नौसेना अधिनियम, 1957
(1957 का अधिनियम संख्यांक 62)
[27 दिसम्बर, 1957]
भारतीय नौसेना के शासन से सम्बन्धित विधि का
समेकन और संशोधन करने के लिए
अधिनियम
भारण गणराज्य के आठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम नौसेना अधिनियम, 1957 कहा जा सकेगा ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. नौसैनिक विधि के अध्यधीन व्यक्ति-(1) निम्नलिखित व्यक्ति, अर्थात्: -
(क) भारतीय नौसेना का हर व्यक्ति, उस समय के दौरान, जिसमें उस पर इस अधिनियम के अधीन सेवा का दायित्व है;
(ख) भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल का हर व्यक्ति जब कि वह-
(i) सक्रिय सेवा पर है, अथवा
(ii) नौसैनिक सेवा की किसी भी सम्पत्ति में या पर, जिसके अन्तर्गत नौसैनिक स्थापन, पोत और अन्य जलयान, वायुयान, यान और अस्त्रागार आते हैं; अथवा
(iii) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसरण में प्रशिक्षण के लिए आहूत किया गया है या प्रशिक्षण पा रहा है, तब तक जब तक वह अपने प्रशिक्षण से सम्यक् रूप से निर्मुक्त न कर दिया जाए; अथवा
(iv) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसरण में भारतीय नौसेना में वास्तविक सेवा के लिए आहूत किया गया है, तब तक जब तक वह उससे सम्यक् रूप से निर्मुक्त न कर दिया जाए, से अथवा
(v) वर्दी में है;
(ग) नियमित सेना और वायुसेना के सदस्य, जब कि वे भारतीय नौसेना कि किसी पोत या वायुयान के फलक पर चढ़े हुई हैं, इतने विस्तार तक और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं;
(घ) हर व्यक्ति जो अन्यथा नौसैनिक विधि के अध्यधीन न होते हुए केन्द्रीय सरकार के साथ धारा 6 के अधीन वचनबद्ध करता है;
(ङ) इस अधिनियम के अधीन समुत्थापित किन्हीं सहायक बलों का हर व्यक्ति, इतने विस्तार तक और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं; तथा
(च) हर व्यक्ति, जो यद्यपि वह अन्यथा नौसैनिक विधि के अध्यधीन न होता, किसी अन्य अधिनियम द्वारा, या सक्रिय सेवा के दौरान उन विनियमों द्वारा, जो इस अधिनियम के अधीन इस निमित्त बनाए गए हों, नौसैनिक विधि के अध्यधीन कर दिया गया है, इतने विस्तार तक और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं,
जहां कहीं भी हों, नौसैनिक विधि के अध्यधीन होंगे ।
(2) निम्नलिखित व्यक्ति, अर्थात्-
(क) हर व्यक्ति जिसकी बाबत यह आदेश दिया गया है कि वह भारतीय नौसेना के किसी पोत या वायुयान के फलक पर ले लिया जाए या जो उस फलक पर यात्री है, इतने विस्तार तक और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं;
(ख) हर व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन कारावास या निरोध के लिए दण्डादिष्ट किया गया है, उसके दण्डादेश की अवधि पर्यन्त, इस बात के होते हुए भी कि वह नौसैनिक सेवा से उन्मुक्त या सकलंक या बिना कलंक पदच्युत किया गया है या जो इस उपबन्ध के अभाव में अन्यथा नौसैनिक विधि के अध्यधीन न रह जाएगा,
नौसैनिक विधि के अध्यधीन व्यक्ति समझे जाएंगे ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(1) सक्रिय सेवा" से-
(क) संविधान के अनुच्छेद 352 के खण्ड (1) के अधीन निकाली गई आपात की उद्घोषणा के प्रवर्तन की कालावधि के दौरान की, अथवा
(ख) किसी ऐसी कालावधि के दौरान की, जिसे केन्द्रीय सरकार ने किसी ऐसे क्षेत्र के प्रति निर्देश से, जिसमें नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति या किसी वर्ग के व्यक्ति सेवा कर रहे हों, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा सक्रिय सेवा की कालावधि घोषित किया है,
सेवा या कर्तव्य अभिप्रेत है ;
(2) नौसेनाध्यक्ष" से राष्ट्रपति द्वारा नौसेनाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया फ्लैग आफिसर या छुट्टी पर या अन्यथा उसकी अनुपस्थिति में वह आफिसर, जिसे केन्द्रीय सरकार ने उस रूप में कार्यवहन करने के लिए नियुक्त किया हो, या ऐसी स्थानापन्न नियुक्ति के अभाव में, वह आफिसर जिसे समादेशाधिकार, इस अधिनियम के अधीन बनाए विनियमों के अनुसार न्यागत होता है, अभिप्रेत है ;
(3) सिविल अपराध" से भारत में मामूली दाण्डिक अधिकारिता के न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध अभिप्रेत है ;
(4) सिविल कारागार" से ऐसी जेल या स्थान अभिप्रेत है, जो किसी आपराधिक कैदी के निरोध के लिए कारागार अधिनियम, 1894 (1894 का 9) के अधीन या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन प्रयुक्त किया जाता हो ;
(5) आयुक्त आफिसर" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है, जो भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल में राष्ट्रपति से आयोग धारण किए हुए है ;
(6) सेना-न्यायालय" से इस अधिनियम के अधीन गठित सेना-न्यायालय अभिप्रेत है ;
(7) शत्रु" के अन्तर्गत ऐसे सब सायुध बागी, सशस्त्र सैन्य विद्रोही, सायुध बल्वाकारी और जल-दस्यु और ऐसा कोई उद्यतायुध व्यक्ति आता है, जिसके विरुद्ध कार्य करना किसी ऐसे व्यक्ति का कर्तव्य है जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन है ;
(8) फ्लैग आफिसर" से फ्लीट एडमिरल, एडमिरल, वायस रियर एडमिरल के रैंक का आफिसर अभिप्रेत है ;
(9) भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल" से केन्द्रीय सरकार द्वारा समुत्थापित और बनाए रखा गया नौसैनिक रिजर्व बल अभिप्रेत है ;
(10) भारतीय नौसेना" से केन्द्रीय सरकार द्वारा समुत्थापित और बनाए रखा गया नियमित नौसैनिक बल अभिप्रेत है ;
(11) भारतीय जल-क्षेत्र" से, धाराओं 31, 97 और 99 के प्रयोजनों के लिए, वह समुद्र अभिप्रेत है, जो भारत के समुद्र तट से ऐसी सीमाओं तक विस्तृत है, जो विहित की जाएं ;
(12) नौसैनिक अभिरक्षा" से विहित रीति से या नौसैनिक सेवा की प्रथाओं के अनुसार किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या परिरोध अभिप्रेत है और सैनिक या वायुसेना अभिरक्षा इसके अन्तर्गत आती है ;
[(12क) नौसैनिक स्थापन" से भारतीय नौसेना का या उसके नियंत्रण में का स्थापन अभिप्रेत है, चाहे वह भारत के भीतर हो या बाहर ;]
(13) नौसैनिक अपराध" से धाराओं 34 से 76 तक के अधीन के अपराधों में से कोई अपराध अभिप्रेत है ;
(14) नौसैनिक सेवा" से भारत का नौसैनिक संगठन अभिप्रेत है ;
(15) नौसैनिक अधिकरण" से धारा 97 के अधीन गठित सेना-न्यायालय अभिप्रेत है, और धारा 96 के अधीन गठित अनुशासन न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन दण्ड देने की शक्तियों का प्रयोग करने वाला कमान आफिसर या अन्य आफिसर या प्राधिकारी इसके अन्तर्गत आता है ;
(16) आफिसर" से आयुक्त आफिसर अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत आता ;-
(क) पैटी आफिसर से भिन्न अधीनस्थ आफिसर है ;
(ख) उसी हैसियत में पुनर्नियोजित कोई आयुक्त आफिसर है ;
[(17) पैटी आफिसर" से इस रूप में रेट किया गया नौसैनिक अभिप्रेत है और मुख्य पैटी आफिसर तथा मास्टर मुख्य पैटी आफिसर इसके अन्तर्गत आते हैं ;]
(18) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(19) प्रोवो मार्शल" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो धारा 89 के अधीन इस रूप में नियुक्त है और उसके उपपदीयों या सहायकों में से कोई, या कोई अन्य व्यक्ति, जो उसके अधीन या उसकी ओर से प्राधिकार का वैध रूप से प्रयोग कर रहा है, उसके अन्तर्गत आता है ;
(20) [नौसैनिक] से आफिसर से भिन्न नौसैनिक सेवा में का कोई व्यक्ति अभिप्रेत है ;
(21) पोत के फलक पर" पद में के सिवाय पोत" के अन्तर्गत, भारतीय नौसेना का ऐसा स्थापन आता है जो नौसेना की रूढ़ि के अनुसार पोत के रूप में प्रयुक्त किया गया है ;
(22) नौसैनिक विधि के अध्यधीन" से किसी अपराध के लिए इस अधिनियम के अधीन गिरफ्तार और विचारित किए जाने के दायित्व के अधीन होना अभिप्रेत है ;
(23) अधीनस्थ आफिसर" से भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल की किसी शाखा में कार्यकारी सब-लेफ्टिनेंट, मिडशिपमैन या कैडट के रूप में नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है, किन्तु कोई कैडेट, जब कि वह किसी संयुक्त सेवा संस्था में प्रशिक्षणाधीन है, इसके अन्तर्गत नहीं आता ;
(24) वरिष्ठ आफिसर" से जब कि वह उस व्यक्ति के संबंध में प्रयुक्त हुआ है, जो नैसैनिक विधि के अध्यधीन है, कोई ऐसा आफिसर या पैटी आफिसर अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन उस व्यक्ति से ज्येष्ठ है और कोई ऐसा आफिसर या पैटी आफिसर अभिप्रेत है, जो यद्यपि उस व्यक्ति से इस प्रकार ज्येष्ठ नहीं है पर उस व्यक्ति को समादेश देने का इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए विनियमों के अधीन हकदार है, और जब कि ऐसा व्यक्ति विहित शर्तों के अधीन सेवा कर रहा है, तब उस व्यक्ति के रैंक से आपेक्षिक उच्चतर रैंक का या उस व्यक्ति को समादेश देने के लिए इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए विनियमों के अधीन हकदार नियमित सेना या वायुसेना का आफिसर, कनिष्ठ आयुक्त आफिसर, वारण्ट या अनायुक्त आफिसर इसके अन्तर्गत आता है ;
(25) जो शब्द और पद इस अधिनियम में प्रयुक्त किए गए हैं, किन्तु इसमें परिभाषित नहीं हैं और भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) में परिभाषित हैं, उन सब के वे ही अर्थ होंगे जो क्रमशः उन्हें उस संहिता में समनुदिष्ट किए गए हैं ।
4. मूल अधिकारों का नौसैनिक विधि के अध्यधीन व्यक्तियों को उपान्तर सहित लागू होना-संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकार नौसैनिक विधि के अध्यधीन के व्यक्तियों को लागू होने में उस विस्तार तक निर्बन्धित या निराकृत होंगे जो इस अधिनियम में उपबन्धित हैं ।
अध्याय 2
नौसैनिक बल
5. नौसैनिक बल समुत्थापित और बनाए रखने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार एक नियमित नौसैनिक बल तथा रिजर्व और सहायक नौसैनिक बलों को समुत्थापित और बनाए रख सकेगी ।
अध्याय 3
कतिपय दशाओं में अनुशासन के संबंध में विशेष उपबंध
6. केन्द्रीय सरकार की सेवा करने को वचनबद व्यक्तियों के अनुशासन के लिए उपबन्ध-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो अन्यथा नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है-
(क) किसी विशिष्ट पोत में, अथवा
(ख) ऐसे विशिष्ट पोत में या ऐसे पोतों में, जैसे केन्द्रीय सरकार, नौसेनाध्यक्ष या विहित प्राधिकारी समय-समय पर अवधारित करें,
सेवा करने के लिए केंद्रीय सरकार के साथ वचनबंध करता है और वचनबंध करने पर नौसैनिक विधि के अध्यधीन हो जाने का करार करता है, तो जब तक वह वचनबंध प्रवृत्त रहे, और इस बात के होते हुए भी कि तत्समय प्रवृत्त वह किसी पोत में सेवा नहीं कर रहा है, वह व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन होगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगी कि ऐसे अपवादों के अध्यधीन रहते हुए, जो विशिष्ट मामलों में नौसेनाध्यक्ष द्वारा या की ओर से किए जाएं, किसी ऐसे वर्ग के व्यक्ति, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, उस दौरान, जिसमें वे इस धारा के आधार पर नौसैनिक विधि के अध्यधीन हों, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए या इस अधिनियम के ऐसे उपबंधों के प्रयोजनों के लिए, जो ऐसे विनिर्दिष्ट किए जाएं, यथास्थिति, आफिसर, पैटी आफिसर या अन्य [नौसैनिक] समझे जाएंगे ।
7. नौसेना, सेना और वायुसेना के एक साथ कार्य करने वाले सदस्यों के बीच सम्बन्ध-(1) जब कि नियमित सेना और वायुसेना या इन दोनों बलों में से किसी के सदस्य, भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल के सदस्यों के साथ विहित शर्तों के अधीन सेवा कर रहे हैं, तब नियमित सेना या वायुसेना के वे सदस्य ऐसे समादेश का, यदि कोई हो, प्रयोग करेंगे और ऐसे अनुशासन के अध्यधीन होंगे, जो विहित किया जाए ।
(2) उपधारा (1) में किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह दण्ड देने की शक्तियों का प्रयोग धारा 93 की उपधारा (3) के खण्ड (ङ) में यथा उपबंधित के सिवाय [या ऐसे मामलों के सिवाय और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं,] नियमित सेना या वायुसेना के सदस्यों द्वारा भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल के सदस्यों पर किया जाना प्राधिकृत करती है ।
8. कानवाय में के वाणिज्यिक पोत के मास्टर के अनुशासन के लिए उपबन्ध-(1) भारतीय नौसेना के आफिसर के समादेशाधीन के कानवाय में समाविष्ट किसी वाणिज्यिक या अन्य जलयान का हर मास्टर या तत्समय समादेश रखने वाला अन्य व्यक्ति कानवाय के नौपरिवहन या सुरक्षा से सम्बद्ध सब मामलों में उन निदेशों का पालन करेगा जो ऐसे आफिसर द्वारा दिए जाएं, और शत्रु से बचने के लिए ऐसी पूर्वावधानियां बरतेगा जो किन्हीं ऐसे निदेशों द्वारा अपेक्षित हों ।
(2) यदि किन्हीं ऐसे निदेशों का पालन न हो तो ऐसा कोई भी आफिसर या उसके आदेशों के अधीन कार्य करने वाला कोई भी व्यक्ति आयुधों के बल से उनका पालन उसके परिणामस्वरूप होने वाली किसी क्षति या जीवन हानि के लिए या सम्पत्ति को हुए खतरे या संपत्ति को हुई हानि के लिए दायी हुए बिना, करा सकेगा ।
अध्याय 4
आयोग, नियुक्तियां और अभ्यावेशन
9. नियुक्ति या अभ्यावेशन के लिए पात्रता-(1) केन्द्रीय सरकार की सम्मति के बिना कोई भी व्यक्ति, जो भारत का नागरिक नहीं है, भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल में नियुक्ति या अभ्यावेशन का पात्र नहीं होगा :
परन्तु इस धारा में की कोई भी बात किसी व्यक्ति को भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल में नियुक्ति या अभ्यावेदन का अपात्र इस आधार पर नहीं करेगी कि वह नेपाल की प्रजा है ।
(2) कोई भी नारी भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल के भागरूप या तत्संलग्न ऐसे विभाग, शाखा या अन्य निकाय में और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रहते हुए, जैसी केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, नियुक्ति या अभ्यावेशित होने की पात्र होने के सिवाय भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल मे नियुक्ति या अभ्यावेशन की पात्र नहीं होगी ।
10. आयोग और नियुक्तियां-(1) अधीनस्थ आफिसरों से भिन्न आफिसर राष्ट्रपति द्वारा अनुदत्त आयोग से नियुक्त किए जाएंगे ।
(2) आयोग का अनुदान शासकीय राजपत्र में अधिसूचित किया जाएगा और ऐसी अधिसूचना ऐसे आयोग के अनुदान का निश्चायक सबूत होगी ।
(3) अधीनस्थ आफिसर ऐसी रीति से नियुक्त किए जाएंगे और ऐसा रैंक धारण करेंगे, जैसा विहित किया जाए ।
11. अभ्यावेशन-(1) इस अधिनियम में यथा अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, [नौसेनिकों] की सेवा के निबन्धन और शर्तें, 3[नौसैनिकों] के रूप में सेवा के लिए अभ्यावेशित करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति और ऐसे अभ्यावेशन की रीति और प्रक्रिया ऐसी होगी जैसी विहित की जाए ।
(2) कोई भी व्यक्ति, प्रथमतः [बीस वर्ष] से अधिक की कालावधि के लिए भारतीय नौसेना में 1[नौसैनिक] के रूप में अभ्यावेशित नहीं किया जाएगा:
परन्तु किसी अप्राप्तवय की दशा में [बीस वर्ष] की उक्त कालावधि उस तारीख से गिनी जाएगी, जब वह सत्रह वर्ष की आयु पूरी कर लेता है ।
(3) किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी यह है कि-
(क) इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति का अभ्यावेशन उसकी अप्राप्तवयता के दौरान और उसके प्राप्तवय हो जाने के पश्चात् भी उसके लिए आबद्धकर होगा;
(ख) इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से अभ्यावेशित अप्राप्तवय के न तो माता या पिता, न संरक्षक और न अन्य कोई व्यक्ति हकदार होगा कि केन्द्रीय सरकार के मुकाबले में अथवा उक्त अप्राप्तवय के उपरिस्थापित केन्द्रीय सरकार के आफिसरों या अन्य व्यक्तियों में से किसी के मुकाबले में वह, उक्त अप्राप्तवय की अभिरक्षा का दावा कर सके ।
12. अभ्यावेशन को विधिमान्यता-जहां कि कोई व्यक्ति, अपने अभ्यावेशन के पश्चात् उस अभ्यावेशन की तारीख से तीस मास की कालावधि पर्यन्त [नौसैनिक] के रूप में वेतन लेता रहा है, वहां यह समझा जाएगा कि वह सम्यक् रूप से अभ्यावेशित हो गया है और तत्पश्चात् वह अपने वचनबन्ध में किसी अनियमितता या अवैधता के आधार पर या किसी भी अन्य आधार पर चाहे वह कुछ भी क्यों न हो अपने उन्मोचन का दावा करने का हकदार नहीं होगा, और यदि उक्त तीन मास के अन्दर ऐसा व्यक्ति अपने उन्मोचन का दावा करता है तो जब तक वह व्यक्ति अपने दावे के अनुसरण में उन्मोचित नहीं कर दिया जाता, ऐसी कोई अनियमितता या अवैधता या अन्य आधार, नौसैनिक सेवा में 2[नौसैनिक] के रूप में उसकी स्थिति पर प्रभाव नहीं डालेगा और उन उसके उन्मोचन से पूर्व की गई किसी कार्यवाही, कार्य या बात को अविधिमान्य बनाएगा ।
13. राजनिष्ठा की शपथ-हर आफिसर और हर 2[नौसैनिक] नियुक्ति या अभ्यावेशन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र उस पोत के, जिसका वह अंग है कमान आफिसर के समक्ष, या विहित आफिसर के समक्ष निम्नलिखित प्ररूप में शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा, और उसे हस्ताक्षरित करेगा, अर्थात्-
“मैं ................ ईश्वर की शपथ लेता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्वा और निष्ठा सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
