के शेष भाग तक होगी जिसके स्थान पर उसे नामनिर्दिष्ट किया गया है ।

(4) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, पदावरोही सदस्य, केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निदेश न दिए जाने की दशा में, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसके स्थान पर, किसी अन्य व्यक्ति को सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता है ।

(5) बोर्ड के सदस्य, संस्थान से ऐसे भत्ते लेने के, यदि कोई हों, हकदार होंगे जो परिनियमों में उपबंधित किए जाएं किन्तु धारा 5 के खंड (च) में निर्दिष्ट सदस्य से भिन्न कोई सदस्य किसी वेतन का हकदार नहीं होगा ।

7. संपत्तियों का निहित होना-नियत दिन से ही और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभी संपत्तियां जो उस दिन से ठीक पूर्व सोसाइटी में निहित थीं, उस दिन से ही संस्थान में निहित हो जाएंगी ।

8. संस्थान के निगमन का प्रभाव-नियत दिन से ही, -

(क) किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में सोसाइटी के प्रतिनिर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह संस्थान के प्रतिनिर्देश है;

(ख) सोसाइटी के सभी अधिकार और दायित्व संस्थान को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार और दायित्व होंगे; और

(ग) नियत दिन के ठीक पहले सोसाइटी द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा संस्थान में उसी सेवाधृत्ति के अनुसार, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसे कि वह उस दशा में धारण करता जिसमें यह अधिनियम पारित नहीं किया जाता और तब तक इसी प्रकार धारण करेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी सेवाधृत्ति, पारिश्रमिक तथा निबंधन और शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक्तः परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :

पंरतु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसका नियोजन संस्थान द्वारा कर्मचारी से की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार समाप्त किया जा सकता है या, यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया गया है तो, स्थायी कर्मचारियों के संबंध में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारियों के संबंध में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर देकर संस्थान द्वारा समाप्त किया जा सकता है ।

9. संस्थान के कृत्य-संस्थान निम्नलिखित कृत्य करेगा, अर्थात्: -

(i) पेट्रोलियम और हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में क्वालिटी को विकसित करना और उनका संवर्धन करना तथा शिक्षा और अनुसंधान में उत्कर्ष प्राप्त करना;

(ii) जिसके परिणामस्वरूप पेट्रोलियम और हाइड्रोकार्बन के क्षेत्र में इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, विज्ञान और कला में स्नातक, मास्टर और डॉक्टर की डिग्रियां प्रदान करने के लिए, ऐसे प्रशिक्षण और अनुसंधान कार्यक्रमों और अनुक्रमों का उपबंध करना;

(iii) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जिन्हें संस्थान अवधारित करे, ऐसे अभ्यर्थियों को जिन्होंने परीक्षाओं के आधार पर या परीक्षण और मूल्यांकन के किसी अन्य आधार पर निर्णीत प्रवीणता के विहित स्तरमान पूरे कर लिए हैं, विभिन्न शैक्षणिक स्तरों पर डिग्रियां, डिप्लोमा, प्रमाणपत्र या अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां या खिताब प्रदान करना और अच्छे तथा पर्याप्त कारणों से ऐसी किसी डिग्री, डिप्लोमा, प्रमाणपत्र या अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियां या खिताब को वापस लेना;

(iv) मानद डिग्रियां या अन्य उपाधियां प्रदान करना और अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र-सहायता वृत्तियां, पुरस्कार और पदक स्थापित करना और प्रदान करना;

(v) संस्थान में परीक्षा या परीक्षण और मूल्यांकन की किसी अन्य पद्धति के माध्यम से प्रवेश के स्तरमान अधिकथित करना;

(vi) फीस और अन्य प्रभार नियत करना, उनकी मांग करना और उन्हें प्राप्त करना;

(vii) अपने शैक्षणिक और अनुसंधान कार्यक्रमों की अंतर्वस्तु, क्वालिटी, डिजाइन का ऐसी से जो अंतरराष्ट्रीय स्तर का प्रत्यायन अर्जित करती हो, प्रबंध करना और उसका सतत् मूल्यांकन करना ;

