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सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 ( Border Security Force Act, 1968 )


 

सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968

(1968 का अधिनियम संख्यांक 47)

[2 दिसम्बर, 1968]

भारत की सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा उससे

संबंधित बातों के लिए संघ के सशस्त्र बल

के गठन और विनियमन का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के उन्नीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सीमा सुरक्षा बल अधिनियम, 1968 है ।

(2) यह उस तारीख  को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) “सक्रिय ड्यूटी" से इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति के संबंध में, बल के सदस्य के रूप में उसकी उस अवधि के दौरान की ड्यूटी अभिप्रेत है जब वह- 

(i) शत्रु के विरुद्ध संक्रियाओं में लगे हुए ; या

(ii) भारत की सीमाओं पर पिकेट की संक्रियाएं कर रहे या गश्ती कर्तव्य या अन्य रक्षा कर्तव्य करने            में लगे हुए,

बल के किसी यूनिट से संबद्ध है या उसका अंग है ; और इसके अंतर्गत ऐसे व्यक्ति द्वारा किसी ऐसी अवधि के दौरान की गई ड्यूटी भी है, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा रापजत्र में अधिसूचना द्वारा किसी ऐसे क्षेत्र के प्रति निर्देश से, जिसमें कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का वर्ग, जो इस अधिनियम के अधीन है, सेवा कर रहा है, सक्रिय ड्यूटी की अवधि घोषित की गई है ;

                (ख) “बटालियन" से बल की वह यूनिट अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बटालियन के रूप में गठित की गई है ;

(ग) “मुख्य विधि आफिसर" और विधि आफिसर" से, केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त क्रमशः बल का मुख्य विधि आफिसर और कोई विधि आफिसर अभिप्रेत है ;

(घ) “सिविल अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो किसी दंड न्यायालयय द्वारा विचारणीय है;

(ङ) “सिविल कारागार" से ऐसी जेल या स्थान अभिप्रेत है जिसका उपयोग किसी आपराधिक बंदी के निरोध के लिए कारागार अधिनियम, 1894 (1894 का 9) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किया जाता है ;

(च) “कमांडेंट (समादेष्टा)" से, जहां इसका प्रयोग इस अधिनियम के किसी उपबंध में बल के किसी यूनिट के प्रति निर्देश से किया गया है, वहां ऐसा आफिसर अभिप्रेत है जिसका कर्तव्य, नियमों के अधीन उस यूनिट की बाबत उस उपबंध में निर्दिष्ट प्रकार के विषयों के संबंध में, कमांडेंट के कृत्यों का निर्वहन करना है ;

(छ) “दंड न्यायालयय" से भारत के किसी भाग में मामूली दंड न्यायालयय अभिप्रेत है ;

(ज) “उप महानिरीक्षक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त बल का उप महानिरीक्षक अभिप्रेत है;

(झ) “महानिरीक्षक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त बल का महानिदेशक अभिप्रेत है ;

(ञ) शत्रु" के अंतर्गत ऐसे सब सशस्त्र सैन्य विद्रोही, सायुध बागी, सायुध बल्वाकारी, जलदस्यु और ऐसा कोई उद्यतायुद्ध व्यक्ति भी है जिसके विरुद्ध कार्रवाई करना किसी ऐसे व्यक्ति का कर्तव्य है जो इस अधिनियम के अध्यधीन है ;

(ट) “अभ्यावेशित व्यक्ति" से इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित कोई अवर आफिसर, या अन्य व्यक्ति   अभिप्रेत है ;

(ठ) “बल" से सीमा सुरक्षा बल अभिप्रेत है ;

(ड) “बल की अभिरक्षा" से नियमों के अनुसार बल के सदस्य की गिरफ्तारी या परिरोध अभिप्रेत है ;

(ढ) “महानिरीक्षक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त बल का महानिरीक्षक अभिप्रेत है ;

(ण) “बल का सदस्य" से कोई आफिसर, अधीनस्थ आफिसर, अवर आफिसर या अन्य अभ्यावेशित व्यक्ति              अभिप्रेत है ;

(त) “अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(थ) “अपराध" से इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई कार्य या लोप अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत सिविल अपराध भी है ;

(द) “आफिसर" से बल के आफिसर के रूप में नियुक्त या वेतन पाने वाला कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, किन्तु इसके अंतर्गत कोई अधीनस्थ आफिसर या अवर आफिसर नहीं है ;

(ध) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(न) “नियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाया गया नियम अभिप्रेत है ;

(प) “सुरक्षा बल न्यायालयय" से धारा 64 में निर्दिष्ट न्यायालयय अभिप्रेत है ;

(फ) “अधीनस्थ आफिसर" से बल के सूबेदार-मेजर, सूबेदार या उप निरीक्षक के रूप में नियुक्त या वेतन पाने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है ;

(ब) “वरिष्ठ आफिसर" से, जहां इसका प्रयोग ऐसे किसी व्यक्ति के संबंध में किया गया है जो इस अधिनियम के अधीन है वहां निम्नलिखित व्यक्ति अभिप्रेत हैं,-

(i) बल का कोई सदस्य, जिसके कमान में वह व्यक्ति नियमों के अनुसरण में तत्समय उसके अधीन है ;

(ii) उस व्यक्ति से उच्चतर रैंक या वर्ग का अथवा एक ही वर्ग में उच्चतर ग्रेड का कोई आफिसर,

                और जब ऐसा व्यक्ति आफिसर नहीं है तब इसके अंतर्गत उच्चतर रैंक, वर्ग या ग्रेड का अधीनस्थ आफिसर या अवर आफिसर ;

                                (भ) “अवर आफिसर" से बल का हैड कांस्टेबल, नायक, लांसनायक अभिप्रेत है ;

(म) उन सभी शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु भारतीय दंड संहिता  (1860 का 45) में परिभाषित है, वहीं अर्थ होंगे जो उनके उस संहिता में हैं ।

(2) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त नहीं है, निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति निर्देश हैं ।

3. इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति-(1) निम्नलिखित व्यक्ति, चाहे वे कहीं भी हों, इस अधिनियम के अधीन होंगे,              अर्थात् :-  

                (क) आफिसर तथा अधीनस्थ आफिसर; और

                (ख) अवर आफिसर और इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित अन्य व्यक्ति ।

(2) प्रत्येक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, इस प्रकार तब तक अधीन बना रहेगा जब तक कि वह इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अनुसार बल से सेवानिवृत्त नहीं हो जाता है या सेवा से उन्मोचित, निर्मुक्त या पदच्युत नहीं कर दिया जाता है या हटा नहीं दिया जाता है ।

अध्याय 2

बल का गठन और बल के सदस्यों की सेवा की शर्तें

                4. बल का गठन-(1) भारत की सीमाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भारत संघ का सीमा सुरक्षा बल नामक एक सशस्त्र बल होगा ।

(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, बल का गठन ऐसी रीति से किया जाएगा जो विहित की जाए और बल के सदस्यों की सेवा की शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।

5. नियंत्रण, निदेशन, आदि-(1) बल का साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण केंद्रीय सरकार में निहित होगा और वही उसका प्रयोग करेगी और उसके तथा इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए बल का समादेशन और अधीक्षण ऐसे आफिसर में निहित होगा जिसे केंद्रीय सरकार बल के महानिदेशक के रूप में नियुक्त करे ।

(2) इस अधिनियम के अधीन महानिदेशक के कर्तव्यों के निर्वहन में उसकी सहायता करने के लिए इतने महानिरीक्षक, उप महानिरीक्षक, कमांडेंट और अन्य आफिसर होंगे, जितने केंद्रीय सरकार नियुक्त करे ।

6. अभ्यावेदन-(1) बल में अभ्यावेशित किए जाने वाले व्यक्ति अभ्यावेशन का ढंग और अभ्यावेशन की प्रक्रिया वह होगी जो विहित की जाए ।

(2) इस अधिनियम और नियमों में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सम्यक् रूप से अभ्यावेशित किया गया समझा जाएगा जिसने लगातार तीस मास तक इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित व्यक्ति के रूप में वेतन प्राप्त किया है और जिसका नाम बल की नामावली में रहा है ।

7. भारत के बाहर सेवा करने का दायित्व-बल का प्रत्येक सदस्य भारत के किसी भाग में तथा भारत के बाहर भी सेवा करने के दायित्व के अधीन होगा ।

8. पद-त्याग और पद से अलग होना-विहित प्राधिकारी की लिखित पूर्व अनुज्ञा के बिना, बल के किसी सदस्य को, -     

                (क) उस अवधि के दौरान, जिसके लिए वह वचनबद्ध है, अपना पद त्याग देने की ; या

                (ख) अपने पद के सभी या उनमें से किन्हीं कर्तव्यों से अलग होने की,

स्वतंत्रता नहीं होगी ।

9. अधिनियम के अधीन सेवा की अवधि-बल का प्रत्येक सदस्य राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा ।  

10. केंद्रीय सरकार द्वारा सेवा का पर्यवसान-इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति को सेवा से पदच्युत कर सकेगी या हटा सकेगी ।

11. महानिदेशक और अन्य आफिसरों द्वारा पदच्युत किया जाना, हटाया जाना या अवनत किया जाना-(1) महानिदेशक या कोई महानिरीक्षक इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति को, जो आफिसर नहीं है, सेवा से पदच्युत कर सकेगा या हटा सकेगा, या निम्नतर ग्रेड या रैंक में अवनत कर सकेगा । 

(2) कोई आफिसर, जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, या कोई विहित आफिसर अपने समादेश के अधीन किसी ऐसे व्यक्ति को, जो ऐसे रैंक या रैंकों का आफिसर या अधीनस्थ आफिसर नहीं है, जैसा कि विहित किया जाए, सेवा से पदच्युत कर सकेगा या हटा सकेगा ।

(3) उपधारा (2) में वर्णित कोई आफिसर अपने समादेश के अधीन किसी व्यक्ति को, जो आफिसर या अधीनस्थ आफिसर नहीं है, निम्नतर ग्रेड या रैंक या रैंकों में अवनत कर सकेगा ।

(4) इस धारा के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग इस अधिनियम और नियमों के अधीन रहते हुए किया जाएगा ।

12. सेवा की समाप्ति का प्रमाणपत्र-अधीनस्थ आफिसर या अवर आफिसर, या अन्य अभ्यावेशित व्यक्ति को, जो बल की सेवा से निवृत्त, उन्मोचित, या निर्मुक्त कर दिया गया है या हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है उस आफिसर द्वारा, जिसके समादेश के अधीन वह है, ऐसी भाषा में जो उस व्यक्ति की मातृ-भाषा है और हिन्दी या अंग्रेजी में भी एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा जिसमें निम्नलिखित बातें बताई जाएंगी, अर्थात् :-    

(क) उसकी सेवा को समाप्त करने वाला प्राधिकारी ;

(ख) ऐसी सेवा की समाप्ति के कारण ; और

(ग) बल में उसकी सेवा की पूर्ण अवधि ।

13. संगम बनाने, वाक्-स्वातंत्र्य आदि के अधिकार के संबंध में निर्बंधन-(1) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी की लिखित पूर्व मंजूरी के बिना, -  

(क) किसी व्यापार संघ, श्रम संघ या राजनीतिक संगम का न तो सदस्य होगा और न उससे किसी प्रकार सहयोजित ही होगा ; या

(ख) किसी सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन का, जिसे बल के भाग के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है या जो         केवल सामाजिक, आमोद-प्रमोद या धार्मिक स्वरूप का नहीं है, न तो सदस्य होगा और न उससे किसी प्रकार से सहयोजित होगा ; या

(ग) प्रेस से न तो पत्र-व्यवहार करेगा और न कोई पुस्तक, पत्र या अन्य दस्तावेज प्रकाशित करेगा, न प्रकाशित कराएगा, किंतु उस दशा में ऐसा कर सकेगा जबकि ऐसा पत्र-व्यवहार या प्रकाशन उसके कर्तव्यों के सद्भावपूर्वक निर्वहन के लिए है या बिल्कुल साहित्यिक, कलात्मक या वैज्ञानिक प्रकृति का है या विहित प्रकृति का है ।

स्पष्टीकरण-यदि कोई प्रश्न उठता है कि इस धारा के खंड (ख) के अधीन कोई सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन बिल्कुल सामाजिक आमोद-प्रमोद या धार्मिक स्वरूप का है या नहीं तो उस पर केंद्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा । 

(2) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे किसी अधिवेशन में न तो भाग लेगा और न उसे संबोधित ही करेगा और न ऐसे किसी प्रदर्शन में भाग लेगा, जो किन्हीं राजनीतिक प्रयोजनों से या ऐसे अन्य प्रयोजनों से, जो विहित किए जाएं, व्यक्तियों के किसी निकाय द्वारा संगठित किया गया है ।

अध्याय 3

अपराध

14. शत्रु से संबंधित अपराध, जो मृत्यु से दंडनीय हैं-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) किसी पदस्थान, स्थान या गारद को, जो उसके भारसाधन में सुपुर्द किया गया है या जिसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य है, लज्जास्पद रूप से परित्यक्त या समर्पित करेगा ; या

(ख) ऐसे किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम या सेना, नौसेना या वायु सेना विधि के अधीन है, शत्रु के विरुद्ध कार्य करने से प्रविरत रहने के लिए विवश या उत्प्रेरित करने के लिए या ऐसे व्यक्ति को शत्रु के विरुद्ध कार्य करने से निरुत्साहित करने के लिए किन्हीं साधनों का साशय उपयोग करेगा ; या

(ग) शत्रु की उपस्थिति में अपने आयुधों, गोलाबारूद, औजारों या उपस्कर को लज्जास्पद रूप से संत्यक्त करेगा या ऐसी रीति से कदाचार करेगा जिससे कायरता दर्शित हो ; या

(घ) शत्रु से या किसी ऐसे व्यक्ति से, जो संघ के विरुद्ध उद्यतायुद्ध है, विश्वासघातपूर्वक वार्ताचार करेगा या उसे आसूचना देगा ; या

(ङ) धन, आयुध, गोलाबारूद, सामान या प्रदाय से या किसी भी अन्य रीति से शत्रु की प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः सहायता करेगा ; या

(च) शत्रु के विरुद्ध सक्रिय कार्रवाई के समय कार्रवाई में, कैंप में, क्वार्टरों में मिथ्या अलार्म साशय कारित करेगा या ऐसी रिपोर्ट जो अलार्म या नैराश्य पैदा करने के लिए प्रकल्पित हो, फैलाएगा या फैलवाएगा ; या

(छ) संघर्ष के समय नियमित रूप से निर्मुक्त हुए बिना या छुट्टी के बिना अपने कमांडेन्ट या अन्य वरिष्ठ आफिसर को या अपने पदस्थान, गारद, पिकेट, पैट्रोल, या दल को छोड़ेगा ; या

(ज) शत्रु द्वारा पकड़े जाने पर या युद्ध बंदी बनाए जाने पर स्वेच्छा से शत्रु की सेवा या सहायता करेगा ; या

(झ) ऐसे शत्रु को, जो बंदी नहीं है, जानते हुए संश्रय देगा या उसका संरक्षण करेगा ; या

(ञ) शत्रु के विरुद्ध सक्रिय कार्रवाई के समय या अलार्म के समय संतरी होते हुए अपने पदस्थान पर सो जाएगा या नशे में होगा ; या

(ट) जानते हुए कोई ऐसा कार्य करेगा जो बल की या भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायु सेना बलों की या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों की या ऐसे बलों के किसी भाग की सफलता को संकट में डालने के लिए प्रकल्पित हो,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर मृत्यु दंड का या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है,                            भागी होगा ।

15. शत्रु से संबंधित अपराध, जो मृत्यु से दंडनीय नहीं है-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) सम्यक् पूर्वावधानी के अभाव से या आदेशों की अवज्ञा या कर्तव्य की जानबूझकर उपेक्षा के कारण बंदी बना लिया जाएगा या शत्रु द्वारा पकड़ लिया जाएगा या बंदी बना लिए जाने पर या इस प्रकार पकड़े जाने पर उस समय, जब वह अपनी सेवा पर वापस आ जाने में समर्थ है, ऐसा करने में असफल रहेगा ; या      

(ख) सम्यक् प्राधिकार के बिना शत्रु के साथ या ऐसे व्यक्ति के साथ, जो शत्रु के मिला हुआ है, वार्ताचार करेगा या उसको आसूचना देगा या ऐसे किसी वार्ताचार या आसूचना का ज्ञान प्राप्त होने पर उसे तुरंत अपने कमांडेंट या अन्य वरिष्ठ आफिसर को बताने का जानबूझकर लोप करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