रखूंगा और जैसा कि मैं कर्तव्य द्वारा आबद्ध हूं ईमानदारी से और वफादरी से नौसैनिक सेवा में कार्य करूंगा, और समुद्र, भूमि या वायुमार्ग से जहां कहीं जाने का मुझे आदेश मिलेगा, वहां जाऊंगा और मैं राष्ट्रपति के सब समादेशों का और अपने उपारिस्थापित वरिष्ठ आफिसर के समादेशों का अपने जीवन की जोखिम उठाकर भी पालन करूंगा ।"
अध्याय 5
सेवा की शर्तें
14. आफिसरों और नाविकों का सेवा करने का दायित्व-(1) उपधारा (4) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए आफिसर और 2[नौसैनिक], यथास्थिति, भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल में सेवा करने के दायित्व के अधीन तब तक रहेंगे, जब तक उन्हें सम्यक् रूप से उन्मोचित, पदच्युत, सकलंक पदच्युति, निवृत्त, पदत्याग करने के लिए अनुज्ञात या निर्मुक्त न कर दिया जाए ।
(2) कोई भी आफिसर, केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा के बिना अपने पद का त्याग करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा, और कोई भी 2[नौसैनिक] विहित आफिसर की अनुज्ञा के बिना अपने पद का त्याग करने के लिए स्वतंत्र नहीं होगा ।
(3) किसी त्यागपत्र का प्रतिग्रहण, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सम्पृक्त आफिसर के स्वविवेकाधिकार में का विषय होगा ।
(4) निवृत्त किए गए या पदत्याग करने के लिए अनुज्ञात किए गए आफिसर इस दायित्व के अधीन रहेंगे कि आपात के समय नौसैनिक सेवा में उन्हें इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार पुनः बुला लिया जाए और ऐसे पुनः बुलाए जाने पर वे तब तक सेवा करने के दायित्व के अधीन रहेंगे जब तक वे सम्यक् रूप से उन्मोचित, पदच्युत, निवृत्त, पदत्याग करने के लिए अनुज्ञात या निर्मुक्त न कर दिए जाएं ।
15. आफिसरों और नाविकों की सेवावृत्ति-(1) हर आफिसर और 2[नौसैनिक] राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेगा ।
(2) इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए विनियमों के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि-
(क) केन्द्रीय सरकार किसी भी आफिसर या 2[नौसैनिक] को नौसैनिक सेवा से [पदच्युत या] उन्मोचित या निवृत्त कर सकेगी;
(ख) नौसेनाध्यक्ष या कोई विहित आफिसर किसी भी 2[नौसैनिक] को नौसैनिक सेवा से 3[पदच्युत या] उन्मोचित कर सकेगा ।
16. वचनबन्ध के अवसान पर उन्मोचन-धारा 18 के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, कोई भी [नौसैनिक] सेवा की उस अवधि के अवसान पर, जिसके लिए वह वचनबद्ध है तब के सिवाय उन्मोचित किए जाने का हकदार होगा जब कि-
(क) ऐसा अवसान सक्रिय सेवा के दौरान होता है, जिस दशा में वह ऐसी अपर कालावधि पर्यन्त सेवा में बने रहने के दायित्व के अधीन होगा, जो नौसेनाध्यक्ष द्वारा अपेक्षित की जाए, अथवा
(ख) वह इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार अभ्यावेशित कर लिया जाता है ।
17. उन्मोचन के बारे में उपबन्ध-(1) धारा 16 के अधीन उन्मोचित किए जाने का हकदार 1[नौसैनिक] सुविधानुसार पूर्ण शीघ्रता से, और किसी भी दशा में उसके ऐसा हकदार हो जाने के एक मास के अन्दर उन्मोचित कर दिया जाएगाः
परन्तु जहां कि कोई 1[नौसैनिक] उस समय, जब कि वह उन्मोचित किए जाने का हकदार है, समुद्र पार सेवा कर रहा है, वहां सुविधानुसार पूर्ण शीघ्रता से और किसी भी दशा में उसके ऐसा हकदार हो जाने के तीन मास के अन्दर, उसे इस प्रयोजन से कि वह उन्मोचित किया जाए, भारत लौटाया जाएगा:
परन्तु यह और भी कि जहां कि वह अभ्यावेशित व्यक्ति, जो ऐसी समुद्र पार सेवा कर रहा है, भारत लौटने का इच्छुक नहीं है, वहां उसे उस स्थान पर उन्मोचित किया जा सकेगा जहां वह उस समय है ।
(2) उन्मोचित किया गया हर 1[नौसैनिक] उस स्थान से, जहां वह उस समय है, भारत में किसी भी स्थान को, जहां वह जाने का इच्छुक है, कोई खर्चा दिए बिना प्रवहित किए जाने का हकदार होगा ।
(3) अभ्यावेशित व्यक्ति पूर्ववर्ती उपधाराओं में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी सेवा करने के दायित्व के अधीन रहेगा, जब तक वह सम्यक् रूप से उन्मोचित न कर दिया जाए ।
(4) हर 1[नौसैनिक] को, जो सेवा से पदच्युत, उन्मोचित, निवृत्त, पदत्याग करने के लिए अनुज्ञात या निर्मुक्त किया जाता है, विहित आफिसर द्वारा उस भाषा में, जो ऐसे 1[नौसैनिक] की मातृभाषा है, और अंग्रेजी भाषा में भी एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा जिसमें निम्नलिखित उपवर्णित होंगे-
(क) उसकी सेवा का पर्यवसान करने वाला प्राधिकारी;
(ख) ऐसे पर्यवसान का कारण; तथा
(ग) भारतीय नौसेना और भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल में उसकी सेवा की पूर्ण कालावधि ।
18. पदच्युक्त करने की नौसैनिक अधिकरणों की शक्तियों की व्यावृत्ति-इस अध्याय में कोई भी बात किसी नौसैनिक अधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन नौसैनिक सेवा से पदच्युत या सकलंक पदच्युति का दण्ड दिए जाने पर प्रभाव न डालेगी ।
19. संगम बनाने के अधिकार, वाक् स्वातन्त्र्य इत्यादि के विषय में निर्बन्धन-(1) कोई भी व्यक्ति जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, केन्द्रीय सरकार की अभिव्यक्त मंजूरी के बिना, -
(क) किसी व्यवसाय संघ, श्रमिक संघ या राजनीतिक संगम, अथवा व्यवसाय संघों, श्रमिक संघों या राजनीतिक संगमों के किसी वर्ग का सदस्य या उससे किसी रूप में सहयुक्त न होगा; अथवा
(ख) किसी अन्य सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन का, जिसे संघ के सशस्त्र बलों के भाग के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है या जो केवल सामाजिक, आमोद-प्रमोदात्मक या धार्मिक प्रकृति का नहीं है, सदस्य या उससे किसी रूप में सहयुक्त न होगा ।
स्पष्टीकरण-यदि कोई प्रश्न उठे कि क्या कोई सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन, केवल सामाजिक, आमोद-प्रमोदात्मक या धार्मिक प्रकृति का है, तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई भी व्यक्ति, व्यक्तियों के किसी निकाय द्वारा किन्हीं राजनीतिक प्रयोजनों के लिए या ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उस निमित्त विनिर्दिष्ट किए जाएं, संगठित किसी सभा में हाजिर नहीं होगा, न उसे सम्बोधित करेगा और न ऐसे संगठित किसी प्रदर्शन में कोई भाग लेगा ।
(3) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई भी व्यक्ति केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना प्रेस को कोई संसूचना नहीं देगा, न कोई पुस्तक, पत्र या अन्य दस्तावेज प्रकाशित करेगा या प्रकाशित कराएगा जो नौसेना, सेना या वायुसेना के विषय से सम्बद्ध है या जिसमें कोई ऐसा तथ्य या राय अन्तर्विष्ट है जो सरकार और जनता या उसके किसी भाग के बीच या सरकार और किसी विदेश के बीच सम्बन्धों में उलझन उत्पन्न करने के लिए प्रकल्पित है ।
(4) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई भी व्यक्ति तब तक जब तक वह इस प्रकार अध्यधीन रहता है नौसेनाध्यक्ष की पूर्व मंजूरी के बिना कोई वृत्ति या कोई उपजीविका, व्यापार या कारबार नहीं करेगा ।
[19क. भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल के व्यक्तियों को भारतीय नौसेना में प्रशिक्षण की या वास्तविक सेवा की कालावधि के पर्यवसान पर पुनःपदस्थ किया जाना-(1) यदि भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल का कोई व्यक्ति, किसी नियोजक के अधीन अपने नियोजन की कालावधि के दौरान, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं विनियमों के अधीन अपने दायित्व के अनुसरण में भारतीय नौसेना में प्रशिक्षण के लिए आहूत किया जाता है या वास्तविक सेवा के लिए आहूत किया जाता है तो ऐसे प्रत्येक नियोजक का यह कर्तव्य होगा कि वह अपने नियोजन में के उस व्यक्ति को भारतीय नौसेना में उसके प्रशिक्षण की या उसमें सेवा की कालावधि के पर्यवसान पर किसी उपजीविका में और ऐसी शर्तों के अधीन पुनःपदस्थ करे जो उन शर्तों से कम अनुकूल न हों जो उसे उस नियोजन में तब लागू होती जब उसके नियोजन में इस प्रकार विघ्न न पड़ा है, तो :
परन्तु यदि नियोजक ऐसे व्यक्ति को पुनःपदस्थ करने से इंकार करता है या ऐसे व्यक्ति को पुनःपदस्थ करने के अपने दायित्व से मुकर जाता है या यदि नियोजक यह अभ्यावेदन करता है कि ऐसे व्यक्ति का पुनःपदस्थ किया जाना किसी कारण से असाध्य है, तो दोनों पक्षकारों में से कोई ऐसे मामले को इस निमित्त विहित प्राधिकारी को निर्दिष्ट कर सकेगा और वह प्राधिकारी उन सभी बातों पर विचार करने के पश्चात् जो उसके समक्ष प्रस्तुत की जाएं तथा मामले में ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात् जो विहित की जाए-
(क) नियोजक को इस धारा के उपबन्धों से छूट देते हुए, अथवा
(ख) नियोजक से ऐसे व्यक्ति को ऐसे निबन्धनों पर, जो प्राधिकारी उचित समझे, पुनर्नियोजित करने की अपेक्षा करते हुए, अथवा
(ग) नियोजक से ऐसे व्यक्ति को पुनर्नियोजित करने में असफलता या असमर्थता के लिए प्रतिकर के रूप में ऐसी दर से जिससे उसका अन्तिम पारिश्रमिक नियोजक द्वारा उसे संदेय था, छह मास के पारिश्रमिक के बराबर रकम से अनधिक राशि का संदाय करने की अपेक्षा करते हुए,
आदेश पारित करेगा ।
(2) यदि कोई नियोजक किसी ऐसे प्राधिकारी के, जो उपधारा (1) के परन्तुक में निर्दिष्ट है, आदेश का पालन करने में असफल रहेगा, तो वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और वह न्यायालय, जिसके द्वारा निजोजक इस उपधारा के अधीन सिद्धदोष ठहराया जाता है (यदि उक्त प्राधिकारी द्वारा पहले ही उससे ऐसी अपेक्षा न की गई हो तो), उसे यह आदेश देगा कि वह उस व्यक्ति को, जिसे वह पुनर्नियोजित करने में असफल रहा है, ऐसी दर से जिससे उसका अन्तिम पारिश्रमिक नियोजक द्वारा उसे संदेय था, छह मास के पारिश्रमिक के बराबर राशि का संदाय करे और उक्त प्राधिकारी या न्यायालय ने जिस रकम के संदाय के लिए इस प्रकार अपेक्षा की हो वह रकम उसी प्रकार वसूलीय होगी, मानो वह ऐसे न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माना हो ।
(3) इस धारा के अधीन किसी कार्यवाही में नियोजक के लिए यह साबित करना प्रतिवाद होगा कि जो व्यक्ति पहले नियोजित था उसने भारतीय नौसेना में अपने प्रशिक्षण या सेवा की कालावधि के पर्यवसान से दो मास की कालावधि के अन्दर नियोजक से अपने पुनःपदस्थ किए जाने के लिए आवेदन नहीं किया था ।
(4) उपधारा (1) द्वारा नियोजक पर अधिरोपित यह कर्तव्य कि वह अपने नियोजन में ऐसे व्यक्ति को, जिसका वर्णन उस उपधारा में किया गया है, पुनःपदस्थ करे ऐसे नियोजक का होगा जो ऐसे व्यक्ति के नियोजन का पर्यवसान भारतीय नौसेना में प्रशिक्षण के लिए वास्तविक रूप से आहूत किए जाने या वास्तविक सेवा में आहूत किए जाने के पूर्व, ऐसी परिस्थितियों में कर देता है जिनसे यह संकेत मिलता है कि उसका आशय उस उपधारा द्वारा अधिरोपित कर्तव्य का अपवंचन करना था और यदि ऐसा पर्यवसान इस अधिनियम के अधीन भारतीय नौसेना में प्रशिक्षण या सेवा के लिए उसे आहूत किए जाने के आदेशों के जारी करने के पश्चात् किया जाता है, तो जब तक प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए ऐसे आशय की उपधारण की जाएगी ।
19ख. भारतीय नौसेना में प्रशिक्षण या वास्तविक सेवा के लिए आहूत किए जाने पर भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल की सेवा के अधिकारों का परिरक्षण-जब कोई व्यक्ति, जो भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल का है और इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं विनियमों के अधीन अपने दायित्व के अनुसरण में भारतीय नौसेना में प्रशिक्षण के लिए आहूत किया जाता है या वास्तविक सेवा के लिए आहूत किया जाता है, उस नियोजन से, जिसका वह त्याग करता है, सम्बन्धित किसी भविष्य निधि या अधिवार्षिकी निधि या किसी अन्य स्कीम के अधीन जो कर्मचारियों के फायदे के लिए बनाई रखी गई है, कोई अधिकार रखता है, तब वह, तब तक जब तक वह भारतीय नौसेना में प्रशिक्षण या सेवा में लगा हुआ है और यदि वह पुनःपदस्थ किया जाता है, तो इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन ऐसे पुनःपदस्थ किए जाने तक ऐसी निधि या स्कीम के सम्बन्ध में ऐसे अधिकार रखे रहेगा जो विहित किए जाएं ।]
अध्याय 6
सेवा के विशेषाधिकार
20. कुर्की से उन्मुक्ति-ऐसे किसी भी व्यक्ति के, जो नौसैनिक सेवा में है, आयुधों, कपड़ों, उपस्करों, साजसज्जाओं या आवश्यक वस्तुओं का अभिग्रहण, और ऐसे व्यक्ति के वेतन और भत्तों की या उनके किसी भाग की कुर्की, तब तक, जब तक वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, किसी ऐसी आदेशिका या निदेश के अधीन नहीं की जाएगी जो उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय किसी दावे, डिक्री या आदेश की बाबत किसी न्यायालय या लोक सेवा के द्वारा या प्राधिकार से निकाला गया है ।
21. ऋण के लिए गिरफ्तारी से उन्मुक्ति-(1) कोई भी व्यक्ति, जो नौसैनिक सेवा में है तब तक, जब तक वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, ऋण के लिए किसी न्यायालय या लोक सेवक के द्वारा या प्राधिकार से निकाली गई किसी आदेशिका या निदेश के अधीन गिरफ्तार किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।
(2) यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबन्धों के उल्लंघन में गिरफ्तार किया जाता है, तो वह न्यायालय या लोक सेवक, जिसके द्वारा या प्राधिकार से ऐसी आदेशिका या निदेश निकाला गया था, गिरफ्तार किए गए व्यक्ति या उसके वरिष्ठ आफिसर के परिवाद पर उस मामले की जांच करेगा, और यदि उसका समाधान हो जाता है कि गिरफ्तारी उपधारा (1) के उल्लंघन में की गई थी, तो वह गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के तुरन्त उन्मोचन के लिए आदेश करेगा और परिवादी को परिवाद का खर्चा अधिनिर्णीत कर सकेगा, जो ऐसे वसूल किया जा सकेगा मानो वह खर्चा उसे उस व्यक्ति के विरुद्ध किसी डिक्री द्वारा अधिनिर्णीत किया गया हो, जिसकी प्रेरणा पर ऐसी आदेशिका या निदेश निकाला गया था ।
(3) उपधारा (2) के अधीन किए गए परिवाद पर, या उन खर्चों की वसूली के लिए, जो उस उपधारा के अधीन अधिनिर्णीत किए जाएं, कोई न्यायालय फीस देय न होगी ।
22. सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय में हाजिर होने वाले व्यक्तियों की गिरफ्तारी से उन्मुक्ति-(1) सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय का कोई भी अध्यक्ष या अन्य सदस्य, कोई भी जज एडवोकेट किसी सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय के समक्ष की किसी कार्यवाही का कोई भी पक्षकार या ऐसे पक्षकार का कोई भी अधिवक्ता या अभिकर्ता और सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय में हाजिर होने के लिए किसी समन के आज्ञानुवर्तन में कार्य करने वाला कोई भी साक्षी सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय को जाने, उसमें हाजिर रहने या वहां से लौटने के दौरान किसी सिविल या राजस्व आदेशिका के अधीन गिरफ्तार किए जाने के दायित्व के अधीन न होगा ।
(2) यदि ऐसा कोई व्यक्ति, ऐसी किसी आदेशिका के अधीन गिरफ्तार किया जाता है तो वह, यथास्थिति, सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय के आदेश से उन्मोचित किया जा सकेगा ।
23. व्यथित व्यक्तियों को प्राप्त उपचार-(1) यदि कोई आफिसर या [नौसैनिक] यह समझता है कि उसे किसी वरिष्ठ आफिसर द्वारा किया गया कोई वैयक्तिक अत्याचार, अन्याय या अन्य बुरा बर्ताव सहन करना पड़ा है, तो वह इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार परिवाद कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विनियम यह उपबन्ध करेंगे कि यदि अपने परिवाद पर किए गए विनिश्चय से परिवादी का समाधान न हो तो वह परिवाद केन्द्रीय सरकार को उसके विचारार्थ अग्रेषित किया जाएगा ।
24. जो व्यक्ति नौसैनिक सेवा में हैं उनके सम्पृक्त मामलों की सुनवाई को पूर्ववर्तिता-(1) जो कोई व्यक्ति नौसैनिक सेवा में है उसके द्वारा या की ओर से उस दौरान, जब वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, उचित नौसैनिक प्राधिकारी का यह प्रमाणपत्र किसी सिविल या राजस्व न्यायालय के समक्ष उपस्थित किए जाने पर कि उस न्यायालय में वाद या अन्य कार्यवाही चलाने या उसमें प्रतिरक्षा करने के प्रयोजन के लिए अनुपस्थिति छुट्टी उसे अनुदत्त की गई है या उसके द्वारा आवेदित है, न्यायालय, उस व्यक्ति के आवेदन पर यावत्संभव यह इंतजाम करेगा कि उस वाद या अन्य कार्यवाही की सुनवाई और अन्तिम निपटारा ऐसे अनुदत्त या आवेदित छुट्टी की कालावधि के भीतर हो जाए ।
(2) उचित नौसैनिक प्राधिकारी के प्रमाणपत्र में अनुदत्त या आवेदित छुट्टी का प्रथम और अन्तिम दिन कथित होगा और वह मामला उपवर्णित होगा जिसके लिए छुट्टी अनुदत्त या आवेदित की गई है, और वह उस प्राधिकारी द्वारा सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित और अधिप्रमाणीकृत होगा ।
(3) कोई भी फीस ऐसे किसी प्रमाणपत्र के उपस्थापन की बाबत या ऐसे किसी व्यक्ति के मामले की सुनवाई को पूर्विकता दिए जाने के लिए उसके द्वारा या की ओर से किए गए किसी आवेदन की बाबत न्यायालय को देय न होगी और यथापूर्वोक्त सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित और अधिप्रमाणित ऐसा हर प्रमाणपत्र उसकी अन्तर्वस्तुओं की शुद्धता का निश्चायक साक्ष्य होगा ।
(4) जहां कि न्यायालय यह इंतजाम करने में असमर्थ होता है कि वाद या अन्य कार्यवाही की सुनवाई और अन्तिम निपटारा यथापूर्वोक्त अनुदत्त या आवेदित छुट्टी की कालावधि के भीतर हो जाए, वहां वह ऐसा करने में असमर्थ होने के अपने कारणों को अभिलिखित कर देगा, और उसकी एक प्रतिलिपि ऐसे व्यक्ति को उसके आवेदन पर प्रतिलिपि के आवेदन के लिए या स्वयं प्रतिलिपि के लिए उसके द्वारा कोई भी संदाय किए गए बिना, दिला देगा ।
