ब्याज-कर अधिनियम, 1974
(1974 का अधिनियम संख्यांक 45)
[23 सितम्बर, 1974]
कुछ दशाओं में ब्याज पर विशेष कर
अधिरोपित करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पच्चीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम ब्याज-कर अधिनियम, 1974 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(1) निर्धारिती" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन ब्याज-कर या धन की कोई अन्य राशि संदेय है और इसके अन्तर्गत,-
(क) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति है जिसके बारे में उसके प्रभार्य ब्याज के या उसे प्रतिदाय के लिए शोध्य रकम के या किसी अन्य व्यक्ति के प्रभार्य ब्याज के, जिसके बारे में वह निर्धार्य है या ऐसे अन्य व्यक्ति को प्रतिदाय के लिए शोध्य रकम के निर्धारण के लिए इस अधिनियम के अधीन कोई कार्यवाही की गई है;
(ख) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति है जिसे इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन व्यतिक्रमी निर्धारिती समझा जाता है;
(2) निर्धारण" के अन्तर्गत पुनर्निर्धारण भी है;
(3) निर्धारण वर्ष" से बारह मास की वह अवधि अभिप्रेत है जो प्रतिवर्ष अप्रैल के प्रथम दिन प्रारम्भ होती है;
(4) बोर्ड" से केन्द्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 (1963 का 54) के अधीन गठित केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड अभिप्रेत है;
(5) प्रभार्य ब्याज" से धारा 6 में अधिकथित रीति से संगणित ब्याज की वह कुल रकम अभिप्रेत है, जो धारा 5 में निर्दिष्ट है;
[(5क) प्रत्यय संस्था" से अभिप्रेत है,-
(i) कोई बैंककारी कम्पनी जिसे बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) लागू होता है (जिसके अन्तर्गत उस अधिनियम की धारा 51 में निर्दिष्ट कोई बैंक या बैंककारी संस्था) ॥।
(ii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 4क में परिभाषित कोई लोक वित्तीय संस्था;
(iii) राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) की धारा 3 या धारा 3क के अधीन स्थापित कोई राज्य वित्तीय निगम या धारा 46 के अधीन अधिसूचित कोई संस्था; और
(iv) कोई अन्य वित्तीय कंपनी;
(5ख) वित्तीय कंपनी" से अभिप्रेत है खंड (5क) के उपखंड (i), उपखंड (ii) या उपखंड (iii) में निर्दिष्ट कंपनी से भिन्न कोई कंपनी, जो-
(i) अवक्रय वित्त कंपनी है, अर्थात्, ऐसी कंपनी है जो अपने मुख्य कारबार के रूप में अवक्रय संव्यवहार या ऐसे संव्यवहारों का वित्तपोषण करती है; या
(ii) विनिधान कंपनी है, अर्थात्, ऐसी कंपनी है जो अपने मुख्य कारबार के रूप में शेयर, स्टाक, बंधपत्र, डिबेंचर, डिबेंचर स्टाक, अथवा सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा निर्गमित प्रतिभूति अथवा इसी प्रकार की अन्य विपण्य प्रतिभूति का अर्जन करती है; या
(iii) आवास वित्त कंपनी है, अर्थात्, ऐसी कंपनी है जो अपने मुख्य कारबार के रूप में मकानों के अर्जन या सन्निर्माण का, जिसके अंतर्गत उसके संबंध में भूमि का अर्जन या विकास है, वित्तपोषण करती है;
(iv) उधारदाता कंपनी है, अर्थात् ऐसी कंपनी है [जो उपखंड (i) से उपखंड (ii) में निर्दिष्ट कंपनी नहीं हैट जो अपने मुख्य कारबार के रूप में उधार या अग्रिम देकर या अन्यथा वित्त उपलब्ध कराने का कारबार करती है;
(v) पारस्परिक फायदा वित्त कंपनी है, अर्थात्, ऐसी कंपनी जो अपने मुख्य कारबार के रूप में अपने सदस्यों से निक्षेपों या प्रतिग्रहण करने का कारबार करती है और जो केंद्रीय सरकार और कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 620क के अधीन निधि या पारस्परिक फायदा सोसाइटी घोषित की गई है, ॥॥
[(vक) अवशिष्ट गैर-बैंककारी कंपनी है [जो उपखंड (i), उपखंड (ii), उपखंड (iii), उपखंड (iv) या उपखंड (v) में निर्दिष्ट वित्तीय कंपनी से भिन्न है], अर्थात्, ऐसी कंपनी है जो किसी स्कीम या ठहराव के अधीन, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, अभिदायों या अभिदानों के रूप में अथवा यूनिटों या प्रमाणपत्रों या अन्य लिखतों के विक्रय द्वारा या किसी अन्य रीति से, एकमुस्त या किस्तों में कोई निक्षेप प्राप्त करती है, या]
(vi) प्रकीर्ण वित्त कंपनी है, अर्थात्, ऐसी कंपनी है, जो अनन्यतः या लगभग अनन्यतः पूर्ववर्ती उपखंडों में निर्दिष्ट दो या अधिक वर्गों का कारबार करती है;]
(6) आय-कर अधिनियम" से आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) अभिप्रेत है;
[(7) ब्याज" से भारत में दिए गए उधार और अग्रिम पर ब्याज अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत हैं,-
(क) भारत में उपयोग के लिए मंजूर किए गए प्रत्यय के अनुपयोजित भाग पर प्रतिबद्धता प्रभार; और
(ख) भारत में लिखे गए वचन-पत्र और विनिमय-पत्र पर बट्टा,
किंतु इसके अंतर्गत नहीं हैं-
(i) भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 42 की उपधारा (1ख) में निर्दिष्ट ब्याज;
(ii) राज-हुंडियों पर बट्टा;]
(8) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
। । । ।
(10) अन्य सभी शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त किन्तु अपरिभाषित हैं और आय-कर अधिनियम में परिभाषित हैं वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं ।
3. कर प्राधिकारी- [(1) आय-कर अधिनियम की धारा 116 में विनिर्दिष्ट आय-कर प्राधिकारी, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ब्याज-कर प्राधिकारी होंगे ।
(1क) प्रत्येक ऐसा प्राधिकारी अपनी अधिकारिता के भीतर किसी व्यक्ति की बाबत इस अधिनियम के अधीन किसी ब्याज-कर प्राधिकारी की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का पालन करेगा ।
(1ख) इस अधिनियम के अधीन ब्याज-कर प्राधिकारी की अधिकारिता वही होगी जो उसे आय-कर अधिनियम की धारा 120 के अधीन या उस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के अधीन जारी किए गए आदेशों या निदेशों के आधार पर (जिनके अंतर्गत समवर्ती अधिकारिता सौंपने वाले आदेश या निदेश हैं) उस अधिनियम के अधीन है ।
(1ग) ऐसी प्रत्यय संस्था के संबंध में, जिसकी आय-कर अधिनियम के अधीन आय-कर से निर्धारणीय कोई आय नहीं है, अधिकारिता रखने वाला ब्याज-कर प्राधिकारी, वह ब्याज-कर प्राधिकारी होगा जिसकी उस क्षेत्र की बाबत, जिसमें वह संस्था अपना कारबार करती है या उसके कारबार का प्रधान स्थान है, अधिकारिता है ।
(1घ) सिवाय उस विस्तार तक जिस तक बोर्ड, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी ब्याज-कर प्राधिकारी की बाबत अन्यथा निदेश दे, आय-कर अधिनियम की धारा 118 और उसके अधीन निकाली गई कोई अधिसूचना, ब्याज-कर प्राधिकारियों के नियंत्रण के संबंध में उसी प्रकार लागू होगी जिस प्रकार वह तत्समान आय-कर प्राधिकारियों के नियंत्रण के संबंध में लागू होती है ।]
(2) इस अधिनियम के निष्पादन के लिए नियोजित सभी अधिकारी और व्यक्ति बोर्ड के आदेशों, अनुदेशों और निदेशों का अनुपालन और अनुसरण करेंगे :
परन्तु ऐसा कोई भी आदेश, अनुदेश या निदेश नहीं दिया जाएगा जिससे-
(क) किसी कर प्राधिकारी से विशिष्ट निर्धारण करने या किसी विशिष्ट मामले को किसी विशिष्ट रीति से निपटाने की अपेक्षा की जाए; या
(ख) [सहायक आयुक्त (अपील)] के अपीली कृत्यों के करने में उसके विवेकाधिकार में हस्तक्षेप हो ।