16. अन्य समयों की अपेक्षा सक्रिय ड्यूटी के समय अधिक कठोरता से दंडनीय अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) किसी संरक्षण गारद का अतिक्रमण करेगा या किसी संतरी का अतिक्रमण करेगा, उस पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा ; या   

(ख) लूट-पाट की तलाश में किसी गृह या अन्य स्थान में अनधिकृत प्रवेश करेगा ; या

(ग) संतरी होते हुए अपने पदस्थान पर सो जाएगा या नशे में होगा ; या

(घ) अपने वरिष्ठ आफिसर के आदेशों के बिना अपनी गारद, पिकेट, पैट्रोल या पदस्थान को छोडे़गा ; या

(ङ) कैंप, या क्वार्टरों में मिथ्या अलार्म साशय या उपेक्षा से कारित करेगा, या ऐसी रिपोर्ट जो अनावश्यक अलार्म या नैराश्य पैदा करने के लिए प्रकल्पित हो, फैलाएगा या फैलवाएगा ; या

(च) पैरोल, संकेत-शब्द या प्रतिसंकेत किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसे जानने का हकदार नहीं है, बताएगा या जो पैरोल, संकेत-शब्द या प्रतिसंकेत उसे बताया गया है उससे भिन्न पैरोल, संकेत-शब्द या प्रतिसंकेत जानते हुए देगा,

                तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर, -

(अ) उस दशा में जबकि वह ऐसा कोई अपराध सक्रिय ड्यूटी पर रहते हुए करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा, और  

(आ) उस दशा में जबकि वह ऐसा कोई अपराध सक्रिय ड्यूटी पर न रहते हुए करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

17. विद्रोह-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) बल में या भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायुसेना बलों में या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों में विद्रोह आरंभ करेगा, उद्दीप्त करेगा, कारित करेगा या कारित करने के लिए किन्हीं अन्य व्यक्तियों के साथ षड्यंत्र करेगा ; या

(ख) ऐसे किसी विद्रोह में सम्मिलित होगा ; या

(ग) ऐसे किसी विद्रोह में उपथित होते हुए, उसे दबाने के लिए अपने अधिकतम प्रयास नहीं करेगा ; या

(घ) यह जानते हुए या इस बात का विश्वास करने का कारण रखते हुए कि ऐसा कोई विद्रोह या ऐसा विद्रोह करने का आशय या ऐसा कोई षड्यंत्र अस्तित्व में है, उसकी इत्तिला अपने कमांडेंट या अन्य वरिष्ठ आफिसर को अविलंब नहीं         देगा ; या

(ङ) बल के या भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायुसेना बलों के या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों के किसी व्यक्ति को उसके कर्तव्य से या संघ के प्रति उसकी राजनिष्ठा से विचलित करने का प्रयास करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर मृत्युदंड का या ऐसे लघुत्तर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

18. अभित्यजन करना और अभित्यजन में सहायता करना-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, सेवा का अभित्यजन करेगा या करने का प्रयत्न करेगा, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर-

(क) उस दशा में जबकि वह ऐसा अपराध सक्रिय ड्यूटी पर करेगा या सक्रिय ड्यूटी पर जाने के आदेश के अधीन होते हुए करेगा, मृत्यु दंड का या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और

(ख) उस दशा में जबकि वह ऐसा अपराध किन्हीं अन्य परिस्थितियों में करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, जानबूझकर ऐसे किसी अभित्यजक को संश्रय देगा, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

(3) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे किसी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी अभित्यजन का या अभित्यजन के प्रयत्न का संज्ञान रखते हुए तत्काल अपने या किसी अन्य वरिष्ठ आफिसर को सूचना नहीं देगा या ऐसे व्यक्ति को पकड़वाने के लिए अपनी शक्ति में की कोई कार्रवाई नहीं करेगा, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

19. छुट्टी के बिना अनुपस्थिति-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) छुट्टी के बिना अपने को अनुपस्थित रखेगा ; या

(ख) अपने को अनुदत्त छुट्टी के उपरांत पर्याप्त हेतुक के बिना  अनुपस्थित रहेगा ; या

(ग) अनुपस्थिति-छुट्टी पर होते हुए और समुचित प्राधिकारी से यह इत्तिला मिलने पर कि किसी बटालियन या बटालियन के प्रभाग को या बल के किसी अन्य यूनिट को जिसका वह अंग है, सक्रिय ड्यूटी पर जाने का आदेश दे दिया गया है, काम पर अविलंब वापस आने में पर्याप्त हेतुक के बिना असफल रहेगा ; या

(घ) परेड में या अभ्यास या ड्यूटी के लिए नियुक्त स्थान पर नियत समय पर हाजिर होने में पर्याप्त हेतुक के बिना असफल रहेगा ; या

(ङ) उस दौरान जब वह परेड में या प्रगमन पथ पर है, पर्याप्त हेतुक के बिना या अपने वरिष्ठ आफिसर से इजाजत लिए बिना परेड या प्रगमन पथ छोड़ेगा ; या

(च) जब वह कैंप में या अन्यत्र है, तब किसी साधारण, स्थानीय या अन्य आदेश द्वारा नियत किन्हीं परिसीमाओं के परे या किसी प्रतिषिद्ध स्थान में, पास के बिना या अपने वरिष्ठ आफिसर की लिखित इजाजत के बिना पाया जाएगा ; या

(छ) जब उसे किसी स्कूल में हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से आदेश दिया गया है तब अपने वरिष्ठ  आफिसर की इजाजत के बिना या सम्यक् हेतुक के बिना अपने को उससे अनुपस्थित रखेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुत्तर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

20. वरिष्ठ आफिसरों पर आघात करना या उन्हें धमकी देना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) अपने वरिष्ठ आफिसर पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा, या

(ख) ऐसे आफिसर के प्रति धमकी भरी भाषा का प्रयोग करेगा, या

                                (ग) ऐसे आफिसर के प्रति अनधीनता द्योतक भाषा का प्रयोग करेगा,

तो वह सुरक्षा बल का न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर-

                (अ) उस दशा में जबकि ऐसा आफिसर उस समय अपना पद निष्पादन कर रहा है या उस दशा में जबकि अपराध सक्रिय ड्यूटी पर किया जाता है, कारावास का जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और

                (आ) अन्य दशाओं में, कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा :

परन्तु खंड (ग) में विनिर्दिष्ट अपराध की दशा में कारावास पांच वर्ष से अधिक का नहीं होगा ।

                21. वरिष्ठ आफिसर की अवज्ञा-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा अपने पद के निष्पादन में स्वयं दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की, चाहे वह मौखिक रूप से या लिखकर या संकेत द्वारा या अन्यथा दिया गया हो, ऐसी रीति से अवज्ञा करेगा, जिससे प्राधिकार का जानबूझकर किया गया तिरस्कार दर्शित होता है, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा करेगा, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर-

(क) उस दशा में जबकि वह ऐसा अपराध सक्रिय ड्यूटी पर करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ;

(ख) उस दशा में जबकि वह ऐसा अपराध सक्रिय ड्यूटी पर न रहते हुए करेगा, कारावास का, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

22. अनधीनता और बाधा-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) किसी झगडे़, दंगे या उपद्रव में संपृक्त होते हुए, किसी ऐसे आफिसर की, भले ही वह निम्नतर रैंक का हो, जो उनकी गिरफ्तारी का आदेश देता है, आज्ञा का पालन करने से इन्कार करेगा या ऐसे किसी आफिसर पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा ; या

(ख) किसी ऐसे व्यक्ति पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा, जिसकी अभिरक्षा में उसे विधिपूर्वक रखा गया है, चाहे वह व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन है या नहीं है और चाहे वह उसका वरिष्ठ आफिसर है या नहीं है ; या

(ग) ऐसे अनुरक्षक का प्रतिरोध करेगा जिसका कर्तव्य उसे पकड़ना या अपने भारसाधन में लेना है ; या

(घ) बैरकों, कैंप या क्वार्टरों से अनधिकृत रूप से निकलेगा ; या

(ङ) किसी साधारण, स्थानीय या अन्य आदेश के पालन की उपेक्षा करेगा ; या

(च) धारा 63 में निर्दिष्ट बल की पुलिस के या उसकी ओर से विधिपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के समक्ष अड़चन डालेगा या बल की पुलिस या उसकी ओर से विधिपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के कर्तव्य निष्पादन में उसकी सहायता की अपेक्षा किए जाने पर उससे इंकार करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि उन अपराधों की दशा में, जो खंड (घ) और (ङ) में विनिर्दिष्ट हैं, दो वर्ष तक की, और उन अपराधों की दशा में, जो अन्य खंडों में विनिर्दिष्ट हैं, दस वर्ष तक की हो सकेगी या इन दोनों दशाओं में किसी दशा में से ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

23. अभ्यावेशन के समय मिथ्या उत्तर देना-यदि किसी व्यक्ति के बारे में, जो इस अधिनियम के अधीन हो गया है, यह पता चलता है कि उसने अपने अभ्यावेशन के समय अभ्यावेशन के लिए विहित प्ररूप में दिए गए किसी ऐसे प्रश्न का मिथ्या उत्तर जानबूझकर दिया था जो अभ्यावेशन करने वाले उस आफिसर ने उससे पूछा था जिसके समक्ष वह अभ्यावेशन के प्रयोजन के लिए हाजिर हुआ था, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

24. कलंकास्पद आचरण के कुछ प्रकार-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

                (क) क्रूर, अशिष्ट या अप्राकृतिक प्रकार के किसी कलंकास्पद आचरण का दोषी होगा ; या

(ख) कर्तव्य से बचने के लिए रोगी बन जाएगा या अपने में रोग या अंगशैथिल्य का ढोंग करेगा या अपने में उसे उत्पन्न करेगा या निरोग होने में साशय विलंब करेगा या अपने रोग या अंगशैथिल्य को गुरुतर बनाएगा ; या

(ग) अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को सेवा के अयोग्य बनाने के आशय से अपने आपको या उस व्यक्ति को स्वेच्छा से उपहति कारित करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

25. अधीनस्थ के साथ बुरा बर्ताव करना-कोई आफिसर, अधीनस्थ आफिसर, या अवर आफिसर, जो किसी ऐसे व्यक्ति पर जो रैंक या पद में उसके अधीनस्थ है और जो इस अधिनियम के अधीन है, आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या उसके साथ अन्यथा बुरा बर्ताव करेगा, सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा । 

26. मत्तता-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, मत्तता की हालत में पाया जाएगा, चाहे वह ड्यूटी पर है या नहीं, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

27. अभिरक्षा में से किसी व्यक्ति को निकल भागने देना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) उस दौरान, जब वह किसी गारद, पिकेट, पैट्रोल, या चौकी का समादेशक है, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसके भारसाधन में सुपुर्द किया गया है, उचित प्राधिकार के बिना, चाहे जानबूझकर या युक्तियुक्त प्रतियुक्त प्रतिहेतु के बिना, निर्मुक्त करेगा या किसी बंदी का ऐसे सुपुर्द किए गए व्यक्ति को लेने से इंकार करेगा ; या

(ख) ऐसे व्यक्ति को, जो उसके भारसाधन में सुपुर्द किया गया है या जिसे रखना या जिस पर पहरा रखना उसका कर्तव्य है, जानबूझकर या युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना निकल भागने देगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा, और उस दशा में जबकि उसने जानबूझकर कार्य नहीं किया है, कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

28. गिरफ्तारी या परिरोध के संबंध में अनियमितता- यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) किसी गिरफ्तार या परिरुद्ध व्यक्ति को विचारण के लिए लाए बिना आनावश्यक रूप से निरुद्ध रखेगा या उसका मामला अन्वेषण के लिए उचित प्राधिकारी के समक्ष लाने में असफल रहेगा ; या

(ख) किसी व्यक्ति को बल की अभिरक्षा के लिए सुपुर्द करके, ऐसी सुपुर्दगी के समय या यथासाध्य शीघ्र और किसी भी दशा में तत्पश्चात् अड़तालीस घंटों के अंदर उस आफिसर या अन्य व्यक्ति को जिसकी अभिरक्षा में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को सुपुर्द किया गया है, उस अपराध का जिसका कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति पर आरोप है, लिखित और स्वहस्ताक्षरित वृत्तान्त परिदत्त करनें में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहेगा, 

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

29. अभिरक्षा से निकल भागना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, विधिपूर्ण अभिरक्षा में होते हुए निकल भागेगा या निकल भागने का प्रयत्न करेगा, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

30. संपत्ति संबंधी अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) सरकार की या किसी बल की मैस, बैंड या संस्था की या ऐसे किसी व्यक्ति की, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी संपत्ति की चोरी करेगा ; या

(ख) ऐसी किसी संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग करेगा या उसको अपने उपयोग के लिए संपरिवर्तित करेगा ; या

(ग) ऐसी किसी संपत्ति की बाबत आपराधिक न्यास-भंग करेगा ; या

(घ) ऐसी किसी संपत्ति को, जिसकी बाबत खंड (क), (ख) और (ग) के अधीन अपराधों में से कोई अपराध किया गया है, यह जानते हुए, या विश्वास करने का कारण रखते हुए कि ऐसा अपराध किया गया है, बेईमानी से प्राप्त करेगा या रखे रहेगा ; या

(ङ) सरकार की किसी संपत्ति को, जो उसे सौंपी गई है, जानबूझकर नष्ट करेगा या उसको क्षति पहुंचाएगा ; या

(च) कपट-वंचन करने के या किसी व्यक्ति को सदोष अभिलाभ या किसी अन्य व्यक्ति को सदोष हानि पहुंचाने के आशय से कोई अन्य बात करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

31. उद्दापन और भ्रष्टाचार-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

                (क) उद्दापन करेगा ; या

                (ख) उचित प्राधिकार के बिना किसी व्यक्ति से धन, रसद या सेवा का आहरण करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

32. उपस्कर गायब कर देना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) किन्हीं आयुधों, गोलाबारूद, उपस्कर, उपकरणों, औजारों, कपड़ों या किसी अन्य वस्तु को, जो सरकार की सम्पत्ति होते हुए उसे अपने उपयोग के लिए दी गई है या उसे सौंपी गई है, गायब कर देगा या गायब कर देने में संपृक्त         होगा ; या

(ख) खंड (क) में वर्णित किसी वस्तु को अपेक्षा से गंवा देगा ; या

(घ) अपने को अनुदत्त किसी पदक या अलंकरण को बेचेगा, गिरवी रखेगा, नष्ट करेगा, या विरूपित करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि खंड (क) में विनिर्दिष्ट अपराधों की दशा में दस वर्ष तक की और अन्य खंडों में विनिर्दिष्ट अपराधों की दशा में पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या इन दोनों दशाओं में से किसी दशा में ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

33. संपत्ति को क्षति-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध            करेगा, अर्थात् :-

(क) धारा 32 के खंड (क) में वर्णित कोई संपत्ति या किसी बल के मैस, बैंड या संस्था की या किसी ऐसे व्यक्ति की, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई संपत्ति नष्ट करेगा या उसको क्षति पहुंचाएगा ; या

(ख) कोई ऐसा कार्य करेगा जिसके कारण अग्नि से सरकार की किसी संपत्ति को नुकसान होता है या वह नष्ट होती है ; या

(ग) अपने को सौंपे गए किसी जीवजन्तु को मार देगा, क्षति पहुंचाएगा, गायब कर देगा, या उससे बुरा बर्ताव करेगा या उसे गंवा देगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में, जिसमें उसने जानबूझकर ऐसे कार्य किया है कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा, और उस दशा में, जब कि उसने युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना ऐसा कार्य किया है, कारावास का जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

34. मिथ्या अभियोग लगाना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई मिथ्या अभियोग यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाएगा कि यह अभियोग मिथ्या है ; या

(ख) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई परिवाद करने में कोई ऐसा कथन, जिससे ऐसे व्यक्ति के चरित्र पर प्रभाव पड़ता है, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि ऐसा कथन मिथ्या है या जानते हुए और जानबूझकर किसी तात्विक तथ्य को छिपाएगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

35. शासकीय दस्तावेजों का मिथ्याकरण तथा मिथ्या घोषणाएं करना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) अपने द्वारा तैयार की गई या हस्ताक्षरित किसी ऐसी रिपोर्ट, विवरणी, सूची, प्रमाणपत्र, पुस्तक या अन्य दस्तावेज में या उसकी विषय-वस्तु में जिसकी यथार्थता अभिनिश्चित करना उसका कर्तव्य है, जानते हुए कोई मिथ्या या कपटपूर्ण कथन करेगा या करने में संसर्गी होगा ; या

(ख) कपट-वंचन करने के आशय से, खंड (क) में वर्णित प्रकार की किसी दस्तावेज में, जानते हुए कोई लोप करेगा या करने में संसर्गी होगा ; या