(5) हर दण्ड न्यायालय, जिसके समक्ष किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो नौसैनिक सेवा में है, कोई मामला लम्बित है, ऐसे मामले की, यावत्संभव शीघ्र सुनवाई और अन्तिम निपटारे का इंतजाम करेगा ।
25. दण्ड न्यायालय द्वारा किए गए निर्णयों या आदेशों की प्रतिलिपियां अभिप्राप्त करने का नौसेनाध्यक्ष या कमान आफिसरों का अधिकार-वह दण्ड न्यायालय, जिसके समक्ष किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो नौसैनिक सेवा में है, उस दौरान, जब वह व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, कोई कार्यवाही की गई है नौसेनाध्यक्ष द्वारा या उस व्यक्ति के कमान आफिसर द्वारा किए गए आवेदन पर मामले में के निर्णय और अंतिम आदेशों की प्रतिलिपियां बिना खर्चों और अविलम्ब अनुदत्त करेगा ।
26. अन्य विधियों के अधीन के अधिकारों और विशेषाधिकारों की व्यावृत्ति-इस अध्याय की पूर्ववर्ती धाराओं में विनिर्दिष्ट अधिकार और विशेषाधिकार उन किन्हीं अन्य अधिकारों और विशेषाधिकारों के, जो नौसैनिक सेवा में के व्यक्तियों को, उस दौरान जब वे नौसैनिक विधि के अध्यधीन हों या साधारणतया नियमित सेना, नौसैना या वायुसेना के सदस्यों को, किसी तत्समय अन्य प्रवृत्त विधि द्वारा प्रदत्त हों, अतिरिक्त न कि उनके अल्पीकरण में होंगे ।
अध्याय 7
वेतन, पेंशन आदि के और कुटुम्बों के भरण पोषण के विषय में उपबन्ध
27. वेतन आदि से कटौतियों का तब के सिवाय न किया जाना जबकि वे प्राधिकृत हों-आफिसरों और [नौसैनिकों] को किन्हीं तत्समय प्रवृत्त विनियमों के अधीन शोध्य वेतन, पेंशनों, उपदानों, भत्तों और अन्य प्रसुविधाओं में से ऐसी कोई भी कटौतियां न की जाएंगी जो इस अधिनियम या किसी अन्य अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत कटौतियों से भिन्न हों ।
28. आफिसरों के वेतन और भत्तों में से कटौतियां-किसी आफिसर के वेतन और भत्तों में से निम्नलिखित कटौतियां, नौसैनिक अधिकरण द्वारा विचारण का आश्रय लिए बिना की जा सकेंगी, अर्थात्: -
(1) छुट्टी बिना अनुपस्थिति के हर दिन के लिए सभी वेतन और भत्ते, तब के सिवाय, जब कि कमान आफिसर को समाधानप्रद स्पष्टीकरण ऐसी अनुपस्थिति के लिए दे दिया गया है और नौसेनाध्यक्ष द्वारा अनुमोदित कर दिया गया है:
परन्तु यह तब जब कि उस आफिसर की बाबत उक्त अनुपस्थिति के लिए कोई कार्यवाही नौसैनिक अधिकरण ने न की हो;
(2) उस हर दिन के लिए सभी वेतन और भत्ते, जब वह किसी ऐसे अपराध के आरोप पर सिविल या नौसैनिक अभिरक्षा में या कर्तव्य से निलम्बित रहा है, जिस अपराध के लिए वह तत्पश्चात् किसी सक्षम नौसैनिक अधिकरण या दण्ड न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध और कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है;
(3) उस हर दिन के लिए सभी वेतन और भत्ते, जब वह ऐसी रुग्णता के कारण अस्पताल में रहता है जिसके बारे में विहित चिकित्सीय आफिसर द्वारा यह प्रमाणपत्र दिया गया हो कि वह किसी ऐसे कार्य से कारित हुई है जो इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय अपराध की कोटि में आता है:
परन्तु यह तब जब कि ऐसा प्रमाणपत्र नौसेनाध्यक्ष द्वारा प्रतिगृहीत कर लिया जाए;
(4) नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी व्यक्ति के उस वेतन और भत्ते की, जो उसने विधिविरुद्ध रूप से प्रतिधृत कर रखा है या जिसे देने से उसने विधिविरुद्ध रूप से इन्कार कर दिया है, प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित राशि;
(5) सरकारी सम्पत्ति या नौसैनिक मेस, बैंड या संस्था की सम्पत्ति की किसी ऐसी हानि, नुकसान या नाश की प्रतिपूर्ति की लिए अपेक्षित राशि, जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार नौसेनाध्यक्ष या विहित आफिसर को सम्यक् अन्वेषण के पश्चात् यह प्रतीत होता है कि वह उस आफिसर के सदोष कार्य से या उपेक्षा से घटित हुआ है;
(6) उसकी पत्नी या धर्मज या अधर्मज संतान के भरण-पोषण के लिए धारा 31 के उपबन्धों के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षित राशि;
(7) वह राशि, जिसकी बाबत विहित आफिसर को सम्यक् अन्वेषण के पश्चात् यह प्रतीत होता है कि वह सेवा, मेस या कैंटीन को शोध्य है ।
29. नाविकों के वेतन और भत्तों में से कटौतियां- [नौसैनिक] के वेतन और भत्तों में से, निम्नलिखित कटौतियां, नौसैनिक अधिकरण द्वारा विचारण का आश्रय लिए बिना की जा सकेंगी, अर्थात्: -
(1) तब के सिवाय छुट्टी बिना अनुपस्थिति के हर दिन के लिए सभी वेतन और भत्ते, जबकि कमान आफिसर को समाधानप्रद स्पष्टीकरण ऐसी अनुपस्थिति के लिए दे दिया गया है:
परन्तु यह तब जब कि उक्त अनुपस्थिति के लिए उस 2[नौसैनिक] की बाबत नौसैनिक अधिकरण ने कार्यवाही नहीं की है;
(2) उस हर दिन के लिए सभी वेतन और भत्ते, जब वह किसी ऐसे अपराध के आरोप पर परिरोध में रहा है, जिसके लिए वह तत्पश्चात् किसी सक्षम नौसैनिक अधिकरण या दण्ड न्यायालय द्वारा सिद्धदोष किया गया है;
(3) उस हर दिन के लिए सभी वेतन और भत्ते, जब वह ऐसी रुग्णता के कारण अस्पताल में रहता है जिसके बारे में विहित चिकित्सीय आफिसर द्वारा यह प्रमाणपत्र दिया गया है कि वह किसी ऐसे कार्य से कारित हुई है जो इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय अपराध की कोटि में आता है:
परन्तु यह तब जब कि ऐसा प्रमाणपत्र नौसेनाध्यक्ष या विहित आफिसर द्वारा प्रतिगृहीत कर लिया जाए;
(4) ऐसी सम्पत्ति की हानि, नुकसान या नाश की प्रतिपूर्ति के लिए अपेक्षित राशि, जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या विहित आफिसर को सम्यक् अन्वेषण के पश्चात् यह प्रतीत होता है कि वह उस [नौसैनिक] के सदोष कार्य से या अपेक्षा से घटित हुआ है;
(5) उसकी पत्नी या धर्मज या अधर्मज सन्तान के भरण-पोषण के लिए धारा 31 के उपबन्धों के अधीन दी जाने के लिए अपेक्षति राशि ।
30. सैनिक अधिकरणों द्वारा अधिनिर्णीत कटौतियां-आफिसर या 1[नौसैनिक] के वेतन और भत्तों में से कटौतियां, ऐसे जुर्माने, समपहरण या वेतन और भत्तों के अपकर्तन के दण्डादेश मद्धे की जा सकेंगी जो नौसैनिक अधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अनुसरण में अधिनिर्णित किया गया हो ।
31. पत्नी और सन्तान के भरण-पोषण का दायित्व-(1) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, अपनी पत्नी और धर्मज या अधर्मज सन्तान का भरण-पोषण करने के लिए दायित्व के अधीन उतने ही विस्तार तक होगा जितने तक वह ऐसे अध्यधीन न होने पर भी होता, किन्तु भरण-पोषण के लिए ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध पारित किसी डिक्री या किए गए किसी आदेश का निष्पादन या प्रवर्तन, उसके शरीर, वेतन, आयुधों, गोला-बारूद, उपस्करों, उपकरणों या कपड़ों के विरुद्ध नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी यह है कि, -
(क) जहां कि केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या विहित प्राधिकारी को समाधानप्रद रूप में यह प्रतीत होता है कि नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी व्यक्ति ने, अपनी पत्नी को या अपनी किसी ऐसी धर्मज सन्तान को, जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, युक्तियुक्त हेतुक के बिना अभित्यक्त कर दिया है, या हीन परिस्थितियों में छोड़ दिया है या वह दूसरा विवाह कर लेने के कारण, अपनी पहली पत्नी को पृथक् भरण-पोषण का उपबन्ध करने के दायित्व के अधीन हो गया है; अथवा
(ख) जहां कि किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन है या तत्पश्चात् हो जाता है, कोई डिक्री या आदेश उसकी पत्नी या धर्मज या अधर्मज संतान के भरण-पोषण के लिए किसी विधि के अधीन पारित किया जाता है और डिक्री या आदेश की एक प्रतिलिपि केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या विहित आफिसर को भेज दी जाती है,
वहां केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या विहित प्राधिकारी यह निदेश दे सकेगा कि उस व्यक्ति के, जो इस प्रकार नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, वेतन का प्रभाग ऐसे वेतन से काट लिया जाए और उसकी पत्नी या सन्तान के भरण-पोषण के लिए उसे विहित रीति से विनियोजित किया जाए, किन्तु काटी गई रकम, डिक्री या आदेश द्वारा (यदि कोई हो) नियत रकम से अधिक नहीं होगी, और इस अधिनियम के अधीन इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा नियत की गई दर से उच्चतर दर पर नहीं होगी:
परन्तु भरण-पोषण के लिए उस डिक्री या आदेश की दशा में, जो खण्ड (ख) में निर्दिष्ट है, वेतन में से किसी कटौती का निदेश तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या विहित आफिसर का यह समाधान नहीं हो जाता कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध ऐसी डिक्री या आदेश पारित किया गया या दिया गया है, उसे उस न्यायालय के समक्ष, जिसके द्वारा डिक्री या आदेश पारित किया गया या दिया गया था मामले में प्रतिरक्षा करने के लिए उपसंजात होने का युक्तियुक्त अवसर मिला था या वह वस्तुतः या तो स्वयं या सम्यक् रूप से नियुक्त किए गए विधि व्यवसायी के माध्यम से मामले में प्रतिरक्षा करने के लिए उपसंजात हो चुका है ।
(3) जहां कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट डिक्री या आदेश के अधीन भरण-पोषण की बकाया उस व्यक्ति के, जिसके विरुद्ध डिक्री या आदेश किया गया है, नौसैनिक विधि के अध्यधीन रहते हुए संचित हो गई है, वहां चाहे उस मद्धे कटौतियां उसके वेतन में से इस धारा के अधीन की गई हों या नहीं, उन बकायों की वसूली के लिए कोई भी कार्रवाई उस व्यक्ति के ऐसे अध्यधीन न रह जाने के पश्चात्, तब के सिवाय नहीं की जाएगी, जब कि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि जब से वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं रहा, तब से वह बकायों या उनके किसी भाग का संदाय करने की योग्यता रखता है और ऐसा संदाय करने में असफल रहा है ।
(4) जहां कि भरण-पोषण के लिए डिक्री या आदेश अभिप्राप्त करने के लिए कोई कार्यवाही, किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध की जाए जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, वहां किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी-
(क) न्यायालय उस व्यक्ति पर तामील कराने के लिए आदेशिका उस पोत के कमान आफिसर को भेज सकेगा जिस पर वह व्यक्ति सेवा कर रहा है या जिसकी पुस्तकों में उसका नाम चढ़ा हुआ है; अथवा
(ख) यदि पोत के समुद्र में होने के कारण या अन्यथा, कमान आफिसर को आदेशिका भेजना न्यायालय के लिए असाध्य है, तो न्यायालय, केन्द्रीय सरकार को कम से कम तीन सप्ताह की ऐसी सूचना के पश्चात्, उसे उस सरकार के सचिव को, उस व्यक्ति पर तामील कराने के लिए कमान आफिसर को पारेषित किए जाने के लिए भेज सकेगा:
परन्तु ऐसी तामील तब के सिवाय विधिमान्य नहीं होगी जब कि इतनी धनराशि, जितनी विहित की जाए, आदेशिका के साथ भेज दी जाती है जिससे कि वह व्यक्ति कार्यवाही की सुनवाई में हाजिर होने और ऐसी हाजिरी के पश्चात् अपने पोत या क्वार्टर वापस जाने के योग्य हो जाए ।
(5) यदि उस व्यक्ति के विरुद्ध, जिस पर आदेशिका की तामील कराई जाती है, कार्यवाही में डिक्री या आदेश पारित किया जाए या दिया जाए, तो आदेशिका के साथ भेजी गई राशि उस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही के खर्चे के रूप में अधिनिर्णीत की जाएगी ।
(6) इस धारा के अधीन की किसी कार्यवाही में कोई भी आदेशिका किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो नौसैनिक-विधि के अध्यधीन है, विधिमान्य नहीं होगी, यदि उसकी तामील उस पर उस समय कराई जाए जब वह किसी विदेशीय स्थान पर या भारतीय जल क्षेत्र के परे सेवा करने के आदेश के अधीन है ।
(7) जब तक कि तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए, आदेशिका की प्राप्ति का ऐसा प्रमाणपत्र पेश किया जाना, जिसका पूर्वोक्त कमान आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है इस बात का साक्ष्य होगा कि आदेशिका की तामील सम्यक् रूप से हो गई है ।
(8) जहां कि किसी डिक्री या आदेश द्वारा, जिसकी एक प्रतिलिपि केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या विहित प्राधिकारी को उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन भेज दी गई है, उस व्यक्ति को, जिसके विरुद्ध डिक्री या आदेश पारित किया गया या दिया गया है, यह निदेश दिया गया है कि वह उस राशि का, जो उपधारा (4) के परन्तुक में निर्दिष्ट आदेशिका के साथ भेजी गई है, खर्चे के रूप में संदाय करे, वहां केन्द्रीय सरकार हकदार व्यक्ति को उस राशि की पूर्ण तुष्टि के लिए रकम दे सकेगी और केन्द्रीय सरकार द्वारा इस प्रकार दी गई रकम ऐसी लोकमांग समझी जाएगी, जो उस व्यक्ति से वसूलीय है जिसके विरुद्ध डिक्री या आदेश पारित किया गया या दिया गया है, और वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसके वेतन में से वह रकम उपधारा (2) द्वारा प्राधिकृत कटौतियों के अतिरिक्त, कटौती द्वारा वसूल की जा सकेगी ।
(9) जहां कि नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी व्यक्ति ने अपने वेतन और भत्तों के किसी भाग का आबंटन अपनी पत्नी के फायदे के लिए किया है, वहां जब तक कि केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या विहित प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता कि आबंटन अब से नहीं किया जाना चाहिए या कि घटा दिया जाना चाहिए, तब तक न तो आबंटन का चालू रहना बन्द किया जाएगा और न उसे घटाया जाएगा ।
(10) इस धारा में वेतन" शब्द के अन्तर्गत बासे, राशन, रसद, कपड़ों के बदले में देय भत्तों तथा यात्रा भत्तों की राशियों से भिन्न वे सब राशियां आती हैं जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन के व्यक्ति को उसकी सेवाओं के लेखे देय हैं ।
32. कुछ कटौतियों की परिसीमा-तब के सिवाय जब कि कटौतियां धारा 28 की उपधारा (1), (2) और (4) या धारा 29 की उपधारा (1) और (2) के अधीन की जाती हैं किसी आफिसर या [नौसैनिक] के वेतन और भत्तों में से की गई कुल कटौतियां किसी एक मास में उसके उस मास के वेतन और भत्तों के आधे से अधिक की नहीं होंगी ।
33. कटौतियों का परिहार-(1) वेतन और भत्तों में से की गई किसी कटौती का, जो इस अधिनियम के द्वारा या अधीन प्राधिकृत है, परिहार नौसेनाध्यक्ष स्वविवेकानुसार कर सकेगा ।
(2) ऐसी कटौती का परिहार ऐसी रीति से, ऐसे विस्तार तक और ऐसे अन्य प्राधिकारी द्वारा भी किया जा सकेगा, जो विहित किया जाए ।
अध्याय 8
युद्ध की नियमावली
[34. समादेशाधीन आफिसरों या व्यक्तियों द्वारा अवचार-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर फ्लैग आफिसर, कप्तान या अन्य व्यक्ति, जो भारतीय नौसेना के किसी पोत, जलयान या वायुयान का या किसी नौसैनिक स्थापन का समादेशन कर रहा हो-
(क) किसी ऐसे पोत, जलयान या वायुयान को, जिसे समर-रत करना उसका कर्तव्य है, समर-रत करने का भरसक प्रयास नहीं करेगा; अथवा
(ख) कोई ऐसा पोत, जलयान या वायुयान शत्रु को उस दशा में अभ्यर्पित करेगा जब सफलतापूर्वक उसकी प्रतिरक्षा की जा सकती है या उसे नष्ट किया जा सकता है; अथवा
(ग) शत्रु का पीछा करने में, जिसका पीछा करना उसका कर्तव्य है, या किसी मित्र की भरसक सहायता करने में, जिसकी सहायता करना उसका कर्तव्य है, असफल रहेगा; अथवा
(घ) शत्रु द्वारा या उसके विरुद्ध किसी संघर्ष के दौरान संघर्ष से या अपने स्थान से अनुचित रूप से हटेगा या उन व्यक्तियों को, जो उसके समादेशाधीन है, साहसपूर्वक लड़ने के लिए स्वयं अपने व्यक्तित्व से और अपने रैंक के अनुसार प्रोत्साहन प्रदान नहीं करेगा; अथवा
(ङ) कोई ऐसा नौसैनिक स्थापन या ऐसे किसी स्थापन का कोई भाग शत्रु को उस दशा में अभ्यर्पित करेगा जब कि सफलतापूर्वक उसकी प्रतिरक्षा की जा सकती है या जब कि उसे नष्ट करा देना उसका कर्तव्य है,
वह, -
(क) उस दशा में, जिसमें ऐसा कार्य शत्रु की सहायता करने के आशय से या कायरता से किया जाता है, मृत्यु से या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा; तथा
(ख) किसी अन्य दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
35. समादेशाधीन व्यक्तियों से भिन्न व्यक्तियों द्वारा अवचार-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो किसी नौसैनिक स्थापन का या भारतीय नौसेना के किसी पोत, जलयान या वायुयान का समादेशन नहीं कर रहा हो, शत्रु द्वारा या उसके विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार होने का आदेश दिए जाने पर या ऐसे संघर्ष के दौरान, अपने वरिष्ठ आफिसरों के विधिपूर्ण आदेशों का निष्पादन करने का भरसक प्रयास नहीं करेगा, वह-
(क) उस दशा में, जिसमें ऐसा कार्य शत्रु की सहायता करने का आशय से किया जाता है, मृत्यु से या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा; तथा
(ख) किसी अन्य दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
36. समादिष्ट संघर्ष या सेवा का किया जाना विलम्बित करना या निरुत्साहित करना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो किसी ऐसे संघर्ष या सेवा का किया जाना, जिसका नौसेना, नियमित सेना, या वायुसेना या उससे सहयोग करने वाले किसी बल की ओर से समादेश दिया गया है, किसी भी प्रकार के बहाने के द्वारा जानबझूकर विलम्बित करेगा या निरुत्साहित करेगा, -