(viii) अध्यापन और अनुसंधान के एकीकरण के माध्यम से तेल, गैस और पेट्रोरसायन उद्योग के फायदे के लिए अनुसंधान का संवर्धन और विकास करना;

(ix) तेल, गैस और पेट्रोरसायन उद्योग में राष्ट्रीय, प्रादेशिक और अंतरराष्ट्रीय उद्यमियों के साथ नेटवर्किंग के माध्यम से नजदीकी शैक्षणिक और अनुसंधान संपर्क बनाए रखना;

(x) विश्व के किसी भाग में ऐसे शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थाओं के साथ जिनके संपूर्ण या भागतः उद्देश्य इस संस्थान के उद्देश्यों के समरूप हैं, अध्यापकों और विद्वानों के आदान-प्रदान द्वारा सहयोग करना, संयुक्त अनुसंधान करना, प्रायोजित अनुसंधान तथा परामर्शी परियोजनाएं, आदि अपने हाथ में लेना;

(xi) पेट्रोलियम और हाइड्रोकार्बनों के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियां, सेमिनार और सम्मेलन का आयोजन करना;

(xii)  छात्रों के लिए हॉलों, निवासों और हॉस्टलों की स्थापना करना, उनका अनुरक्षण और प्रबंध करना;

(xiii) शैक्षणिक, प्रशासनिक, तकनीकी और अन्य पदों का सृजन करना और उन पर नियुक्तियां करना;

(xiv) अध्यापकों और कर्मचारियों के अन्य प्रवर्गों के लिए सेवा की शर्तें अधिकथित करना जिनके अंतर्गत आचार संहिता भी है;

(xv) संस्थान के कर्मचारियों के सभी प्रवर्गों में अनुशासन का पर्यवेक्षण, नियंत्रण और विनियमन करना तथा उनके स्वास्थ्य और सामान्य कल्याण के संवर्धन का प्रबंध करना;

(xvi) छात्रों में अनुशासन का पर्यवेक्षण और विनियमन करना तथा उनके स्वास्थ्य, सामान्य कल्याण और सांस्कृतिक तथा सामूहिक जीवन के संवर्धन का प्रबंध करना;

(xvii) परिनियम और अध्यादेश बनाना और उनमें परिवर्तन, उपांतरण करना या उन्हें विखंडित करना;

(xviii) संस्थान की या उसमें निहित किसी संपत्ति के साथ ऐसी रीति में व्यवहार करना जिसे संस्थान अपने उद्देश्यों को अग्रसर करने के लए ठीक समझे;

(xix) केन्द्रीय और राज्य सरकारों से दान, अनुदान, संदान या उपकृतियां प्राप्त करना और वसीयकर्ताओं, दाताओं, अंतरकों, पूर्वछात्र, उद्योग या किसी अन्य व्यक्ति से जंगम या स्थावर संपत्तियों की वसीयतें, दान, अनुदान और अंतरण प्राप्त करना;

(xx) संस्थान के प्रयोजनों के लिए संस्थान की संपत्ति की प्रतिभूति सहित या बिना धन उधार लेना;

(xxi) कक्षाओं में छात्र केन्द्रीकृत अध्ययन की युक्तियों को प्रोत्साहन देने के लिए और अध्ययन के लिए अभिवृत्ति विकसित करने के लिए नई प्रौद्योगिकी को एकीकृत करना;

(xxii) पेट्रोलियम सेक्टर के क्षेत्र में, जिसके अंतर्गत संपूर्ण हाइड्रोकार्बन मान श्रृंखला के साथ ही विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अन्य संबंधित क्षेत्र भी आते हैं, मुद्रित और अमुद्रित ज्ञान के संसाधनों के सूचना संसाधन केन्द्र का विकास और अनुरक्षण करना;