(3) इस अधिनियम के निष्पादन के लिए नियोजित हर आय-कर अधिकारी [या सहायक आयुक्त] [या उपायुक्त] उन आदेशों, अनुदेशों और निदेशों का अनुपालन और अनुसरण करेगा जो उसके मार्गदर्शन के लिए उस [निदेशक] द्वारा या आयुक्त द्वारा या 4[आय-कर अपर आयुक्त या] 3[संयुक्त आयुक्त] द्वारा जारी किए गए हैं जिसकी अधिकारिता के अधीन ऐसा अधिकारी अपने कृत्यों का पालन करता है ।
4. कर का प्रभार- [(1)] इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक अनुसूचित बैंक पर, अप्रैल, 1975 के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् प्रारम्भ होने वाले हर निर्धारण वर्ष के लिए उसके पूर्व वर्ष के प्रभार्य ब्याज की बाबत ऐसे प्रभार्य ब्याज के सात प्रतिशत की दर से एक कर (जिसे इस अधिनियम में ब्याज-कर कहा गया है) प्रभारित किया जाएगा ।
[परन्तु वह दर जिस पर 31 मार्च, 1983 के पश्चात् प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले किसी प्रभार्य ब्याज की बाबत ब्याज-कर प्रभारित किया जाएगा, ऐसे प्रभार्य ब्याज का साढ़े तीन प्रतिशत होगी ।]
[(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, किंतु इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए प्रत्येक प्रत्यय संस्था पर, 1 अप्रैल, 1992 को और से प्रारम्भ होने वाले प्रत्येक निर्धारण वर्ष के लिए, उसके पूर्ववर्ष के प्रभार्य ब्याज की बाबत, ऐसे प्रभार्य ब्याज के तीन प्रतिशत की दर से ब्याज-कर प्रभारित किया जाएगा :]
[परंतु वह दर, जिस पर ब्याज-कर 31 मार्च, 1997 के पश्चात् प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले किसी प्रभार्य ब्याज के संबंध में प्रभावित किसी जाएगा, ऐसे प्रभार्य ब्याज का दो प्रतिशत होगी ।]
[(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, 31 मार्च 2000 के पश्चात् प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले किसी प्रभार्य ब्याज की बाबत कोई ब्याज-कर प्रभारित नहीं किया जाएगा ।]
[5. प्रभार्य ब्याज का प्रविषय-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी पूर्ववर्ष में किसी प्रत्यय संस्था का प्रभार्य ब्याज (अन्य प्रत्यय संस्थाओं को [या ऐसी सहकारी सोसाइटी को जो बैंककारी का कारबार करने में लगी हुई है] दिए गए उधारों और अग्रिमों पर ब्याज से भिन्न) ब्याज की वह कुल रकम होगी जो उस पूर्व वर्ष में उस प्रत्यय संस्था को प्रोद्भूत या उद्भूत होती है :
परन्तु आय-कर अधिनियम की धारा 43घ में निर्दिष्ट डूबंत या शंकास्पद ऋणों के प्रवर्गों के संबंध में कोई ब्याज, प्रत्यय संस्था को उस पूर्व वर्ष में, जिसमें वह प्रत्यय संस्था द्वारा उस वर्ष के लाभ और हानि लेखा में जमा किया जाता है या, यथास्थिति, जिसमें वह प्रत्यय संस्था द्वारा वास्तव में प्राप्त किया जाता है, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, प्रोद्भूत या उद्भूत हुआ समझा जाएगा ।]
6. प्रभार्य ब्याज की संगणना-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी पूर्व वर्ष के लिए प्रभार्य ब्याज की संगणना में उस पूर्व वर्ष में निर्धारिती को प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले ( [प्रत्यय संस्थाओं] को दिए गए उधार और अग्रिम पर ब्याज से भिन्न) ब्याज को कुल रकम में से ब्याज की उस रकम की कटौती की जाएगी जिसके बारे में यह साबित कर दिया गया है कि वह पूर्व वर्ष में डूबन्त ऋण हो गई है :
परन्तु यह तब जबकि ऐसा ब्याज किसी पूर्वतन वर्ष के लिए निर्धारिती के प्रभार्य ब्याज की संगणना करने में हिसाब में लिया गया है और उस रकम को उस पूर्व वर्ष के लिए जिसके दौरान उसका डूबन्त ऋण होना साबित किया गया है निर्धारिती के लेखाओं में वसूल न की जा सकने वाली रकम के रूप में लिखा गया है ।
स्पष्टीकरण-संदेह दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि किसी पूर्व वर्ष के प्रभार्य ब्याज की संगणना में निर्धारिती को प्रोद्भूत या उद्भूत होने वाले ब्याज की कुल रकम में से इस उपधारा में विनिर्दिष्ट कटौती से भिन्न कोई कटौती अनुज्ञात नहीं की जाएगी ।
(2) किसी पूर्व वर्ष के प्रभार्य ब्याज की संगणना में, ब्याज की वह रकम जो निर्धारिती को [1 अगस्त, 1974 के पहले या 28 फरवरी, 1978 के बाद] [1 मार्च, 1978 को प्रारम्भ होने वाली और 30 जून, 1980 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान][1 अप्रैल, 1985 को प्रारम्भ होने वाली और 30 सितंबर, 1991 को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान] प्रोद्भूत या उद्भूत हुई है हिसाब में नहीं ली जाएगी ।
7. प्रभार्य ब्याज की विवरणी- [(1) प्रत्येक प्रत्यय संस्था की दशा में, उसका प्रधान अधिकारी, या जहां किसी अनिवासी प्रत्यय संस्था की दशा में कोई व्यक्ति आय-कर अधिनियम की धारा 163 के अधीन उसका अभिकर्ता माना गया है वहां, ऐसा व्यक्ति, पूर्ववर्ष में प्रत्यय संस्था के प्रभार्य ब्याज की, विहित प्ररूप में और विहित रीति से सत्यापित और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जैसी विहित की जाएं, उल्लिखित करते हुए एक विवरणी निर्धारण वर्ष के दिसम्बर के इकतीसवें दिन के पूर्व, देगा ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, निर्धारण अधिकारी, प्रत्यय संस्था के प्रधान अधिकारी पर या जहां किसी अनिवासी प्रत्यय संस्था की दशा में किसी व्यक्ति को आय-कर अधिनियम की धारा 163 के अधीन उसका अभिकर्ता माना गया है वहां, उस व्यक्ति पर, सुसंगत निर्धारण वर्ष की समाप्ति के पूर्व सूचना तामील कर सकेगा जिसमें उससे यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उस सूचना की तामील की तारीख से तीस दिन के भीतर पूर्ववर्ष में प्रत्यय संस्था के प्रभार्य ब्याज की, विहित प्ररूप में और विहित रीति से सत्यापित और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो विहित की जाएं, उल्लिखित करते हुए एक विवरणी दे ।]
(3) वह निर्धारिती जिसने उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञात समय के दौरान विवरणी नहीं दी है या जिसे उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन विवरणी देने के पश्चात् उसमें किसी लोप या गलत कथन करने का पता लगता है 4[सुसंगत निर्धारण वर्ष की समाप्ति से एक वर्ष की समाप्ति के पूर्व या निर्धारण के पूरा होने से पूर्व, इनमें से जो भी पूर्वतर हो] किसी भी समय, यथास्थिति, विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी दे सकता है ।
8. निर्धारण-(1) इस अधिनियम के अधीन निर्धारण के प्रयोजन के लिए आय-कर अधिकारी किसी व्यक्ति पर जिसने धारा 7 के अधीन विवरणी दी है या जिस पर धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन सूचना तामील की गई है (चाहे विवरणी दी गई हो या नहीं) एक सूचना तामील कर सकता है जिसमें यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उस तारीख को जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएगी ऐसे लेखे या दस्तावेजें या साक्ष्य पेश करे या पेश कराए जिनकी [निर्धारण] अधिकारी इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अपेक्षा करे और समय-समय पर ऐसे अतिरिक्त लेखाओं या दस्तावेजों या अन्य साक्ष्य को, जिनकी वह अपेक्षा करे, पेश करने की अपेक्षा करने वाली अतिरिक्त सूचनाओं की तामील कर सकता है ।