(ग) यह जानते हुए और किसी व्यक्ति की क्षति करने के आशय से या जानते हुए और कपट-वंचन करने के आशय से किसी ऐसी दस्तावेज को, जिसे परिरक्षित रखना या प्रस्तुत करना उसका कर्तव्य है, छिपा लेगा, विरूपित करेगा, परिवर्तित करेगा या उसे लेकर भाग जाएगा ; या

(घ) जहां किसी बात के बारे में घोषणा करना उसका पदीय कर्तव्य है वहां जानते हुए मिथ्या घोषणा करेगा ; या

(ङ) ऐसे कथन से, जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का उसे या तो ज्ञान है या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है अथवा किसी पुस्तक या अभिलेख में कोई मिथ्या प्रविष्टि करके या उसमें की मिथ्या प्रविष्टि का उपयोग करके, अथवा मिथ्या कथन अंतर्विष्ट करने वाली कोई दस्तावेज बनाकर अथवा कोई सही प्रविष्टि करने में या सही कथन अंतर्विष्ट करने वाली दस्तावेज बनाने में लोप करके, अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई पेंशन, भत्ता या अन्य फायदा या विशेषाधिकार अभिप्राप्त करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

36. रिक्त स्थान छोड़कर हस्ताक्षर करना और रिपोर्ट देने में असफल रहना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) वेतन, आयुध, गोलाबारूद, उपस्कर, कपडे़, प्रदाय या सामान से या सरकार की किसी संपत्ति से सम्बद्ध ऐसी किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करते समय किसी तात्विक भाग को, जिसके लिए उसका हस्ताक्षर प्रमाणक है, कपटपूर्वक रिक्त छोड़ देगा ; या

(ख) ऐसी रिपोर्ट या विवरणी देने या भेजने से, जिसका देना या भेजना उसका कर्तव्य है, इंकार करेगा या ऐसा करने का लोप आपराधिक उपेक्षा से करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

37. सुरक्षा बल न्यायालययों के संबंध में अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) किसी सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष साक्षी के रूप में हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से समन या आदिष्ट किए जाने पर हाजिर होने में जानबूझकर या उचित प्रतिहेतु के बिना व्यतिक्रम करेगा ; या

(ख) ऐसी कोई शपथ लेने या प्रतिज्ञान करने से इंकार करेगा जिसके लिए जाने या किए जाने की सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा वैध रूप से अपेक्षा की गई है ; या

(ग) अपनी शक्ति या नियंत्रण में की ऐसी कोई दस्तावेज पेश या परिदत्त करने से इंकार करेगा जिसे पेश या परिदत्त किए जाने की सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा वैध रूप से अपेक्षा की गई है ; या

(घ) जब वह साक्षी है तब किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने से इंकार करेगा जिसका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा आबद्ध है ; या

(ङ) सुरक्षा बल न्यायालयय के लिए अपमानजनक या धमकी भरी भाषा का प्रयोग करके, या उसकी कार्यवाहियों में कोई विघ्न या विक्षोभ कारित करके उस न्यायालयय के अवमान का दोषी होगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

38. मिथ्या साक्ष्य-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षा बल न्यायालयय या अन्य ऐसे अधिकरण के समक्ष, जो शपथ दिलाने या प्रतिज्ञान कराने के लिए इस अधिनियम के अधीन सक्षम है, सम्यक् रूप से शपथ लेकर या प्रतिज्ञान करके कोई ऐसा कथन करेगा जो मिथ्या है, और जिसके मिथ्या होने का उसे या तो ज्ञान या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा । 

39. वेतन का विधिविरुद्धतया रोका जाना-कोई आफिसर, अधीनस्थ आफिसर या अवर आफिसर, जो ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, वेतन प्राप्त करके, उसके शोध्य होने पर उसे विधिविरुद्धतया रोक रखेगा या देने से इंकार करेगा, वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

40. सुव्यवस्था और अनुशासन का अतिक्रमण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है बल की सुव्यवस्था और अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले ऐसे कार्य या लोप का दोषी होगा जो इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट नहीं है तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय का दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

41. प्रकीर्ण अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई भी अपराध   करेगा, अर्थात् :-

(क) किसी चौकी पर या प्रगमन पर समादेशन करते हुए और यदि परिवाद प्राप्त करने पर कि उसके समादेश के अधीन के किसी व्यक्ति ने किसी व्यक्ति को पीटा है या उसके साथ अन्यथा बुरा बर्ताव किया है या उसे सताया है या किसी मेले या बाजार में विघ्न डाला है या कोई बल्वा या अतिचार किया है, क्षतिग्रस्त व्यक्ति की हानि की सम्यक् पूर्ति कराने या मामले की रिपोर्ट उचित प्राधिकारी से करने में असफल रहेगा ; या

(ख) पूजा के किसी स्थान को अपवित्र करके या अन्यथा किसी व्यक्ति के धर्म का साशय अपमान करेगा या उसकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाएगा ; या

(ग) आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध के किए जाने की दशा में कोई कार्य करेगा ; या

(घ) अधीनस्थ आफिसर के रैंक से नीचे का होते हुए, जब वह ड्यूटी पर न हो, तब कैंप में या उसके आसपास अथवा किसी नगर या बाजार में या उसके आसपास या किसी नगर या बाजार को जाते हुए, या उससे वापस आते हुए, कोई राइफल, तलवार या अन्य आक्रामक शस्त्र उचित प्राधिकार के बिना ले जाते हुए देखा जाएगा ; या

(ङ) किसी व्यक्ति के अभ्यावेशन या सेवा में किसी व्यक्ति के लिए अनुपस्थित छुट्टी, प्रोन्नति या कोई अन्य फायदा या अनुग्रह प्राप्त कराने के हेतु या इनाम के रूप में कोई परितोषण अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः प्रतिगृहीत करेगा या अभिप्राप्त करेगा या प्रतिगृहीत करने के लिए सहमत होगा या अभिप्राप्त करने का प्रयत्न करेगा ; या

(च) उस देश के, जिसमें वह सेवा कर रहा है, किसी वासी या निवासी की संपत्ति या उसके शरीर के विरुद्ध कोई अपराध करेगा,

तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

42. प्रयत्न-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 14 से धारा 41 तक में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध के किए जाने की दिशा में कोई कार्य करेगा, उस दशा में जब कि ऐसे प्रयत्न के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध नहीं किया गया है, सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर :-

(क) यदि प्रयतित अपराध मृत्यु से दंडनीय है तो कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और

(ख) यदि प्रयतित अपराध कारावास से दंडनीय है तो कारावास का, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

43. किए गए अपराधों का दुष्प्रेरण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 14 से धारा 41 तक में (जिसमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जबकि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, उस अपराध के लिए उपबंधित दंड का या ऐसे लुघतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

44. मृत्यु से दंडनीय ऐसे अपराधों का दुष्प्रेरण जो नहीं किए गए हैं-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 14, धारा 17 और धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन मृत्यु से दंडनीय किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जबकि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण को दंडित करने के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, कारावास का, जिसकी, अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा । 

45. कारावास से दंडनीय ऐसे अपराधों का दुष्प्रेरण जो नहीं किए गए हैं-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 14 से धारा 41 तक में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट और कारावास से दंडनीय अपराधों में से किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जबकि वह अपराध ऐसे दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, कारावास का, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

46. सिविल अपराध-धारा 47 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, भारत में या भारत के बाहर किसी स्थान पर कोई सिविल अपराध करेगा तो उसे इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध का दोषी समझा जाएगा और यदि उस पर वह अपराध इस धारा के अधीन आरोपित किया जाता है तो वह सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा विचारण किए जाने का और दोषसिद्धि पर निम्नलिखित रूप से दंडित किए जाने का भागी होगा, अर्थात् :- 

(क) यदि अपराध ऐसा है जो भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन मृत्यु से दण्डनीय है, तो वह किसी ऐसे दंड का, जो उस अपराध के लिए पूर्वोक्त विधि द्वारा नियत किया गया है, और ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और

(ख) किसी अन्य दशा में, वह किसी ऐसे दंड का, जो उस अपराध के लिए, भारत में प्रवृत्त विधि द्वारा नियत किया गया है, या कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

47. सिविल अपराध, जो सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा विचारणीय नहीं है-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन नहीं है, हत्या का या हत्या की कोटि में न आने वाले अपराधिक मानव वध का या ऐसे व्यक्ति से बलातसंग करने का अपराध करेगा, तो उसे इस अधिनियम के विरुद्ध किसी अपराध का दोषी तभी समझा जाएगा और सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा उसका विचारण तभी किया जाएगा जबकि वह उक्त अपराधों में से कोई अपराध -

                (क) सक्रिय ड्यूटी पर रहते समय करता है ; या

                (ख) भारत के बाहर किसी स्थान पर करता है ; या

                (ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किसी स्थान पर करता है ।

 

 

 

अध्याय 4

दंड

48. सुरक्षा बल न्यायालययों द्वारा अधिनिर्णेय दण्ड-(1) ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो           सुरक्षा बल न्यायालययों द्वारा दोषसिद्ध किए गए हैं, किए गए अपराधों के बारे में निम्नलिखित मापमान के अनुसार दंड दिए जा सकेंगे,           अर्थात् :-

(क) मृत्यु ;

(ख) कारावास, जो आजीवन या किसी अन्य लघुतर अवधि का हो सकेगा, किन्तु इसके अंतर्गत बल की अभिरक्षा में तीन मास से अनधिक अवधि का कारावास नहीं है ;

(ग) सेवा से पदच्युति ;

(घ) बल की अभिरक्षा में तीन मास से अनधिक अवधि का कारावास ;

(ङ) अवर आफिसर की दशा में, सामान्य सैनिक के रूप में या निम्नतर रैंक या श्रेणी में या उनके रैंक की सूची में किसी निम्नतर स्थान पर अवनति ;

(च) रैंक में ज्येष्ठता का समपहरण और सेवा की पूर्ण अवधि या उसके किसी भाग का इसलिए समपहरण कि उसे प्रोन्नति के प्रयोजन के लिए न गिना जाए ;

(छ) सेवा की अवधि का इसलिए समपहरण कि उसे वेतनवृद्धि, पेंशन या किसी अन्य विहित प्रयोजन के लिए न गिना जाए ;

(ज) सिविल अपराधों की बाबत जुर्माना ;

(झ) तीव्र-धिग्दंड या धिग्दंड, किन्तु अवर आफिसर के रैंक से नीचे के व्यक्तियों को नहीं ;

(ञ) सक्रिय सेवा के दौरान किए गए किसी अपराध के लिए अधिक से अधिक तीन मास की अवधि के लिए वेतन और भत्तों का समपहरण ;

(ट) सेवा से पदच्युति से दंडित व्यक्ति की दशा में वेतन और भत्तों की सब बकाया और अन्य लोक धन का समपहरण, जो ऐसी पदच्युति के समय उसको शीघ्र शोध्य हों ;

(ठ) वेतन और भत्तों का तब तक के लिए रोक दिया जाना जब तक उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति न हो जाए जो उस अपराध के कारण हुआ है जिसके लिए उसे सिद्धदोष ठहराया गया है ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक दंड उपयुक्त मापमान में अपने पूर्ववर्ती प्रत्येक दंड से कोटि में निम्नतर समझा जाएगा ।

49. सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा अधिनिर्णेय आनुकल्पिक दंड-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सुरक्षा बल न्यायालयय ऐसे किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 14 से धारा 45 तक में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी के लिए दोषसिद्ध किए जाने पर, या तो वह विशिष्ट दंड जिससे उक्त अपराध के दंडनीय होने का कथन धाराओं में है या उसके बदले में धारा 48 में दिए गए दंडों में से कोई निम्नतर मापमान का दंड, अपराध की प्रकृति और गभीरता को ध्यान में रखते हुए, अधिनिर्णित कर सकेगा ।

50. दंडों का संयोजन-सुरक्षा बल न्यायालयय के दंडादेश द्वारा, किसी अन्य दंड के अतिरिक्त या उसके बिना, धारा 48 की उपधारा (1) के खंड (ग) में विनिर्दिष्ट दंड और उस उपधारा के खंड (ङ) से खंड (ठ) तक में (जिनमें ये दोनों खंड भी सम्मिलित हैं), विनिर्दिष्ट दंडों में से कोई एक या अधिक दंड अधिनिर्णित किए जा सकेंगे । 

51. सक्रिय ड्यूटी पर दोषसिद्ध किए गए व्यक्ति को बल में रखे रखना-जब किसी अभ्यावेशित व्यक्ति को उस समय के दौरान जबकि वह सक्रिय ड्यूटी पर है, सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा पदच्युति का या पदच्युति सहित या रहित कारावास का दंडादेश दिया गया हो, तब विहित आफिसर निदेश दे सकेगा कि ऐसे व्यक्ति को सामान्य सैनिकों में सेवा करने के लिए प्रतिधृत रखा जाए और ऐसी सेवा उसके कारावास की, यदि कोई हो, अवधि के भाग के रूप में गिनी जाएगी ।

52. सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दंडित किए जाने से अन्यथा दंडित किया जाना-ऐसे व्यक्तियों द्वारा जो इस अधिनियम के अधीन हैं, किए गए अपराधों के बारे में दंड सुरक्षा बल न्यायालयय के मध्यक्षेप के बिना धारा 53 और धारा 55 में कथित रीति से भी दिए जा सकेंगे ।

53. लघु दंड-धारा 54 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई कमांडेंट या ऐसा अन्य आफिसर, जिसे केन्द्रीय सरकार की सहमति से महानिदेशक विनिर्दिष्ट करे ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो आफिसर या अधीनस्थ आफिसर नहीं है और जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति को निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड विहित विस्तार तक अधिनिर्णित कर सकेगा, अर्थात् :-

                (क) बल की अभिरक्षा में अट्ठाईस दिन तक का कारावास ;

                (ख) अट्ठाईस दिन तक का निरोध ;

                (ग) अट्ठाईस दिन तक का लाइन्स में परिरोध ;

                (घ) अतिरिक्त पहरा या ड्यूटी ;

(ङ) किसी विशेष पद से या विशेष उपलब्धियों या किसी कार्यकारी रैंक से वंचित करना या वेतन की निम्नतर श्रेणी में अवनत करना ;

(च) सुसेवा वेतन और सदाचरण वेतन का समपहरण ; 

(छ) तीव्र-धिग्दंड या धिग्दंड ;

(ज) किसी एक मास में चौदह दिन के वेतन तक का जुर्माना ;

(झ) उसके वेतन में से किसी ऐसी राशि की कटौती जो उसके द्वारा केन्द्रीय सरकार को या किसी भवन या संपत्ति को किए गए किसी व्यय, हानि, नुकसान या नाश के ऐसे प्रतिकर की पूर्ति के लिए अपेक्षित हो, जो उसके कमांडेंट द्वारा अधिनिर्णित किया जाए ।

54. धारा 53 के अधीन दंडों की परिसीमा-(1) धारा 53 के खंड (क), (ख), (ग) और (घ) में विनिर्दिष्ट दंडों में से दो या अधिक के अधिनिर्णयन की दशा में खंड (ग) या खंड (घ) में विनिर्दिष्ट दंड खंड (क) या खंड (ख) में विनिर्दिष्ट दंड के खत्म होने पर ही प्रभावशील होगा ।

(2) जब किसी व्यक्ति को उक्त खंड (क), (ख) और (ग) में विनिर्दिष्ट दंडों में से दो या अधिक दंड संयुक्ततः अधिनिर्णीत किए गए हों या तब अधिनिर्णीत किए गए हों जब वह उक्त दंडों में से एक या अधिक पहले से ही भोग रहा हो, तब उन दंडों का संपूर्ण विस्तार कुल मिलाकर बयालीस दिन से अधिक नहीं होगा ।

(3) उक्त खंड (क), (ख) और (ग) में विनिर्दिष्ट दंड किसी ऐसे व्यक्ति को अधिनिर्णीत नहीं किए जाएंगे जो अवर आफिसर के रैंक का है या जो उस अपराध को करते समय, जिसके लिए उसे दंडित किया जाता है, ऐसे रैंक का था ।

(4) धारा 53 के खंड (छ) में विनिर्दिष्ट दंड अवर आफिसर के रैंक से नीचे के किसी व्यक्ति को अधिनिर्णीत नहीं किया        जाएगा ।

55. उप महानिरीक्षकों और अन्यों द्वारा अधीनस्थ आफिसरों के रैंक के और उनसे नीचे के रैंक के व्यक्तियों को दंडित          किया जाना-(1) ऐसा आफिसर, जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है या ऐसा अन्य आफिसर जिसे केन्द्रीय सरकार की सहमति से महानिदेशक विनिर्दिष्ट करे, अधीनस्थ आफिसर के रैंक के या अधीनस्थ आफिसर के रैंक से नीचे के किसी ऐसे आफिसर के विरुद्ध, जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड दे सकेगा, अर्थात् :- 