(क) उस दशा में, जिसमें ऐसा कार्य शत्रु की सहायता करने के आशय से किया जाता है, मृत्यु से या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा; तथा
(ख) किसी अन्य दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
37. संघर्ष में अवज्ञा के लिए शास्ति-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो शत्रु की उपस्थिति या सामीप्य में रहते हुए अथवा शत्रु द्वारा या उसके विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार रहने का आदेश दिए जाने पर, -
(क) अपने पदस्थान का अभित्यजन करेगा; अथवा
(ख) अपने पहरे पर सोएगा,
मृत्यु से या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।]
38. गुप्तचरी के लिए शास्ति-जो व्यक्ति, अन्यथा नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है, वैसा हर व्यक्ति, जो शत्रु का गुप्तचर रहेगा या ऐसे गुप्तचर के रूप में कार्य करेगा, इस अधिनियम के अधीन मृत्यु से या ऐसे अन्य दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, ऐसे दण्डित किया जाएगा मानो वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन का व्यक्ति हो ।
39. शत्रु के साथ वार्ताचार इत्यादि-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो-
(क) गद्दारीयुक्त रूप से शत्रु के साथ वार्ताचार करेगा या शत्रु को कोई आसूचना देगा; अथवा
(ख) कोई जानकारी, जो उसने शत्रु से प्राप्त की है, उचित प्राधिकारियों को ज्ञात कराने में असफल रहेगा; अथवा
(ग) किन्हीं प्रदायों से शत्रु की सहायता करेगा; अथवा
(घ) युद्ध कैदी बनाए जाने पर स्वेच्छा से शत्रुपक्ष में सेवा करेगा या शत्रु की सहायता करेगा,
मृत्यु से या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
40. शत्रु के साथ अनुचित आसूचना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो किसी गद्दारीयुक्त आशय के बिना शत्रु के साथ अनुचित आसूचना करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
41. पदस्थान का अभित्यजन और कर्तव्य की उपेक्षा-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो-
(क) अपने पदस्थान का अभित्यजन करेगा, अथवा
(ख) अपने पहरे पर सोएगा, अथवा
[(ग) अपने पर अधिरोपित कर्तव्य का पालन करने में असफल रहेगा या उपेक्षापूर्वक पालन करेगा; अथवा]
(घ) नौसैनिक सेवा में प्रतिबाधा डालते की प्रवृत्ति रखने वाले किन्हीं शब्दों, आचार या परिकल्पना को जानबूझकर छिपाएगा,
कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
[42. विद्रोह की परिभाषा-विद्रोह से नौसैनिक विधि, सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) के अध्यधीन के किन्हीं दो या अधिक व्यक्तियों का या ऐसे व्यक्तियों के बीच, जिनमें से कम से कम दो व्यक्ति, नौसैनिक विधि या किसी ऐसे अधिनियम के अध्यधीन हों, ऐसा कोई जमाव या समुच्चय अभिप्रेत है जो-
(क) नौसेना, नियमित सेना, या वायु सेना के अथवा उनमें से किसी एक या अधिक के किसी भाग के अथवा उससे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों के अथवा उनके किसी भाग के विधिपूर्ण प्राधिकारी को सत्ता से हटा देने या उसका प्रतिरोध करने के लिए है; अथवा
(ख) ऐसे प्राधिकारी की अवज्ञा, ऐसी परिस्थितियों में, जिनकी वजह से ऐसी अवज्ञा अनुशासन के लिए ध्वंसात्मक हो जाती है या ऐसे कर्तव्य या सेवा से बचने के उद्देश्य से, करने के लिए है, जो शत्रु के विरुद्ध है या जो शत्रु के विरुद्ध संक्रियाओं से सम्बद्ध है; अथवा
(ग) ऐसे प्राधिकारी के प्रति, ऐसी परिस्थितियों में, अवमान दर्शित करने के लिए है, जिनकी वजह से ऐसा आचरण अनुशासन के लिए ध्वंसात्मक हो जाता है; अथवा
(घ) नौसेना, नियमित सेना, या वायु सेना में अथवा उनमें से किसी एक या अधिक के किसी भाग में अथवा उससे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों में अथवा उनके किसी भाग में किसी कर्तव्य के पालन में या सेवा के करने में अड़चन डालने के लिए है ।]
43. विद्रोह के लिए दण्ड-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो-
(क) किसी विद्रोह में सम्मिलित होगा, अथवा
(ख) किसी विद्रोह को आरम्भ करेगा, उद्दीप्त करेगा, कारित करेगा या कारित कराने के लिए किन्हीं अन्य व्यक्तियों के साथ षड्यंत्र करेगा, अथवा
(ग) किसी विद्रोह में सम्मिलित होने के लिए या विद्रोह का कोई कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति को उद्दीप्त करने का प्रयास करेगा, अथवा
(घ) नियमित सेना, नौ-सेना या वायुसेना में के किसी व्यक्ति को विलुब्ध करके संविधान के प्रति उसकी सत्यनिष्ठा या राज्य के प्रति उसकी भक्ति या उसके वरिष्ठ आफिसरों के प्रति उसके कर्तव्य से उसे च्युत करने का प्रयास करेगा या ऐसे किसी व्यक्ति को शत्रु के विरुद्ध कार्य करने से प्रविरत रहने के लिए विवश या उत्प्रेरित करने के लिए या ऐसे व्यक्ति को शत्रु के विरुद्ध कार्य करने से निरुत्साहित करने के लिए कोई साधन अपनाएगा, अथवा
[(ङ) विद्रोह का दमन करने या उसको रोकने के लिए भरसक प्रयास नहीं करेगा, अथवा]
(च) राज्य के विरुद्ध किसी गद्दारीयुक्त या विद्रोहात्मक आचार या परिकल्पना को या कहे गए किन्हीं गद्दारीयुक्त शब्दों को जानबूझकर छिपाएगा, अथवा
(छ) यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए कि कोई विद्रोह या विद्रोह करने का आशय विद्यमान है, उसकी इत्तिला अपने पोत के कमान आफिसर को या अन्य वरिष्ठ आफिसर को अविलम्ब नहीं देगा, अथवा
(ज) राजद्रोह या विद्रोह के शब्द उच्चारित करेगा,
मृत्यु से या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
44. पोतों या विमानों के फलक पर के व्यक्तियों द्वारा नौसैनिक कार्मिकों को विलुब्ध करके निष्ठा से च्युत किया जाना-जो व्यक्ति नौसैनिक विधि के अन्यथा अध्यधीन नहीं है वैसा हर व्यक्ति, जो नौसेना के किसी पोत या विमान के फलक पर या सरकार की सेवा में के किसी पोत के फलक पर होते हुए, नौसैनिक विधि के अध्यधीन के ऐसे किसी व्यक्ति को विलुब्ध करके उसे संविधान के प्रति उसकी सत्यनिष्ठा या राज्य के प्रति उसकी भक्ति या वरिष्ठ आफिसरों के प्रति उसके कर्तव्य से च्युत करने का प्रयास करेगा, इस अधिनियम के अधीन मृत्यु से या किसी अन्य दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, ऐसे दण्डित किया जाएगा, मानो वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन का व्यक्ति हो ।
45. वरिष्ठ आफिसरों पर आघात करना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात्: -
(क) अपने वरिष्ठ आफिसर पर आघात करेगा या आघात करने का प्रयत्न करेगा, अथवा
(ख) ऐसे आफिसर के विरुद्ध कोई आयुध निकालेगा या उठाएगा, अथवा
(ग) ऐसे आफिसर के विरुद्ध किसी प्रकार की हिंसा का प्रयोग करेगा या प्रयोग करने का प्रयत्न करेगा,
यदि अपराध सक्रिय सेवा पर होते हुए किया गया है, कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा; तथा
किसी अन्य दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या, अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
46. अधीनस्थों के साथ बुरा बर्ताव करना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो ऐसी विधि के अध्यधीन के किसी अन्य व्यक्ति से जो रैंक या पद में उसके अधीनस्थ है, बुरा बर्ताव करने का दोषी होगा, कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
47. अवज्ञा और अनधीनता-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो-
(क) अपने वरिष्ठ आफिसर के किसी विधिपूर्ण समादेश की जानबूझकर अवज्ञा करेगा, अथवा
(ख) अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा दिए गए विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा करने का अपना आशय ऐसे वरिष्ठ आफिसर की उपस्थिति में या अन्यथा दर्शित या अभिव्यक्त करेगा, अथवा
(ग) अपने वरिष्ठ आफिसर के प्रति अनधीनताद्योतक, धमकी भरी या अपमानजनक भाषा का प्रयोग करेगा, अथवा
(घ) अपने वरिष्ठ आफिसर के प्रति अवमानपूर्ण आचरण करेगा,
यदि अपराध सक्रिय सेवा पर होते हुए किया गया है या ऐसी रीति से किया गया है जिससे यह दर्शित होता है कि प्राधिकार का जानबूझकर तिरस्कार किया गया है, कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे अन्य दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा, और अन्य दशाओं में, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
48. झगड़ा करना, लड़ना और विच्छृंखल आचरण-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो-
(क) किसी अन्य व्यक्ति से, चाहे वह व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, या नहीं, झगड़ा करेगा, लड़ेगा या उस पर आघात करेगा, अथवा
(ख) झगड़ा या उपद्रव खड़ा करने की प्रवृत्ति वाले निन्दामय या प्रकोपक शब्दों या अंग विक्षेपों का प्रयोग करेगा,
(ग) विच्छृंखलता से आचरण करेगा,
कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
49. अभित्यजन-(1) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का जो भी व्यक्ति अपने पोत से या ऐसे स्थान से, जहां होने के लिए वह अपने कर्तव्यवश अपेक्षित है, इस आशय से अनुपस्थित होता है, कि उस पोत या स्थान पर वापस न आए या तब, जब कि वह अपने पोत या कर्तव्य-स्थान से अनुपस्थित है, किसी भी समय या किन्हीं भी परिस्थितियों में कोई ऐसा कार्य करता है, जिससे वह दर्शित होता है कि उसका आशय उस पोत या स्थान पर वापस न आने का है, तो यह कहा जाता है कि वह अभित्यजन करता है ।
(2) हर व्यक्ति, जो अभित्यजन करेगा, -
(क) यदि वह अभित्यजन करके शत्रु के साथ जा मिलेगा, मृत्यु से या ऐसे अन्य दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा, अथवा
(ख) यदि वह किन्हीं अन्य परिस्थितियों में अभित्यजन करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा,
और ऐसे हर मामले में, उसका अपने द्वारा उपार्जित, सब वेतन, मथोत, बाउंटी, उदारण, प्राइज, धन और भत्ते, और वे सब वार्षिकियां, पेंशन, उपदान, पदक और अलंकरण, जो उसे अनुदत्त किए गए हैं और वे सब कपड़े और चीजबस्त भी, जो वह उस पोत के फलक या उस स्थान पर जहां से उसने अभित्यजन किया था, तब के सिवाय समपहृत हो जाएंगे जब कि वह अधिकरण, जिसके द्वारा उसका विचारण किया जाता है, या केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष अन्यथा निदिष्ट करता है ।
50. अभित्यजन करने के लिए किसी व्यक्ति को उत्प्रेरित करना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को अभित्यजन करने के लिए विलुब्ध करने का प्रयास करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
51. पोत से अनधिकृत रूप से निकल जाना और छुट्टी के बिना अनुपस्थिति-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो अभित्यजन का दोषी हुए बिना [अपने पोत को या कर्तव्य-स्थान को या किसी ऐसे स्थान को, जहां उसका होना अपेक्षित है, अनुचित रूप से छोड़ेगा या छुट्टी बिना अनुपस्थित रहेगा,] कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे अन्य दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा और वेतन और भत्तों के ऐसे अपकर्तन से भी दंडित किया जाएगा, जो विहित किया जाए ।
52. मत्तता- [(1)] नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो मत्त होने का दोषी होगा, यदि अपराध सक्रिय सेवा पर होते हुए किया गया हो, कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा और किन्हीं अन्य दशाओं में कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
[(2) उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए, कोई व्यक्ति मत होने का दोषी समझा जाएगा, यदि वह मद्यसार या किसी मादक-द्रव्य के प्रभाव के कारण, चाहे अकेले या किन्हीं अन्य परिस्थितियों के संसंग में, अपने कर्तव्य के या किसी ऐसे कर्तव्य के, जिसका पालन करने के लिए वह आहूत किया जाए, सौंपे जाने के अयोग्य हो या विच्छृंखलता से आचरण करे या ऐसे आचरण करे जिससे नौसैनिक सेवा की अप्रतिष्ठा होना सम्भाव्य हो ।]
53. गन्दगी या अशिष्ट कार्य-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति जो, -
(क) गन्दगी का, अथवा
(ख) किसी अशिष्ट कार्य का,
दोषी होगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
54. क्रूरता और ऐसा आचरण जो आफिसर के लिए अशोभनीय है-(1) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर आफिसर जो क्रूरता का दोषी होगा, कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर आफिसर, जो कलंकात्मक या कपटपूर्ण आचरण का या ऐसे आचरण का, जो आफिसर के लिए अशोभनीय है, दोषी होगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
55. पोत या वायुयान खो देना-(1) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो [जानबूझकर] भारतीय नौसेना के या सरकार की सेवा में के किसी पोत को खोएगा, उत्कूलित करेगा या परिसंकटग्रस्त करेगा या उसका खोया जाना, उत्कूलन या परिसंकटग्रस्त होना सहन करेगा, या भारतीय नौसेना के या सरकार की सेवा में के किसी वायुयान को खोएगा, उसका खोया जाना सहन करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो उपेक्षा से या किसी व्यतिक्रम द्वारा भारतीय नौसेना के या सरकार की सेवा में के किसी पोत को खोएगा, उत्कूलित करेगा या परिसंकटग्रस्त करेगा या उसका खोया जाना, उत्कूलन या परिसंकटग्रस्त होना सहन करेगा या भारतीय नौसेना के या सरकार की सेवा में के किसी वायुयान को खोएगा या उसका खोया जाना सहन करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
[55क. अप्राधिकृत संकटपूर्ण उड़ान-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति जो भारतीय नौसेना के किसी वायुयान की उड़ान में या उसका उपयोग करने में या ऐसे किसी वायुयान या वायुयान-सामग्री के सम्बन्ध में किसी ऐसे कार्य या उपेक्षा का दोषी हो, जिससे किसी व्यक्ति को जीवन हानि या शारीरिक क्षति कारित होती है या उसका कारित होना संभाव्य है-
(क) उस दशा में जिसमें उसने जानबूझकर कार्य किया है या जानबूझकर की गई उपेक्षा से कार्य किया है कारावास से, जिकसी अवधि चौदह वर्ष तक [हो सकेगी, या ऐसे अन्य दण्ड से जो इसमें इसके पश्चात् उल्लिखित है, दण्डित किया जाएगा]; तथा
(ख) किसी अन्य दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।
55ख. अयथार्थ प्रमाणपत्र-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो सरकार के या सरकार की सेवा में किसी वायुयान या वायुयान-सामग्री के सम्बन्ध में किसी प्रमाणपत्र पर उसकी यथार्थता सुनिश्चित किए बिना हस्ताक्षर करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
55ग. नीची उड़ान और उड़ान से क्षोभ-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो भारतीय नौसेना के वायुयान का पाइलट है, -
(क) उसे अपने कमान आफिसर द्वारा या समुचित सेवा प्राधिकारी द्वारा प्राधिकृत न्यूनतम ऊंचाई से कम ऊंचाई पर तब के सिवाय उड़ाएगा जब वह जमीन से उड़ान कर रहा हो या उतर रहा हो; अथवा
(ख) उसे ऐसे उड़ाएगा जिससे किसी व्यक्ति को अनावश्यक क्षोभ कारित हो या कारित होना संभाव्य हो,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
55घ. वायुयान के कप्तान के विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति जो उस समय जब वह सरकार के या उसके उपयोग में के किसी वायुयान में है, वायुयान की उड़ान से या उसके हथालना से या उसकी सुरक्षा पर प्रभाव डालने से सम्बन्ध रखने वाली सभी बातों के सम्बन्ध में वायुयान के कप्तान द्वारा, चाहे ऐसा कप्तान नौसैनिक विधि के अध्यधीन हो या न हो, दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दण्डित किया जाएगा ।]
56. कनवाय के भारसाधक आफिसरों द्वारा अपराध-(1) किन्हीं पोतों या जलयानों के कनवाय या संरक्षण करने के लिए नियुक्त सब आफिसर, अपने कर्तव्यों का पालन उस निमित्त उन्हें दिए गए अनुदेशों के अनुसार अविलम्ब और तत्परतापूर्वक करेंगे ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का ऐसा हर आफिसर, जो-
(क) अपने कनवाय के अधीन पोतों और माल की प्रतिरक्षा, किन्हीं अन्य उद्देश्यों के प्रति विचलित हुए बिना, नहीं करेगा, अथवा
(ख) यदि उन पर हमला हुआ है तो उनकी प्रतिरक्षा में लड़ने से इन्कार करेगा, अथवा
(ग) अपने कनवाय के अधीन के पोतों का कायरतापूर्वक परित्याग करेगा, या उन्हें परिसंकट के लिए उच्छन्न करेगा, अथवा
(घ) किसी वणिक या मास्टर से कोई धन या अन्य पुरस्कार उन पोतों या जलयानों का, जो उसे रक्षार्थ न्यस्त हैं, कनवाय करने के लिए मांगेगा या आहरित करेगा, अथवा
(ङ) उनके मास्टरों या जहाजियों का दुरुपयोग करेगा,
मृत्यु से या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा और वणिकों, स्वामियों और अन्यों की नुकसनीस्वरूप इतनी हानिपूर्ति भी करेगा, जितनी सक्षम अधिकारिता वाला सिविल न्यायालय न्यायनिर्णीत करे ।
57. अप्राधिकृत माल को पोत के फलक पर लेना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का भारतीय नैसेना के किसी पोत का समादेशधारक हर आफिसर, जो किसी ऐसे पोत के फलक पर के, जो खुले समुद्र में या किसी पत्तन, संकरी खाड़ी या बन्दरगाह में ध्वस्त हो गया हो या आसन्नसंकट हो, माल या वाणिज्या को उसके उचित स्वामियों के लिए उसके परिरक्षण के प्रयोजनार्थ के सिवाय या ऐसे माल या वाणिज्या के सिवाय, जिसे पोत के फलक पर लेने या प्राप्त करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके वरिष्ठ आफिसर द्वारा किसी समय उसे आदेश दिया जाए, किसी माल या वाणिज्या को, चाहे वह कुछ भी क्यों न हो, पोत के या पोत वाले व्यक्तियों के अन्य उपयोगार्थ से अन्यथा ऐसे पोत के फलक पर प्राप्त करेगा, या प्राप्त करने देगा, नौसैनिक सेवा से पदच्युति से या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