(2) 5[निर्धारण] प्राधिकारी ऐसे लेखाओं, दस्तावेजों या साक्ष्य पर, यदि कोई हों, जो उपधारा (1) के अधीन उसने प्राप्त किए हैं, विचार करने के पश्चात् और किसी सुसंगत सामग्री पर जो उसने एकत्र की है, ध्यान देने के पश्चात्, प्रभार्य ब्याज का निर्धारण और ऐसे निर्धारण के आधार पर संदेय ब्याज-कर की रकम का निर्धारण, लिखित आदेश द्वारा करेगा ।
[(3) यदि कोई व्यक्ति,-
(क) धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन अपेक्षित विवरणी देने में असफल रहता है और उसने उस धारा की उपधारा (3) के अधीन कोई विवरणी या संशोधित विवरणी नहीं दी है, या
(ख) उस धारा की उपधारा (2) के अधीन सूचना के सभी निबंधनों का अनुपालन करने में असफल रहता है,
तो निर्धारण अधिकारी, ऐसी सभी सुसंगत सामग्री पर, जो उसने एकत्रित की है, विचार करने के पश्चात् और निर्धारिती को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, अपनी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार, कुल प्रभार्य ब्याज का निर्धारण करेगा और ऐसे निर्धारण के आधार पर निर्धारिती द्वारा संदेय राशि अवधारित करेगा :
परन्तु ऐसा अवसर निर्धारण अधिकारी द्वारा ऐसी सूचना की तामील करके दिया जाएगा जिसमें निर्धारिती से सूचना में विनिर्दिष्ट की जाने वाली तारीख को और समय पर यह हेतुक दर्शित करने की अपेक्षा की गई हो कि निर्धारण उसकी सर्वोत्तम विवेकबुद्धि के अनुसार क्यों न पूरा किया जाए :
परन्तु यह और कि ऐसा अवसर किसी ऐसी दशा में देना आवश्यक नहीं होगा जहां इस धारा के अधीन निर्धारण करने के पूर्व उपधारा (1) के अधीन सूचना जारी की गई है ।]
[9. स्वतः निर्धारण-(1) जहां, इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन पहले ही संदत्त किए गए ब्याज-कर की रकम को, यदि कोई हो, हिसाब में लेने के पश्चात्, धारा 7 या धारा 10 के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित किसी विवरणी के आधार पर कोई ब्याज-कर संदेय है, वहां निर्धारिती, विवरणी देने के पूर्व, ऐसे ब्याज-कर का और साथ ही विवरणी देने में हुए किसी विलम्ब अथवा अग्रिम ब्याज-कर के संदाय में किसी व्यतिक्रम या विलम्ब के लिए, इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन संदेय ब्याज का संदाय करने का दायी होगा तथा विवरणी के साथ ऐसे ब्याज-कर और ब्याज के संदाय का सबूत होगा ।
स्पष्टीकरण-जहां इस उपधारा के अधीन निर्धारिती द्वारा संदत्त रकम, पूर्वोक्त ब्याज-कर और ब्याज के योग से कम पड़ती है वहां इस प्रकार संदत्त रकम का समायोजन पहले, पूर्वोक्त संदेय ब्याज के प्रति और अतिशेष का, यदि कोई हो, समायोजन, संदेय ब्याज-कर के प्रति किया जाएगा ।
(2) धारा 8 के अधीन निर्धारण कर दिए जाने के पश्चात्, उपधारा (1) के अधीन संदत्त रकम निर्धारण के प्रति संदत्त समझी जाएगी ।
(3) यदि कोई निर्धारिती, उपधारा (1) के उपबन्धों के अनुसार, ऐसे संपूर्ण ब्याज-कर या ब्याज या उसके किसी भाग अथवा दोनों का संदाय करने में असफल रहता है तो वह, किन्हीं ऐसे अन्य परिणामों पर जो वह उपगत करे, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, असंदत्त रहे ब्याज-कर या ब्याज अथवा दोनों की बाबत व्यतिक्रम करने वाला निर्धारिती समझा जाएगा और इस अधिनियम के सभी उपबन्ध तद्नुसार लागू होंगे ।]
10. निर्धारण से छूटा ब्याज-यदि-
(क) [निर्धारण अधिकारी] के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी निर्धारण वर्ष के लिए धारा 7 के अधीन निर्धारिती की ओर से विवरणी दिए जाने में, किसी निर्धारण वर्ष के लिए उसके निर्धारण के लिए आवश्यक सभी तात्त्विक तथ्यों के पूर्णतया और ठीक-ठीक प्रकट किए जाने में, लोप या असफलता के कारण उस वर्ष के लिए प्रभार्य ब्याज निर्धारण से छूट गया है या कम निर्धारित हुआ है या इस अधिनियम के अधीन उस पर अत्यधिक राहत दे दी गई है; अथवा
(ख) इस बात के होते हुए भी कि खण्ड (क) में यथावर्णित कोई लोप या असफलता निर्धारिती की ओर से नहीं हुई है, 1[निर्धारण अधिकारी] के अपने कब्जे में की जानकारी के परिणामस्वरूप यह विश्वास करने का कारण है कि किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धार्य प्रभार्य ब्याज निर्धारण से छूट गया है या कम निर्धारित हुआ है या इस अधिनियम के अधीन उस पर अत्यधिक राहत दे दी गई है,
तो वह खण्ड (क) के अधीन आने वाले मामलों में किसी भी समय और खण्ड (ख) के अधीन आने वाले मामलों में उस निर्धारण वर्ष की समाप्ति के चार वर्ष के भीतर किसी भी समय निर्धारिती पर एक सूचना की तामील करा सकेगा जिसमें ऐसी सभी या कोई भी अपेक्षाएं, जो धारा 7 के अधीन किसी सूचना में की जा सकती हैं, अन्तर्विष्ट होंगी और वह ब्याज-कर के लिए प्रभार्य रकम निर्धारित या पुनर्निधारित करने की कार्यवाही कर सकेगा और इस अधिनियम के उपबन्ध, जहां तक हो सके उसी प्रकार लागू होंगे मानो वह सूचना उस धारा के अधीन निकाली गई सूचना हो ।
[10क. निर्धारण और पुनः निर्धारण को पूरा करने के लिए समय की परिसीमा-(1) धारा 8 के अधीन निर्धारण का कोई आदेश, उस निर्धारण वर्ष के, जिसमें ब्याज सर्वप्रथम निर्धारणीय था, अंत से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् किसी समय नहीं किया जाएगा ।
(2) धारा 10 के अधीन निर्धारण या पुनः निर्धारण का कोई आदेश, उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें उस धारा के अधीन सूचना की तामील की गई थी, अंत से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 15, धारा 16, धारा 19 या धारा 20 के अधीन किसी निर्धारण को अपास्त या रद्द करने के लिए किए गए आदेश के अनुसरण में नए निर्धारण का आदेश, उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें, यथास्थिति, धारा 15 या धारा 16 के अधीन आदेश आयुक्त को प्राप्त होता है या, धारा 19 या धारा 20 के अधीन आदेश आयुक्त द्वारा किया जाता है, अंत से दो वर्ष की समाप्ति के पूर्व किसी भी समय किया जा सकेगा ।
(4) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंध, इस अधिनियम की धारा 15 या धारा 16 या धारा 19 या धारा 20 के अधीन अथवा इस अधिनियम की धारा 21 के आधार पर इस अधिनियम को लागू आय-कर अधिनियम की धारा 256 या धारा 260 के अधीन किसी आदेश में अथवा इस अधिनियम के अधीन अपील या निर्देश की कार्यवाही से अन्यथा किसी कार्यवाही में किसी न्यायालय के किसी आदेश में अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए किए गए किसी निर्धारण या पुनः निर्धारण को लागू नहीं होंगे तथा ऐसा निर्धारण या पुनः निर्धारण, उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी भी समय पूरा किया जा सकेगा ।
स्पष्टीकरण 1-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, परिसीमाकाल की संगणना करने में,-
(i) संपूर्ण कार्यवाही या उसके किसी भाग को पुनः आरम्भ करने में लगे समय का; या
(ii) उस अवधि का, जिसके दौरान निर्धारण की कार्यवाही किसी न्यायालय के आदेश या व्यादेश से रोकी जाती है,
अपवर्जन किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण 2-जहां, उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी आदेश द्वारा, किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धारिती की बाबत प्रभार्य ब्याज में से कोई ब्याज अपवर्जित किया जाता है वहां किसी अन्य निर्धारण वर्ष के लिए ऐसे ब्याज का निर्धारण धारा 10 और इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उक्त आदेश में अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए किया गया निर्धारण समझा जाएगा ।]