(xxiii) तेल, गैस और संपूर्ण हाइड्रोकार्बन मान श्रृंखला से संबंधित प्रौद्योगिकी के उन्नत क्षेत्रों में संस्थान के कार्य वृत्तिकों और अन्य कर्मचारियों को और शिक्षा देना;

(xxiv) ऐसी सभी कृत्य करना जो विनिर्दिष्ट रूप से उपरोक्त कृत्यों के अंतर्गत नहीं आती हैं तथा जो संस्थान के सभी या किन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।

10. बोर्ड की शक्तियां-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, बोर्ड संस्थान के कार्यकलाप के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगा और उन सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा जिनका इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अन्यथा उपबंध नहीं किया गया है और उसे सिनेट के कार्यों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड, -

(क) संस्थान के प्रशासन और कार्यकरण से संबंधित नीति विषयक प्रश्नों का विनिश्चय करेगा;

(ख) पाठ्यक्रमों की अवधि, संस्थान द्वारा प्रदान की जाने वाली डिग्रियों और अन्य उपाधियों के नाम के संबंध में नीति अधिकथित करेगा;

(ग) अध्ययन के पाठ्यक्रम संस्थित करना और संस्थान द्वारा प्रस्थापित पाठ्यक्रमों की बाबत दक्षता और अन्य शैक्षणिक विशिष्टियों के मानदंड अधिकथित करेगा;

(घ) संस्थान के अध्यापन और अनुसंधान संकाय के कर्मचारियों के साथ अन्य कर्मचारियों की काडर संरचना, अर्हता, भर्ती की पद्धति और सेवा की शर्तों के संबंध में नीति अधिकथित करेगा;

(ङ) संस्थान के संसाधनों को सक्रिय बनाने के लिए मार्गदर्शित करेगा और विनिधान के लिए नीतियां अधिकथित करेगा;

(च) संस्थान के प्रयोजनों के लिए, संस्थान की संपत्ति की प्रतिभूति सहित या बिना उधार लेने के प्रस्तावों पर विचार करेगा और उनका अनुमोदन करेगा;

(छ) परिनियम बनाना और उनमें परिवर्तन, उपांतरण करेगा या उन्हें विखंडित करेगा;

(ज) संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट, लेखाओं और आगामी वित्तीय वर्ष के बजट प्राक्कलनों पर, उनकी विकास योजनाओं के विवरण सहित विचार करेगा और ऐसे संकल्प पारित करेगा, जो वह ठीक समझे;

(झ) ऐसी सभी बातें करेगा जो पूर्वोक्त सभी या किन्हीं शक्तियों का पालन करने के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।

(3) बोर्ड को उतनी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी जितनी वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग और अपने कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।

(4) बोर्ड को भारत के भीतर या भारत से बाहर किसी स्थान पर शिक्षा संस्था या शिक्षा केन्द्र स्थापित करने की शक्ति होगी:

परंतु कोई भी शिक्षा संस्था या शिक्षा केन्द्र, भारत से बाहर केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना स्थापित नहीं किया जाएगा ।

(5) धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना संस्थान की किसी स्थावर संपत्ति का किसी भी रीति में व्ययन नहीं करेगा ।

(6) बोर्ड, इस प्रभाव के विनिर्दिष्ट संकल्प के माध्यम से, अपनी शक्तियों और कर्तव्यों में से किसी को संस्थान के सभापति, निदेशक, किसी अधिकारी या किसी प्राधिकारी को उस कार्य का, जो ऐसे प्रत्यायोजित प्राधिकार के अधीन किया जा सके पुनर्विलोकन करने के अधिकार को आरक्षित रखने के अधीन रहते हुए प्रत्यायोजित कर सकेगा ।

11. संस्थान का सभी मूलवंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुला होना-(1) संस्थान सभी स्त्रियों और पुरुषों के लिए खुला होगा चाहे वे किसी भी मूलवंश, पंथ, जाति या वर्ग के हों, और छात्रों को प्रवेश देने, शिक्षकों या कर्मचारियों को नियुक्त करने में या किसी भी अन्य बात के संबंध में धार्मिक विश्वास या मान्यता का कोई मानदंड या शर्त अधिरोपित नहीं की जाएगी ।