58. सम्पत्ति सम्बन्धी अपराध-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो किसी सरकारी सम्पत्ति या किसी नौसैनिक, सैनिक या वायुसैनिक मैस, बैंड या संस्था की कोई सम्पत्ति अपचयकारक रीति से व्यय करेगा या कपटपूर्वक खरीदेगा, बेचेगा या प्राप्त करेगा और हर व्यक्ति, जो ऐसा कोई अपचयकारक व्यय या ऐसा कोई कपटपूर्ण क्रय, विक्रय या प्राप्ति जानते हुए करने देगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
59. आग लगाना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो किसी डाकयार्ड, रसद यार्ड, या वाष्प कारखाना यार्ड, आयुधशाला, बारूदशाला, निर्माण भंडार को या किसी पोत, जलयान, हॉय, बार्ज, नौका, वायुयान, या अन्य यान या उन किसी में के फर्नीचर को, जो शत्रु की सम्पत्ति नहीं है, विधिविरुद्ध रूप से आग लगाएगा मृत्यु से या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
60. शासकीय दस्तावेजों का मिथ्याकरण तथा मिथ्या घोषणाएं-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति-
(क) जो शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने के लिए कोई मिथ्या रिपोर्ट, विवरण, सूची, प्रमाण, पुस्तक, मस्टर या अन्य दस्तावेज जानते हुए बनाएगा, या हस्ताक्षरित करेगा, अथवा
(ख) जो उसके बनाए जाने या हस्ताक्षरित किए जाने का समादेश या सलाह देगा या उसका बनाया जाना या हस्ताक्षरित किया जाना उपाप्त करेगा, अथवा
(ग) जो उसे बनाने और हस्ताक्षरित करने में किसी अन्य व्यक्ति की सहायता करेगा, उसे दुष्प्रेरित करेगा, अथवा
(घ) जो जानते हुए ऐसे किसी दस्तावेज में मिथ्या या कपटपूर्ण कथन या कपटपूर्ण लोप करेगा, किए जाने का समादेश या सलाह देगा अथवा ऐसे कथन या लोप का किया जाना उपाप्त करेगा,
कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
61. कर्तव्य से बचने के लिए रोगी होने का बहाना करना आदि-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति-
(क) जो अस्पताल में या अन्यत्र कोई रोग या अंगशैथिल्य उत्पन्न करने या बढ़ाने या निरोग होने में विलम्ब करने के आशय से कोई कार्य जानबूझकर करेगा, या किन्हीं आदेशों की जानबूझकर अवज्ञा करेगा; अथवा
(ख) किसी रोग का, अंगशैथिल्य का, या अपने कर्तव्यपालन में असमर्थ होने का ढोंग करेगा,
कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
62. इस आधार पर कि आहार अस्वास्थ्यकर है या अन्य न्यायसंगत आधारों पर उपद्रव पैदा करने का प्रयास करने के लिए शास्ति-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जिसके पास इस आधार पर कि आहार अस्वास्थकर है या किसी अन्य न्यायंगत आधार पर परिवाद करने का कोई हेतुक है, उसकी जानकारी अपने वरिष्ठ को या अपने केप्टेन को या नौसेनाध्यक्ष को संसूचना की विहित प्रणाली के अनुसार शान्तिपूर्वक करा देगा और उक्त वरिष्ठ, केप्टेन या नौसेनाध्यक्ष वहां तक, जहां तक वह ऐसा करने में समर्थ हो, तुरन्त उस बात का उपचार कराएगा और नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो किसी भी बहाने कोई उपद्रव पैदा करने का प्रयत्न करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
63. प्राइज सम्बन्धी कागज-पत्रों की बाबत अपराध-(1) वे सब कागज-पत्र, पोत भाटक-पत्र, वहनपत्र, पारपत्र और अन्य लेख चाहे वे कुछ भी हों, जो किन्हीं ऐसे पोतों के फलक पर से, जो प्राइज के तौर पर लिए गए हों, लिए जाएं, अभिगृहीत किए जाएं या पाए जाएं, सम्यक् रूप से परिरक्षित किए जाएंगे, और उस पोत का कमान आफिसर जिसने ऐसा प्राइज लिया है, उनकी पूरी मूल प्रतियों को, कपट के बिना, सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय को या अन्य ऐसे अधिकरण या आयुक्तों को, जो यह अवधारित करने के लिए प्राधिकृत किए गए हों कि क्या ऐसा प्राइज विधिपूर्ण प्रग्रहण है, भेजेगा जिससे विधि के अनुसार वहां उनका अवलोकन, उपयोग और उनके विषय में कार्यवाही की जाए ।
(2) हर कमान आफिसर, जो उन कागज-पत्रों, पोत भाटक-पत्रों, वहनपत्रों, पारपत्रों या अन्य लेखों को, चाहे वे कुछ भी हों, जो किन्हीं ऐसे पोतों के फलक पर से, जो प्राइज के तौर पर लिए गए हों, लिए जाएं, अभिगृहित किए जाएं या पाए जाएं, उचित न्यायालय या अन्य प्राधिकारी को भेजने में जानबूझकर असफल रहेगा, नौसैनिक सेवा से पदच्युत किए जाने के दंड से या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा, और इसके अतिरिक्त प्रग्रहण में का उसका अंश समपहृत हो जाएगा और जाता रहेगा ।
64. प्राइज की बाबत अपराध-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो किसी प्राइज में से या प्राइज के तौर पर अभिगृहीत पोत में से कोई धन, प्लेट या माल, इसके पूर्व कि सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय में उसे विधिपूर्ण प्राइज न्यायनिर्णीत किया जाए, तब के सिवाय निकाल लेगा जब कि यह निकालना उस धन, प्लेट या माल को अधिक सुरक्षित करने के लिए या भारतीय नौसेना के किन्हीं युद्धपोतों के आवश्यक उपयोग और सेवा के लिए आवश्यक है, कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा और इसके अतिरिक्त प्रग्रहण में का उसका अंश समपहृत हो जाएगा और जाता रहेगा ।
65. प्राइज पोत के फलक पर के व्यक्तियों के बारे में अपराध-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो प्राइज के तौर पर लिए गए पोत या जलयान के फलक पर के आफिसरों, जहाजियों या अन्य व्यक्तियों की किसी प्रकार लूटमार करेगा, उन्हें पीटेगा या उनसे बुरा बर्ताव करेगा या उनके कपड़े विधिविरुद्ध तौर पर उतार लेगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
66. प्राइज को विधिविरुद्ध देना या फिरौती लेकर छोड़ देना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का भारतीय सेना के पोत का हर कमान आफिसर जो-
(क) शत्रु के साथ दुस्सन्धि करके किसी जलयान, माल या वस्तु को प्राइज के तौर पर लेगा, अथवा
(ख) प्राइज के तौर पर लिए गए किसी जलयान, माल या वस्तु को फिरौती लेकर छोड़ देने का किसी व्यक्ति के साथ विधिविरुद्धतया करार करेगा, अथवा
(ग) फिरौती लेकर छोड़ देने के किसी अवैध करार के अनुसरण में या अन्यथा दुस्सन्धि करके किसी ऐसे जलयान, माल या वस्तु को जिसे प्राइज के तौर पर लिया गया है, वस्तुतः छोड़ेगा या प्रत्यावर्तित कर देगा,
कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
67. प्राइज पोत के फलक पर के माल में से निकाल लेना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो प्राइज के तौर पर लिए गए या किसी युद्धमानाधिकार के प्रयोग में या जलदस्युता या दास-व्यापार या सीमाशुल्क से सम्बद्ध किसी विधि के अधीन निरुद्ध किसी जलयान के फलक पर के किसी माल में से, इस आशय से कि उसमें की या उसकी किसी वस्तु का बेईमानी से दुर्विनियोग किया जाए, कुछ निकाल लेगा, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
68. अधिनियम, विनियमों और आदेशों का अतिक्रमण-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों का या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी विनियम का या किसी साधारण या स्थानीय आदेश का पालन करने में उपेक्षा करेगा या उसका उल्लंघन करेगा, तब के सिवाय, जब कि ऐसी उपेक्षा या उल्लंघन के लिए इस अधिनियम में अन्य दण्ड उपबन्धित किया गया है कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
69. सेना-न्यायालय के सम्बन्ध में अपराध-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो-
(क) किसी सेना-न्यायालय के समक्ष साक्षी के तौर पर हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से समनित या आदिष्ट होने पर हाजिर होने में जानबूझर या युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना असफल होगा, अथवा
(ख) उस शपथ या प्रतिज्ञान को, जिसके लिए या किए जाने की अपेक्षा सेना-न्यायालय द्वारा वैध रूप से की गई हो, लेने या करने से इंकार करेगा, अथवा
(ग) शपथ लेने के पश्चात् किन्हीं ऐसे प्रश्नों के उत्तर देने से इंकार करेगा, जिनका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा आबद्ध है, अथवा
(घ) अपनी शक्ति में की किसी ऐसी दस्तावेज को पेश या परिदत्त करने से इंकार करेगा, जिसे न्यायालय वैध रूप से मांगे, अथवा
(ङ) सेना-न्यायालय के अवमान का दोषी होगा,
कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
70. कपटपूर्ण प्रवेश-जो कोई भी व्यक्ति नौसैनिक सेवा में प्रविष्टि पर या प्रविष्ट होने के लिए स्वयं को पेश करते समय किसी आफिसर या व्यक्ति से, जो [नौसैनिकों] या अन्यों को ऐसी नौसैनिक सेवा में या के लिए प्रविष्ट या अभ्यावेशित करने के लिए प्राधिकृत है, चाहे मौखिक रूप में चाहे लिखित रूप में कोई मिथ्या कथन जानबूझकर करेगा या देगा, यदि वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन हो गया है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
71. अभिरक्षा से निकल भागना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा में होते हुए, ऐसी अभिरक्षा से निकल भागेगा या निकल भागने का प्रयत्न करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
72. अपराधियों के निरोध में सहायता करने में असफल रहना-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो-
(क) इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध करने वाले सब अपराधियों का पता लगाने, उन्हें पकड़ने या उन्हें दंड दिलवाने का भरसक प्रयास नहीं करेगा, अथवा
(ख) उस प्रयोजन के लिए नियुक्त आफिसरों की सहायता नहीं करेगा,
कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
73. बुलाए जाने पर हाजिर होने में रिजर्व बलों के सदस्यों के असफल रहने के लिए शास्ति-भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल का हर सदस्य, [और इस अधिनियम के अधीन समुत्थापित किन्हीं सहायक बलों का हर व्यक्तिट जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसरण में प्रशिक्षण के लिए बुलाए जाने पर या भारतीय नौसेना में वास्तविक सेवा करने के लिए बुलाए जाने पर और ऐसे बुलावे पर इस बात के लिए अपेक्षित होने पर कि वह किसी पोत पर के कर्तव्य ग्रहण के लिए पहुंचे या किसी स्थान पर हाजिर हो, ऐसी अपेक्षा का अनुपालन करने में, युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना असफल रहेगा, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दण्ड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
74. अच्छी सुव्यवस्था और नौसैनिक अनुशासन के विरुद्ध अपराध-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो सुव्यवस्था और नौसैनिक अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले, ऐसे कार्य, उपद्रव या उपेक्षा का, जो इसमें इससे पूर्व विनिर्दिष्ट नहीं की गई है, दोषी होगा, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे अन्य दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
75. प्रयत्न-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो धाराओं 34 से 74 तक और धारा 76 में विनिर्दिष्ट अपराधों में से कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा, और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध करने की दिशा में कोई कार्य करेगा, उस दशा में, जिसमें कि इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध ऐसा प्रयत्न दंडित करने के लिए नहीं किया गया है, -
(क) यदि प्रयतित अपराध मृत्यु से दंडित है, कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा, तथा
(ख) यदि प्रयतित अपराध कारावास से दंडनीय है, उस अपराध के लिए उपबन्धित अधिकतम दंड के आधे से या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
76. अपराधों का दुष्प्रेरण-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, जो धाराओं 34 से 74 तक में विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा और वहां जहां कि इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबन्ध ऐसे दुष्प्रेरण को दण्डित करने के लिए नहीं किया गया है, उस अपराध के लिए उपबन्धित दंड से दण्डित किया जाएगा चाहे दुष्प्रेरित कार्य, दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया हो या नहीं ।
77. सिविल अपराध-(1) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो मृत्यु से या आजीवन कारावास से दंडनीय सिविल अपराध करेगा, उस अपराध के लिए समनुदिष्ट दंड से दंडित किया जाएगा ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो कोई अन्य सिविल अपराध करेगा, या तो उस अपराध के लिए समनुदिष्ट दंड से या कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या अन्य ऐसे दंड से, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित है, दंडित किया जाएगा ।
78. स्थान और अपराधों के बारे में अधिकारिता-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जिस पर किसी नौसैनिक अपराध या सिविल अपराध का आरोप लगाया गया है, इस बात का ध्यान न करते हुए कि अभिकथित अपराध कहां किया गया था, इस अधिनियम के अधीन विचारित और दंडित किया जा सकेगा ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का व्यक्ति, जो ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो सैनिक, नौसैनिक या वायुसेना विधि के अध्यधीन नहीं है, हत्या का या ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानव वध का या ऐसे व्यक्ति से बलात्संग करने का अपराध करेगा, इस अधिनियम के अधीन विचारित और दंडित तब के सिवाय नहीं किया जाएगा जब कि वह उक्त अपराधों में से कोई अपराध-
(क) सक्रिय सेवा पर रहते समय करता है, अथवा
(ख) भारत के बाहर किसी स्थान पर करता है, अथवा
(ग) किसी ऐसे स्थान पर करता है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट हो ।
79. समय के बारे में अधिकारिता-कोई भी व्यक्ति, तब के सिवाय जब कि वह ऐसा अपराधी है जो पकड़े जाने से बच निकला है, या न्याय से भाग गया है या जिसने अभित्यजन या कपटपूर्ण प्रवेश या विद्रोह का अपराध किया है, अपने द्वारा किए गए किसी भी अपराध के लिए इस अधिनियम के अनुसरण में तब के सिवाय विचारित या दण्डित नहीं किया जाएगा जब कि ऐसा विचारण उस अपराध के किए जाने के तीन वर्ष के अन्दर प्रारम्भ हो जाता है:
परन्तु तीन वर्ष की उक्त कालावधि की संगणना करने में कोई भी समय, जिसके दौरान अपराधी भारत के बाहर था, या कोई भी समय जिसके दौरान वह युद्ध कैदी था, काट दिया जाएगा:
परन्तु यह और भी कि यदि प्रश्नगत व्यक्ति, जो आफिसर नहीं है, अपराध के किए जाने के पश्चात्, भारतीय नौसेना में तीन वर्ष के अन्यून समय तक अनुकरणीय रीति से निरंतर सेवा कर चुका है तो सक्रिय सेवा पर से अभित्यजन से भिन्न अभित्यजन के अपराध का या कपटपूर्ण प्रवेश के अपराध का कोई भी विचारण प्रारम्भ नहीं किया जाएगा ।
80. नौसैनिक विधि के अध्यधीन न रह जाने के पश्चात् किसी व्यक्ति का विचारण-जब कि इस अध्याय में वर्णित कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा उस समय किया गया है जब वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, और वह व्यक्ति अपराध किए जाने के पश्चात् नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं रह गया है, तब उसे इस अधिनियम के अधीन अभिरक्षा में ऐसी रीति से लिया और रखा जा सकेगा तथा ऐसे अपराध के लिए विचारित और दंडित किया जा सकेगा जैसे यदि वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन बना रहता है तो उसे अभिरक्षा में ले लिया और रखा जाता और विचारित और दंडित किया जाता :
परन्तु जब तक कि उसके विरुद्ध विचारण उसके इस प्रकार अध्यधीन न रह जाने के पश्चात् छह मास के अन्दर प्रारम्भ न हो जाए, विद्रोह या अभित्यजन के अपराध की दशा में के सिवाय ऐसे अपराध के लिए उसका विचारण नहीं किया जाएगा ।
अध्याय 9
दंड विषयक उपबन्ध
81. दंड-(1) इस अधिनियम के अधीन निम्नलिखित दंड दिए जा सकेंगे, -
(क) मृत्यु;
(ख) कारावास, जो आजीवन या किसी अन्य न्यून अवधि के लिए हो सकेगा;
(ग) नौसैनिक सेवा से सकलंक पदच्युति;
(घ) निरोध;
(ङ) नौसैनिक सेवा से पदच्युति;
(च) आफिसरों [और मास्टर चीफ पैटी आफिसरों] की दशा में, रैंक में की ज्येष्ठता का समपहरण;
(छ) 2[कमान्डर के रैंक से नीचे के आफिसरों और मास्टर चीफ पैटी आफिसरों की दशा में,] प्रोन्नति के लिए समय का समपहरण;
(ज) अपराधी जिस पोत का है, उससे उसकी पदच्युति;
(झ) [पैटी आफिसरों] और उच्चतर रेट धारण करने वाले व्यक्ति की दशा में, 2[रैंक में, अवनत करना];
(ञ) सिविल अपराधों की बाबत जुर्माना;
(ट) वेतन और भत्तों का अपकर्तन;
(ठ) तीव्र धिग्दंड या धिग्दंड;
(ड) अपराधी द्वारा उपार्जित वेतन, मथौत, बाउन्टी, उद्धारण, प्राइज धन और भत्तों का और उसे अनुदत्त सब वार्षिकियों, पेंशनों, उपदानों, पदकों, और अलंकरणों का या उपर्युक्त विशिष्टियों में से किसी एक या अधिक का समपहरणः अभित्यजन की दशा में, अभित्याजक द्वारा उस पोत पर जिसका वह है, छोड़े गए कपड़ों और चीजबस्त का भी समपहरण;
(ढ) ऐसे लघुदंड, जो नौसेना की रूढ़ि के अनुसार दिए जाते हैं या समय-समय पर विहित किए जाएं ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट दंडों में से हर एक उपर्युक्त मापमान में उससे पूर्व दिए हुए हर दंड से, कोटि में निम्नतर समझा जाएगा ।