[11. ब्याज कर का अग्रिम संदाय-(1) ब्याज-कर, इस धारा के उपबन्धों के अनुसार वित्तीय वर्ष के ठीक बाद के निर्धारण वर्ष के लिए प्रभार्य ब्याज की बाबत, उस वित्तीय वर्ष के दौरान, अग्रिम रूप में संदेय होगा ।
(2) ब्याज-कर प्रत्येक वित्तीय वर्ष के दौरान तीन किस्तों में अग्रिम रूप में संदेय होगा और ऐसी प्रत्येक किस्त की निश्चित तारीख और उसमें संदेय रकम वह होगी, जो निम्नलिखित सारणी में विनिर्दिष्ट की गई है :-
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सारणी |
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किस्त की निश्चित तारीख |
संदेय रकम |
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15 सितम्बर को या उसके पूर्व |
अग्रिम रूप में संदेय ऐसे ब्याज-कर के बीस प्रतिशत से अन्यून |
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15 दिसम्बर को या उसके पूर्व |
अग्रिम रूप में संदेय ऐसे ब्याज-कर के पचास प्रतिशत से अन्यून जैसी कि वह पूर्वतर किस्त में संदत्त रकम को, यदि कोई हो, घटाकर आए |
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15 मार्च को या उसके पूर्व |
अग्रिम रूप में संदेय ऐसे ब्याज-कर की संपूर्ण रकम जैसी कि वह पूर्वतर किस्त या किस्तों में संदत्त रकम को, यदि कोई हो, घटाकर आए : |
परंतु इस अधिनियम के सभी प्रयोजनों के लिए, मार्च के इकतीसवें दिन को या उसके पूर्व अग्रिम रूप में संदेय ब्याज-कर के रूप में संदत्त किसी रकम को भी, उस दिन को समाप्त होने वाले वित्तीय वर्ष के दौरान अग्रिम रूप में संदत्त ब्याज-कर माना जाएगा ।
12. प्रभार्य ब्याज की विवरणी देने में व्यतिक्रम के लिए ब्याज-(1) जहां धारा 7 की उपधारा (1) के, अधीन या उस धारा की उपधारा (2) के अधीन सूचना के उत्तर में, किसी निर्धारण वर्ष के लिए प्रभार्य ब्याज की विवरणी, निश्चित तारीख के पश्चात् दी जाती है या नहीं दी जाती है वहां निर्धारिती निश्चित तारीख के ठीक पश्चात्वर्ती दिन को प्रारंभ होने वाली, और-
(क) जहां विवरणी निश्चित तारीख के पश्चात् दी जाती है वहां विवरणी देने की तारीख को समाप्त होने वाली; या
(ख) जहां कोई विवरणी नहीं दी गई है वहां धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन निर्धारण के पूरा होने की तारीख को समाप्त होने वाली, अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए धारा 8 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन अवधारित प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर की रकम पर, जैसी कि वह अग्रिम रूप में संदत्त ब्याज-कर को घटाकर आए, दो प्रतिशित की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा ।
स्पष्टीकरण 1-इस धारा में, निश्चित तारीख" से, यथास्थिति, सुसंगत निर्धारण वर्ष के दिसम्बर मास का इकतीसवां दिन या वह तारीख अभिप्रेत है जिसको धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन सूचना के उत्तर में विवरणी दाखिल की जानी है ।
स्पष्टीकरण 2-जहां किसी निर्धारण वर्ष के संबंध में, कोई निर्धारण धारा 10 के अधीन पहली बार किया जाता है वहां इस प्रकार किया गया निर्धारण, धारा 8 की, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन किया गया निर्धारण माना जाएगा ।
स्पष्टीकरण 3-धारा 9 के अधीन संदेय ब्याज की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए, विवरणी में घोषित प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर धारा 8 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन अवधारित कुल प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर समझा जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन संदेय ब्याज में से इस धारा के अधीन प्रभार्य ब्याज के प्रति धारा 9 के अधीन संदत्त ब्याज, यदि कोई हो, घटा दिया जाएगा ।
(3) जहां किसी निर्धारण वर्ष के लिए प्रभार्य ब्याज की विवरणी, जिसकी धारा 8 की उपधारा (2) या उपधारा (3) अथवा धारा 10 के अधीन निर्धारण के पूरा होने के पश्चात् धारा 10 के अधीन जारी की गई सूचना द्वारा अपेक्षा की जाती है, ऐसी सूचना के अधीन अनुज्ञात समय की समाप्ति के पश्चात् दी जाती है या नहीं दी जाती है वहां निर्धारिती पूर्वोक्त अनुज्ञात समय की समाप्ति के ठीक पश्चात्वर्ती दिन को प्रारंभ होने वाली, और-
(क) जहां विवरणी पूर्वोक्त समय की समाप्ति के पश्चात् दी जाती है वहां विवरणी देने की तारीख को समाप्त होने वाली; या
(ख) जहां कोई विवरणी नही दी गई है वहां धारा 10 के अधीन पुनः निर्धारण के पूरा होने की तारीख को समाप्त होने वाली,
अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए उस रकम पर, जितनी से ऐसे पुनः निर्धारण के आधार पर अवधारित प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर, पूर्वोक्त पूर्वतर निर्धारण के आधार पर प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर से अधिक हो जाता है, दो प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा ।
(4) जहां, इस अधिनियम की धारा 15 या धारा 17 अथवा, इस अधिनियम की धारा 21 के आधार पर इस अधिनियम को लागू आय-कर अधिनियम की धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 के अधीन किसी आदेश के परिणामस्वरूप ऐसी रकम, जिस पर उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन ब्याज संदेय था, यथास्थिति, बढ़ाई गई है या घटाई गई है वहां ब्याज, तद्नुसार, बढ़ा दिया जाएगा या घटा दिया जाएगा, और-
(i) किसी ऐसी दशा में जहां ब्याज बढ़ाया जाता है, निर्धारण अधिकारी संदेय राशि विनिर्दिष्ट करते हुए, विहित प्ररूप में मांग की सूचना की तामील निर्धारिती पर करेगा और ऐसी मांग की सूचना, धारा 21 के आधार पर इस अधिनियम को लागू आय-कर अधिनियम की धारा 156 के अधीन सूचना समझी जाएगी और इस अधिनियम के उपबंध तद्नुसार लागू होंगे ;
(ii) किसी ऐसी दशा में जहां ब्याज घटाया जाता है, संदत्त अधिक ब्याज का, यदि कोई हो, प्रतिदाय किया जाएगा ।
(5) इस धारा के उपबंध, 1 अप्रैल, 1992 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष और पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्षों के लिए निर्धारणों की बाबत लागू होंगे ।
12क. ब्याज-कर के अग्रिम रूप में संदाय में व्यतिक्रम के लिए ब्याज-(1) इस धारा के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां किसी वित्तीय वर्ष में कोई ऐसा निर्धारिती, जो धारा 11 के अधीन ब्याज-कर का अग्रिम रूप में संदाय करने का दायी है, ऐसे कर का संदाय करने में असफल हो गया है या जहां ऐसे निर्धारिती द्वारा अग्रिम रूप में संदत्त ब्याज-कर, निर्धारित ब्याज-कर के नब्बे प्रतिशत से कम है वहां निर्धारिती ऐसे वित्तीय वर्ष के ठीक बाद के अप्रैल के प्रथम दिन से धारा 8 की, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन प्रभार्य ब्याज के अवधारण की तारीख तक की अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के किसी भाग के लिए, यथास्थिति, निर्धारित ब्याज-कर के बराबर रकम पर या उस रकम पर, जितनी से अग्रिम रूप में संदेय ब्याज-कर निर्धारित ब्याज-कर से कम पड़ता है, दो प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा ।