(2) कोई संस्थान किसी संपत्ति की कोई वसीयत, संदान या अंतरण स्वीकार नहीं करेगा जिसमें, बोर्ड की राय में, इस धारा के भाव और उद्देश्य के विरुद्ध कोई शर्त या बाध्यता अन्तर्ग्रस्त है ।

12. संस्थान में शिक्षा-संस्थान में सभी शिक्षण-कार्य और अन्य शैक्षणिक क्रियाकलाप संस्थान द्वारा या उसके नाम से इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार किया जाएगा ।

13. कुलाध्यक्ष-(1) भारत का राष्ट्रपति संस्थान का कुलाध्यक्ष होगा ।

(2) कुलाध्यक्ष संस्थान के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उसके कार्यकलापों की जांच करने के लिए और उन पर रिपोर्ट ऐसी रीति से देने के लिए जैसी कुलाध्यक्ष निदेश दे, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा ।

(3) ऐसी किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, कुलाध्यक्ष ऐसी कार्रवाई कर सकेगा और ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जो वह रिपोर्ट में वर्णित किन्हीं विषयों की बाबत आवश्यक समझे और संस्थान ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।

14. संस्थान के प्राधिकारी-संस्थान के प्राधिकारी निम्नलिखित होंगे, अर्थात्: -

(क) महा-परिषद्;

(ख) शासक-बोर्ड;

(ग) सिनेट; और

(घ) ऐसे अन्य प्राधिकारी जिन्हें परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकारी घोषित किए जाएं ।

15. महा-परिषद् की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए महा-परिषद् के नाम से ज्ञात निकाय की स्थापना की जाएगी ।

(2) महा-परिषद्, निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -

(क) केन्द्रीय सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय का सचिव, पदेन जो अध्यक्ष होगा;

(ख) इंडियन ऑयल कारपोरेशन लिमिटेड का अध्यक्ष, पदेन;

(ग) हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, पदेन;

(घ) भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, पदेन;

(ङ) आयल एंड नेचुरल गैस कारपोरेशन का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, पदेन;

(च) गैस आथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, पदेन;

(छ) ऑयल इंडिया लिमिटेड का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, पदेन;

(ज) महानिदेशक, हाइड्रोकार्बन, पदेन;

(झ) प्रधान सलाहकार (ऊर्जा), योजना आयोग, पदेन;

(ञ) कार्यकारी निदेशक, तेल उद्योग सुरक्षा निदेशालय, पदेन;

(ट) निदेशक, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर, पदेन;

(ठ) निदेशक, यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नालाजी, मुंबई विश्वविद्यालय, पदेन;

(ड) सचिव, तेल उद्योग विकास बोर्ड, पदेन;

(ढ) बोर्ड का सभापति, पदेन;

(ण) संस्थान का निदेशक, पदेन; और

(त) देश में कार्य कर रहे पेट्रोलियम सेक्टर के क्षेत्र में निजी इकाइयों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो से अन्यून किन्तु चार से अनधिक व्यक्ति, जो अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएं ।

(3) संस्थान का रजिस्ट्रार, महा-परिषद् का पदेन सचिव होगा ।

(4) अध्यक्ष को ऐसे किसी व्यक्ति को, जो महा-परिषद् का सदस्य नहीं है महा-परिषद् के अधिवेशन में उपस्थित होने के लिए आमंत्रित करने की शक्ति होगी किन्तु ऐसा आमंत्रित व्यक्ति मत देने का हकदार नहीं होगा ।

16. महा-परिषद् की शक्तियां और कृत्य-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, महा-परिषद् की निम्नलिखित शक्तियां और कृत्य होंगे, अर्थात्: -

(क) समय-समय पर संस्थान की विस्तृत नीतियों और कार्यक्रमों का पुनर्विलोकन करना और उनमें सुधार और विकास के लिए उपायों का सुझाव देना;