82. दंड अधिनिर्णीत किए जाने के विषय में उपबन्ध-(1) वे दंड, जो इस अधिनियम के अधीन दिए जा सकेंगे, निम्नलिखित उपधाराओं के उपबन्धों के अनुसार अधिनिर्णीत किए जाएंगे ।
(2) युद्ध-काल में या सक्रिय सेवा पर किए गए विद्रोह की दशा में के सिवाय मृत्यु दंड किसी अपराधी को तब तक न दिया जाएगा, जब तक दंडादेश की पुष्टि केन्द्रीय सरकार द्वारा न कर दी गई हो ।
(3) दो साल से अधिक के कारावास के दंड के साथ, सब दशाओं में नौसैनिक सेवा से सकलंक पदच्युति का दंडादेश भी होगा ।
(4) दो साल से अनधिक के कारावास के दंड के साथ, सब दशाओं में नौसैनिक सेवा से सकलंक पदच्युति का या पदच्युति का दंडादेश भी हो सकेगा:
परन्तु आफिसरों की दशा में, तब के सिवाय जब कि सकलंक पदच्युति का दंडादेश भी अधिनिर्णीत किया गया हो, कारावास के ऐसे दंडादेश में नौसैनिक सेवा से पदच्युति भी अन्तर्वलित होगी ।
(5) कारावास का दंडादेश कठिन या सादा या भागतः कठिन और भागतः सादा हो सकेगा ।
(6) अपराधी द्वारा उपार्जित सब वेतन, मथौत, बाउन्टी, उद्धारण, प्राइज धन और भत्तों का और उसे अनुदत्त सब वार्षिकियों, पेंशनों, उपदानों, पदकों और अलंकरणों का भी, समपहरण तथा किसी प्रतिरक्षा सेवा या सिविल सेवा में सरकार की फिर सेवा करने की या सरकार के अधीन प्रतिरक्षा से संसक्त कोई भी पद या कोई सिविल पद धारण करने की अपात्रता सकलंक पदच्युति दण्डादेश में सब दशाओं में अन्तर्वलित होगी:
परन्तु अभित्याजकों की दशा में के सिवाय, धन का समपहरण उस धन को लागू नहीं होगा, जो दोषसिद्धि से पूर्ववर्ती अन्तिम वेतन दिवस को दे दिया जाना चाहिए था ।
(7) नौसैनिक सेवा से पदच्युति के दण्ड में उन व्यक्तियों की दशा में, जो नियमित सेना या वायुसेना में नियुक्तियों पर धारणाधिकार रखते हैं, ऐसी सैनिक या वायुसैनिक सेवा से पदच्युति अन्तर्वलित होगी ।
(8) निरोध का दंड दो वर्ष से अनधिक की किसी भी अवधि के लिए दिया जा सकेगा, किन्तु जब तक कि नौसैनिक निरोध क्वार्टर या सैनिक या वायुसैनिक निरोध बैरक वर्तमान न हो, निरोध का कोई भी दंडादेश नहीं दिया जाएगा ।
(9) उपधारा (14) के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि चाहे पोत के फलक पर या तट पर कारावास या निरोध के दंड में, किसी पैटी आफिसर या उच्चतर [रैंक] धारण करने वाले किसी व्यक्ति के मामले में [रैंक में अवनति] अन्तर्वलित होगा, और साथ ही सब दशाओं में, उस कारावास या निरोध की अवधि के दौरान के वेतन और भत्ते बन्द रहेंगे:
परन्तु जहां कि अधिनिर्णीत दंड चौदह दिन से अनधिक की अवधि के लिए निरोध का है, वहां दंडादेश में यह निदेश दिया जा सकेगा कि दंड के साथ-साथ निरोध अवधि के दौरान वेतन और भत्ते बन्द नहीं रहेंगे ।
(10) कोई भी आफिसर निरोध्य नहीं होगा ।
(11) ज्येष्ठता के समपहरण का दंड दंडादेश की तारीख को धारित प्रतिष्ठायी रैंक में अधिरोपित किया जाएगा और हर उच्चतर कार्यकारी रैंक में की ज्येष्ठता का तत्सम समपहरण, इस शर्त के सदैव अध्यधीन रहते हुए उसमें अन्तर्वलित होगा कि किसी रैंक में की ज्येष्ठता का समपहरण दंडादेश की तारीख को उसके उस रैंक में की ज्येष्ठता से किसी भी दशा में अधिक नहीं होगा ।
(12) ज्येष्ठता के समपहरण के दंड में वेतन, पेंशन, उपदान, प्रोन्नति के प्रयोजनों के लिए तथा ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए, जैसे विहित किए जाएं, समपहृत ज्येष्ठता में सम्मिलित सेवा के फायदे की हानि अन्तर्वलित होगी, परन्तु यह तब जब कि वेतन, पेंशन, उपदान और प्रोन्नति तथा अन्य प्रयोजन ऐसी सेवा पर निर्भर हों ।
[(12क) किसी मास्टर चीफ पैटी आफिसर की दशा में बारह मास से अधिक की ज्येष्ठता के समपहरण का दण्ड नहीं दिया जाएगा ।]
(13) प्रोन्नति समय के समपहरण का दंड, प्रोन्नति में उतने समय का, जितना विनिर्दिष्ट हो, विलम्ब कर देगा ।
2[(13क) किसी मास्टर चीफ पैटी आफिसर की दशा में, बारह मास से अधिक की प्रोन्नति समय के समपहरण का दण्ड नहीं दिया जाएगा ।]
(14) किसी भी व्यक्ति को विहित सीमाओं से नीचे या उस रेटिंग से, जिसमें वह नौसैनिक सेवा में प्रविष्ट हुआ था या नियुक्त किया गया था वस्तुतः या सापेक्षतया रेट में अवनत नहीं किया जाएगा ।
(15) उपधाराओं (16) और (17) में यथोपबन्धित के सिवाय, वेतन और भत्तों का अपकर्तन अधिनिर्णीत नहीं किया जाएगा ।
(16) धारा 51 के अधीन अपराधी की दोषसिद्धि पर वेतन और भत्तों का अपकर्तन इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार अधिनिर्णीत किया जाएगा ।
(17) उस उपधारा के कारण, जिसके लिए, दोषसिद्धि हुई है, किसी साबित हुई हानि या नुकसान को पूरा करने के लिए और [नौसैनिकों] द्वारा मत्तता के अपराध के लिए भी वेतन का अपकर्तन अधिनिर्णीत किया जा सकेगा ।
(18) जुर्माने का दंड, सिविल अपराधों की बाबत अन्य दंडों के अतिरिक्त या के बदले, अधिनिर्णीत किया जा सकेगा जो इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट है ।
(19) धारा 81 की उपधारा (1) के खंड (ड) के अधीन किया गया धन का समपहरण अभित्यजन की दशा में के सिवाय, उस धन को लागू नहीं होगा जो दोषसिद्धि से पूर्ववर्ती अन्तिम वेतन दिवस को दे दिया जाना चाहिए था ।
(20) इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत अन्य सब दंड ऐसी रीति से दिए जा सकेंगे जैसी नौसैनिक सेवा में एतत्पूर्व काम में आती रही है या जो विहित की जाए ।
(21) पूर्वगामी उपधाराओं के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, जहां कि कोई दंड, किसी अपराध के लिए शास्ति के रूप में इस अधिनियम द्वारा विनिर्दिष्ट किया गया है, और यह भी घोषित किया गया है कि अन्य ऐसे दंड, जो इसमें इसके पश्चात् वर्णित हैं, उसी अपराध के लिए अधिनिर्णीत किया जा सकेगा, वहां अन्य ऐसे दंडपद में उन दंडों में से एक या अधिक समाविष्ट समझा जाएगा जो विनिर्दिष्ट दंड से धारा 81 की उपधारा (1) में दिए गए दंडों में मापमान के अनुसार कोटि में निम्नतर हैं ।
अध्याय 10
गिरफ्तारी
83. गिरफ्तारी के वारण्ट निकालने की शक्ति-(1) नौसेनाध्यक्ष, भारतीय नौसेना के पोतों के बेड़े या स्क्वाड्रन का या भारतीय नौसेना के किसी पोत का समादेशन करने वाला हर आफिसर या किसी पत्तन पर उपस्थित ज्येष्ठ आफिसर या वह आफिसर जिसे अपराधों का विचारण करने की शक्ति धारा 93 की उपधारा (2) और (3) के आधार पर प्राप्त है, स्वहस्ताक्षरित वारण्ट द्वारा किसी भी व्यक्ति को प्राधिकृत कर सकेगा कि वह व्यक्ति किसी ऐसे अपराधी को जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, इस अधिनियम के अधीन विचारणीय किसी भी ऐसे अपराध के लिए, जो ऐसे वारण्ट में वर्णित है, गिरफ्तार कर ले, और ऐसे वारण्ट में एक ही प्रकृति के कई अपराधों के बारे में एक से अधिक व्यक्तियों के नाम अन्तर्विष्ट हो सकेंगे ।
(2) कोई व्यक्ति, जो किसी यथापूर्वोक्त वारण्ट में नामित है, यदि वारण्ट ऐसा किया जाना निर्दिष्ट करता है, अपनी गिरफ्तारी की जाने पर तत्क्षण, भारतीय नौसेना के उस पोत को, जिसका वह व्यक्ति है या भारतीय नौसेना के किसी अन्य पोत को ले जाया जा सकेगा ।
(3) अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए प्राधिकृत व्यक्ति ऐसे बल का प्रयोग कर सकेगा जो ऐसी गिरफ्तारी करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हो ।
(4) जहां कि उपधारा (1) के अधीन का वारण्ट किसी पुलिस आफिसर को निकाला गया हो वहां वह पुलिस आफिसर वारण्ट का निष्पादन करने के लिए कार्यवाही करेगा और अपराधी को ऐसी रीति से गिरफ्तार करेगा, मानो वह वारण्ट सक्षम अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट द्वारा निकाला गया हो, और जब वह व्यक्ति गिरफ्तार कर लिया जाए, तब उसे नौसैनिक अभिरक्षा में रखे जाने के लिए यथाशक्यशीघ्र परिदत्त कर देगा ।
84. वारण्ट के बिना गिरफ्तारी-(1) नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी भी व्यक्ति की बाबत वारण्ट के बिना नौसैनिक अभिरक्षा में ले लिए जाने का आदेश इस अधिनियम के अधीन विचारणीय किसी अपराध के लिए किसी भी वरिष्ठ आफिसर द्वारा दिया जा सकेगा ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी ऐसे अन्य व्यक्ति को, जो उसकी दृष्टिगोचरता में ऐसा कोई अपराध करता है, जो मृत्यु अथवा आजीवन या चौदह वर्ष तक की अवधि के कारावास से दंडनीय है, वारण्ट के बिना गिरफ्तार कर सकेगा, भले ही वह अन्य व्यक्ति उससे उच्चतर रैंक का हो ।
(3) प्रोवो मार्शल नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी भी व्यक्ति को धारा 89 के उपबन्धों के अनुसार गिरफ्तार कर सकेगा ।
(4) वारण्ट के बिना गिरफ्तारी करने या किसी व्यक्ति को अभिरक्षा में लेने के प्रयोजनों के लिए ऐसे बल का प्रयोग करना विधिपूर्ण होगा, जैसा उस प्रयोजन के लिए आवश्यक हो ।
85. नौसैनिक अभिरक्षा की प्रक्रिया और शर्तें-(1) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई भी व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन गिरफ्तार किया गया है, ऐसी गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी उसे यथाशक्यशीघ्र दिए गए बिना, नौसैनिक अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं रखा जाएगा ।
(2) नौसैनिक विधि के अध्यधीन का हर व्यक्ति, जो गिरफ्तार किया गया है और नौसैनिक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया है ऐसी गिरफ्तारी के अड़तालीस घंटों की कालावधि के अन्दर, जिसकी गणना में वह समय अपवर्जित कर दिया जाएगा जो गिरफ्तारी के स्थान से उसके कमान आफिसर तक या अन्य ऐसे आफिसर तक, जो इस निमित्त विहित किया गया हो, यात्रा के लिए आवश्यक हो, ऐसे कमान आफिसर या अन्य आफिसर के समक्ष पेश किया जाएगा और ऐसे कमान आफिसर या अन्य आफिसर के प्राधिकार के बिना ऐसा कोई भी व्यक्ति उक्त कालावधि से अधिक समय तक अभिरक्षा में निरुद्ध न रखा जाएगा ।
86. गिरफ्तारी के पश्चात् अन्वेषण-अभिरक्षा में लिए नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोप का अन्वेषण उचित प्राधिकारी द्वारा अनावश्यक विलम्ब के बिना किया जाएगा, और यथाशक्य शीघ्र या तो विचारण के लिए कार्यवाही की जाएगी, या उस व्यक्ति को अभिरक्षा से उन्मोचित कर दिया जाएगा ।
87. अभिरक्षा में लेने या रखने का कर्तव्य-(1) कमान आफिसर हर ऐसे व्यक्ति की सुरक्षित अभिरक्षा के लिए उत्तरदायी होगा जो उसके पोत के फलक पर या उसके स्थापन में नौसैनिक अभिरक्षा में है ।
(2) गारद का भारसाधक आफिसर या [नौसैनिक] अथवा प्रोवो मार्शल, किसी भी ऐसे व्यक्ति को लेगा और रखेगा, जो अभिरक्षा के लिए उसे सम्यक् रूप से सुपुर्द किया जाए ।
88. विचारण के पहले प्रक्रिया-इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि विचारण से पहले की प्रक्रिया और अन्वेषण की रीति वह होगी जो विहित की जाए ।
89. प्रोवो मार्शल-(1) प्रोवो मार्शलों की नियुक्ति नौसेनाध्यक्ष या विहित आफिसर द्वारा की जा सकेगी ।
(2) प्रोवो मार्शल के कर्तव्य हैं नौसैनिक अभिरक्षा में के व्यक्तियों को अपने भारसाधन में लेना, अच्छी व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना और नौसैनिक विधि या नियमित सेना या वायुसेना के शासन से संबद्ध प्रवृत्त विधि के अध्यधीन के व्यक्तियों द्वारा उसके भंग को निवारित करना ।
(3) प्रोवो मार्शल नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी ऐसे व्यक्ति को, जो कोई अपराध करता है या जिस पर किसी अपराध का आरोप है, विचारण के लिए किसी भी समय गिरफ्तार और निरुद्ध कर सकेगा और इस अधिनियम के अधीन पारित दंडादेश के अनुसरण में दिए जाने वाले दंड क्रियान्वित भी कर सकेगा, किन्तु अपने स्वयं के प्राधिकार से कोई दंड नहीं देगा:
परन्तु कोई भी आफिसर किसी अन्य आफिसर के आदेश पर गिरफ्तार या निरुद्ध किए जाने से अन्यथा ऐसे गिरफ्तार या निरुद्ध नहीं किया जाएगा ।
(4) उपधाराओं (2) और (3) के प्रयोजन के लिए प्रोवो मार्शल के अन्तर्गत प्रोवो मार्शल और उसके सहायकों में से कोई, जो नियमित सेना या वायुसेना के शासन से संबद्ध प्रवृत्त विधि के अधीन नियुक्त है, समझा जाएगा ।
अध्याय 11
आरोप
90. आरोपों का संयोजन-हर ऐसे सुभिन्न अपराध के लिए, जिसका कोई व्यक्ति अभियुक्त है, पृथक् आरोप होगा, किन्तु इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा अन्यथा उपबन्धित के सिवाय सब पृथक् आरोपों का एक साथ विचारण किया जा सकेगा ।
91. विभिन्न अपराधों की कोटि में आने वाले कार्य-यदि कोई एक कार्य या कार्यावली ऐसी प्रकृति की है कि यह सन्देहपूर्ण है कि वे तथ्य, जो साबित किए जा सकते हैं, कई अपराधों में से कौन सा अपराध गठित करेंगे तो अभियुक्त पर ऐसे सब अपराधों को या उनमें से किन्हीं को करने का आरोप लगाया जा सकेगा और ऐसे आरोपों में से कितनों ही का एक साथ विचारण किया जा सकेगा या उस पर उक्त अपराधों में से किसी एक को करने का अनुकल्पतः आरोप लगाया जा सकेगा ।
92. अभियुक्त व्यक्तियों का संयोजन-निम्नलिखित व्यक्ति एक साथ आरोपित और विचारित किए जा सकेंगे, अर्थात्-
(i) वे व्यक्ति जो एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए एक ही अपराध के लिए अभियुक्त हों;
(ii) वे व्यक्ति जो किसी अपराध के अभियुक्त हों और ऐसे अपराध का दुष्प्रेरण या प्रयत्न करने के अभियुक्त हों; तथा
(iii) वे व्यक्ति जो एक ही संव्यवहार के अनुक्रम में किए गए भिन्न अपराधों के लिए अभियुक्त हों:
परन्तु किसी सेना-न्यायालय द्वारा विचारण में विचारण जज एडवोकोट किसी अभियुक्त द्वारा इस निमित्त किए गए आवेदन पर निदेश दे सकेगा कि अभियुक्तों में से हर एक का विचारण उसी सेना-न्यायालय द्वारा पृथक्-पृथक् किया जाए ।
अध्याय 12
दण्ड अधिनिर्णीत करने की शक्ति रखने वाले प्राधिकारी
93. सेना न्यायालय और कमान आफिसरों को अपराधों का विचारण करने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के अधीन विचारणीय अपराध सेना-न्यायालय द्वारा विचारित और दंडित किया जा सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन विचारणीय ऐसा अपराध, जो मृत्यु से दण्डनीय नहीं है, और आफिसर से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा (और उन मामलों में, जिनके लिए इस अधिनियम द्वारा स्पष्ट रूप से उपबन्ध किया गया है, कि कब किसी आफिसर द्वारा किया गया है) किया गया है उस पोत के, जिसका अपराधी या तो अपराध करने के समय या विचारण के समय है, कमान आफिसर द्वारा उन विनियमों के अध्यधीन रहते हुए, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए हों, संक्षिप्ततः विचारित और दंडित, इस निर्बन्धन के अध्यधीन रहते हुए किया जा सकेगा कि कमान आफिसर को यह शक्ति न होगी कि वह तीन मास से अधिक के लिए कारावास या निरोध अधिनिर्णीत करे या नौसैनिक सेवा से सकलंक पदच्युति अधिनिर्णीत करे :
परन्तु कारावास या पदच्युति का कोई भी दंडादेश तब तक क्रियान्वित नहीं किया जाएगा, जब तक वह विहित प्राधिकारियों द्वारा अनुमोदित न कर दिया गया हो ।
(3) वह शक्ति, जो पोत के कमान आफिसर में इस धारा द्वारा निहित की गई है, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अध्यधीन रहते हुए-
(क) उन [नौसैनिकों] के बारे में, जो पोत के टेण्डर के फलक पर हैं, ऐसे एकल टेण्डर की दशा में, जो पोत से अन्यत्र हैं ऐसे टेण्डर के समादेशधारक आफिसर द्वारा तथा पोत से अन्यत्र के दो या अधिक उन टेण्डरों की दशा में, जो एक साथ में हैं या साथ-साथ काम कर रहे हैं, ऐसे टेण्डरों के अव्यवहित समादेशधारक आफिसर द्वारा प्रयुक्त की जा सकेगी;
(ख) उन 1[नौसैनिकों] के बारे में, जो किसी ऐसी नौका के फलक पर हैं जो पोत की है, उस दशा में, जब कि ऐसी नौका वियोजित सेवा पर गई हुई है, नौका का समादेशन करने वाले आफिसर द्वारा प्रयुक्त की जा सकेगी;
(ग) उन 1[नौसैनिकों] के बारे में, जो या तो तट पर या अन्यथा वियोजित सेवा पर हैं, उस व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त की जा सकेगी जो उन व्यक्तियों का अव्यवहित समादेशन करता है;
(घ) नौसैनिक बैरकों में आवासित 1[नौसैनिकों] के बारे में बैरकों का समादेशन करने वाले आफिसर द्वारा प्रयुक्त की जा सकेगी,
(ङ) उन 1[नौसैनिकों] के बारे में, जो नियमित सेना या वायुसेना के किसी निकाय के साथ विहित शर्तों के अधीन संलग्न या सेवा में हैं, नियमित सेना या वायुसेना के ऐसे किसी निकाय के कमान आफिसर द्वारा प्रयुक्त की जा सकेगी ।
(4) पोत या बैरकों का कमान आफिसर, ऐसे दंड जो मापमान में पदच्युति से निम्नतर है अधिनिर्णीत करने की शक्ति अपने समादेशाधीन अन्य आफिसरों को इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार प्रत्यायोजित कर सकेगा ।
94. समय या ज्येष्ठता का समपहरण अधिरोपित करने की केन्द्रीय सरकार, नौसेनाध्यक्ष और अन्य आफिसरों की शक्ति- [(1) केन्द्रीय सरकार कमान्डर के रैंक से नीचे के किसी आफिसर पर निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड अधिरोपित कर सकेगी, अर्थात्: -
(क) रैंक में बारह मास से अनधिक की ज्येष्ठता का समपहरण;
(ख) बारह मास से अनधिक के प्रोन्नति समय का समपहरण;
(ग) वेतन और भत्तों का अपकर्तन ।
(2) नौसेनाध्यक्ष कमान्डर के रैंक से नीचे के किसी आफिसर पर निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड अधिपोरित कर सकेगा, अर्थात्: -
(क) रैंक में छह मास से अनधिक की ज्येष्ठता का समपहरण;
(ख) छह मास से अनधिक के प्रोन्नति समय का समपहरण;
(ग) वेतन और भत्तों का अपकर्तन ।
(2क) किसी नौसैनिक कमान का फ्लैग आफिसर कमांडिग-इन-चीफ इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन रहते हुए, कमान्डर के रैंक के नीचे के किसी आफिसर पर निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड अधिरोपित कर सकेगा, अर्थात्: -