(क) ज्येष्ठता का समपहरण, या उनमें से किसी ऐसे की दशा में जिसकी प्रोन्नति सेवाकाल की लंबाई पर निर्भर है बारह मास से अनधिक की कालावधि के सेवाकाल का इसलिए समपहरण कि वह प्रोन्नति के प्रयोजन के लिए न गिना जाए, किन्तु यह बात दंड अधिनिर्णीत किए जाने के पूर्व अभियुक्त के यह निर्वाचन करने के अधिकार के अधीन होगी कि उसका विचारण सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा किया जाए ;

(ख) तीव्र-धिग्दंड या धिग्दंड ;

(ग) वेतन और भत्तों का तब तक के लिए रोक दिया जाना जब तक कि उस साबित हुई हानि या नुकसान की प्रतिपूर्ति न हो जाए जो उस अपराध के कारण हुआ है जिसके लिए उसे दोषसिद्ध किया गया है ।

(2) ऐसे प्रत्येक मामले में, जिसमें उपधारा (1) के अधीन दंड दिया गया है, दंड देने वाला अधिकारी कार्यवाहियों की प्रमाणित सही प्रतियां विहित प्राधिकारी को विहित रीति से भेजेगा और यदि वरिष्ठ प्राधिकारी को दंड अवैध, अन्यायपूर्ण या अत्यधिक प्रतीत होता है तो वह उस दंड को रद्द, परिवर्तित या उसका परिहार कर सकेगा और ऐसा अन्य निदेश दे सकेगा, जो उस मामले की परिस्थितियों में समुचित हो ।

56. सामूहिक जुर्माने-(1) जब कभी कोई शस्त्र या शस्त्र का भाग या गोलाबारूद, जो बल की किसी यूनिट के उपस्कर का भाग है, खो जाता है या चोरी हो जाता है, तब ऐसा आफिसर, जो बटालियन के कमांडेंट के रैंक से नीचे का न हो, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे और नियमों के अधीन रहते हुए, अधीनस्थ आफिसरों, अवर आफिसरों और ऐसी यूनिट के जवानों पर या उनमें से उतनों पर, जितने उसके निर्णय में ऐसे खो जाने या चोरी के लिए उत्तरदायी ठहराए जाने चाहिएं सामूहिक जुर्माना अधिरोपित कर सकेगा ।

(2) ऐसा जुर्माना उन व्यक्तियों के, जिन पर वह पड़ता है, वेतन के प्रतिशत के रूप में, निर्धारित किया जाएगा ।

 

अध्याय 5

गिरफ्तारी तथा विचारण के पूर्व की कार्यवाहियां

57. अपराधियों की अभिरक्षा-(1) यदि किसी व्यक्ति पर, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी अपराध का आरोप है, तो उसे किसी वरिष्ठ आफिसर के आदेश से बल की अभिरक्षा में लिया जा सकेगा ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई आफिसर यह आदेश दे सकेगा कि किसी ऐसे अन्य आफिसर को, भले ही वह उच्चतर रैंक का हो, जो झगड़ा, दंगा या उपद्रव करने में लगा हो, बल की अभिरक्षा में ले लिया जाए ।

58. निरोध के संबंध में कमान आफिसर का कर्तव्य-(1) प्रत्येक कमांडेंट का यह कर्तव्य होगा कि वह इस बात की सतर्कता बरते कि जब उसके समादेशाधीन किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है तब उस व्यक्ति को आरोप का अन्वेषण किए गए बिना, उस समय के पश्चात्, जब उसको अभिरक्षा में सुपुर्द किए जाने की रिपोर्ट ऐसे आफिसर को की गई है, अड़तालीस घंटे से अधिक के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध तभी किया जाए जबकि अड़तालीस घंटे के अंदर ऐसे अन्वेषण का किया जाना लोक सेवा की दृष्टि से उसे असाध्य प्रतीत होता है, अन्यथा नहीं ।   

(2) कमांडेंट ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के मामले की, जिसे अड़तालीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध किया गया है और ऐसे निरुद्ध रखे जाने के कारणों की रिपोर्ट उस उप महानिरीक्षक को, जिसके अधीन वह सेवा कर रहा है या ऐसे अन्य आफिसर को देगा जिसको, उस व्यक्ति का जिस पर आरोप है, विचारण करने के लिए सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित करने का आवेदन किया जा सकेगा ।

(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अड़तालीस घंटों की अवधि की गणना करने में, रविवार और अन्य लोकावकाश दिन नहीं         गिने जाएंगे ।

(4) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार उस रीति और उस अवधि का उपबंध करने वाले नियम बना सकेगी जिस रीति से और जिस अवधि के लिए कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, उसके द्वारा किए गए किसी अपराध के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा विचारण लंबित रहने तक सुरक्षा बल की अभरिक्षा में लिया जा सकेगा और निरुद्ध रखा जा सकेगा ।

59. सुपुर्दगी और सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित किए जाने के बीच का अंतराल-ऐसे प्रत्येक मामले में, जिसमें कोई ऐसा व्यक्ति, जो धारा 57 में वर्णित है और सक्रिय सेवा पर नहीं है, उसके विचारण के लिए सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित किए बिना, ऐसी अभिरक्षा में आठ दिन से दीर्घतर अवधि के लिए रहता है, उसके कमांडेंट द्वारा विलंब का कारण बताने वाली एक विशेष रिपोर्ट, विहित रीति से की जाएगी और ऐसी ही रिपोर्ट हर आठ दिन के अंतरालों पर तब तक भेजी जाएगी जब तक सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित न कर लिया जाए या उस व्यक्ति को अभिरक्षा से निर्मुक्त न कर दिया जाए ।

60. सिविल प्राधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी-जब कभी कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है, किसी मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर की अधिकारिता के अंदर है तब वह मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर उस व्यक्ति के कमांडेंट द्वारा या ऐसे आफिसर द्वारा जिसे कमांडेंट ने इस निमित्त प्राधिकृत किया है हस्ताक्षरित उस भाव का लिखित आवेदन प्राप्त होने पर उस व्यक्ति के पकड़े जाने और बल की अभिरक्षा में दिए जाने में सहायता करेगा ।

61. अभित्याजकों को पकड़ना-(1) जब कभी कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन करता है, तब उस यूनिट का, जिसका वह सदस्य है, कमांडेंट ऐसे अभित्यजन की इत्तिला ऐसे सिविल प्राधिकारियों को देगा जो उसकी राय में अभित्याजक को पकड़ने में सहायता देने में समर्थ है, और तब वे प्राधिकारी उक्त अभित्याजक को पकड़ने के लिए उसी रीति से कार्रवाई करेंगे मानो वह ऐसा व्यक्ति है जिसे पकड़ने के लिए किसी मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट निकाला गया है अभित्याजक को पकड़ लिए जाने पर उसे बल की अभिरक्षा में दे देंगे ।

(2) कोई भी पुलिस आफिसर किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसके बारे में युक्तियुक्त रूप से यह विश्वास है कि वह इस अधिनियम के अधीन है और अभित्याजक है या प्राधिकार के बिना यात्रा कर रहा है, बिना वारंट गिरफ्तार कर सकेगा और उसके साथ विधि के अनुसार बर्ताव किए जाने के लिए उसे अविलंब निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष लाएगा ।

62. छुट्टी के बिना अनुपस्थित रहने की जांच-(1) जब ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, सम्यक् प्राधिकार के बिना तीस दिन की अवधिपर्यंत अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित रहा है तब एक जांच न्यायालयय यथासाध्य शीघ्र ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी रीति से नियुक्त किया जाएगा, जो विहित की जाए ; और वह न्यायालयय उस व्यक्ति की अनुपस्थिति के बारे में और उसे देख-रेख के लिए सौंपी गई सरकारी संपत्ति में या किन्हीं आयुधों, गोलाबारूद, उपस्कर, उपकरणों, कपड़ों या आवश्यक वस्तुओं में हुई कमी के, यदि कोई हो, के बारे में जांच विहित रीति से दिलाई गई शपथ या कराए गए प्रतिज्ञान पर करेगा, और यदि उसका इस तथ्य की बाबत समाधान हो जाता है कि अनुपस्थिति सम्यक् प्राधिकार या अन्य पर्याप्त हेतुक के बिना हुई है तो न्यायालयय उस अनुपस्थिति और उसकी अवधि की तथा उक्त कमी की, यदि कोई हो, घोषणा करेगा और उस यूनिट का, जिसका वह व्यक्ति अंग है, कमांडेंट उसे विहित रीति से लेखबद्ध करेगा ।

(2) यदि वह व्यक्ति, जिसे अनुपस्थित घोषित किया गया है, तत्पश्चात् न तो अभ्यर्पण करता है और न पकड़ा जाता है तो उसे इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अभित्याजक समझा जाएगा ।

63. बल के पुलिस आफिसर-(1) महानिदेशक या कोई विहित आफिसर उपधारा (2) और उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट कृत्यों का निर्वहन करने के लिए व्यक्तियों को (जिन्हें इस अधिनियम में सुरक्षा बल पुलिस कहा गया है) नियुक्त कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति के कर्तव्य हैं-किसी अपराध के लिए परिरुद्ध व्यक्तियों को अपने भारसाधन में लेना, बल में सेवा करने वाले या उससे संलग्न व्यक्तियों में, सुव्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना तथा उनके द्वारा उसका भंग किया जाना निवारित करना ।

(3) धारा 57 में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो कोई अपराध करता है या जिस पर किसी अपराध का आरोप है, विचारण के लिए किसी भी समय गिरफ्तार और निरुद्ध कर सकेगा तथा सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा या किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो धारा 53 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है, अधिनिर्णीत दंडादेश के अनुसरण में दंड को कार्यान्वित भी कर सकेगा किन्तु वह अपने प्राधिकार से कोई दंड नहीं देगा :

परन्तु किसी आफिसर को किसी अन्य आफिसर के आदेश पर ही इस प्रकार गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

अध्याय 6

सुरक्षा बल न्यायालयय

64. सुरक्षा बल न्यायालययों के प्रकार-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सुरक्षा बल न्यायालयय तीन प्रकार के होंगे,          अर्थात् :-

                (क) जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय ;

                (ख) पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय ;

                (ग) सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय ।

65. जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित करने की शक्ति-जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय केन्द्रीय सरकार द्वारा या महानिदेशक द्वारा या महानिदेशक के अधिपत्र से इस निमित्त सशक्त किए गए किसी आफिसर द्वारा संयोजित किया जा सकेगा ।

66. पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित करने की शक्ति-पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित करने की शक्ति रखने वाले आफिसर द्वारा या ऐसे किसी आफिसर के अधिपत्र से इस निमित्त सशक्त किए गए आफिसर द्वारा संयोजित किया जा सकेगा ।

67. धारा 65 और धारा 66 के अधीन निकाले गए अधिपत्रों की अंतर्वस्तुएं-धारा 65 या धारा 66 के अधीन जारी किए गए अधिपत्र में ऐसे निर्बंधन, आरक्षण या शर्तें हो सकेंगी जो उसे निकालने वाला आफिसर ठीक समझे ।

68. जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय की संरचना-जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय कम से कम पांच ऐसे आफिसरों से मिलकर बनेगा जिनमें से प्रत्येक कम से कम तीन पूरे वर्ष तक पुलिस उप अधीक्षक का पद धारण कर चुका हो और जिनमें से कम से कम चार स्थायी पुलिस उप अधीक्षक के रैंक से नीचे के न हों ।

स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 69 के प्रयोजनों के लिए पुलिस उप अधीक्षक" के अंतर्गत उससे उच्चतर रैंक का कोई पद और कोई ऐसा पद, जिसे केन्द्रीय सरकार ने अधिसूचना द्वारा उसके बराबर का पद घोषित कर दिया है तथा इस प्रकार घोषित पद से रैंक में उच्चतर कोई पद भी है ।

69. पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय की संरचना-पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय कम से कम तीन ऐसे आफिसरों से मिलकर बनेगा जिनमें से प्रत्येक कम से कम दो वर्ष तक पुलिस उप अधीक्षक का पद धारण कर चुका हो ।

70. सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय-(1) सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय सुरक्षा बल की किसी यूनिट के कमांडेंट द्वारा अधिविष्ट किया जा सकेगा और वह न्यायालयय अकेले उससे ही गठित होगा ।

(2) कार्यवाहियों में दो अन्य ऐसे व्यक्ति आरंभ से अंत तक हाजिर रहेंगे जो आफिसर या अधीनस्थ आफिसर या दोनों में से एक-एक होंगे और जिन्हें उस रूप में न तो शपथ दिलाई जाएगी और न प्रतिज्ञान कराया जाएगा ।

71. सुरक्षा बल न्यायालयय का विघटन-(1) यदि विचारण प्रारंभ होने के पश्चात् किसी सुरक्षा बल न्यायालयय में उन आफिसरों की संख्या, जिनसे मिलकर वह बना है, उस न्यूनतम संख्या से, जो इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित है, कम हो जाती है तो उसे विघटित कर दिया जाएगा । 

(2) यदि निष्कर्ष के पहले विधि आफिसर की या अभियुक्त की रुग्णता के कारण विचारण चलाते रहना असंभव हो जाता है तो सुरक्षा बल न्यायालयय को विघटित कर दिया जाएगा ।

(3) यदि उस आफिसर को जिसने सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित किया है यह प्रतीत होता है कि सेवा की अत्यावश्यकताओं या अनुशासनिक आवश्यकताओं के कारण उक्त सुरक्षा बल न्यायालयय का चालू रहना असंभव या असमीचीन हो गया है तो वह ऐसे न्यायालयय को विघटित कर सकेगा ।

(4) जहां सुरक्षा बल न्यायालयय को इस धारा के अधीन विघटित कर दिया जाता है वहां अभियुक्त का विचारण फिर से किया जा सकेगा ।

72. जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय की शक्तियां-जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय को किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे अपराध के लिए, जो उसके अधीन दंडनीय है, विचारण करने और उसके द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश पारित करने की शक्ति होगी ।

73. पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय की शक्तियां-पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय को आफिसर या अधीनस्थ आफिसर से भिन्न किसी व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे अपराध के लिए, जो उसके अधीन दंडनीय है, विचारण करने की तथा इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई ऐसा दंडादेश पारित करने की, जो मृत्यु या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास के दंडादेश से भिन्न है,           शक्ति होगी ।

74. सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय की शक्तियां-(1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी भी अपराध का विचारण कर सकेगा ।

(2) जब तुरंत कार्रवाई के लिए गंभीर कारण नहीं है और अनुशासन का अहित किए बिना अभिकथित अपराधी के विचारण के लिए उस आफिसर को निर्देश किया जा सकता है जो पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित करने के लिए सशक्त है तब सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय अधिविष्ट करने वाला आफिसर, धारा 14, धारा 17 और धारा 46 में से किसी के अधीन दंडनीय किसी भी अपराध का या सुरक्षा बल न्यायालयय अधिविष्ट करने वाले आफिसर के विरुद्ध किसी अपराध का विचारण ऐसे निर्देश के बिना नहीं करेगा ।

(3) सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय किसी ऐसे व्यक्ति का विचारण कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन है और जो न्यायालयय को अधिविष्ट करने वाले आफिसर के कमान के अधीन है, किंतु किसी आफिसर या अधीनस्थ आफिसर का विचारण नहीं            कर सकेगा ।

(4) सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय मृत्यु या उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट परिसीमा से अधिक की अवधि के कारावास के दंडादेश से भिन्न कोई भी ऐसा दंडादेश पारित कर सकेगा, जो इस अधिनियम के अधीन पारित किया जा सकता है ।

(5) उपधारा (4) में निर्दिष्ट परिसीमा, -

(क) उस दशा में एक वर्ष होगी जबकि सुरक्षा बल न्यायालयय को अधिविष्ट करने वाला आफिसर या तो पुलिस अधीक्षक का पद या कोई ऐसा पद जिसे केन्द्रीय सरकार ने अधिसूचना द्वारा उसके समान घोषित कर दिया है, कम से कम तीन वर्ष की अवधि के लिए धारण कर चुका है या उक्त पदों में से किसी से उच्चतर रैंक का पद धारण करता है ; और

(ख) किसी अन्य दशा में तीन मास की होगी ।

75. द्वितीय विचारण का प्रतिषेध-(1) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा या दंड न्यायालयय द्वारा किसी अपराध से दोषमुक्त या उसके लिए दोषसिद्ध कर दिया गया है या उसके बारे में धारा 53 या धारा 55 के अधीन कार्यवाही की गई है तब वह उसी अपराध के लिए सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा पुनःविचारण किए जाने या उक्त धाराओं के अधीन पुनःकार्यवाही किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।