स्पष्टीकरण 1-इस धारा में, निर्धारित ब्याज-कर" से अभिप्रेत है,-
(क) धारा 9 के अधीन संदेय ब्याज की संगणना करने के प्रयोजनों के लिए, उस धारा में निर्दिष्ट विवरणी में घोषित प्रभार्य ब्याज पर ब्याज कर;
(ख) किसी अन्य दशा में, धारा 8 की, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन अवधारित प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर ।
स्पष्टीकरण 2-जहां किसी निर्धारण वर्ष के संबंध में, कोई निर्धारण धारा 10 के अधीन पहली बार किया जाता है वहां इस प्रकार किया गया निर्धारण, धारा 8 की, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन किया गया निर्धारण माना जाएगा ।
(2) जहां धारा 8 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन निर्धारण पूरा होने की तारीख के पूर्व, निर्धारिती द्वारा धारा 9 के अधीन या अन्यथा ब्याज-कर का संदाय कर दिया जाता है वहां-
(i) ब्याज इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों के अनुसार उस तारीख तक जिसको ब्याज-कर का इस प्रकार संदाय किया जाता है, परिकलित किया जाएगा और उसमें से इस धारा के अधीन प्रभार्य ब्याज के प्रति धारा 9 के अधीन संदत्त ब्याज को, यदि कोई हो, घटा दिया जाएगा ;
(ii) उसके पश्चात् ब्याज, उस रकम पर जितनी से इस प्रकार संदत्त कर और साथ ही अग्रिम रूप में संदत्त ब्याज-कर निर्धारित ब्याज-कर से कम पड़ता है, पूर्वोक्त दर से परिकलित किया जाएगा ।
(3) जहां, धारा 10 के अधीन पुनः निर्धारण के किसी आदेश के परिणामस्वरूप ऐसी रकम, जिस पर उपधारा (1) के अधीन ब्याज संदेय था बढा़ई जाती है वहां निर्धारिती उपधारा (1) में निर्दिष्ट धारा 8 की, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन निर्धारण पूरा होने की तारीख से ठीक पश्चात्वर्ती दिन को प्रारंभ होने वाली और धारा 10 के अधीन पुनः निर्धारण की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या मास के किसी भाग के लिए, उस रकम पर जितनी से ऐसे पुनः निर्धारण के आधार पर अवधारित प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर, धारा 8 की, यथास्थिति, उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन निर्धारण के आधार पर अवधारित प्रभार्य ब्याज पर ब्याज-कर से अधिक हो जाता है, दो प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा ।
(4) जहां, इस अधिनियम की धारा 15 या धारा 17 अथवा इस अधिनियम की धारा 21 के आधार पर इस अधिनियम को लागू आय-कर अधिनियम की धारा 254 या धारा 260 या धारा 262 के अधीन किसी आदेश के परिणामस्वरूप, ऐसी रकम, जिस पर उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन ब्याज संदेय था, यथास्थिति, बढ़ाई गई है या घटाई गई है वहां ब्याज, तद्नुसार, बढ़ा दिया जाएगा या घटा दिया जाएगा, और-
(i) किसी ऐसी दशा में जहां ब्याज बढ़ाया जाता है, निर्धारण अधिकारी संदेय राशि विनिर्दिष्ट करते हुए, विहित प्ररूप में मांग की सूचना की तामील निर्धारिती पर करेगा और ऐसी मांग की सूचना इस अधिनियम की धारा 21 के आधार पर इस अधिनियम को लागू आय-कर अधिनियम की धारा 156 के अधीन सूचना समझी जाएगी और इस अधिनियम के उपबंध तद्नुसार लागू होंगे;
(ii) किसी ऐसी दशा में जहां ब्याज घटाया जाता है, संदत्त अधिक ब्याज का, यदि कोई हो, प्रतिदाय किया जाएगा ।
(5) इस धारा के उपबंध, 1 अप्रैल, 1992 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष और पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्षों के लिए निर्धारणों की बाबत लागू होंगे ।
12ख. अग्रिम रूप में संदेय ब्याज-कर के आस्थगन के लिए ब्याज-(1) जहां किसी वित्तीय वर्ष में, ऐसा निर्धारिती, जो धारा 11 के अधीन ब्याज-कर का अग्रिम रूप में संदाय करने का दायी है, ऐसे ब्याज-कर का संदाय करने में असफल हो गया है और जहां निर्धारिती द्वारा अपने प्रभार्य ब्याज पर 15 दिसम्बर को या उसके पूर्व संदत्त ऐसे कर विवरणी में दिए गए प्रभार्य ब्याज पर देय ब्याज-कर के बीस प्रतिशत से कम है अथवा 15 सितम्बर को या उसके पूर्व संदत्त ऐसे ब्याज-कर की रकम, विवरणी में दिए गए प्रभार्य ब्याज पर देय कर के पचास प्रतिशत से कम है वहां निर्धारिती विवरणी में दिए गए प्रभार्य ब्याज पर देय ब्याज-कर के, यथास्थिति, बीस प्रतिशत या पचास प्रतिशत से कम पड़ने वाली रकम पर तीन मास की अवधि के लिए डेढ़ प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा ।
(2) इस धारा के उपबंध, 1 अप्रैल, 1992 को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष और पश्चात्वर्ती निर्धारण वर्षों के लिए निर्धारणों की बाबत लागू होंगे ।
13. प्रभार्य व्याज के छिपाने के लिए शास्ति-यदि निर्धारण अधिकारी या आयुक्त (अपील) का, इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के दौरान, यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति ने प्रभार्य ब्याज की विशिष्टियां छिपाई हैं या ऐसे ब्याज की गलत विशिष्टियां दी हैं तो वह यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति, शास्ति के रूप में, उसके द्वारा संदेय किसी ब्याज-कर के अतिरिक्त, वह राशि जो उस ब्याज-कर की रकम से कम नहीं होगी किंतु उस ब्याज-कर की रकम के तीन गुने से अधिक नहीं होगी जिसके अपवंचन करने का अपने प्रभार्य ब्याज की विशिष्टियों को छिपाने या ऐसे प्रभार्य ब्याज की गलत विशिष्टियां देने के कारण प्रयास किया जाता है ।
14. सुनवाई का अवसर-धारा 12 या धारा 13 के अधीन शास्ति अधिरोपित करने वाला कोई आदेश निर्धारिती को सुने जाने के या उसे सुनवाई का उचित अवसर दिए जाने के पश्चात् ही किया जाएगा अन्यथा नहीं ।
15. [आयुक्त (अपील)] को अपील-(1) कोई व्यक्ति जो ऐसे ब्याज-कर की रकम पर आपत्ति करता है जिसके लिए वह [निर्धारण अधिकारी] द्वारा निर्धारित किया गया है या कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन निर्धारित किए जाने के अपने दायित्व से इंकार करता है या जो 2[निर्धारण अधिकारी] द्वारा अधिरोपित किसी शास्ति या जुर्माने पर आपत्ति करता है, या इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन राहत के रूप में 2[निर्धारण अधिकारी] द्वारा अनुज्ञात रकम पर आपत्ति करता है या आय-कर अधिकारी द्वारा राहत देने से इंकार करने पर या भूल को सुधारने के आदेश पर जिसके परिणामस्वरूप निर्धारण में वृद्धि या प्रतिदाय में कमी की गई है, या धारा 17 के अधीन भूल सुधार के लिए निर्धारिती द्वारा किए गए दावे को अनुज्ञात करने से इंकार करने वाले किसी आदेश पर आपत्ति करता है तो वह 1[आयुक्त (अपील)] को अपील कर सकता है ।
[(2) 1 अक्तूबर, 1998 को या उसके पश्चात् फाइल की गई प्रत्येक अपील विहित प्ररूप में होगी और विहित रीति से सत्यापित की जाएगी तथा उसके साथ दो सौ पचास रुपए की फीस होगी ।]
(3) अपील निम्नलिखित तारीख से तीस दिन के भीतर प्रस्तुत की जाएगी, अर्थात् :-
(क) जहां अपील या निर्धारण या शास्ति या जुर्माने से सम्बन्धित है वहां निर्धारण या शास्ति या जुर्माने से सम्बन्धित मांग की सूचना की तामील की तारीख, या