(क) रैंक में तीन मास से अनधिक की ज्येष्ठता का समपहरण;
(ख) तीन मास से अनधिक के प्रोन्नति समय का समपहरण;
(ग) तीव्र धिग्दन्ड या धिग्दन्ड;
(घ) वेतन और भत्तों का अपकर्तन ।]
(3) किसी पोत का कमांडिग आफिसर, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन रहते हुए, किसी भी अधीनस्थ आफिसर पर निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड अधिरोपित कर सकेगा, अर्थात्: -
(क) रैंक में तीन मास से अनधिक की ज्येष्ठता का समपहरण;
(ख) तीन मास से अनधिक के प्रोन्नति समय का समपहरण;
(ग) वेतन और भत्तों का अपकर्तन ।]
(4) उपधाराओं (1), [(2) और (2क) के अधीन] दंड अधिरोपित करने में, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष के लिए यह आवश्यक न होगा कि वह स्वयं अभियुक्त को या उसे उसके किसी मित्र या काउन्सल द्वारा सुने ।
[(5) किसी [पोत] का कमान आफिसर या नौसैनिक अकादमी का भारसाधक आफिसर किसी अधीनस्थ आफिसर पर जब वह प्रशिक्षणाधीन हो समय-समय पर विहित किए जाने वाले ऐसे छोटे दण्ड अधिरोपित कर सकेगा, जो तीव्र-धिग्दण्ड या धिग्दण्ड से बड़े न हों ।]
95. अनुशासनिक न्यायालय कब गठित किए जा सकेंगे-जब कि किसी आफिसर की बाबत युद्ध-काल में या सक्रिया सेवा के दौरान यह अभिकथित किया गया है कि उसने अनुशासनिक अपराध अर्थात् धारा 41, 47, 48, 49, 51, 52, 68 और 74 को, या धारा 75 या 76 के साथ पठित उन धाराओं में से किसी को भंग करने का अपराध किया है तब वह आफिसर, जो यह आदेश देने की शक्ति रखता है कि सेना-न्यायालय द्वारा विचारण किया जाए, उस दशा में, जब कि वह अपराध को इस प्रकार का समझता है कि सेना न्यायालय द्वारा विचारण आवश्यक नहीं है, सेना-न्यायालय का आदेश किए जाने के बदले यह आदेश दे सकेगा कि विचारण इसमें इसके पश्चात् वर्णित रूप में गठित अनुशासनिक न्यायालय द्वारा किया जाए ।
96. अनुशासनिक न्यायालयों का गठन और प्रक्रिया-(1) अनुशासनिक न्यायालय पांच से अनधिक और तीन से अन्यून आफिसरों से मिलकर बनेगा:
परन्तु अध्यक्ष सहित उन आफिसरों की बहुसंख्या नौसैनिक सेवा की कार्यपालिका शाखा के आफिसरों की होगी ।
(2) जिन आफिसरों से मिलकर न्यायालय बनेगा उनमें से कम से कम एक विचारणाधीन आफिसर के रैंक से वरिष्ठ रैंक का होगा, और किसी भी दशा में वह प्रतिष्ठायी या कार्यकारी कमांडर के रैंक का या उससे उच्चतर रैंक का होगा ।
(3) अनुशासनिक न्यायालय को यह शक्ति होगी कि वह कोई ऐसा दण्ड, जो उस मापमान के अनुसार, जो एत्स्मिनपूर्व अन्तर्विष्ट है, निरोध से निम्नतर कोटि का है, अधिरोपित करे, न कि उससे कोई गुरुतर दण्ड ।
(4) जिन आफिसरों से मिलकर अनुशासनिक न्यायालय बनेगा वे उस प्राधिकारी द्वारा जिसने उसके द्वारा विचारण किए जाने का आदेश दिया है, या ऐसे प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त सशक्त किए गए किसी आफिसर द्वारा नामित किए जाएंगे ।
(5) पूर्वगामी उपधाराओं के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि सेना-न्यायालयों की इस अधिनियम के द्वारा या अधीन उपबन्धित प्रक्रिया और पद्धति ऐसे उपान्तरों के साथ, जो विहित किए जाएं, अनुशासनिक न्यायालयों की प्रक्रिया और पद्धति को लागू होगी ।
97. सेना-न्यायालयों का गठन-(1) सेना-न्यायालय निम्नलिखित उपधाराओं के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए गठित और संयोजित किए जाएंगे ।
(2) राष्ट्रपति या नौसेनाध्यक्ष को या ऐसे आफिसर को, जिसे नौसेनाध्यक्ष ने आयोग द्वारा इस निमित्त सशक्त किया है, यह शक्ति होगी कि वह इस अधिनियम के अधीन के अपराधों के विचारण करने के लिए सेना-न्यायालयों को आदेश करे ।
(3) जब तक कि किसी विनिर्दिष्ट पत्तन या स्टेशन के बारे में अन्यथा विहित न किया गया हो, वह आफिसर, जो सेना-न्यायालयों का आदेश करने को नौसेनाध्यक्ष से आयोग धारण किए हुए हैं, ऐसा करने के लिए सशक्त नहीं होगा, यदि कोई ऐसा आफिसर जो रैंक में उससे वरिष्ठ है, और भारतीय नौसेना के पोतों में से एक या अधिक का समादेशन करता है, उस स्थान में, जहां कि सेना-न्यायालय अधिविष्ट होता है, उपस्थित है, भले ही ऐसा अन्तिम वर्णित आफिसर सेना-न्यायालयों का आदेश करने के लिए आयोग धारण न किए हो, और ऐसी दशा में ऐसा अन्तिम वर्णित आफिसर सेना-न्यायालय का आदेश कर सकेगा भले ही वह उस प्रयोजन के लिए कोई आयोग धारण न किए हो ।
(4) यदि सेना-न्यायालय का आदेश करने के लिए नौसेनाध्यक्ष से आयोग धारण करने वाला आफिसर किसी फ्लीट या स्क्वाड्रन का समादेशन करते हुए और भारतीय जलक्षेत्र से बाहर रहते हुए मर जाता है, वापस बुला लिया जाता है, अपना स्टेशन छोड़ जाता है, या अपने समादेशन से हटा दिया जाता है, तो नौसेनाध्यक्ष से किसी आयोग के बिना उस आफिसर को, जिसे उस फ्लीट या स्क्वाड्रन का समादेशन न्यागत होता है और इसी प्रकार समय-समय पर उस आफिसर की, जो उस फ्लीट या स्क्वाड्रन का समादेशन करे, सेना-न्यायालयों का आदेश करने की वही शक्ति होगी, जो प्रथम वर्णित आफिसर में विनिहित थी ।
(5) यदि कोई आफिसर, जो सेना-न्यायालयों का आदेश करने का नौसेनाध्यक्ष से आयोग धारण किए हुए है, और भारतीय नौसेना के किसी ऐसे फ्लीट या स्क्वाड्रन का समादेशन किए हुए है, जो भारत के जलक्षेत्र से बाहर है, ऐसे किसी फ्लीट या स्क्वाड्रन के किसी भाग को वियोजित कर लेता है, या ऐसे फ्लीट या स्क्वाड्रन के किसी भाग से स्वयं को पृथक् कर लेता है तो वह प्रथम वर्णित दशा में, उस स्क्वाड्रन या टुकड़ी के कमान आफिसर को, जिसे ऐसी पृथक् सेवा का आदेश दिया गया है और उसकी मृत्यु हो जाने या ऐसे समादेशन करने से उसके परिविरत हो जाने की दशा में उस आफिसर को, जिसे ऐसे पृथक् स्क्वाड्रन या टुकड़ी का समादेशन प्राप्त होगा और द्वितीय वर्णित दशा में, भारतीय नौसेना के उस ज्येष्ठ आफिसर को, जो स्टेशन के खण्ड पर का है, जिससे वह अनुपस्थित है स्व-हस्ताक्षरित आयोग द्वारा यह शक्ति दे सकेगा कि वह, यथास्थिति, ऐसी पृथक् सेवा के समय के दौरान या उस स्टेशन के खण्ड से उसकी अनुपस्थिति के दौरान, सेना-न्यायालयों का आदेश करे और ऐसा हर प्राधिकार तब तक प्रवृत्त बना रहेगा जब तक वह प्रतिसंहृत न कर दिया जाए, या जब तक उस प्राधिकार को धारण करने वाला आफिसर भारत न लौट आए या जब तक वह किसी ऐसे वरिष्ठ आफिसर के समक्ष न आए जो उसी स्क्वाड्रन, टुकड़ी, या स्टेशन के खण्ड में सेना-न्यायालय का आदेश द्वारा गठन करने के लिए सशक्त है किन्तु ऐसा प्राधिकार उस दशा में, जब कि उसे धारण करने वाला आफिसर वहां नहीं रह जाता, जहां कि ऐसा वरिष्ठ आफिसर उपस्थित है, तथा समय-समय पर जितनी बार कि मामले से ऐसा अपेक्षित हो, पुनरुज्जीवित हो जाएगा ।
(6) सेना-न्यायालय पांच से अन्यून और नौ से अनधिक आफिसरों से मिलकर बनेगा ।
(7) कोई भी आफिसर सेना-न्यायालय के सदस्य के रूप में बैठने के लिए अर्हित तब के सिवाय न होगा, जब कि-
(क) वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन है,
(ख) वह लैफ्टीनेंट के या उच्च्तर रैंक का नौसेना का आफिसर है, तथा
(ग) वह इक्कीस वर्ष की या उससे अधिक आयु का है ।
(8) अभियोजक, उस व्यक्ति के, जिसका वह अभियोजन करता है, विचारण के लिए गठित सेना-न्यायालय में सदस्य के तौर पर बैठने के लिए अर्हित न होगा ।
(9) वह आफिसर, जिसने सेना न्यायालय का आदेश द्वारा गठन किया है, वह आफिसर, जो उस पोत का कमान आफिसर था जिसका अभियुक्त व्यक्ति उस समय था जब अभिकथित अपराध किया गया तथा वह आफिसर, जिसने अपराध का अन्वेषण किया, ऐसे अभियुक्त के विचारण के लिए गठित सेना-न्यायालय में सदस्य के तौर पर बैठने के लिए अर्हित न होंगे ।
(10) उपधाराओं (7) से (9) तक के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि भारतीय नौसेना के आफिसर इस पर ध्यान दिए बिना कि वे नौसैनिक सेवा की किस शाखा के हैं, सेना-न्यायालय के सदस्य के तौर पर उसमें बैठने के लिए पात्र होंगे:
परन्तु-
(क) अध्यक्ष सहित सेना न्यायालय के सदस्यों की बहुसंख्या नौसैनिक सेवा की कार्यपालिका शाखा के आफिसरों की होगी;
(ख) नौसैनिक सेवा की कार्यपालिका शाखा के आफिसरों से भिन्न आफिसर उन अपराधों के विचारण में सदस्य के तौर पर बैठने के लिए पात्र न होंगे जो धाराओं 34, 35, 55, [55क, 55ग] और 56 के विरुद्ध है ।
(11) सेना-न्यायालय सम्यक् रूप से गठित नहीं समझा जाएगा जब तक कि उसके सदस्य लैफ्टीनेंट के रैंक के या उससे उच्चतर रैंक के आफिसरों के समादेशाधीन वाले कम से कम दो ऐसे पोतों से, जो टेंडर नहीं हैं, न लिए गए हों ।
(12) सेना-न्यायालय का अध्यक्ष उस प्राधिकारी द्वारा जिसने उसका आदेश किया है या ऐसे प्राधिकारी द्वारा अध्यक्ष नामित करने के लिए सशक्त किए गए किसी आफिसर द्वारा, नामित किया जाएगा ।
(13) फ्लैग आफिसर के विचारण के लिए कोई भी सेना-न्यायालय सम्यक् रूप से गठित नहीं होगा जब तक कि अध्यक्ष फ्लैग आफिसर न हो और अन्य आफिसर जिनसे मिलकर न्यायालय बना है कैप्टन के रैंक के या उससे उच्चतर रैंक के न हों ।
(14) कैप्टन के विचारण के लिए कोई भी सेना-न्यायालय सम्यक् रूप से गठित नहीं होगा जब तक कि अध्यक्ष कैप्टन या उससे उच्चतर रैंक का न हो और अन्य आफिसर जिनसे मिलकर न्यायालय बना हो, कमांडर या उससे उच्चतर रैंक के आफिसर न हों ।
(15) कमांडर के विचारण के लिए कोई भी सेना-न्यायालय सम्यक् रूप से गठित नहीं होगा जब तक कि अध्यक्ष कमांडर या उससे उच्चतर रैंक का न हो और दो अन्य सदस्य कमांडर या उससे उच्चतर रैंक के आफिसर न हों ।
(16) कमांडर के रैंक से नीचे के रैंक के व्यक्ति के विचारण के लिए कोई भी सेना-न्यायालय सम्यक् रूप से गठित नहीं होगा जब तक कि अध्यक्ष प्रतिष्ठायी या कार्यकारी कमांडर या उससे उच्चतर रैंक का न हो ।
(17) कोई भी कमांडर, या लैफ्टीनेंट कमांडर या लैफ्टीनेंट किसी सेना-न्यायालय के सदस्य के रूप में बैठने के लिए तब अपेक्षित नहीं किया जाएगा जब कि उच्चतर रैंक के और अध्यक्ष से कनिष्ठ चार आफिसर उस स्थान पर समवेत किए जा सकते हैं जहां सेना-न्यायालय अधिविष्ट होना है, किन्तु किसी सेना-न्यायालय की या उसकी कार्यवाही की नियमितता या विधिमान्यता पर प्रभाव किन्हीं परिस्थितियों से किसी कमांडर, लैफ्टीनेंट कमांडर, या लैफ्टीनेंट से उसमें सदस्य के तौर पर बैठने की अपेक्षा किए जाने से या सदस्य के तौर पर उसके बैठने से नहीं पड़ेगा और जबकि कोई कमांडर या लैफ्टीनेंट कमांडर या लैफ्टीनेंट किसी सेना-न्यायालय में सदस्य के तौर पर बैठता है, तब उसके सदस्य पांच से अधिक नहीं होंगे ।
(18) सेना न्यायालय के अध्यक्ष से भिन्न सदस्य पूर्वगामी उपधाराओं के अध्यधीन रहते हुए, उपधारा (19) में उपबन्धित रीति से नियुक्त किए जाएंगे ।
(19) उपधारा (11) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि अध्यक्ष उन आफिसरों के सिवाय, जिन्हें उपधारा (20) के उपबन्धों के अधीन छूट दी गई है, ऐसे सब आफिसरों को, जो ज्येष्ठता में उससे ठीक नीचे के हैं और उस स्थान में उपस्थित हैं, जहां सेना-न्यायालय अधिविष्ट होना है, सेना-न्यायालय में सदस्य के तौर पर बैठने के लिए आहूत करेगा जब तक कि नौ की संख्या या पांच से अन्यून कोई अन्य संख्या, जो प्राप्त हों, पूरी नहीं हो जाती ।
(20) सेना-न्यायालय का संयोजन करने वाला आफिसर या उस स्थान पर, जहां सेना न्यायालय अधिविष्ट होना है, उपस्थित ज्येष्ठ नौसैनिक आफिसर सेना-न्यायालय के अध्यक्ष को पहुंचाए गए स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा, किसी आफिसर को सदस्य के रूप में हाजिर होने से छूट रुग्णता या अर्जेण्ट लोक कर्तव्य के आधार पर दे सकेगा ।
(21) जब तक कि अन्यथा कथित न हो, इस धारा में आफिसरों के विनिर्दिष्ट रैंकों के प्रति निर्देश प्रतिष्ठायी रैंकों के प्रति निर्देश समझे जाएंगे, और यह समझा जाएगा कि नौसैनिक सेवा की सब शाखाओं में के समतुल्य रैंकों के प्रति निर्देश उनके अन्तर्गत आते हैं ।
(22) जहां नौसैनिक बल सक्रिय सेवा पर हों, तब नौसैनिक विधि के अध्यधीन के भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल के आफिसर सेना-न्यायालय के सदस्यों के तौर पर उसमें बैठने के लिए पात्र उसी आधार पर और उन्हीं शर्तों के अधीन होंगे जिस पर या जिनके अधीन भारतीय नौसेना के आफिसर होते हैं ।
अध्याय 13
प्रक्रिया
सेना-न्यायालयों की प्रक्रिया
98. सेना-न्यायालय कहां अधिविष्ट होंगे-सेना न्यायालय स्थल या जल पर अधिविष्ट हो सकेगा ।
99. विचारण जज एडवोकेट-(1) हर सेना-न्यायालय में एक व्यक्ति (जो इस अधिनियम में विचारण जज एडवोकेट के रूप में विनिर्दिष्ट है) हाजिर रहेगा जो या तो नौसेना के जज एडवोकेट जनरल के विभाग में का जज एडवोकेट होगा या संयोजक आफिसर द्वारा नियुक्त कोई उपयुक्त व्यक्ति होगा:
परन्तु किसी ऐसे सेना-न्यायालय की दशा में, जो मृत्यु से दंडनीय किसी अपराध के विचारण के लिए है, तब के सिवाय जब कि ऐसा विचारण भारतीय जलक्षेत्र के बाहर किया जाता है विचारण जज एडवोकेट नौसेना के जज एडवोकेट जनरल द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्ति होगा ।
(2) विचारण जज एडवोकेट विचारण में हर साक्षी को शपथ दिलाएगा और अन्य ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो इस अधिनियम में उपस्थित हैं और विहित किए जाएं ।
100. सेना-न्यायालय लोक के प्रवेश के लिए खुले होंगे-वह स्थान, जिसमें कोई सेना-न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करने के प्रयोजन के लिए अधिविष्ट होता है, खुला न्यायालय समझा जाएगा, जिसमें साधारण लोक, जहां तक सुविधापूर्वक वह उसमें समा सकें, प्रवेश कर सकेंगे:
परन्तु यदि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि लोक हित में या न्याय के उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो न्यायालय किसी विशिष्ट मामले के विचारण के लिए किसी भी प्रक्रम में आदेश दे सकेगा कि साधारण लोक या उसका कोई प्रभाग या कोई विशिष्ट व्यक्ति उस स्थान में, जहां न्यायालय अधिविष्ट है, प्रवेश न करेगा, या न होगा या ठहरा न रहेगा ।
101. कार्यवाहियों का प्रारम्भ-(1) जैसे ही न्यायालय समवेत हो जाए, अभियुक्त उसके सामने लाया जाएगा और अभियोजक, अभियुक्त की प्रतिरक्षा करने वाला या वाले व्यक्ति, यदि कोई हो या हों, और दर्शकगण प्रविष्ट होने दिए जाएंगे ।
(2) अभियुक्त की प्रतिरक्षा वहां के सिवाय, जहां कि वह अपनी प्रतिरक्षा स्वयं करता है, ऐसा व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति कर सकेंगे जो विहित किए जाएं ।
(3) विचारण जज एडवोकेट न्यायालय को समवेत करने का अधिपत्र और उन व्यक्तियों के नाम, जिन्हें धारा 97 की उपधारा (20) के अधीन हाजिरी से छूट दी गई है, ऐसी छूट के कारणों सहित, पढ़कर सुनाएगा ।
(4) विचारण जज एडवोकेट उन आफिसरों के नाम पढ़ कर सुनाएगा जिनसे मिलकर न्यायालय बना है और अभियोजक से पूछेगा कि उसे उनमें से किसी के प्रति आक्षेप तो नहीं है ।
(5) यदि अभियोजक ने कोई आक्षेप नहीं किया हो या अभियोजक द्वारा किए गए आक्षेप का निपटारा हो चुका हो तो विचारण जज एडवोकेट अभियुक्त से पूछेगा कि न्यायालय के किसी सदस्य के प्रति उसे आक्षेप तो नहीं है ।
102. सदस्यों के प्रति आक्षेप-अभियोजक और अभियुक्त द्वारा उठाए गए आक्षेपों के निपटारे को निम्नलिखित उपबन्ध लागू होंगे-
(क) किसी भी सदस्य के प्रति आक्षेप ऐसे आधार पर किया जा सकेगा जिससे निष्पक्ष न्यायाधीश के रूप में कार्य करने की उसकी क्षमता पर प्रभाव पड़ता है और विचारण जज एडवोकेट न्यायालय के सदस्यों को निर्देशित किए बिना किसी ऐसे आक्षेप को संक्षिप्ततः प्रतिक्षेपित कर सकेगा, जो ऐसे आधार पर न किया गया हो;
(ख) सदस्यों के प्रति किए गए आक्षेपों का विनिश्चय अलग-अलग किया जाएगा; रैंक में सबसे निम्न आफिसर के प्रति किए गए आक्षेपों को सबसे पहले विचारार्थ लिया जाएगा; परन्तु यदि आक्षेप अध्यक्ष के प्रति किया गया है तो ऐसे आक्षेप का विनिश्चय सबसे पहले किया जाएगा, और सब अन्य सदस्य, चाहे उनके प्रति आक्षेप किया गया हो या नहीं उस आक्षेप के निपटारे के विषय में मतदान करेंगे;
(ग) कोई आक्षेप उन आफिसरों में से, जो आक्षेप का विनिश्चय करने के हकदार हैं, आधे या अधिक आफिसरों द्वारा मंजूर कर दिए जाने पर, वह सदस्य जिसके बारे में आक्षेप किया गया है तत्काल निवृत्त हो जाएगा, और उसका स्थान इसके पूर्व कि किसी अन्य सदस्य के विरुद्ध किए गए आक्षेप को विचारार्थ लिया जाए, भर दिया जाएगा;
(घ) यदि अध्यक्ष के प्रति आक्षेप किया जाता है, और वह आक्षेप मंजूर कर लिया जाता है, तो न्यायालय तब तक के लिए स्थगित हो जाएगा, जब तक कि संयोजक प्राधिकारी द्वारा या उस संयोजक अधिकारी द्वारा इस निमित्त सशक्त किए गए आफिसर द्वारा नया अध्यक्ष नियुक्त नहीं कर दिया जाता;
(ङ) यदि किसी सदस्य के प्रति आक्षेप इस आधार पर किया जाता है कि वह साक्षी के तौर पर समन किया गया है और यह पाया जाता है कि आक्षेप सद्भावपूर्वक किया गया है और आफिसर को तथ्यों के बारे में, न कि केवल शील के बारे में, साक्ष्य देना है तो आक्षेप मंजूर किया जाएगा ।
103. अतिरिक्त आक्षेप-(1) विचारण जज एडवोकेट तब अभियुक्त से पूछेगा कि उसे न्यायालय के गठन के बारे में कोई अतिरिक्त आक्षेप तो नहीं है, और यदि अभियुक्त ऐसा कोई आक्षेप उठाता है तो उसका विनिश्चय न्यायालय द्वारा किया जाएगा, जो विनिश्चय अन्तिम होगा और तत्पश्चात् सेना-न्यायालय के गठन के प्रति अधिक्षेप नहीं किया जाएगा और यह समझा जाएगा कि वह सब प्रकार से सम्यक् रूप से गठित है ।