(2) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा किसी अपराध से दोषमुक्त या उसके लिए दोषसिद्ध कर दिया गया है या उसके बारे में धारा 53 या धारा 55 के अधीन कार्यवाही कर दी गई है तब वह उसी अपराध के लिए या उन्हीं तथ्यों पर किसी दंड न्यायालयय द्वारा पुनःविचारण किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।

76. कुछ दशाओं में अभित्यजन के अपराध के विचारण के लिए परिसीमा काल-यदि प्रश्नगत व्यक्ति, जो आफिसर नहीं है, अपराध के किए जाने के पश्चात् बल के किसी यूनिट में अनुकरणीय रीति से सेवा निरंतर कम से कम तीन वर्ष के लिए कर चुका है तो सक्रिय ड्यूटी पर अभित्यजन से भिन्न अभित्यजन के अपराध का कोई भी विचारण प्रारंभ नहीं किया जाएगा ।

77. उस अपराधी का विचारण आदि जो इस अधिनियम के अधीन नहीं रह जाता है-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा उस समय किया गया था जब वह इस अधिनियम के अधीन था और वह ऐसे अधीन नहीं रह गया है वहां उसे बल की अभिरक्षा में ऐसे ले लिया और रखा जा सकेगा तथा ऐसे अपराध के लिए उसका ऐसे विचारण और उसे दंडित किया जा सकेगा मानो वह ऐसे अधीन बना रहा हो ।

(2) ऐसे किसी व्यक्ति का किसी अपराध के लिए विचारण तभी किया जाएगा जबकि उसका विचारण उसके इस अधिनियम के अधीन न रह जाने के पश्चात् छह मास के अंदर प्रारंभ हो जाए, अन्यथा नहीं :

परन्तु इस उपधारा की कोई भी बात अभित्यजन के अपराध के लिए या धारा 17 में वर्णित अपराधों में से किसी के लिए किसी ऐसे व्यक्ति के विचारण को न तो लागू होगी और न ऐसे किसी अपराध का विचारण करने की दंड न्यायालयय की अधिकारिता पर प्रभाव डालेगी जो ऐसे न्यायालयय द्वारा तथा सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा भी विचारणीय है ।

78. दंडादेश की अवधि के दौरान अधिनियम का लागू होना-(1) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई सुरक्षा बल न्यायालयय कारावास का दंडादेश देता है तब यह अधिनियम उसके दंडादेश की अवधि के दौरान उसे लागू होगा, भले ही उसे बल से पदच्युत कर दिया गया है या वह अन्यथा इस अधिनियम के अधीन नहीं रह गया है और उसे ऐसे रखा, हटाया या कारावासित और दंडित किया जा सकेगा मानो वह इस अधिनियम के अधीन बना रहा है ।

(2) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा मृत्यु का दंडादेश दिया जाता है, तब यह अधिनियम उसे तब तक लागू होगा जब तक कि वह दंडादेश कार्यान्वित नहीं कर दिया जाता ।

79. विचारण का स्थान-किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो इस अधिनियम के विरुद्ध कोई अपराध करता है, ऐसे अपराध के लिए किसी भी स्थान पर विचारण किया जा सकेगा और उसे दंडित किया जा सकेगा ।

80. दंड न्यायालयय और सुरक्षा बल न्यायालयय में से किसी एक का चयन-जब किसी अपराध के संबंध में दंड न्यायालयय और सुरक्षा बल न्यायालयय में से प्रत्येक को अधिकारिता है तब यह विनिश्चय करना कि कार्यवाहियां किस न्यायालयय के समक्ष संस्थित की जाएं उस महानिदेशक या महानिरीक्षक या उप महानिरीक्षक के जिसके कमान में अभियुक्त व्यक्ति सेवा कर रहा है, ऐसे अन्य आफिसर के, जो विहित किया जाए, विवेकाधीन होगा और यदि वह आफिसर यह विनिश्चय करता है कि कार्यवाहियां सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष संस्थित की जाएं तो यह निदेश देना कि अभियुक्त व्यक्ति को बल की अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाए, उसके विवेकाधीन होगा ।

81. दंड न्यायालयय की यह अपेक्षा करने की शक्ति कि अपराधी सौंपा जाए-(1) जब अधिकारिता रखने वाले दंड न्यायालयय की यह राय है कि किसी अभिकथित अपराध के बारे में कार्यवाहियां उसी के समक्ष संस्थित की जानी चाहिएं तब वह लिखित सूचना द्वारा धारा 80 में निर्दिष्ट आफिसर से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह स्वविकल्प में या तो अपराधी को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध कार्यवाही किए जाने के लिए निकटतम मजिस्ट्रेट को सौंप दे या जब तक केन्द्रीय सरकार को निदेश नहीं कर दिया जाता है तब तक के लिए कार्यवाहियों को मुल्तवी कर दे ।

(2) ऐसे प्रत्येक मामले में उक्त आफिसर या तो उस अध्यपेक्षा के अनुपालन में अपराधी को सौंप देगा या इस प्रश्न को कि कार्यवाहियां किस न्यायालयय के समक्ष संस्थित की जानी हैं, केन्द्रीय सरकार को उसके द्वारा अवधारण के लिए तत्क्षण निर्देशित करेगा और ऐसे निर्देश पर केन्द्रीय सरकार का आदेश अंतिम होगा ।

अध्याय 7

सुरक्षा बल न्यायालययों की प्रक्रिया

82. पीठासीन आफिसर-प्रत्येक जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय या पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय में ज्येष्ठ सदस्य पीठासीन आफिसर होगा । 

83. विधि आफिसर-एक विधि आफिसर या यदि ऐसा कोई आफिसर उपलब्ध नहीं है तो मुख्य विधि आफिसर या विधि आफिसर द्वारा अनुमोदित कोई आफिसर प्रत्येक जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय में हाजिर रहेगा और प्रत्येक पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय में हाजिर रह सकेगा।

84. आक्षेप-(1) जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय या पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा सभी विचारणों में, जैसे ही न्यायालयय समवेत हो वैसे ही, पीठासीन आफिसर और सदस्यों के नाम अभियुक्त को पढ़कर सुनाए जाएंगे और तब उससे यह पूछा जाएगा कि क्या वह न्यायालययासीन किसी आफिसर द्वारा अपना विचारण किए जाने पर आक्षेप करता है ।

(2) यदि अभियुक्त ऐसे किसी आफिसर के बारे में आक्षेप करता है तो उसका आक्षेप और उस पर उस आफिसर का, जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, उत्तर भी सुना और अभिलिखित किया जाएगा और न्यायालयय के बाकी आफिसर उस आक्षेप पर उस आफिसर की अनुपस्थिति में, जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, विनिश्चय करेंगे ।

(3) यदि आक्षेप मतदान करने के हकदार आफिसरों में से आधे या उससे अधिक आफिसरों के मतों से मंजूर किया जाता है तो आक्षेप मंजूर किया जाएगा और वह सदस्य जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, निवृत्त हो जाएगा और उस रिक्ति को विहित रीति       से किसी अन्य आफिसर से इस शर्त के अधीन रहते हुए भरा जाएगा कि अभियुक्त को उसके बारे में भी आक्षेप करने का वही        अधिकार होगा ।

(4) जब कोई आक्षेप नहीं किया गया है या जब आक्षेप किया गया है और वह नामंजूर कर दिया गया है या ऐसे प्रत्येक आफिसर का स्थान, जिसके बारे में सफलतापूर्वक आक्षेप किया गया है, किसी अन्य ऐसे आफिसर से भर दिया गया है जिसके बारे में कोई आक्षेप नहीं किया गया है या मंजूर नहीं किया गया है, तब न्यायालयय विचारण के लिए अग्रसर होगा ।

85. सदस्य, विधि आफिसर और साक्षी को शपथ दिलाना-(1) इसके पूर्व कि विचारण प्रारंभ हो, प्रत्येक सुरक्षा बल न्यायालयय के प्रत्येक सदस्य को और, यथास्थिति, विधि आफिसर या धारा 83 के अधीन अनुमोदित आफिसर को विहित रीति से शपथ दिलाई जाएगी या उससे प्रतिज्ञान कराया जाएगा ।  

(2) सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष साक्ष्य देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षा विहित प्ररूप में सम्यक् रूप से उसे शपथ दिलाने या उससे प्रतिज्ञान कराने के पश्चात् की जाएगी ।

(3) उपधारा (2) के उपबंध वहां लागू नहीं होंगे जहां कि साक्षी बारह वर्ष से कम आयु का बालक है और सुरक्षा बल न्यायालयय की यह राय है कि यद्यपि साक्षी सत्य बोलने के कर्तव्य को समझता है तथापि वह शपथ या प्रतिज्ञान की प्रकृति को नहीं समझता ।

86. सदस्यों द्वारा मतदान-(1) उपधारा (2) और (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सुरक्षा बल न्यायालयय का प्रत्येक विनिश्चय स्पष्ट बहुमत में पारित किया जाएगा और जहां या तो निष्कर्ष या दंडादेश के बारे में मत बराबर हैं वहां विनिश्चय अभियुक्त के पक्ष में होगा ।

(2) जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा मृत्यु दंडादेश उस न्यायालयय के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति के बिना पारित नहीं किया जाएगा ।

(3) आक्षेप या निष्कर्ष या दंडादेश के मामलों से भिन्न मामलों में पीठासीन आफिसर को निर्णायक मत देने का अधिकार  होगा ।

87. साक्ष्य के बारे में साधारण नियम-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष की सब कार्यवाहियों को लागू होगा ।

88. न्यायिक अवेक्षा-सुरक्षा बल न्यायालयय किसी ऐसी बात की न्यायिक अवेक्षा कर सकेगा जो बल के आफिसरों के रूप में सदस्यों के साधारण ज्ञान में होती है ।

89. साक्षियों को समन करना-(1) संयोजक आफिसर, सुरक्षा बल न्यायालयय का पीठासीन आफिसर या, यथास्थिति, विधि आफिसर या धारा 83 के अधीन अनुमोदित आफिसर या अभियुक्त व्यक्ति का कमांडेंट स्वहस्ताक्षरित समन द्वारा किसी व्यक्ति की, या तो साक्ष्य देने के लिए या कोई दस्तावेज या अन्य वस्तु पेश करने के लिए उस समय और स्थान पर जो समन में वर्णित किया जाए, हाजिरी की अपेक्षा कर सकेगा ।

(2) उस साक्षी की दशा में, जो इस अधिनियम के अधीन है, समन उसके कमांडेंट को भेजा जाएगा और वह आफिसर उसकी उस पर तद्नुसार तामील करेगा ।

(3) किसी अन्य साक्षी की दशा में, समन उस मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा जिसकी अधिकारिता के भीतर वह है या निवास करता है और वह मजिस्ट्रेट समन को ऐसे कार्यान्वित करेगा मानो साक्षी से उस मजिस्ट्रेट के न्यायालयय में आने की अपेक्षा की गई हो ।

(4) जब किसी साक्षी से उसके कब्जे या शक्ति में की किसी विशिष्ट दस्तावेज या अन्य वस्तु को पेश करने की अपेक्षा की जाती है तब समन में उचित प्रमितता के साथ उसका वर्णन किया जाएगा ।

90. पेश किए जाने से छूट-प्राप्त दस्तावेजें-(1) धारा 89 की कोई भी बात भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली अथवा डाक या तार प्राधिकारियों की अभिरक्षा में किसी पत्र, पोस्टकार्ड, तार या अन्य दस्तावेज को लागू होने वाली नहीं समझी जाएगी ।

(2) यदि किसी जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, उच्च न्यायालयय या सेशन न्यायालयय की राय में ऐसी अभिरक्षा में की किसी दस्तावेज की किसी सुरक्षा बल न्यायालयय के प्रयोजन के लिए आवश्यकता है तो वह मजिस्ट्रेट या न्यायालयय, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसी दस्तावेज ऐसे व्यक्ति को परिदत्त करें जिसे वह मजिस्ट्रेट या न्यायालयय           निर्दिष्ट करे ।

(3) यदि किसी अन्य मजिस्ट्रेट या किसी पुलिस आयुक्त या जिला पुलिस अधीक्षक की राय में किसी ऐसी दस्तावेज की ऐसे ही किसी प्रयोजन के लिए आवश्यकता है तो वह, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसी दस्तावेज की तलाश कराएं और उसे ऐसे किसी जिला मजिस्ट्रेट, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या उच्च न्यायालयय या सेशन न्यायालयय के आदेश होने तक रोके रखें ।

91. साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन-(1) जब कभी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा किए जा रहे विचारण के दौरान न्यायालयय को यह प्रतीत होता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि साक्षी की परीक्षा की जाए और ऐसे साक्षी की हाजिरी इतने विलंब, व्यय या असुविधा के बिना, जितना कि मामले की परिस्थतियों में अनुचित होगा, नहीं कराई जा सकती है, तब ऐसा न्यायालयय मुख्य विधि आफिसर को संबोधित कर सकेगा कि उस साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए कमीशन निकाला जाए । 

(2) तब, यदि मुख्य विधि आफिसर आवश्यक समझता है तो वह साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए किसी ऐसे जिला मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के नाम, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह साक्षी निवास करता है, कमीशन निकाल सकेगा ।

(3) वह मजिस्ट्रेट या आफिसर जिसके नाम कमीशन निकाला गया है या, यदि वह जिला मजिस्ट्रेट है तो, वह या ऐसा प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जिसे उसने इस निमित्त नियुक्त किया है, उस स्थान पर जाएगा जहां साक्षी है या साक्षी को अपने समक्ष आने के लिए समन करेगा और उसी रीति से उसका साक्ष्य लिखेगा और इस प्रयोजन के लिए उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के अधीन वारंट मामलों के विचारणों के लिए हैं ।

(4) जब साक्षी किसी जनजाति क्षेत्र में या भारत से बाहर किसी स्थान पर निवास करता है तब कमीशन उस रीति से निकाला जा सकेगा जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के अध्याय 40 में विनिर्दिष्ट है ।

92. साक्षी की कमीशन पर परीक्षा-(1) ऐसे मामले में, जिसमें धारा 91 के अधीन कमीशन निकाला गया है, अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति क्रमशः कोई ऐसे लिखित परिप्रश्न भेज सकेंगे जिन्हें न्यायालयय विवाद्यक से सुसंगत समझे और ऐसे कमीशन का निष्पादन करने वाला मजिस्ट्रेट या आफिसर ऐसे परिप्रश्नों पर साक्षी की परीक्षा करेगा ।

(2) अभियोजन और अभियुक्त व्यक्ति ऐसे मजिस्ट्रेट या आफिसर के समक्ष काउंसेल की मार्फत या, उस दशा को छोड़कर जबकि अभियुक्त व्यक्ति अभिरक्षा में है, स्वयं उपसंजात हो सकेंगे और उक्त साक्षी की, यथास्थिति, परीक्षा, प्रतिपरीक्षा और पुनःपरीक्षा कर सकेंगे ।

(3) धारा 91 के अधीन निकाले गए कमीशन के सम्यक् रूप से निष्पादित किए जाने के पश्चात्, उसे उस साक्षी के अभिसाक्ष्य सहित, जिसकी उसके अधीन परीक्षा की गई है, मुख्य विधि आफिसर को लौटा दिया जाएगा ।

(4) उपधारा (3) के अधीन लौटाए गए कमीशन और अभिसाक्ष्य की प्राप्ति पर, मुख्य विधि आफिसर उसे उस न्यायालयय को, जिसकी प्रेरणा पर वह कमीशन निकाला गया था या, यदि वह न्यायालयय विघटित कर दिया गया है तो, अभियुक्त व्यक्ति के विचारण के लिए संयोजित किसी अन्य न्यायालयय को अग्रेषित करेगा और वह कमीशन, तत्संबंधी विवरणी और अभिसाक्ष्य अभियोजक और अभियुक्त द्वारा निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे और सब न्याय संगत अपवादों के अधीन रहते हुए, मामले में या तो अभियोजक द्वारा या अभियुक्त द्वारा साक्ष्य में पढे़ जा सकेंगे और न्यायालयय की कार्यवाही के भाग होंगे ।

(5) ऐसे प्रत्येक मामले में, जिसमें धारा 91 के अधीन कमीशन निकाला गया है, विचारण ऐसे विनिर्दिष्ट समय के लिए, जो कमीशन के निष्पादन और लौटाए जाने के लिए उचित रूप से पर्याप्त हो, स्थगित किया जा सकेगा ।

93. ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि जिसका आरोप लगाया गया हो-(1) वह व्यक्ति, जिस पर अभित्यजन का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, अभित्यजन करने का प्रयत्न करने या छुट्टी के बिना अनुपस्थित होने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।

(2) वह व्यक्ति, जिस पर अभित्यजन करने का प्रयत्न करने का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, छुट्टी के बिना अनुपस्थित होने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।

(3) वह व्यक्ति, जिस पर अपराधिक बल का प्रयोग करने का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, हमले का दोषी ठहराया जा सकेगा ।

(4) वह व्यक्ति, जिस पर धमकी भरी भाषा का प्रयोग करने का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, अनधीनता द्योतक भाषा का प्रयोग करने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।

(5) वह व्यक्ति, जिस पर धारा 30 के खंड (क), (ख), (ग) और (घ) में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी एक का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, इन अपराधों में से किसी ऐसे अन्य अपराध का दोषी ठहराया जा सकेगा जिसका उस पर आरोप लगाया जा सकता है ।

(6) वह व्यक्ति, जिस पर धारा 46 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, किसी ऐसे अन्य अपराध का दोषी ठहराया जा सकेगा जिसका उसे उस दशा में दोषी ठहराया जा सकता था जब दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबन्ध लागू होते ।

(7) वह व्यक्ति, जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, अपराध के ऐसी परिस्थितियों में किए जाने का, जिनमें अधिक कठोर दंड अंतर्वलित है, सबूत न होने पर उसी अपराध के ऐसी परिस्थितियों में जिनमें कम कठोर दंड अंतर्वलित हैं, किए जाने का दोषी ठहराया जा सकेगा ।

(8) वह व्यक्ति, जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष लगाया गया है, उस अपराध के प्रयत्न का या दुष्प्रेरण का दोषी ठहराया जा सकेगा, चाहे प्रयत्न या दुष्प्रेरण का आरोप पृथक्तः न लगाया गया हो ।

94. हस्ताक्षरों के बारे में उपधारणा-इस अधिनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही में ऐसा कोई आवेदन, प्रमाणपत्र, वारंट, उत्तर या अन्य दस्तावेज, जिसका सरकार की सेवा में के किसी आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, पेश किए जाने पर उसके बारे में, जब तक तत्प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, यह उपधारणा की जाएगी कि वह उस व्यक्ति द्वारा और उस हैसियत में सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित है जिसके द्वारा और जिस हैसियत में उसका हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है ।

95. अभ्यावेशन पत्र-(1) कोई अभ्यावेशन पत्र, जो किसी अभ्यावेशन आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, इस अधिनियम के अधीन, कार्यवाहियों में इस बात का साक्ष्य होगा कि अभ्यावेशित व्यक्ति ने प्रश्नों के वही उत्तर दिए थे जिनका उसके द्वारा दिया जाना उसमें व्यपदिष्ट है । 

(2) ऐसे व्यक्ति का अभ्यावेशन उसके मूल अभ्यावेशन पत्र या उसकी ऐसी प्रतिलिपि, जो अभ्यावेशन पत्र को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होना तात्पिर्यत है, पेश करके साबित किया जा सकेगा ।

96. कुछ दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-(1) बल की किसी यूनिट में किसी व्यक्ति के सेवा में होने या ऐसी यूनिट से किसी व्यक्ति की पदच्युति या उन्मोचन के संबंध में या किसी व्यक्ति की इन परिस्थितियों के बारे में कि उसने बल की किसी यूनिट में सेवा नहीं की है या वह उसका अंग नहीं था, कोई पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज उस दशा में, जबकि उसका केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक द्वारा या उसकी ओर से या किसी विहित आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, उन तथ्यों का साक्ष्य होगा जिनका कथन उस पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज में है ।

(2) सीमा सुरक्षा बल सूची या राजपत्र, जिसका प्राधिकार से प्रकाशित होना तात्पर्यित है, उसमें वर्णित आफिसरों, अधीनस्थ आफिसरों की प्रास्थिति तथा रैंक का और उनके द्वारा धारित किसी नियुक्ति का तथा बल की उस बटालियन यूनिट या शाखा का, जिसके वे अंग हैं, साक्ष्य होगा । 

(3) जहां इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अनुसरण में या अन्यथा शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में अभिलेख किसी बटालियन पुस्तक में लेखबद्ध किया गया है और कमांडेंट द्वारा या उस आफिसर द्वारा, जिसका कर्तव्य ऐसा अभिलेख लेखबद्ध करना है, हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, वहां ऐसा अभिलेख उन तथ्यों का साक्ष्य होगा जिनका उसमें कथन किया गया है ।

(4) किसी बटालियन पुस्तक में के किसी अभिलेख की प्रतिलिपि, जो ऐसी पुस्तक को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होनी तात्पर्यित है, ऐसे अभिलेख का साक्ष्य होगी ।

(5) जहां किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के आरोप पर विचारण हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी आफिसर या ऐसे अन्य व्यक्ति की, जो इस अधिनियम के अधीन है, या बल के किसी यूनिट की अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है या उसे ऐसे आफिसर या व्यक्ति द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र जिसका, यथास्थिति, ऐसे आफिसर द्वारा या उस यूनिट के, जिसका कि वह व्यक्ति अंग है, कमांडेट द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान तथा इस बात का कथन है कि उसका पहनावा कैसा था ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।

(6) जहां किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के आरोप पर विचारण हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी ऐसे पुलिस आफिसर की, जो किसी पुलिस थाने के भारसाधक आफिसर से नीचे के रैक का नहीं है, अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है या उसे ऐसे आफिसर द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र जिसका ऐसे पुलिस आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकडे़ जाने का तथ्य, तारीख और स्थान पर इस बात का कथन है कि उसका पहनावा कैसा था, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।

(7) कोई दस्तावेज, जिसका सरकार के रासायनिक परीक्षक या सहायक रासायनिक परीक्षक द्वारा हस्ताक्षरित ऐसी रिपोर्ट होना तात्पर्यित है जो ऐसे किसी पदार्थ या चीज के बारे में है जो परीक्षा या विश्लेषण और रिपोर्ट के लिए उसे सम्यक् रूप से भेजी गई थी, इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त की जा सकेगी ।

97. अभियुक्त द्वारा सरकारी आफिसर को निर्देश-(1) यदि अभित्यजन के या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के, छुट्टी के उपरान्त अनुपस्थिति के या सेवा के लिए बुलाए जाने पर वापस न आने के लिए किए जा रहे किसी विचारण में अभियुक्त व्यक्ति अपनी अप्राधिकृत अनुपस्थिति के लिए किसी पर्याप्त या युक्तियुक्त प्रतिहेतु का कथन अपनी प्रतिरक्षा में करता है और उसके समर्थन में सरकार की सेवा में के किसी आफिसर के प्रति निर्देश करता है या यदि ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिरक्षा में उक्त कथन के किसी ऐसे आफिसर द्वारा साबित या नासाबित किए जाने की संभावना है तो न्यायालयय ऐसे आफिसर को लिखेगा और कार्यवाहियों को तब तक के लिए स्थगित कर देगा जब तक उसका उत्तर प्राप्त न हो जाए । 

(2) ऐसे निर्देशित आफिसर का लिखित उत्तर, यदि वह उसके द्वारा हस्ताक्षरित है तो, साक्ष्य में लिया जाएगा और उसका वैसा ही प्रभाव होगा मानो वह न्यायालयय के समक्ष शपथ पर दिया गया हो ।

(3) यदि ऐसे उत्तर की प्राप्ति के पूर्व न्यायालयय का विघटन हो जाता है या यदि न्यायालयय इस धारा के उपबंधों का         अनुवर्तन करने का लोप करता है तो संयोजक आफिसर कार्यवाहियों को स्वविवेकानुसार बातिल कर सकेगा और नए विचारण का आदेश दे सकेगा ।

98. पूर्व दोषसिद्धियों और साधारण शील का साक्ष्य-(1) जब किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, सुरक्षा बल न्यायालयय ने किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया है तब वह सुरक्षा बल न्यायालयय ऐसे व्यक्ति की किसी सुरक्षा बल न्यायालयय या दंड न्यायालयय द्वारा की गई पूर्व दोषसिद्धियों की धारा 53 या धारा 55 के अधीन किए गए किसी पूर्व दंड अधिनिर्णय की जांच कर सकेगा और उसका साक्ष्य प्राप्त तथा लेखबद्ध कर सकेगा और इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्ति के साधारण शील की तथा ऐसी बातों की, जो विहित की जाएं, जांच कर सकेगा और उन्हें लेखबद्ध कर सकेगा ।

(2) इस धारा के अधीन प्राप्त किया गया साक्ष्य या तो मौखिक या सुरक्षा बल न्यायालयय की पुस्तकों की या अन्य शासकीय अभिलेखों की प्रविष्टियों के रूप में या उनमें से प्रमाणिक उद्धरणों के रूप में हो सकेगा और उस व्यक्ति को, जिसका विचारण किया गया है, विचारण के पूर्व यह सूचना देना आवश्यक नहीं होगा कि उसकी पूर्व दोषसिद्धियों या शील के बारे में साक्ष्य प्राप्त किया जाएगा ।

(3) यदि सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय में विचारण करने वाला आफिसर ठीक समझता है तो वह अपराधी के विरुद्ध हुई किन्हीं पूर्व दोषसिद्धियों को, उसके साधारण शील को और ऐसी अन्य बातों को जो विहित की जाएं, इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन साबित किए जाने की अपेक्षा करने के बदले अपने ज्ञान के रूप में अभिलिखित कर सकेगा ।

99. अभियुक्त का पागलपन-(1) जब कभी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा विचारण के दौरान न्यायालयय को यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति, जिस पर आरोप है, चित्तविकृति के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है या उसने अभिकथित कार्य किया तो था किन्तु वह चित्तविकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति को जानने में या यह जानने में कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है असमर्थ था, तब न्यायालयय तद्नुसार निष्कर्ष लेखबद्ध करेगा ।

(2) न्यायालयय का पीठासीन आफिसर या, सुरक्षा बल न्यायालयय की दशा में, विचारण करने वाला आफिसर मामले की रिपोर्ट, यथास्थिति, पुष्टिकर्ता आफिसर को या उस प्राधिकारी को तत्काल करेगा जो उसके निष्कर्ष पर धारा 115 के अधीन कार्यवाही करने के लिए सशक्त हो ।   

(3) यदि पुष्टिकर्ता आफिसर जिसको मामले की रिपोर्ट उपधारा (2) के अधीन की जाती है, निष्कर्ष की पुष्टि नहीं करता है तो वह अभियुक्त व्यक्ति का, उस अपराध के लिए जिसका उस पर आरोप लगाया गया था, विचारण उसी या किसी अन्य सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा कराने के लिए कार्यवाही कर सकेगा ।

 (4) वह प्राधिकारी, जिसके सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय के निष्कर्ष की रिपोर्ट उपधारा (2) के अधीन की जाती है और पुष्टिकर्ता आफिसर, जो ऐसे मामले में, जिसकी रिपोर्ट उसको दी गई है, निष्कर्ष की पुष्टि करता है, अभियुक्त व्यक्ति को विहित रीति से अभिरक्षा में रखे जाने का आदेश देगा तथा केन्द्रीय सरकार के आदेशों के लिए मामले की रिपोर्ट करेगा ।

(5) उपधारा (4) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार अभियुक्त व्यक्ति को किसी पागलखाने में या सुरक्षित अभिरक्षा के अन्य उपयुक्त स्थान में निरुद्ध किए जाने का आदेश दे सकेगी ।

100. पागल अभियुक्त का आगे चल कर विचारण के उपयुक्त हो जाना-जहां कोई अभियुक्त व्यक्ति चित्तविकृति के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाए जाने पर धारा 99 के अधीन अभिरक्षा या निरोध में है, वहां इस निमित्त विहित कोई आफिसर-

(क) यदि ऐसा व्यक्ति धारा  99 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सीय आफिसर की इस रिपोर्ट पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है, या

(ख) यदि ऐसा व्यक्ति धारा 99 की उपधारा (5) के अधीन किसी जेल में निरुद्ध है तो कारागारों के महानिरीक्षक के इस प्रमाणपत्र पर और यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा के अधीन किसी पागलखाने में निरुद्ध है तो उस पागलखाने के परिदर्शकों में से किन्हीं दो या अधिक के इस प्रमाणपत्र पर और यदि उस उपधारा के अधीन वह किसी अन्य स्थान में  निरुद्ध है तो विहित प्राधिकारी के इस प्रमाणपत्र पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है,

उस व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए, जिसका आरोप उस पर मूलतः लगाया गया था उसी या किसी अन्य सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा या, यदि अपराध सिविल अपराध है तो, दंड न्यायालयय द्वारा कराने के लिए कार्यवाही कर सकेगा । 

101. धारा 100 के अधीन किए गए आदेशों का केंद्रीय सरकार को पारेषण-अभियुक्त के विचारण के लिए किसी आफिसर द्वारा धारा 100 के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रतिलिपि केंद्रीय सरकार को तत्काल भेज दी जाएगी ।

102. पागल अभियुक्त की निर्मुक्ति-जहां कोई व्यक्ति धारा 99 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (5) के निरोध में है वहां-

(क) यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सा आफिसर की ऐसी रिपोर्ट पर, या

(ख) यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (5) के अधीन निरोध में है तो धारा 100 के खंड (ख) में वर्णित प्राधिकारियों में से किसी ऐसे प्रमाणपत्र पर कि उस आफिसर या प्राधिकारी के विचार में उस व्यक्ति की निर्मुक्ति उसके स्वयं अपने को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने के संकट के बिना की जा सकती है,

केंद्रीय सरकार यह आदेश दे सकेगी कि ऐसे व्यक्ति को निर्मुक्त कर दिया जाए या अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाए या, यदि उसे पहले ही किसी ऐसे लोक पागलखाने में नहीं भेज दिया गया है तो, उसे ऐसे पागलखाने में भेज दिया जाए ।

103. पागल अभियुक्त का उसके नातेदारों को सौंपा जाना-जहां ऐसे व्यक्ति का, जो धारा 99 की उपधारा (4) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (5) के अधीन निरोध में है, कोई नातेदार या मित्र चाहता है कि उसे उसकी देख-रेख और अभिरक्षा में रखे जाने के लिए उसको सौंप दिया जाए, वहां केंद्रीय सरकार ऐसे नातेदार या मित्र के आवेदन पर और उस सरकार के समाधानप्रद रूप में ऐसी प्रतिभूति उसके द्वारा दिए जाने पर कि सौंपे गए व्यक्ति की समुचित देख-रेख की जाएगी और उसे स्वयं अपने को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने से निवारित रखा जाएगा तथा सौंपे गए व्यक्ति को ऐसे आफिसर के समक्ष और ऐसे समय पर और स्थान पर, जो केंद्रीय सरकार द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, निरीक्षण के लिए पेश किया जाएगा, ऐसे व्यक्ति को ऐसे नातेदार या मित्र को सौंप दिए जाने का आदेश दे सकेगी ।

104. विचारण लंबित रहने तक संपत्ति की अभिरक्षा और व्ययन के लिए आदेश-जब कोई संपत्ति, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो कोई अपराध करने के लिए उपयोग में लाई गई प्रतीत होती है, किसी सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष विचारण के दौरान पेश की जाए, तब न्यायालयय विचारण की समाप्ति होने तक के लिए ऐसी सम्पत्ति की उचित अभिरक्षा के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे और यदि संपत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है तो, ऐसा साक्ष्य जो वह आवश्यक समझे लेखबद्ध करने के पश्चात्, उसे बेच देने या अन्यथा व्ययनित करने का आदेश दे सकेगा ।    

105. जिस संपत्ति के बारे में अपराध किया गया है उसके व्ययन के लिए आदेश-(1)  किसी सुरक्षा बल न्यायालयय के समक्ष विचारण की समाप्ति के पश्चात्, वह न्यायालयय या उस सुरक्षा बल न्यायालयय के निष्कर्ष या दंडादेश की पुष्टि करने वाला आफिसर या ऐसे आफिसर से वरिष्ठ कोई प्राधिकारी या, ऐसे सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय की दशा में जिसके निष्कर्ष या दण्डादेश की पुष्टि अपेक्षित नहीं है, ऐसा आफिसर जो उस उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है जिसके कमान में विचारण किया गया था, ऐसी किसी संपत्ति या दस्तावेज को, जो उस न्यायालयय के समक्ष पेश की गई है या उसकी अभिरक्षा में है या जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो कोई अपराध करने के लिए प्रयुक्त की गई है नष्ट करके, अधिहरण करके, ऐसे किसी व्यक्ति को परिदत्त करके जो उसके कब्जे का हकदार होने का दावा करता है या अन्यथा व्ययनित करने के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे । 