(ख) किसी अन्य दशा में वह तारीख जिसको उस आदेश की सूचना तामील की जाती है जिसके विरुद्ध अपील की जा रही है :
परन्तु यदि [आयुक्त (अपील)] का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त कारणवश उस अवधि के भीतर अपील प्रस्तुत नहीं कर सका था तो वह उक्त कालावधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकता है ।
(4) 1[आयुक्त (अपील)] अपील की सुनवाई और उसका अवधारण करेगा और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए ऐसे आदेश पारित करेगा जो वह ठीक समझे और ऐसे आदेशों के अन्तर्गत निर्धारण या शास्ति की वृद्धि करने वाला आदेश भी है :
परन्तु निर्धारण या शास्ति में वृद्धि करने वाला आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि उससे प्रभावित होने वाले व्यक्ति को ऐसी वृद्धि के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का उचित अवसर नहीं दे दिया गया है ।
(5) अपीलों की सुनवाई और अवधारण में लागू की जाने वाली प्रक्रिया, आवश्यक उपान्तर सहित, आय-कर के सम्बन्ध में लागू होने वाली प्रक्रिया के अनुसार होगी ।
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16. अपीली अधिकरण को अपील-(1) कोई निर्धारिती जो धारा 19 के अधीन आयुक्त द्वारा पारित आदेश से या इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन 1[आयुक्त (अपील)] द्वारा पारित आदेश से व्यथित है, ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण को अपील कर सकता है ।
(2) आयुक्त, यदि वह 1[आयुक्त (अपील)] द्वारा इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन पारित आदेश पर आक्षेप करता है तो, [निर्धारण अधिकारी] को उस आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण को अपील करने का निदेश दे सकता है ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से साठ दिन के भीतर दाखिल की जाएगी जिसको वह आदेश जिसके विरुद्ध अपील की जा रही है, यथास्थिति, निर्धारिती को या आयुक्त को संसूचित किया जाता है ।
(4) यथास्थिति, 3[निर्धारण अधिकारी] या (निर्धारिती या सूचना प्राप्त होने पर कि सहायक आयुक्त (अपील) के आदेश के विरुद्ध उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अपील दूसरे पक्षकार द्वारा की गई है, इस बात के होते हुए भी कि उसने ऐसे आदेश या उसके किसी भाग के विरुद्ध अपील नहीं की है, सूचना की प्राप्ति के तीस दिन के भीतर 1[आयुक्त (अपील)] के आदेश के किसी भाग के विरुद्ध विहित रीति से सत्यापित प्रति आक्षेपों का ज्ञापन फाइल कर सकता है और ऐसा ज्ञापन अपील अधिकरण द्वारा इस प्रकार निपटाया जाएगा मानो वह उपधारा (3) के अधीन पेश की गई अपील है ।
(5) अपील अधिकरण उपधारा (3) या उपधारा (4) में निर्दिष्ट सुसंगत कालावधि की समाप्ति के पश्चात् किसी अपील को ग्रहण कर सकता है या प्रति आक्षेपों का ज्ञापन दाखिल करने की अनुज्ञा दे सकता है, यदि उसका समाधान हो जाता है कि उस कालावधि के भीतर उसे पेश न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
(6) अपील अधिकरण को अपील विहित प्ररूप में होगी और उसका सत्यापन विहित रीति से किया जाएगा और उपधारा (2) में निर्दिष्ट अपील या उपधारा (4) में निर्दिष्ट प्रति आक्षेपों के ज्ञापन की दशा के सिवाय उसके साथ [1 अक्तूबर, 1998 को या उसके पश्चात् फाइल की गई अपील की दशा में एक हजार रुपए] की फीस होगी ।
(7) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन, इस धारा के अधीन अपील की सुनवाई करने और आदेश देने में अपील अधिकरण उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करेगा और उसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जिसका प्रयोग और उसके द्वारा अनुसरण आय-कर अधिनियम के अधीन अपील की सुनवाई और आदेश के देने में किया जाता है ।
17. भूल सुधार-(1) अभिलेख से प्रकट किसी भूल को सुधारने की दृष्टि से आयुक्त, [निर्धारण अधिकारी] 1[आयुक्त (अपील)] और अपील अधिकरण स्वप्रेरणा से या इस निमित्त निर्धारिती द्वारा किए गए आवेदन पर इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में अपने द्वारा दिए गए आदेश को [उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें ऐसा आदेश पारित किया गया था, अंत से चार वर्ष के भीतर संशोधित कर सकता है ।]
(2) कोई संशोधन जिसका परिणाम निर्धारण में वृद्धि करना या प्रतिदाय को घटाना या निर्धारिती के दायित्व को अन्यथा बढ़ाना है इस धारा के अधीन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि सम्बन्धित प्राधिकारी ने ऐसा करने के अपने आशय की निर्धारिती को सूचना न दे दी हो और निर्धारिती को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया हो ।
(3) जहां इस धारा के अधीन कोई संशोधन किया जाता है वहां सम्बन्धित प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में आदेश पारित किया जाएगा ।
(4) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए जहां किसी संशोधन का परिणाम निर्धारण को घटाना है वहां [निर्धारण अधिकारी] ऐसा प्रतिदाय करेगा जो ऐसे निर्धारिती को देय हो ।
(5) जहां ऐसे किसी संशोधन का परिणाम पहले से किए गए निर्धारण में वृद्धि करना या प्रतिदाय को घटाना है वहां 1[निर्धारण अधिकारी] संदेय राशि विनिर्दिष्ट करते हुए विहित प्ररूप में मांग की सूचना की निर्धारिती पर तामील करेगा ।
[18. आय-कर अधिनियम के अधीन कुल आय की संगणना करने में ब्याज-कर का कटौती-योग्य होना-आय-कर अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, कारबार या वृत्ति के लाभ और अभिलाभ" शीर्ष के अधीन या अन्य स्रोतों से आय" शीर्ष के अधीन किसी प्रत्यय संस्था की आय-कर से प्रभार्य आय की संगणना करने में, किसी प्रत्यय संस्था द्वारा किसी निर्धारण वर्ष के लिए संदेय ब्याज-कर, संबंधित शीर्षों के अधीन, उस निर्धारण वर्ष के लिए प्रत्यय संस्था की निर्धारणीय आय में से, कटौती योग्य होगा ।]
19. राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले आदेश का पुनरीक्षण-(1) आयुक्त इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही का अभिलेख मांग सकता है और उसकी परीक्षा कर सकता है और यदि वह समझता है कि [निर्धारण अधिकारी] द्वारा उसमें पारित कोई आदेश गलत है जहां तक कि वह राजस्व के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है तो निर्धारिती को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच करने या करवाने के पश्चात्, जैसी वह आवश्यक समझा है, उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकता है, जैसा उस मामले की परिस्थितियों में न्यायोचित हो जिसके अन्तर्गत निर्धारण में वृद्धि या उपान्तरण करने का, या निर्धारण को रद्द करने और नए सिरे से निर्धारण का निदेश देने का आदेश भी है ।
3[स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) अभिलेख" में इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के संबंध में सभी अभिलेख, जो परीक्षा के समय आयुक्त को उपलब्ध हों, सम्मिलित हैं और उनके बारे में यह समझा जाएगा कि वे सदैव से सम्मिलित हैं;
(ख) जहां इस उपधारा में निर्दिष्ट कोई आदेश, किसी अपील का विषय है वहां इस उपधारा के अधीन आयुक्त की शक्ति का विस्तार ऐसे सभी विषयों तक होगा जिस पर ऐसी अपील में विचार नहीं किया गया है और विनिश्चय नहीं किया गया है ।]