(ख) लेखाओं के वार्षिक विवरण पर जिसके अंतर्गत उसकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ तुलन-पत्र भी हैं और उन पर शासक-बोर्ड के संप्रेक्षणों पर विचार करना तथा संस्थान के वित्तीय प्रबंधन में सुधारों का सुझाव देना;

(ग) संस्थान की समस्त क्वालिटी और परिणामिता का पुनर्विलोकन और मूल्यांकन करना तथा कार्यपालन में सुधार के लिए उपायों की सलाह देना और संस्थान और उसके पणधारियों के बीच विश्वास कायम रखने के लिए उपायों की सलाह देना;

(घ) संस्थान के लिए, विशेषकर छात्र नियोजन और संसाधन को सक्रिय बनाने के बारे में विश्वसनीयता, वातावरण, संबंध और संपर्क निश्चित करना; और

(ङ) संस्थान और उसके बोर्ड को, संपूर्ण हाइड्रोकार्बन मान श्रृंखला के अंतर्गत आने वाले पेट्रोलियम सेक्टर के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी के उन्नत क्षेत्रों के संबंध में और ऐसे किसी अन्य विषय के संबंध में जो बोर्ड द्वारा सलाह के लिए उसके समक्ष भेजा जाए, सलाह देना ।       

17. सिनेट-संस्थान की सिनेट, प्रधान शैक्षणिक निकाय होगी और उसकी संरचना ऐसी होगी जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाए ।

18. सिनेट के कृत्य-इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सिनेट, संस्थान में शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा के स्तरों का नियंत्रण और साधारण विनियमन करेगी और उनको बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगी और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी जो परिनियमों द्वारा प्रदत्त या अधिरोपित किए जाएं ।

19. बोर्ड का सभापति-(1) सभापति सामान्यतया बोर्ड के अधिवेशनों की और संस्थान के दीक्षांत समारोहों की अध्यक्षता करेगा ।

(2) सभापति का यह कर्तव्य होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि बोर्ड द्वारा किए गए विनिश्चयों का क्रियान्वयन हो रहा है ।

(3) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

20. निदेशक-(1) संस्थान का निदेशक, केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी रीति से और ऐसे निबंधनों और शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं:

परंतु प्रथम निदेशक, केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे निबंधन और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, प्रथम परिनियमों के प्रवर्तन में आने की तारीख से छह मास से अनधिक की अवधि के लिए नियुक्त किया जाएगा ।

(2) निदेशक, संस्थान का प्रधान शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा और संस्थान के उचित प्रशासन और शैक्षणिक कार्य के लिए तथा शिक्षा प्रदान करने और उसमें अनुशासन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा ।

(3) निदेशक, बोर्ड को वार्षिक रिपोर्टें और लेखा प्रस्तुत करेगा ।

(4) निदेशक, ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

21. कुल-सचिव-(1) संस्थान का कुल-सचिव ऐसी रीति से और ऐसे निबंधनों तथा शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं और वह संस्थान के अभिलेख, उसकी सामान्य मुद्रा, निधि और ऐसी अन्य संपत्ति का अभिरक्षक होगा, जो बोर्ड उसके भारसाधन में सौंपे ।

(2) कुल सचिव महा-परिषद्, बोर्ड, सिनेट और ऐसी समितियों के, जो परिनियमों द्वारा उपबंधित की जाएं सचिव के रूप में कार्य करेगा ।

(3) कुल-सचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।

(4) कुल-सचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम, परिनियमों या निदेशक द्वारा सौंपे जाएं ।

22. अन्य प्राधिकारियों और अधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य-इसमें इससे पहले वर्णित प्राधिकारियों और अधिकारियों से भिन्न प्राधिकारियों और अधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य परिनियमों द्वारा अवधारित किए जाएंगे ।

23. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-संस्थान को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा सम्यक् विनियोजन के पश्चात् संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि का और ऐसी रीति से, जो वह ठीक उचित समझे, संदाय करेगी ।