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश ऐसी संपत्ति के बारे में किया गया है, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, वहां आदेश करने वाले प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित उस आदेश की प्रतिलिपि, चाहे विचारण भारत के अंदर हुआ हो या न हुआ हो, ऐसे मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी, जिसकी अधिकारिता में वह संपत्ति उस समय स्थित है और तब वह मजिस्ट्रेट उस आदेश को ऐसे कार्यान्वित कराएगा मानो वह उसके द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबंधों के अधीन पारित आदेश हो ।

(3) “इस धारा में संपत्ति" शब्द के अंतर्गत, उस संपत्ति की दशा में जिसके बारे में अपराध किया गया प्रतीत होता है, न केवल वह संपत्ति आती है जो मूलतः किसी व्यक्ति के कब्जे में या नियंत्रण में रही है, बल्कि वह सम्पत्ति भी आती है जिसमें या जिसके बदले में उसका संपरिवर्तन या विनिमय किया गया है, और वह सब कुछ आता है जो ऐसे संपरिवर्तन या विनिमय द्वारा तुरंत या अन्यथा अर्जित किया गया है ।

106. इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के संबंध में सुरक्षा बल न्यायालयय की शक्तियां-सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किया गया विचारण भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और सुरक्षा बल न्यायालयय दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 480 और 482 के अर्थ में  न्यायालयय समझा जाएगा ।

अध्याय 8

पुष्टि और पुनरीक्षण

107. निष्कर्ष और दंडादेश का तभी विधिमान्य होना जब उसकी पुष्टि कर दी जाए-किसी जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय या पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय का कोई भी निष्कर्ष या दंडादेश वहीं तक विधिमान्य होगा जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबधों के अनुसार पुष्ट कर दिया जाता है ।

108. जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय के निष्कर्ष और दंडादेश की पुष्टि करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार या कोई ऐसा आफिसर जिसे केन्द्रीय सरकार के अधिपत्र द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया है, जनरल सुरक्षा बल न्यायालययों के निष्कर्षों और दंडादेशों की पुष्टि कर सकेगा ।

109. पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय के निष्कर्ष और दंडादेश की पुष्टि करने की शक्ति-जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय को संयोजित करने की शक्ति रखने वाला आफिसर या कोई ऐसा आफिसर जो ऐसे आफिसर के अधिपत्र द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया है, पेटी सुरक्षा बल न्यायालययों के निष्कर्षों और दंडादेशों की पुष्टि कर सकेगा ।

110. पुष्टिकर्ता प्राधिकारी की शक्तियों की परिसीमा-धारा 108 या धारा 109 के अधीन निकाले गए अधिपत्र में ऐसे निर्बंधन, आरक्षण या शर्तें हो सकेंगी जो उसे निकालने वाला प्राधिकारी ठीक समझे ।

111. दंडादेशों में कमी करने, उनका परिहार करने या उनका लघुकरण करने की पुष्टिकर्ता प्राधिकारी की शक्ति-ऐसे निर्बंधनों, आरक्षणों या शर्तों के, जो धारा 108 या धारा 109 के अधीन निकाले गए किसी अधिपत्र में हों, अधीन रहते हुए पुष्टिकर्ता प्राधिकारी किसी सुरक्षा बल न्यायालयय के दंडादेश की पुष्टि करते समय उस दंड में, जो उसके द्वारा अधिनिर्णीत किया गया है, कमी कर सकेगा या उसका परिहार कर सकेगा या उस दंड को धारा 48 में अधिकथित निम्नतर मापमान के किसी दंड या किन्हीं दंडों में लघुकृत कर सकेगा ।

112. पोत के फलक पर के निष्कर्षों और दंडादेशों का पुष्ट किया जाना-जब किसी व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा उस समय विचारण किया गया है और उसे दंडादिष्ट किया गया है जबकि वह किसी पोत के फलक पर है तब निष्कर्ष और दंडादेश, जहां तक कि पोत पर उसे पुष्ट या निष्पादित न किया गया हो, ऐसी रीति से पुष्ट और निष्पादित किया जा सकेगा मानो ऐसे व्यक्ति का विचारण उसके उतरने के पतन पर किया गया हो ।

113. निष्कर्ष या दंडादेश का पुनरीक्षण-(1) सुरक्षा बल न्यायालयय का निष्कर्ष या दंडादेश जिसकी पुष्टि अपेक्षित है, पुष्टिकर्ता आफिसर के आदेश से एक बार पुनरीक्षित किया जा सकेगा और ऐसे पुनरीक्षण पर न्यायालयय, यदि वह पुष्टिकर्ता आफिसर द्वारा ऐसा करने के लिए निदेशित किया गया है तो, अतिरिक्त साक्ष्य ले सकेगा ।

(2) पुनरीक्षण पर, न्यायालयय उन्हीं आफिसरों से जो उस समय उपस्थित थे जब मूल विनिश्चय पारित किया गया था, मिलकर गठित होगा किंतु तब नहीं जबकि उन आफिसरों में से कोई अपरिवर्जनीय रूप से अनुपस्थित हो ।

(3) ऐसी अपरिवर्जनीय अनुपस्थिति की दशा में उसका हेतुक कार्यवाही में सम्यक् रूप से प्रमाणित किया जाएगा और न्यायालयय पुनरीक्षण करने के लिए अग्रसर होगा परंतु यह तब जबकि, यदि वह जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय है तो, पांच आफिसरों से या, यदि वह पेटी सुरक्षा बल न्यायालयय है तो, तीन आफिसरों से मिलकर, उस समय भी गठित हो । 

114. सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय का निष्कर्ष और दंडादेश-(1) जैसा उपधारा (2) में अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय के निष्कर्ष और दंडादेश की पुष्टि अपेक्षित नहीं होगी, बल्कि उसे तत्काल कार्यान्वित किया जा सकेगा ।

(2) यदि विचारण करने वाला आफिसर पुलिस अधीक्षक के रैंक का है या धारा 74 की उपधारा (5) के खंड (क) के अधीन उक्त रैंक के समान घोषित रैंक का है या उससे निम्नतर रैंक का है और ऐसा रैंक पांच वर्ष से कम धारण कर चुका है तो वह, सक्रिय सेवा पर के सिवाय, किसी दंडादेश को तब तक क्रियान्वित नहीं करेगा जब तक कि उस पर ऐसे आफिसर का अनुमोदन प्राप्त न हो गया हो जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है ।

115. सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालययों की कार्यवाहियों का पारेषण-प्रत्येक सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय की कार्यवाहियां उस आफिसर को, जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है और जिसके कमान में विचारण किया गया था, या विहित आफिसर को अविलंब भेजी जाएगी, और ऐसा आफिसर या महानिदेशक या उसके द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया कोई आफिसर, मामले के गुणागुण पर आधारित कारणों से, न कि केवल तकनीकी आधारों पर, कार्यवाहियों को अपास्त कर सकेगा या उस दंडादेश को किसी अन्य ऐसे दंडादेश तक घटा सकेगा जो कि वह न्यायालयय पारित कर सकता था ।

116. कुछ मामलों में निष्कर्ष या दंडादेश को परिवर्तित किया जाना-(1) जहां किसी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा दोषी होने का ऐसा निष्कर्ष, जिसकी पुष्टि हो चुकी है या जिसकी पुष्टि होनी अपेक्षित नहीं है, किसी कारण से अविधिमान्य पाया जाता है या साक्ष्य से उसका समर्थन नहीं होता है वहां वह प्राधिकारी जिसे, यदि निष्कर्ष विधिमान्य होता, दंडादेश द्वारा अधिनिर्णीत दंड को लघुकृत करने की शक्ति धारा 128 के अधीन होती, नया निष्कर्ष प्रतिस्थापित कर सकेगा और ऐसे निष्कर्ष में विनिर्दिष्ट या अंतर्वलित अपराध के लिए दंडादेश पारित कर सकेगा :

परन्तु ऐसा कोई प्रतिस्थापन तभी किया जाएगा जब सुरक्षा बल न्यायालयय उस आरोप पर ऐसा निष्कर्ष विधिमान्यतया निकाल सकता था और जब यह प्रतीत हो कि उक्त अपराध साबित करने वाले तथ्यों के बारे में सुरक्षा बल न्यायालयय का समाधान अवश्य हो जाना चाहिए था, अन्यथा नहीं ।

(2) जहां सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा पारित ऐसा दंडादेश, जिसकी पुष्टि हो चुकी है या जिसकी पुष्टि होनी अपेक्षित नहीं है, किंतु जो उपधारा (1) के अधीन प्रतिस्थापित नए निष्कर्ष के अनुसरण में पारित दंडादेश नहीं है, किसी कारण से अविधिमान्य पाया जाता है, वहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी विधिमान्य दंडादेश पारित कर सकेगा ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन पारित दंडादेश द्वारा अधिनिर्णीत दंड, दंडों के मापमान में उस दंड से उच्चतर नहीं होगा और न उस दंड से अधिक होगा जो उस दंडादेश द्वारा अधिनिर्णीत किया गया है जिसके लिए इस धारा के अधीन नया दंडादेश प्रतिस्थापित किया गया है ।

(4) इस धारा के अधीन प्रतिस्थापित कोई निष्कर्ष या पारित कोई दंडादेश इस अधिनियम और नियमों के प्रयोजनों के लिए ऐसे प्रभावी होगा मानो वह किसी सुरक्षा बल न्यायालयय का यथास्थिति, निष्कर्ष या दंडादेश हो ।

117. सुरक्षा बल न्यायालयय के आदेश, निष्कर्ष या दंडादेश के विरुद्ध उपचार-(1) कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन है और जो किसी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा पारित किसी आदेश से अपने को व्यथित समझता है, उस आफिसर या प्राधिकारी को, जो उस सुरक्षा बल न्यायालयय के किसी निष्कर्ष या दंडादेश की पुष्टि करने के लिए सशक्त है, अर्जी दे सकेगा और पुष्टिकर्ता प्राधिकारी, पारित आदेश की शुद्धता, वैधता या औचित्य के बारे में या जिस कार्यवाही से वह आदेश संबद्ध है, उसकी नियमितता के बारे में अपना समाधान करने के लिए ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जैसी आवश्यक समझी जाए ।

(2) कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो किसी सुरक्षा बल न्यायालयय के ऐसे निष्कर्ष या दंडादेश से, जिसकी पुष्टि की जा चुकी है, अपने को व्यथित समझता है, केंद्रीय सरकार, महानिदेशक या समादेश में उस आफिसर से, जिसने उस निष्कर्ष या दंडादेश की पुष्टि की है, वरिष्ठ किसी विहित आफिसर को अर्जी दे सकेगा, और यथास्थिति, केंद्रीय सरकार, महानिदेशक या विहित आफिसर उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

118. कार्यवाहियों को बातिल किया जाना-केंद्रीय सरकार, महानिदेशक या कोई विहित आफिसर किसी सुरक्षा बल न्यायालयय की कार्यवाहियों को इस आधार पर बातिल कर सकेगा कि वे अवैध या अन्यायपूर्ण हैं ।

अध्याय 9

दंडादेशों का निष्पादन, क्षमा, परिहार, आदि

119. मृत्यु दंडादेश का रूप-सुरक्षा बल न्यायालयय मृत्यु का दंडादेश अधिनिर्णीत करने में स्वविवेकानुसार निदेश देगा कि अपराधी की मृत्यु ऐसे घटित की जाए कि जब तक वह मर न जाए तब तक उसे गर्दन में फांसी लगाकर लटकाए रखा जाए या उसे गोली से मार दिया जाए ।

120. कारावास के दंडादेश का प्रारंभ-जब कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन किसी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है तब उस दंडादेश की अवधि, चाहे उसे पुनरीक्षित किया गया हो या नहीं, उस दिन प्रारंभ हुई मानी जाएगी जिस दिन मूल कार्यवाही पीठासीन आफिसर द्वारा या सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय की दशा में, उस न्यायालयय द्वारा हस्ताक्षरित की गई थी ।

121. कारावास के दंडादेश का निष्पादन-(1) जब कभी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा इस अधिनियम के अधीन कारावास का कोई दंडादेश पारित किया जाता है या जब कभी मृत्यु के दंडादेश को कारावास के रूप में लघुकृत किया जाता है तब पुष्टिकर्ता आफिसर या सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय की दशा में न्यायालयय अधिविष्ट करने वाला आफिसर या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, उपधारा (3) और (4) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसे छोड़कर, यह निदेश देगा कि दंडादेश किसी सिविल कारागार में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा ।

(2) जब उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया गया है, तब दंडादिष्ट व्यक्ति का कमांडेंट या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को, जिसमें ऐसे व्यक्ति को परिरोध में रखा जाना है, विहित प्ररूप में अधिपत्र भेजेगा और अधिपत्र के साथ उसे उस कारागार को भेजने की व्यवस्था करेगा ।

(3) अधिक से अधिक तीन मास की अवधि के और सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा इस अधिनियम के अधीन पारित कारावास के दंडादेश की दशा में, उपधारा (1) के अधीन समुचित आफिसर निदेश दे सकेगा कि दंडादेश किसी सिविल कारागार के बजाय सुरक्षा बल की अभिरक्षा में परिरोध करके कार्यान्वित किया जाए ।

(4) सक्रिय ड्यूटी पर की दशा में, कारावास का दंडादेश ऐसे स्थान में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जा सकेगा जिसे वह उप महानिरीक्षक जिसके कमान में दंडाविष्ट व्यक्ति सेवारत है या कोई विहित आफिसर समय-समय पर नियुक्त करे ।

 [121क. किसी व्यक्ति द्वारा भोगी गई अभिरक्षा की अवधि का कारावास के प्रति मुजरा किया जाना-जब इस अधिनियम के अधीन कोई व्यक्ति, सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा किसी अवधि के कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है, जो जुर्माने के संदाय में व्यतिक्रम के लिए कारावास नहीं है, तो उसी मामले के अन्वेषण, जांच या विचारण के दौरान और ऐसे दंडादेश की तारीख के पहले, उसके द्वारा सिविल या बल अभिरक्षा में बिताई गई अवधि का उस पर अधिरोपित कारावास की अवधि के प्रति मुजरा किया जाएगा और ऐसे दंडादेश पर उस व्यक्ति का कारावास भुगतने का दायित्व उस पर अधिरोपित कारावास की अवधि के शेष भाग तक, यदि कोई हो, निर्बंधित होगा ।ट

122. अपराधी की अस्थायी अभिरक्षा-जहां यह निदेश दिया गया है कि कारावास का दंडादेश सिविल कारागार में भोगा जाए, वहां अपराधी को उस समय तक, जब तक कि उसे किसी सिविल कारागार में भेजना संभव नहीं है बल की अभिरक्षा में या किसी अन्य उचित स्थान में रखा जा सकेगा ।

123. विशेष दशाओं में कारावास के दंडादेश का निष्पादन-जब कभी किसी ऐसे आफिसर की राय में, जो उस उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है जिसके कमान में विचारण किया गया है, कारावास का कोई दंडादेश या कारावास के दंडादेश का कोई प्रभाग विशेष कारणों से धारा 121 के उपबंधों के अनुसार बल की अभिरक्षा में सुविधापूर्वक कार्यान्वित नहीं किया जा सकता तब वह आफिसर निदेश दे सकेगा कि वह दंडादेश या उस दंडादेश का वह प्रभाव किसी सिविल कारागार या अन्य उचित स्थान में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जाए ।

124. बंदी को एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाना-जो व्यक्ति कारावास के दंडादेश के अधीन है, वह एक स्थान से दूसरे स्थान को अपने ले जाए जाने के दौरान या जब वह पोत या वायुयान के फलक पर या अन्यथा है, ऐसे अवरोध के अधीन होगा जो उसके सुरक्षित रूप से ले जाए जाने और वहां से हटाए जाने के लिए आवश्यक है ।

125. कुछ आदेशों का कारागार आफिसरों को संसूचित किया जाना-जब कभी ऐसे दंडादेश, आदेश या अधिपत्र को, जिसके अधीन कोई व्यक्ति सिविल कारागार में परिरुद्ध है, अपास्त करने या उसमें फेरफार करने का कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से किया जाता है तब ऐसे आदेश के अनुसार एक अधिपत्र ऐसा आदेश करने वाले आफिसर या उसके स्टाफ आफिसर या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जो विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को भेजा जाएगा जिसमें वह व्यक्ति परिरुद्ध है ।

126. जुर्माने के दंडादेश का निष्पादन-जब सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा धारा 46 के अधीन जुर्माने का दंडादेश अधिरोपित किया जाता है तब ऐसे दंडादेश की पुष्टिकर्ता आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित एक प्रति भारत में किसी मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी और वह मजिस्ट्रेट उस जुर्माने को दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबंधों के अनुसार ऐसे वसूल कराएगा मानो वह उस मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित जुर्माने का दंडादेश है ।