3[(2) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें वह आदेश, जिसका पुनरीक्षण चाहा गया है, पारित किया गया था, अंत से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।]
(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी किसी ऐसे आदेश की दशा में जो अपील अधिकरण, [राष्ट्रीय कर अधिकरण] उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के आदेश में अन्तर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसको प्रभावी करने के लिए पारित किया गया है, इस धारा के अधीन पुनरीक्षण में आदेश किसी भी समय पारित किया जा सकता है ।
स्पष्टीकरण-उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए परिसीमा काल की संगणना करने में [उतने समय का जो इस अधिनियम की धारा 21 के आधार पर इस अधिनियम को लागू आय-कर अधिनियम की धारा 129 के परंतुक के अधीन निर्धारिती को पुनःसुनवाई का अवसर देने में लगा है और] ऐसी कालावधि का अपवर्जन किया जाएगा जिसके दौरान इस धारा के अधीन कोई कार्यवाही किसी न्यायालय के आदेश या व्यादेश से रोक रखी गई है ।
20. आयुक्त द्वारा आदेशों का पुनरीक्षण-(1) आयुक्त स्वप्रेरणा से या निर्धारिती द्वारा पुनरीक्षण के लिए आवेदन पर इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसी कार्यवाही का अभिलेख मंगा सकता है जो उसके अधीनस्थ किसी [निर्धारण अधिकारी] ॥॥ द्वारा की गई है और उसमें ऐसी जांच कर सकता है या करवा सकता है जो वह ठीक समझे और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकता है जो वह ठीक समझे किन्तु वह आदेश निर्धारिती को प्रतिकूल रीति से प्रभावित करने वाला नहीं होगा ।
(2) यदि कोई आदेश एक वर्ष से पूर्व किया गया है तो आयुक्त स्वप्रेरणा से इस धारा के अधीन उस आदेश का पुनरीक्षण नहीं करेगा ।
(3) निर्धारिती द्वारा इस धारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए आवेदन की दशा में, आवेदन, उस तारीख से, जिसको प्रश्नगत आदेश उसे संसूचित किया गया था या उस तारीख से, जिसको उसे अन्यथा उसका ज्ञान हुआ, इनमें से जो भी पूर्वतर हो उससे एक वर्ष के भीतर करना होगा :
परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि निर्धारिती उस कालावधि के भीतर आवेदन करने से पर्याप्त हेतुक से निवारित हो गया था तो वह उस कालावधि की समाप्ति के पश्चात् किया गया आवेदन ग्रहण कर सकता है ।
(4) आयुक्त इस धारा के अधीन किसी आदेश का पुनरीक्षण निम्नलिखित दशाओं में नहीं करेगा-
[(क) जहां उस आदेश के विरुद्ध अपील, [आयुक्त (अपील) को या अपील अधिकरण को] हो सकती है किन्तु की नहीं गई है और वह समय, जिसके भीतर ऐसी अपील की जा सकती है, समाप्त नहीं हुआ है या निर्धारिती ने अपील के अपने अधिकार का अधित्यजन नहीं किया है; या
(ख) जहां आदेश आयुक्त (अपील) को अपील का विषय बनाया गया है ।]
(5) इस धारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए निर्धारिती द्वारा दिए गए हर आवेदन के साथ पच्चीस रुपए की फीस होगी ।
[(6) निर्धारिती द्वारा 1 अक्तूबर, 1998 को या उसके पश्चात् इस उपधारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए किए गए प्रत्येक आवेदन पर उस वित्तीय वर्ष के अंत से, जिसमें निर्धारिती द्वारा पुनरीक्षण के लिए ऐसा आवेदन किया गया है, एक वर्ष के भीतर आदेश पारित किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए परिसीमा की अवधि की संगणना करने में धारा 21 के परन्तुक के अधीन निर्धारिती को पुनः सुने जाने का अवसर दिए जाने में लिए गए समय और उस अवधि को, जिसके दौरान इस धारा के अधीन कोई कार्यवाही किसी न्यायालय के किसी आदेश या व्यादेश द्वारा रोक दी जाती है, अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(7) उपधारा (6) में किसी बात के होते हुए भी, [अपील अधिकारण, राष्ट्रीय कर अधिकरण, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय] के आदेश में अंतर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप या उसे प्रभावी करने के लिए उपधारा (6) के अधीन पुनरीक्षण में आदेश, किसी भी समय पारित किया जा सकेगा ।]
स्पष्टीकरण 1-आयुक्त का वह आदेश जिसमें हस्तक्षेप करने से इंकार किया गया है, इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसा नहीं समझा जाएगा कि वह निर्धारिती पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आदेश है ।
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21. आय-कर अधिनियम के उपबन्धों का लागू होना-आय-कर अधिनियम की, निम्नलिखित धाराओं तथा अनुसूचियों के उपबन्ध और समय-समय पर यथाप्रवृत्त आय-कर (प्रमाण-पत्र कार्यवाही) नियम, 1962, आवश्यक उपान्तरों सहित उसी प्रकार लागू होंगे मानो उक्त उपबन्धों तथा नियमों में आय-कर के स्थान पर ब्याज-कर के प्रति निदेश है :-
[2 (44), [119,] 129, 131, 132, 132क, 132ख, 133 से 136 (दोनों सहित), 138, 140, 145, 156, 160, 161, 162, 163, 166, 167, 170, 173, 175, 176, 178, 179, 220, से 227 (दोनों सहित), 228क, 229, 232, 237 से 245 (दोनों सहित), 254 से 262 (दोनों सहित), 265, 266, 268, 269, 281, 281ख, 282, 284, 287, 288, 288क, 288ख, 289 से 293 (दोनों सहित), द्वितीय अनुसूची और तृतीय अनुसूची :]
परन्तु उक्त उपबन्धों और नियमों में निर्धारिती" के प्रति निदेशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे इस अधिनियम में यथापरिभाषित निर्धारिती के प्रति निर्देश हैं ।
22. इस अधिनियमों के प्रयोजनों के लिए आय-कर के कागज-पत्रों का उपलब्ध होना-(1) आय-कर अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, उस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किए गए किसी कथन या दी गई किसी विवरणी में या उस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्राप्त या संगृहीत सभी जानकारी का उपयोग इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है ।
(2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किए गए किसी कथन या दिए गए किसी विवरण में या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्राप्त या संगृहीत जानकारी का उपयोग आय-कर अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है ।
[23. सूचना का अनुपालन करने में असफलता-यदि कोई व्यक्ति, धारा 8 के अधीन पेश किए जाने के लिए अपेक्षित कोई लेखा या दस्तावेज पेश करने या या पेश कराने में, युक्तियुक्त हेतुक के बिना, असफल रहेगा तो, वह ऐसी प्रत्येक असफलता के लिए, शास्ति के रूप में, उतनी राशि का, जो एक हजार रुपए से कम की नहीं होगी किंतु पच्चीस हजार रुपए तक की हो सकेगी,संदाय करेगा ।
24. मिथ्या कथन-यदि कोई व्यक्ति, इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन किसी सत्यापन में कोई ऐसा कथन करेगा या कोई लेखा या विवरणी परिदत्त करेगा जो मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का या तो उसे ज्ञान है, या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है तो वह कठित कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी किन्तु सात वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