24. संस्थान की निधि-(1) संस्थान एक निधि रखेगा जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे, -

(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए सभी धन;

(ख) सभी फीस तथा अन्य प्रभार;

(ग) अनुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत अथवा अंतरणों के रूप में संस्थान द्वारा प्राप्त सभी धन; और

(घ) किसी अन्य रीति या स्रोत से संस्थान को प्राप्त सभी धन ।

(2) निधि में जमा किए गए सभी धन, ऐसे बैंकों में जमा या ऐसी रीति से विनिहित किए जाएंगे, जिसे बोर्ड विनिश्चित करे ।

(3) निधि का उपयोग संस्थान के व्ययों की, जिनके अंतर्गत इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग में और कृत्यों के निर्वहन में किए गए व्यय भी हैं, पूर्ति के लिए किया जाएगा ।

25. विन्यास निधि की स्थापना-संस्थान, धारा 24 में किसी बात के होते हुए भी, -

(क) विन्यास निधि और विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए किसी अन्य निधि की स्थापना कर सकेगा; और

(ख) अपनी निधि में से कोई धन विन्यास निधि या किसी अन्य विधि में अंतरण कर सकेगा ।  

26. लेखा और संपरीक्षा-(1) संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अंतर्गत तुलनपत्र भी है, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जैसा केन्द्रीय सरकार भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विहित करे । 

(2) संस्थान के लेखे की वार्षिक संपरीक्षा भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक करेगा और उस संपरीक्षा के संबंध में उपगत व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।

(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और संस्थान के लेखे की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के उस संपरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखे की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्ट रूप से बहियां, लेखा संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेजों और कागज पेश किए जाने की मांग करने और संस्थान के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित संस्थान के लेखे, उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ, प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित किए जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

27. पेंशन और भविष्य निधि-(1) संस्थान अपने कर्मचारियों के, जिनके अंतर्गत निदेशक भी है, फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी पेंशन, बीमा और भविष्य निधि स्कीम स्थापित करेगा, जो वह ठीक समझे ।

(2) जहां कोई ऐसी भविष्य निधि इस प्रकार स्थापित की गई है वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि हो ।

 28. नियुक्तियां-संस्थान के कर्मचारिवृंद की सभी नियुक्तियां, निदेशक की नियुक्ति को छोड़कर परिनियमों द्वारा अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार निम्नलिखित द्वारा की जाएंगी, -

(क) यदि नियुक्ति सहायक आचार्य या उससे ऊपर के पद पर शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के बारे में की जाती है या यदि नियुक्ति गैर शैक्षणिक कर्मचारिवृंद में किसी काडर में की जाती है जिसका अधिकतम वेतनमान सहायक आचार्य के वेतनमान के समान या उससे उच्चतर है, तो बोर्ड द्वारा; और

(ख) किसी अन्य दशा में, निदेशक द्वारा ।

29. परिनियम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए परिनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) शिक्षण विभागों और अन्य शैक्षणिक इकाइयों का बनाया जाना;

(ख) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र सहायता वृत्तियों, पदकों और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;

(ग) संस्थान के अधिकारियों के, जिनके अंतर्गत सभापति, निदेशक, कुल-सचिव और ऐसे अन्य अधिकारी भी हैं जो परिनियमों द्वारा संस्थान के अधिकारी के रूप में घोषित किए जाएं, पदों का वर्गीकरण, पदावधि, नियुक्ति की पद्धति, शक्तियां और कर्तव्य तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(घ) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद का वर्गीकरण, नियुक्ति की पद्धति और सेवा के निबंधनों और शर्तों का अवधारण;

(ङ) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और ऐसे अन्य प्रवर्ग के व्यक्तियों के लिए पदों के आरक्षण जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर अवधारित किए जाएं;

(च) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृंद के फायदे के लिए पेंशन, बीमा और भविष्य निधियों की स्थापना;

(छ) धारा 14 के खंड (घ) में निर्दिष्ट संस्थान के अन्य प्राधिकारियों का गठन, शक्तियां और कर्तव्य;