127. आदेश या अधिपत्र में अप्ररूपिता या गलती-जब कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है और वह उस दंडादेश को किसी ऐसे स्थान या रीति में भोग रहा है, जिसमें कि वह इस अधिनियम के अनुसरण में किसी विधिपूर्ण आदेश या अधिपत्र के अधीन परिरुद्ध किया जा सकता है, तब ऐसे व्यक्ति का परिरोध केवल इस कारण अवैध नहीं समझा जाएगा कि उस आदेश, अधिपत्र या अन्य दस्तावेज या उस प्राधिकार में या उसके संबंध में जिसके द्वारा या जिसके अनुसरण में वह व्यक्ति ऐसे स्थान में लाया गया था या परिरुद्ध है, कोई अप्ररूपिता या गलती है और ऐसे किसी आदेश, अधिपत्र या दस्तावेज में तद्नुसार संशोधन किया जा सकेगा ।

128. क्षमा और परिहार-जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है तब केंद्रीय सरकार या महानिदेशक या ऐसे दंडादेश की दशा में, जिसे वह पुष्ट कर सकता था जिसकी पुष्टि अपेक्षित नहीं थी, ऐसा आफिसर जो उप महानिदेशक के रैंक से नीचे का न हो और जिसके कमान में वह व्यक्ति दोषसिद्धि के समय सेवा करता था, या विहित आफिसर-

(क) या तो उन शर्तों के सहित या उनके बिना जिन्हें दंडादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करता है, उस व्यक्ति को क्षमा कर सकेगा या अधिनिर्णीत संपूर्ण दंड या उसके किसी भाग का परिहार कर सकेगा ; या  

(ख) अधिनिर्णीत दंड में कमी कर सकेगा ; या

(ग) ऐसे दंड को इस अधिनियम में वर्णित किसी कम दंड या दंडों में लघुकृत कर सकेगा ;

(घ) या तो उन शर्तों के सहित या उनके बिना जिन्हें दंडादिष्ट व्यक्ति स्वीकार करता है, उस व्यक्ति को पैरोल पर निर्मुक्त कर सकेगा ।

129. सशर्त क्षमा, पैरोल पर निर्मुक्ति या परिहार को रद्द करना-(1) यदि कोई शर्त, जिस पर किसी व्यक्ति को क्षमा या पैरोल पर निर्मुक्त किया गया है या जिस पर किसी दंड का परिहार किया गया है, उस प्राधिकारी की राय में जिसने क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार अनुदत्त किया था पूरी नहीं की गई है तो वह प्राधिकारी उस क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार को रद्द कर सकेगा और तब न्यायालयय का दंडादेश ऐसा क्रियान्वित किया जाएगा मानो ऐसी क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार अनुदत्त नहीं किया गया था ।

(2) वह व्यक्ति, जिसके कारावास का दंडादेश उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन क्रियान्वित किया जाता है, अपने दंडादेश का केवल अनवसित प्रभाग ही भोगेगा ।

130. कारावास के दंडादेश का निलंबन-(1) जहां किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है, वहां केंद्रीय सरकार, महानिदेशक या जनरल सुरक्षा बल न्यायालयय संयोजित करने के लिए सशक्त कोई आफिसर दंडादेश को निलंबित कर सकेगा, चाहें अपराधी को कारागार  में या बल की अभिरक्षा में पहले ही सुपुर्द कर दिया गया हो या नहीं । 

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर ऐसे दंडादिष्ट अपराधी की दशा में निदेश दे सकेगा कि जब तक ऐसे प्राधिकारी या आफिसर के आदेश अभिप्राप्त न कर लिए जाए तब तक अपराधी को कारागार में या बल की अभिरक्षा में सुपुर्द नहीं किया जाएगा ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे दंडादेश की दशा में किया जा सकेगा जिसकी पुष्टि की जा चुकी है या जो घटा दिया गया है या लघुकृत कर दिया गया है ।

131. निलंबन के लंबित रहने तक आदेश-(1) जहां धारा 130 में निर्दिष्ट दंडादेश, सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालय से भिन्न सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा अधिरोपित किया जाता है वहां पुष्टिकर्ता आफिसर दंडादेश की पुष्टि करते समय निदेश दे सकेगा कि अपराधी को कारागार के या बल की अभिरक्षा के सुपुर्द तब तक न किया जाए जब तक कि धारा 130 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर के आदेश अभिप्राप्त न कर लिए जाएं ।

(2) जहां कारावास का दंडादेश किसी सम्मरी सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा अधिरोपित किया जाता है वहां विचारण करने वाला आफिसर या दंडादेश की धारा 114 की उपधारा (2) के अधीन अनुमोदित करने के लिए प्राधिकृत आफिसर उपधारा (1) में निर्दिष्ट निदेश दे सकेगा ।

132. निलंबन पर निर्मुक्ति-जहां कोई दंडादेश धारा 130 के अधीन निलंबित किया जाता है वहां अपराधी को अभिरक्षा से तत्काल निर्मुक्त कर दिया जाएगा ।

133. निलंबन की अवधि की संगणना-वह अवधि जिसके दौरान दंडादेश निलंबित है, उस दंडादेश की अवधि का भाग      मानी जाएगी ।

134. निलंबन के पश्चात् आदेश-धारा 130 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर दंडादेश निलंबित रहने के दौरान किसी भी समय आदेश दे सकेगा कि-

                (क) अपराधी उस दंडादेश के अनवसित प्रभाग को भोगने के लिए सुपुर्द किया जाए ;

(ख) दंडादेश का परिहार किया जाए ।

135. निलंबन के पश्चात् मामले पर पुनर्विचार-(1) जहां कोई दंडादेश निलंबित किया गया है, वहां धारा 130 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा अथवा धारा 130 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो उप महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, मामले पर पुनर्विचार किसी भी समय किया जा सकेगा और अधिक से अधिक चार मास के अंतरालों पर किया जाएगा ।

(2) जहां ऐसे प्राधिकृत आफिसर को ऐसे पुनर्विचार पर यह प्रतीत होता है कि अपराधी का आचरण दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसा रहा है कि दंडादेश का परिहार करना न्यायोचित होगा, वहां वह मामले को धारा 130 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर को निर्देशित करेगा ।

136. निलंबन के पश्चात् नया दंडादेश-जहां किसी अपराधी को, उस समय के दौरान जब उसका दंडादेश इस अधिनियम के अधीन निलंबित है, किसी अन्य अपराध के लिए दंडादिष्ट किया जाता है, वहां-

(क) यदि अतिरिक्त दंडादेश भी इस अधिनियम के अधीन निलम्बित किया जाता है तो वे दोनों दंडादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे ;

(ख) यदि अतिरिक्त दंडादेश तीन मास या उससे अधिक की अवधि के लिए है और इस अधिनियम के अधीन निलंबित नहीं किया जाता है, तो अपराधी पूर्ववर्ती दंडादेश के अनवसित प्रभाग के लिए भी कारगार या बल की अभिरक्षा में सुपुर्द किया जाएगा, किंतु दोनों दंडादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे ; और

(ग) यदि अतिरिक्त दंडादेश तीन मास से कम की अवधि के लिए है और इस अधिनियम के अधीन निलंबित नहीं किया जाता है, तो अपराधी केवल उसी दंडादेश पर ऐसे सुपुर्द किया जाएगा और पूर्ववर्ती दंडादेश किसी ऐसे आदेश के अधीन रहते हुए निलंबित बना रहेगा जो धारा 134 या धारा 135 के अधीन पारित किया जाए ।

137. निलंबन की शक्ति की परिधि-धारा 130 और 134 द्वारा प्रदत्त शक्तियां, कमी करने, परिहार करने और लघुकरण की शक्ति के, अतिरिक्त होंगी, न कि उसके अल्पीकरण में ।

138. निलंबन और परिहार का पदच्युति पर प्रभाव-(1) जहां सुरक्षा बल न्यायालयय द्वारा किसी अन्य दंडादेश के अतिरिक्त पदच्युति का दंड अधिनिर्णीत किया जाता है और ऐसा अन्य दंडादेश धारा 130 के अधीन निलंबित किया जाता है वहां ऐसी पदच्युति तब तक प्रभावशील नहीं होगी जब तक कि धारा 130 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा वैसा आदेश नहीं कर दिया जाता ।

(2) यदि धारा 134 के अधीन ऐसे अन्य दंडादेश का परिहार किया जाता है तो पदच्युति के दंड का भी परिहार कर         दिया जाएगा ।

अध्याय 10

प्रकीर्ण

139. बल के सदस्यों को प्रदान किए जाने योग्य शक्तियां और उन पर अधिरोपित किए जाने योग्य कर्तव्य-(1) केंद्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए और भारत की सीमाओं के समीप के ऐसे क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, बल का कोई सदस्य-

(i) पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 (1920 का 34), विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939 (1939 का 16), केंद्रीय उत्पाद-शुल्क और नमक अधिनियम, 1944 (1944 का 1), विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31), विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1947 (1947 का 7), सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) या पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (1967 का 15) के अधीन दंडनीय किसी अपराध को या किसी अन्य केंद्रीय अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी संज्ञेय अपराध को रोकन के प्रयोजन के लिए ; या

(ii) किसी ऐसे व्यक्ति को पकड़ने के प्रयोजन के लिए जिसने खंड (i) में निर्दिष्ट कोई अपराध किया है,

उस अधिनियम या किसी ऐसे अन्य केंद्रीय अधिनियम के अधीन जो उक्त आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसी शक्तियों का प्रयोग या कर्तव्यों का निर्वहन कर सकेगा जो शक्तियां और कर्तव्य ऐसे हैं जिनका उक्त प्रयोजनों के लिए प्रयोग या निर्वहन करने के लिए, केंद्रीय सरकार की राय में, उस अधिनियम द्वारा या ऐसे अन्य अधिनियम द्वारा तत्समान या निम्नतर रैंक के आफिसर को सशक्त किया                  गया है ।

(2) केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, संबंधित राज्य सरकार की सहमति से उन शक्तियों या कर्तव्यों में से, जिनका प्रयोग या निर्वहन किसी पुलिस आफिसर द्वारा राज्य के किसी अधिनियम के अधीन किया जा सकता है, कोई शक्ति या कर्तव्य बल के किसी ऐसे सदस्य को, जो केंद्रीय सरकार की राय में तत्समान या उससे उच्चतर रैंक का है, प्रदान या उस पर अधिरोपित कर सकेगी ।

 [(3) इस धारा के अधीन निकाला गया प्रत्येक आदेश, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस आदेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह आदेश नहीं निकाला जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु आदेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]

140. बल के सदस्यों के कार्यों के लिए संरक्षण-(1) किसी सक्षम प्राधिकारी के वारंट या आदेश के अनुसरण में बल के किसी सदस्य द्वारा किए गए किसी कार्य के लिए उसके विरुद्ध किसी वाद या कार्यवाही में उसके लिए यह अभिवाक् करना विधिपूर्ण होगा कि उसने ऐसा कार्य ऐसे वारंट या आदेश के प्राधिकार के अधीन किया था । 

(2) ऐसा कोई अभिवाक् उस कार्य का निदेश देने वाले वारंट या आदेश को पेश करके साबित किया जा सकेगा और यदि उसे इस प्रकार साबित कर दिया जाता है तो बल के, सदस्य को, उसके द्वारा इस प्रकार किए गए कार्य के बारे में दायित्व से, उस प्राधिकारी की अधिकारिता में, जिसने ऐसा वारंट या आदेश जारी किया है, कोई त्रुटि होते हुए भी उन्मोचित कर दिया जाएगा ।  

(3) उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई विधिक कार्यवाही (चाहे सिविल हो या दांडिक) जो बल के किसी सदस्य के विरुद्ध इस अधिनियम या नियमों के किसी उपबंध द्वारा या उसके अनुसरण में प्रदत्त शक्तियों के अधीन किए गए या किए जाने के लिए आशयित कार्य के लिए विधिपूर्वक लाई जाए, उस कार्य के, जिसकी शिकायत की गई है, किए जाने के पश्चात् तीन मास के भीतर प्रारंभ की जाएगी, अन्यथा नहीं और ऐसी कार्यवाही की और उसके हेतुक की लिखित सूचना प्रतिवादी को या उसके वरिष्ठ अधिकारी को ऐसी कार्यवाही के प्रारंभ के कम से कम एक मास पूर्व दी जाएगी ।

141. नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए उपबंध कर सकेंगे :-

(2) विशिष्टतया तथा पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे :-

                (क) सुरक्षा बल का गठन, शासन, कमान और अनुशासन ;

(ख) सुरक्षा बल में व्यक्तियों का अभ्यावेशन तथा सुरक्षा बल के अन्य सदस्यों की भर्ती ;

(ग) सुरक्षा बल के सदस्यों की सेवा की शर्तें (जिनमें वेतन तथा भत्तों से कटौतियां सम्मिलित हैं) ;

(घ) आफिसरों, अधीनस्थ आफिसरों, अवर आफिसरों और ऐसे अन्य व्यक्तियों के, जो इस अधिनियम के अधीन हैं, रैंक, पूर्विकता, कमान की शक्तियां और प्राधिकार ;

(ङ) ऐसे व्यक्तियों का, जो इस अधिनियम के अधीन हैं, सेवा से हटाया जाना, सेवानिवृत्ति, सेवा से निर्मुक्ति            या उन्मोचन ;

(च) वे प्रयोजन तथा अन्य बातें, जो धारा 13 के अधीन विहित की जानी अपेक्षित हैं ;

(छ) सुरक्षा बल न्यायालययों का संयोजन, गठन, स्थगन, विघटन तथा बैठकें, ऐसे न्यायालययों द्वारा विचारणों में पालन की जाने वाली प्रक्रिया, वे व्यक्ति जिनके द्वारा अभियुक्त की ऐसे विचारणों में प्रतिरक्षा की जा सकेगी और उनमें ऐसे व्यक्तियों की हाजिरी ;

(ज) सुरक्षा बल न्यायालययों के निष्कर्षों और दंडादेशों का पुष्टिकरण, पुनरीक्षण और निष्प्रभाव किया जाना तथा उन निष्कर्षों और दंडादेशों के विरुद्ध अर्जियां ;

(झ) सुरक्षा बल न्यायालययों से संबंधित इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किए जाने वाले  [आदेशों के प्ररूप] और मृत्यु, कारावास तथा निरोध के अधिनिर्णय तथा दंड ;

(ञ) सुरक्षा बल न्यायालययों के दंडादेशों को कार्यान्वित करना ;

(ट) इस अधिनियम को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक कोई बात, जहां तक उसका संबंध इस अधिनियम के अधीन विचारणीय या दंडनीय अपराधों के अन्वेषण, गिरफ्तारी, अभिरक्षा, विचारण और दंड से है ;

(ठ) सुरक्षा बल में पालन की जाने वाली औपचारिकताएं तथा दिए जाने वाले सम्मान ;

(ड) जांच न्यायालययों को संयोजित करना, उनका गठन, उनकी प्रक्रिया और पद्धति, उनके समक्ष साक्षियों को समन किया जाना और ऐसे न्यायालययों द्वारा शपथ दिलाया जाना ;

(ढ) मुख्य विधि आफिसर और विधि आफिसरों की भर्ती और उनकी सेवा की शर्तें ;

(ण) कोई अन्य बात, जो विहित की जानी है या विहित की जा सकती है या जिसके बारे में इस अधिनियम में कोई उपबंध नहीं है या अपर्याप्त उपबंध है और केंद्रीय सरकार की राय में इस अधिनियम के उचित कार्यान्वयन के लिए उपबंध आवश्यक है ।

 [(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]

142. विद्यमान सीमा सुरक्षा बल के संबंध में उपबंध-(1) इस अधिनियम के प्रारंभ पर विद्यमान सीमा सुरक्षा बल को इस अधिनियम के अधीन गठित बल समझा जाएगा ।

(2) इस अधिनियम के प्रारंभ पर विद्यमान सीमा सुरक्षा बल के सदस्यों को इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, नियुक्त या अभ्यावेशित समझा जाएगा ।

(3) इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व उपधारा (1) में निर्दिष्ट सीमा सुरक्षा बल के गठन के संबंध में, यथास्थिति, उसमें नियुक्त या अभ्यावेशित किसी व्यक्ति के संबंध में की गई कोई बात या कार्रवाई विधि में वैसी ही विधिमान्य और प्रभावी होगी मानो वह बात या कार्रवाई इस अधिनियम के अधीन की गई थी :

परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व उसके द्वारा की गई या करने से लोप की गई किसी बात के बारे में किसी अपराध के लिए दोषी नहीं बनाएगी ।

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