25. कर, आदि का जानबूझकर अपवंचन करने का प्रयास-यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य या अधिरोपणीय किसी ब्याज-कर, शास्ति या ब्याज का, किसी भी रीति से जानबूझकर अपवंचन करने का प्रयत्न करेगा तो वह, इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन, उस पर अधिरोणीय शास्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कठिन कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी किंतु सात वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य या अधिरोपणीय किसी ब्याज-कर, शास्ति या ब्याज के अथवा उसके संदाय के अपवंचन करने का जानबूझकर प्रयत्न करने के अन्तर्गत वह मामला है जिसमें कोई व्यक्ति-
(i) अपने कब्जे या नियंत्रण में कोई ऐसी लेखा पुस्तकें या अन्य दस्तावेजें रखता है, (जो लेखा पुस्तकें या अन्य दस्तावेज इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही से सुसंगत हैं) जिनमें कोई मिथ्या प्रविष्टि या कथन है; या
(ii) ऐसी लेखा पुस्तकों या अन्य दस्तावेजों में मिथ्या प्रविष्टि या कथन करता है या कराता है; या
(iii) ऐसी लेखा पुस्तकों या अन्य दस्तावेजों में से किसी सुसंगत प्रविष्टि या कथन का जानबूझकर लोप करता है या लोप कराता है; या
(iv) कोई ऐसी अन्य परिस्थितियां उत्पन्न कराता है जिनका प्रभाव ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य या अधिरोपणीय किसी ब्याज-कर, शास्ति या ब्याज का अथवा उसके संदाय का अपवंचन करने में समर्थ बनाना होगा ।
26. मिथ्या विवरणी, आदि का दुष्प्रेरण-यदि कोई व्यक्ति किसी प्रभार्य ब्याज के संबंध में कोई ऐसा लेखा या कथन या घोषणा, जो मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का या तो उसे ज्ञान है, या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, करने और परिदत्त करने के लिए या धारा 25 के अधीन कोई अपराध करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को किसी रीति से दुष्प्रेरित या उत्प्रेरित करेगा तो वह कठिन कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी किन्तु सात वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
26क. प्रत्यय संस्थाओं द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी प्रत्यय संस्था द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस प्रत्यय संस्था के कारबार के संचालन के लिए उस प्रत्यय संस्था का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह प्रत्यय संस्था भी ऐसे अपराध की दोषी समझी जाएगी और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने की भागी होगी :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी प्रत्यय संस्था द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध प्रत्यय संस्था के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, सहकारी सोसाइटी के संबंध में, निदेशक" से उसके कार्यकलापों को नियंत्रित करने वाला कोई सदस्य अभिप्रेत है ।
26ख. कार्यवाहियों का संस्थित किया जाना और अपराधों का प्रशमन-(1) किसी व्यक्ति के विरुद्ध धारा 24 या धारा 25 या धारा 26 के अधीन किसी अपराध के लिए अथवा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अधीन किसी अपराध के लिए कोई कार्यवाही, आयुक्त या आयुक्त (अपील) की पूर्व मंजूरी से ही की जाएगी, अन्यथा नहीं :
परन्तु यथास्थिति, मुख्य आयुक्त या महानिदेशक, इस उपधारा के अधीन कार्यवाही संस्थित करने के लिए, पूर्वोक्त ब्याज-कर प्राधिकारियों को ऐसे अनुदेश या निदेश जारी कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अपराध का प्रशमन, कार्यवाही संस्थित किए जाने के पूर्व या पश्चात्, मुख्य आयुक्त या महानिदेशक द्वारा किया जा सकेगा ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस अधिनियम के अधीन आदेश, अनुदेश या निदेश जारी करने की बोर्ड की शक्ति के अन्तर्गत इस धारा के अधीन अपराधों के समुचित प्रशमन के लिए अन्य ब्याज-कर प्राधिकारियों को अनुदेश या निदेश (जिनके अन्तर्गत बोर्ड का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त करने के लिए निदेश या अनुदेश है) देने की शक्ति सम्मिलित है ।
26ग. कतिपय करारों में फेरफार करने की प्रत्यय संस्था की शक्ति-किसी ऐसे करार में, जिसके अधीन किसी प्रत्यय संस्था द्वारा 1 अक्तूबर, 1991 के पूर्व कोई सावधि उधार मंजूर किया गया है, किसी बात के होते हुए भी, प्रत्यय संस्था के लिए करार में ऐसा फेरफार करना विधिपूर्ण होगा जिससे कि उसमें अनुबंधित ब्याज की दर में उस विस्तार तक वृद्धि की जा सके जिस तक ऐसी संस्था उस सावधि उधार पर, जो प्रत्यय संस्था को देय है, ब्याज की रकम के संबंध में इस अधिनियम के अधीन ब्याज-कर का संदाय करने के लिए दायी है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए सावधि उधार" से ऐसा उधार अभिप्रेत है जो मांग पर प्रतिसंदेय नहीं है ।]
27. नियम बनाने की शक्ति-(1) बोर्ड केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकता है ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित में से सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकते हैं, अर्थात् :-
(क) वह प्ररूप जिसमें धारा 7 के अधीन विवरणियां दी जा सकेंगी और वह रीति जिससे वे सत्यापित की जा सकेंगी;
(ख) वह प्ररूप जिसमें धारा 15 या धारा 16 के अधीन अपीलें दाखिल की जा सकेंगी और वह रीति जिसमें वे सत्यापित की जाएंगी;
(ग) वह प्रक्रिया जिसका भूलों को सुधारने के आवेदनों और प्रतिदायों के आवेदनों में अनुसरण किया जाएगा;
(घ) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के अधीन विहित किए जाने हैं या विहित किए जा सकते हैं ।
(3) इस धारा द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत उसके प्रयोग के प्रथम अवसर पर उन नियमों या उनमें से किसी को किसी ऐसी तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से पहले की नहीं है, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति होगी ।
(4) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा रखवाया जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहित तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
28. छूट देने की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि या तो लोकहित में या मामले की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं [किसी प्रत्यय संस्था या प्रत्यय संस्थाओं के किसी वर्ग को अथवा उधारों या अग्रिमों के किसी प्रवर्ग पर किसी ब्याज को] ब्याज-कर के उद्ग्रहण से छूट दे सकती है :
परन्तु ऐसी छूट भारतीय रिजर्व बैंक की सिफारिश पर ही दी जाएगी अन्यथा नहीं ।
29. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति- [(1)] यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, कठिनाई को दूर कर सकती है :
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात्, नहीं किया जाएगा ।
[(2) यदि वित्त (संख्यांक 2) अधिनियम, 1991 द्वारा संशोधित इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, ऐसी कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए कोई ऐसी बात कर सकेगी जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो :
परन्तु ऐसा कोई आदेश 1 अक्तूबर, 1991 से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।]
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