(ज) शक्ति का प्रत्यायोजन;

(झ) आचार संहिता, अवचार के लिए उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई जिसके अंतर्गत अवचार के कारण कर्मचारियों को सेवा से हटाया जाना भी है और संस्थान के अधिकारी या प्राधिकारी की कार्रवाई के विरुद्ध अपील के लिए प्रक्रिया;

(ञ) सम्मानिक डिग्रियां प्रदान करना;

(ट) हॉलों, निवासों और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;

(ठ) बोर्ड के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन; और

(ड) कोई अन्य विषय जो, इस अधिनियम के अधीन परिनियमों द्वारा उपबंधित किया जाना है या की जा सकता है ।

30. परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) संस्थान के प्रथम परिनियम केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए जाएंगे और उनके बनाए जाने के पश्चात् उनकी एक प्रति संसद् के समक्ष यथाशक्य शीघ्र रखी जाएगी ।

(2) बोर्ड, समय-समय पर नया या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या इस धारा में इसके पश्चात् उपबंधित रीति से परिनियम को संशोधित या निरसित कर सकेगा ।

(3) नए परिनियम के लिए या परिनियमों में परिवर्धन या परिनियम के किसी संशोधन या निरसन के लिए महा-परिषद् का पूर्व अनुमोदन अपेक्षित होगा जो उसके लिए सहमति दे सकेगी या सहमति रोक सकेगी या उसे बोर्ड को विचार के लिए भेज सकेगी ।

(4) नए परिनियम या विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि महा-परिषद् उसके लिए सहमति नहीं दे देती है ।

31. अध्यादेश-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अध्यादेश निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) संस्थान में छात्रों का प्रवेश;

(ख) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य प्रवर्ग के व्यक्तियों के लिए आरक्षण;   

(ग) संस्थान की सभी डिग्रियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;

(घ) वे शर्तें जिनके अधीन छात्रों को डिग्री, डिप्लोमा और प्रमाणपत्र पाठ्यक्रमों में और संस्थान की परीक्षा में प्रवेश दिया जाएगा और उनको प्रदान किए जाने के लिए पात्रता की शर्तें;

(ङ) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायता वृत्तियां, पदक और पुरस्कार प्रदान किए जाने की शर्तें;

(च) परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग तथा उनके कर्तव्य;

(छ) परीक्षाओं का संचालन;

(ज) संस्थान के विद्यार्थियों में अनुशासन बनाए रखना;

(झ) संस्थान में अध्ययन पाठ्यक्रमों के लिए और परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभारित की जाने वाली फीसें;

(ञ) संस्थान के विद्यार्थियों के निवास की शर्तें और हॉलों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीसों और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण किया जाना; और

(ट) कोई अन्य विषय जो, इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन अध्यादेशों द्वारा उपबंधित किया जाना है या किया जा सकता है ।

32. अध्यादेश किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे ।

(2) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश ऐसी तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निर्दिष्ट करे परंतु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश, बोर्ड को यथाशक्य शीघ्र, प्रस्तुत किया जाएगा और बोर्ड द्वारा अपने आगामी अधिवेशन में उस पर विचार किया जाएगा ।

(3) बोर्ड को ऐसे किसी अध्यादेश को संकल्प द्वारा उपांतरित या रद्द करने की शक्ति होगी और ऐसे संकल्प की तारीख से ऐसा अध्यादेश, यथास्थिति, तद्नुसार उपांतरित या रद्द हो जाएगा ।

33. संस्थान के प्राधिकारियों द्वारा कारबार का संचालन-संस्थान के प्राधिकारी अपने स्वयं के और उनके द्वारा नियुक्त ऐसी समितियों के, यदि कोई हों, जिनके लिए इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उपबंध नहीं किया गया है, कारबार का संचालन करने के लिए इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के संगत, प्रक्रिया के अपने स्वयं के नियम बना सकेंगे ।

34. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) संस्थान और उसके किन्हीं कर्मचारियों के बीच किसी संविदा से उद्भूत होने वाला विवाद संबद्ध कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान की प्रेरणा पर ऐसे माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देशित किया जाएगा जिसमें संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य और कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य तथा कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक होगा ।

(2) माध्यस्थम् अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा ।

(3) उपधारा (1) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देश किए जाने के लिए अपेक्षित किसी मामले की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।

(4) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।

(5) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।

अध्याय 3

प्रकीर्ण

35. रिक्तियों के कारण कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन गठित संस्थान या महा-परिषद् या बोर्ड या सिनेट या किसी अन्य निकाय का कोई कार्य निम्नलिखित कारणों से अविधिमान्य नहीं होगा-

(क) उसमें कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या

(ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या

(ग) उसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।

36. संस्थान द्वारा डिग्रियों, आदि का दिया जाना-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को इस अधिनियम के अधीन डिग्रियां और अन्य शैक्षिक विशिष्टियां तथा खिताब देने की शक्ति होगी ।

37. प्रायोजित स्कीमें-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, जब कभी संस्थान किसी सरकार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग या किसी अन्य अभिकरण से जिसमें ऐसा उद्योग भी सम्मिलित है जो संस्थान पर निष्पादित या प्रदान की जाने वाली किसी अनुसंधान स्कीम, परामर्शी समनुदेशन, अध्यापन कार्यक्रम या आसीन या आचार्य पद या छात्रवृत्ति प्रायोजित करता हो, निधियां प्राप्त करता है तब, -

(क) संस्थान द्वारा प्राप्त रकम संस्थान की निधि से पृथक् रखी जाएगी और स्कीम के प्रयोजन के लिए ही उपयोग की जाएगी;

(ख) उस स्कीम को निष्पादित करने के लिए अपेक्षित कर्मचारिवृंद प्रायोजित करने वाले संगठन द्वारा अनुबंधित निबंधन और शर्तों के अनुसार भर्ती किया जाएगा:

परंतु खंड (क) के अधीन उपयोग में न लिया गया शेष धन धारा 25 के अधीन सृजित विन्यास निधि को अंतरित कर दिया जाएगा ।

38. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी या ऐसे निदेश दे सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों: 

परंतु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथासंभवशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

39. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, -

(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले सोसाइटी के शासक बोर्ड के रूप में कार्य करने वाला शासक बोर्ड उसी रूप में तब तक कार्य करता रहेगा जब तक इस अधिनियम के अधीन संस्थान के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन किसी नए बोर्ड के गठन पर बोर्ड के ऐसे सदस्य, जो ऐसे गठन के पहले पद धारण कर रहे हों, पद धारण नहीं करेंगे; और

(ख) जब तक इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम और अध्यादेश नहीं बनाए जाते हैं, तब तक इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त राजीव गांधी पेट्रोलियम प्रौद्योगिकी संस्थान सोसाइटी के परिनियम और अध्यादेश या अधिसूचना संस्थान को वहां तक लागू होती रहेंगी, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं । 

40. परिनियमों, अध्यादेशों और अधिसूचनाओं का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम और अध्यादेश या जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी ।

(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम और प्रत्येक अध्यादेश या जारी की गई अधिसूचना, बनाए या जारी किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा या रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह परिनियम, अध्यादेश नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा या हो जाएगी । किन्तु परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(3) परिनियम या अध्यादेश बनाने या अधिसूचनाएं जारी करने की शक्ति के अंतर्गत उक्त परिनियमों, अध्यादेशों, अधिसूचनाओं या उनमें से किसी को उस तारीख से जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्व की नहीं होगी, भूतलक्षी रूप से प्रभावी करने की शक्ति भी होगी किन्तु किसी ऐसे परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना को इस रूप में भूतलक्षी रूप से प्रभावी नहीं किया जाएगा जिससे ऐसे किसी व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो जिसे ऐसा परिनियम, अध्यादेश या अधिसूचना लागू होती हो ।

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