(2) यदि अभियुक्त को, न्यायालय गठन के बारे में अतिरिक्त आक्षेप नहीं करना है या यदि कोई आक्षेप नामंजूर हो गया है, तो सदस्य और विचारण जज एडवोकेट धारा 104 में उपवर्णित प्ररूप में शपथ लेंगे या प्रतिज्ञान करेंगे ।
104. शपथ दिलाना या प्रतिज्ञान कराना-(1) इसके पूर्व कि न्यायालय आरोपित व्यक्ति का विचारण करने के लिए अग्रसर हो, विचारण जज एडवोकेट द्वारा सेना-न्यायालय के अध्यक्ष और हर सदस्य को उनकी ज्येष्ठता के क्रम से निम्नलिखित प्ररूप में और नीति से शपथ दिलाई जाएगी या प्रतिज्ञान कराया जाएगा-
ईश्वर की शपथ लेता हूं
मैं .................... कि मैं सम्यक् प्रकार से और वफादारी से तथा अपनी
सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक बुद्धि से, न्याय का प्रशासन भय या पक्षपात, अनुराग या वैमनस्य के बिना विधि के अनुसार करूंगा, और इस सेना-न्यायालय के किसी विशिष्ट सदस्य का मत या राय किसी भी कारण से या किसी भी समय तब के सिवाय जाहिर या प्रकट नहीं करूंगा जबकि उसे जाहिर या प्रकट करने की मुझसे विधि के सम्यक् अनुक्रम में अपेक्षा की जाए ।" ।
(2) तत्श्चात् विचारण जज एडवोकेट से निम्नलिखित प्ररूप में शपथ ग्रहण या प्रतिज्ञान अध्यक्ष द्वारा कराया जाएगा-
ईश्वर की शपथ लेता हूं
मैं --------------------- कि सम्यक् रूप से और वफादारी से तथा अपनी
सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक बुद्धि से, अपने पद के कर्तव्यों का पालन भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना विधि के अनुसार करूंगा, और इस सेना-न्यायालय के किसी विशिष्ट सदस्य का मत या राय किसी भी कारण से और किसी भी समय तब के सिवाय जाहिर या प्रकट नहीं करूंगा, जबकि उसे जाहिर या प्रकट करने की मुझसे विधि के सम्यक् अनुक्रम में अपेक्षा की जाए ।" ।
105. दोषारोपण-(1) जबकि न्यायालय विचारण प्रारम्भ करने के लिए तैयार हो गया हो, तब विचारण जज एडवोकेट आरोप पढ़कर सुनाएगा और अभियुक्त से पूछेगा कि वह दोषी होने का या दोषी न होने का अभिवचन करता है ।
(2) यदि अभियुक्त दोषी होने का अभिवचन करता है, तो ऐसे अभिवचन के अभिलिखित किए जाने से पूर्व विचारण जज एडवोकेट यह सुनिश्चित करेगा कि अभियुक्त उस आरोप को, जिसका दोषी होने का उसने अभिवचन किया है और दोषी होने के अभिवचन के परिणामस्वरूप प्रक्रिया में जो अन्तर होगा उसको समझता है ।
(3) यदि अभियुक्त के उत्तरों से या विहित रीति से तैयार किए गए साक्ष्यसंक्षेप में यह प्रतीत होता है कि उसे दोषी होने का अभिवचन नहीं करना चाहिए, तो विचारण जज एडवोकेट अभियुक्त को अपना अभिवचन प्रत्याहृत करने की सलाह दे सकेगा ।
(4) यदि न्यायालय दोषी होने का अभिवचन प्रतिगृहीत कर लेता है, तो वह न्यायालय के निष्कर्ष के रूप में अभिलिखित किया जाएगा और न्यायालय दंडादेश पारित करने की कार्यवाही करने के लिए तब के सिवाय अग्रसर होगा, जब कि अन्य आरोप हैं, जिनका विचारण किया जाना है, जिस दशा में दंडादेश तब के लिए आस्थगित कर दिया जाएगा जब तक उस आरोपों पर निष्कर्ष न दे दिए जाएं ।
106. अभियोजन पक्ष का प्रारम्भ-(1) यदि अभियुक्त दोषी न होने का अभिवचन करता है या अभिवचन करने से इंकार करता है, या अभिवचन नहीं करता या यदि यह दावा करता है कि उसका विचारण किया जाए या यदि दोषी होने के अभिवचन का प्रत्याहरण धारा 105 की उपधारा (3) में वर्णित परिस्थितियों में कर लेता है या यदि न्यायालय दोषी होने का अभिवचन प्रतिगृहीत नहीं करता, तो न्यायालय अभियुक्त का विचारण करने के लिए अग्रसर होगा ।
(2) अभियोजक अपने मामले का कथन उस परिस्थिति-पत्र को पढ़ते हुए, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार तैयार किया गया है, आरोपित अपराध का वर्णन इस अधिनियम या भारतीय दंड संहिता या अन्य विधि में से आरोपित अपराध पढ़ते हुए और संक्षेप में यह कथित करते हुए कि वह अभियुक्त का दोष किस साक्ष्य से साबित करने की प्रत्याशा करता है, प्रारम्भ करेगा ।
(3) अभियोजक तब अपने साक्षियों की परीक्षा करेगा ।
107. अभियोजन के उस साक्षी को बुलाना जिसका नाम मूल सूची में नहीं है-कोई भी साक्षी, जिसका नाम साक्षियों की उस मूल सूची में भी सम्मिलित नहीं था जो विचारण जज एडवोकेट और अभियुक्त को इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार दी गई है, अभियोजक द्वारा तब के सिवाय नहीं बुलाया जाएगा, जब कि विचारण जज एडवोकेट ने अभियुक्त को ऐसे साक्षी को बुलाने के अभियोजक के आशय की सूचना दे दी हो और ऐसे साक्षी के साक्ष्य का संक्षेप अभियुक्त को दे दिया हो ।
108. दुभाषिए और आशुलिपिक द्वारा शपथ ग्रहण-विचारण के दौरान किसी भी समय यदि न्यायालय आवश्यक समझे तो कोई निष्पक्ष व्यक्ति दुभाषिए के रूप में काम करने के लिए नियोजित किया जा सकेगा और उससे उस हैसियत में निम्नलिखित रीति से शपथग्रहण या प्रतिज्ञान कराया जा सकेगा-
ईश्वर की शपथ लेता हूं
मैं --------------------- कि जो मामला इस सेना-न्यायालय के समक्ष
सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
सम्बन्धित जो निर्वचन और अनुवाद मुझसे अपेक्षित होगा, उसे मैं अपनी योग्यता से सही-सही करूंगा ।"
(2) विचारण के दौरान कोई निष्पक्ष व्यक्ति आशुलिपिक के रूप में नियोजित किया जाएगा और उससे उस हैसियत में निम्नलिखित रीति से शपथग्रहण या प्रतिज्ञान सम्यक् रूप से कराया जाएगा-
ईश्वर की शपथ लेता हूं
मैं --------------------- कि इस सेना-न्यायालय के समक्ष दिए जाने वाले साक्ष्य
सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
को और ऐसी अन्य बातों को, जिन्हें लिखने की मुझसे अपेक्षा की जाएगी, अपनी पूरी शक्ति से सही-सही लिखूंगा और अपेक्षित किए जाने पर न्यायालय को उसकी सही अनुलिपि परिदत्त करूंगा ।" ।
109. दुभाषिए या आशुलिपिक के प्रति आक्षेप-(1) इससे पूर्व कि दुभाषिए या आशुलिपिक की हैसियत में किसी व्यक्ति से शपथ ग्रहण या प्रतिज्ञान कराया जाए, अभियुक्त से पूछा जाएगा कि उस व्यक्ति के प्रति उसका क्या यह आक्षेप है कि वह निष्पक्ष नहीं है और न्यायालय आक्षेप के विषय में विनिश्चय करेगा ।
(2) यदि न्यायालय या साक्षी द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाए तो उस साक्षी द्वारा दिया गया साक्ष्य न्यायालय से उसके जाने के पूर्व उसे पढ़कर सुनाया जाएगा ।
110. साक्षियों का शपथग्रहण-(1) किसी भी साक्षी की परीक्षा तब तक नहीं की जाएगी जब तक कि उससे निम्नलिखित रीति से शपथग्रहण या प्रतिज्ञान सम्यक् रूप से न करा लिया गया हो-
ईश्वर की शपथ लेता हूं
मैं --------------------- कि जो साक्ष्य मैं न्यायालय के समक्ष दूंगा वह सत्य
सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञान करता हूं
और सम्पूर्ण सत्य होगा और सत्य के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा ।"
(2) हर व्यक्ति, जो शपथ या प्रतिज्ञान पर सेना-न्यायालय के समक्ष साक्ष्य दे रहा है, सत्य कथित करने के लिए आबद्ध होगा ।
111. यह अभिवाक् कि कोई मामला बनता ही नहीं और अभियुक्त की प्रतिरक्षा-(1) अभियोजन-साक्षियों की परीक्षा समाप्त हो जाने पर अभियुक्त से अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए कहा जाएगा ।
(2) अपनी प्रतिरक्षा आरम्भ करने के पूर्व, अभियुक्त यह अभिवाक् कर सकेगा कि ऐसा कोई मामला बनता ही नहीं है जिसका उत्तर दिया जाए ।
(3) यदि ऐसा अभिवाक् किया जाता है तो न्यायालय अभियुक्त और अभियोजक को और विचारण जज एडवोकेट की सलाह को सुनने के पश्चात् उस अभिवाक् का विनिश्चय करेगा ।
(4) यदि न्यायालय उस अभिवाक् को प्रतिगृहीत कर ले तो अभियुक्त उस आरोप या उन आरोपों से दोषमुक्त कर दिया जाएगा, जिनके बारे में अभिवाक् प्रतिगृहीत किया गया है ।
(5) यदि न्यायालय उस अभिवाक् को नामंजूर कर देता है तो अभियुक्त से अपेक्षा की जाएगी कि वह अपनी प्रतिरक्षा आरम्भ करे ।
(6) विचारण जज एडवोकेट अभियुक्त को तब यह जानकारी देगा कि यदि वह ऐसा करना चाहे और ऐसा करने के लिए लिखित प्रार्थना करे तो वह अपनी ओर से साक्षी के रूप में स्वयं साक्ष्य दे सकेगा, किन्तु वह तद्द्वारा अपने को इस दायित्व के अधीन कर लेगा कि उसकी प्रतिपरीक्षा की जाए ।
(7) यदि अभियुक्त साक्ष्य देने का आवेदन नहीं करता तो वह मामले के तथ्यों के बारे में कथन कर सकेगा, और यदि उसके कोई प्रतिरक्षण-साक्षी नहीं है जिनकी परीक्षा तथ्यों के बारे में की जाए तो अभियोजक अपने मामले का उपसंहार कर सकेगा और अभियुक्त उत्तर देने का हकदार होगा ।
(8) यदि अभियुक्त या कई अभियुक्तों में से कोई भी एक साक्ष्य देने के लिए आवेदन करता है और प्रतिरक्षण के लिए कोई भी अन्य ऐसे साक्षी, जो शील के बारे के साक्षियों से भिन्न हैं, उस मामले में नहीं हैं, तो ऐसे अभियुक्त का साक्ष्य अभिलिखित किया जाएगा, और यदि अभियुक्त ऐसा चाहे तो शील के बारे में साक्षियों की परीक्षा की जाएगी और अभियोजक तब अपने मामले का उपसंहार करेगा और अभियुक्त उत्तर दे सकेगा ।
(9) यदि अभियुक्त या अभियुक्तों में से कोई भी एक स्वयं अपने साक्ष्य से, यदि कोई हो, अतिरिक्त कोई तथ्य-विषयक मौखिक साक्ष्य देता है तो अभियुक्त उस साक्ष्य की समाप्ति पर अपने मामले का उपसंहार कर सकेगा और अभियोजक उत्तर देने का हकदार होगा ।
112. अवलोकन के लिए स्थगन-(1) जब कभी न्यायालय यह समझता है कि उसे उस स्थान का, जिसके बारे में यह अभिकथित है कि आरोपित अपराध वहां किया गया था या किसी अन्य स्थान का, जिसके बारे में यह अभिकथित है कि कोई अन्य संव्यवहार जो विचारण के लिए तात्त्विक है वहां घटित हुआ था, अवलोकन करना चाहिए, तो न्यायालय उस भाव का आदेश करेगा और अभियोजक और अभियुक्त के और किसी व्यक्ति के, यदि कोई हो, जिसके द्वारा अभियुक्त का प्रतिनिधित्व होता है, साथ तब उस स्थान को जाएगा जिसका अवलोकन किया जाना है ।
(2) अवलोकन पूरा हो जाने पर न्यायालय स्थगन करके न्यायालय-कक्ष में पुनः समवेत होगा ।
113. विचारण जज एडवोकेट द्वारा उपसंहार-जब कि प्रतिरक्षा के मामले का कथन और अभियोजक का उत्तर, यदि कोई हो, समाप्त हो गए हों तब विचारण जज एडवोकेट अभियोजन और प्रतिरक्षा की ओर के साक्ष्य का खुले न्यायालय में उपसंहार करने को अग्रसर होगा और वह विधि अधिकथित करेगा जिससे न्यायालय को मार्गदर्शन प्राप्त करना है ।
114. विचारण जज एडवोकेट के कर्तव्य-(1) सेना-न्यायालय द्वारा किए जाने वाले सब विचारणों में, विचारण जज एडवोकेट का यह कर्तव्य होगा कि वह विचारण के अनुक्रम में उठने वाले सब विधि-प्रश्नों का, विशेषतया उन तथ्यों की ससंगति के बारे में, जिन्हें साबित करने की प्रस्थापना है, सब प्रश्नों का और साक्ष्य की ग्राह्यता या पक्षकारों द्वारा या उनकी ओर से पूछे गए प्रश्नों के औचित्य का विनिश्चय करे और अग्राह्य साक्ष्य का पेश किया जाना, चाहे पक्षकारों द्वारा उसके बारे में आक्षेप किया जाए या नहीं, स्वविवेकानुसार निवारित करें ।
(2) जब भी विचारण जज एडवोकेट को किसी विचारण के अनुक्रम में यह वांछनीय प्रतीत होता है कि साक्ष्य की ग्राह्यता के बारे की बहस और साक्ष्य अथवा पृथक् विचारणों के आवेदन के समर्थन में या किन्हीं अन्य-विधि-प्रश्नों पर बहस न्यायालय की उपस्थिति में नहीं सुनी जानी चाहिए, तब वह न्यायालय के अध्यक्ष को तदनुसार सलाह दे सकेगा और तदुपरि अध्यक्ष यह आदेश करेगा कि न्यायालय एकांत में जाए या विचारण जज एडवोकेट को यह निदेश देगा कि वह किसी अन्य सुविधाजनक स्थान में बहस सुने ।
115. न्यायालय के कर्तव्य-न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह यह विनिश्चय करे कि तथ्यों के बारे में कौन सी दृष्टि ठीक है और फिर उस निष्कर्ष पर पहुंचे जिस पर, उस दृष्टि से पहुंचना चाहिए ।
116. निष्कर्ष के संबंध में विचार करने के लिए एकांतता-(1) विचारण जज एडवोकेट ने जब अपनी बात का उपसंहार समाप्त कर लिया हो तब न्यायालय निष्कर्ष के संबंध में विचार करने के लिए खाली कराया जाएगा ।
(2) विचारण जज एडवोकेट तब न्यायालय के साथ नहीं बैठेगा जब न्यायालय निष्कर्ष पर विचार कर रहा है, और जब न्यायालय निष्कर्ष के संबंध में विचार कर रहा है तब कोई भी व्यक्ति न तो न्यायालय से कोई बात करेगा और न कोई वार्ताचार करेगा ।
117. निष्कर्ष का आख्यापन-(1) जब न्यायालय ने निष्कर्ष के बारे में विचार कर लिया हो, तब, न्यायालय पुनः समवेत किया जाएगा और विचारण जज एडवोकेट को अध्यक्ष यह बात खुले न्यायालय में बाताएगा कि उसका धारा 124 के अनुसार अभिनिश्चित निष्कर्ष क्या है ।
(2) न्यायालय उन सब आरोपों पर अपने निष्कर्ष देगा जिन पर अभियुक्त का विचारण हुआ है ।
118. निष्कर्ष लेखबद्ध करना-(1) विचारण जज एडवोकेट तब न्यायालय द्वारा यथा आख्यापित निष्कर्ष को लेखबद्ध करेगा ।
(2) इस प्रकार लेखबद्ध किया हुआ निष्कर्ष इस बात के होते हुए भी कि न्यायालय के सदस्यों में मतभेद रहा है न्यायालय के सब सदस्यों द्वारा अनुप्रमाणार्थ हस्ताक्षरित किया जाएगा, तथा विचारण जज एडवोकेट द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित किया जाएगा ।
(3) जहां कि किसी आरोप के बारे में दोषी नहीं होने का निष्कर्ष है, वहां न्यायालय अभियुक्त को उस आरोप से दोषमुक्त कर देगा ।
(4) यदि अभियुक्त सब आरोपों से दोषमुक्त कर दिया जाता है, तो निष्कर्षों पर उपधारा (2) में यथा उपबन्धित हस्ताक्षर करने के पश्चात् न्यायालय विघटित कर दिया जाएगा ।
(5) न तो न्यायालय और न विचारण जज एडवोकेट खुले न्यायालय में यह आख्यापित करेगा कि निष्कर्ष सर्वसम्मत था या नहीं, किन्तु अध्यक्ष सेना-न्यायालय के किसी विशिष्ट सदस्य का मत या की राय प्रकट किए बिना, हर निष्कर्ष पर का मतविभाजन अभिलिखित करेगा और ऐसा अभिलेख नौसेना के जज एडवोकेट जनरल को पारेषित किए जाने के लिए विचारण जज एडवोकेट को संसूचित किया जाएगा ।
119. शील और पूर्व दोषसिद्धियों का साक्ष्य-(1) यदि अभियुक्त सब आरोपों पर या उनमें से किसी पर दोषी पाया जाता है, तो दंड अधिनिर्णीत करने के पहले न्यायालय अभियुक्त के पूर्व शील और अर्हताओं के बारे में साक्ष्य पेश करा सकेगा, और साधारण शील विषयक किसी मौखिक साक्ष्य के अतिरिक्त, जो दिया जाए, निम्नलिखित दस्तावेजों पर, जिन्हें विचारण जज एडवोकेट खुले न्यायालय में पढ़ेगा, विचार करेगा, -
(क) किसी आफिसर के बारे में-
(i) उसकी पूर्व दोषसिद्धियों सम्बन्धी कोई प्रविष्टियां, जो उन आफिसरों की सूची में, जिनका सेना-न्यायालय द्वारा विचारण किया गया है, उसके विरुद्ध हैं; तथा
(ii) कोई पूर्व प्रविष्टियां जो उस पोत की, जिसका वह उस समय रहा हो जब वह अपराध किया गया था या वे अपराध किए गए थे जिस या जिनके लिए उसका विचारण हो रहा है, लागबुक में उसके विरुद्ध हों और वरिष्ठ प्राधिकारी द्वारा की गई सुनिश्चित परिनिन्दा की प्रवृत्ति की ऐसी कोई दस्तावेजें भी, जो लागबुक में की ऐसी प्रविष्टियों से भिन्न हैं, ऐसी लागबुक और दस्तावेजें अभियोजन को पेश करनी होंगी; तथा
(iii) शील विषयक ऐसा कोई प्रमाणपत्र या अन्य दस्तावेजें, जो अभियुक्त पेश करे;
(ख) किसी [नौसैनिक] के बारे में-
(i) दिसम्बर के 31वें दिवस के उस अपराध की तारीख तक, जिसके लिए वह विचारण के अधीन हो, निर्धारित उसके शील सहित किन्तु उस अपराध को ध्यान में न लेते हुए ऐसी विशिष्टियां, जो अपराध की तारीख से पहले किन्तु उसके अपने तत्कालिक पोत पर सम्मिलित होने से पश्चात् आचरण-अपराध-अभिलेख पर्णियों में उसके विरुद्ध हों,
(ii) उसका सेवा-प्रमाणपत्र, तथा
(iii) उसकी पूर्व दोषसिद्धियों सम्बन्धी कोई प्रविष्टियां जो उनकी सूची में उसके विरुद्ध हैं जिनका सेना-न्यायालय द्वारा विचारण किया गया है ।
(2) अभियुक्त तब दंड के कम किए जाने के लिए कथन कर सकेगा और शील विषयक साक्ष्य पेश कर सकेगा, यदि निष्कर्ष के पहले उसने ऐसा न कर दिया हो ।
120. दंडादेश पर विचार-(1) न्यायालय तदुपरान्त एकान्त में बैठेगा और निष्कर्ष के अनुरूपतः दिए जाने के लिए उचित दंड का विचारण और अवधारण करेगा और न्यायालय के सब सदस्य, चाहे उन्होंने दोषमुक्ति के लिए अपना मत दिया हो या नहीं, इस प्रश्न पर अपना-अपना मत देंगे कि अभियुक्त जिस अपराध का दोषी पाया गया है, उसके लिए कौन सा दंड अधिनिर्णीत किया जाना उचित है ।
(2) विचारण जज एडवोकेट न्यायालय के साथ उस दौरान बैठेगा जब न्यायालय दंडादेश पर विचार कर रहा हो और दण्डादेश का अवधारण करने में न्यायालय की सहायता करेगा किन्तु उस पर अपना मत नहीं देगा ।
121. दंडादेश का आख्यापन-(1) जब कि न्यायालय ने दंडादेश पर, चाहे सर्वसम्मति से या बहुमत से, विनिश्चय कर लिया हो, तब विचारण जज एडवोकेट दंडादेश को विहित रूप में लेखबद्ध करेगा जो, ऐसे किसी मतभेद के होते हुए भी, जो न्यायालय के सदस्यों में रहा हो, न्यायालय के हर सदस्य द्वारा अनुप्रमाणार्थ हस्ताक्षरित किया जाएगा और विचारण जज एडवोकेट द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित किया जाएगा ।
(2) न्यायालय तब पुनः समवेत किया जाएगा और अभियुक्त अन्दर लाया जाएगा और विचारण जज एडवोकेट न्यायालय के निदेश से दंडादेश सुनाएगा ।
(3) अभियुक्त को तब वहां से हटा दिया जाएगा और न्यायालय विघटित कर दिया जाएगा ।
122. स्थगन-(1) यदि सेना-न्यायालय को प्रतीत होता है कि स्थगन वांछनीय है, तो वह न्यायालय तदनुसार स्थगित किया जाएगा किन्तु वहां के सिवाय जहां कि ऐसे स्थगन का आदेश दिया गया है सेना-न्यायालय, तब के सिवाय जब कि मौसमजन्य कठिनाई से या अपरिवर्जनीय दुर्घटना से वह ऐसा करने से निवारित हो जाए रविवार को छोड़कर दिन-प्रतिदिन तब तक बैठेगा जब तक विचारण समाप्त न हो जाए ।
(2) सेना-न्यायालय की कार्यवाहियां विचारण प्रारंभ हो जाने के पश्चात् इस कारण विलम्बित नहीं की जाएंगी कि उसका कोई सदस्य अनुपस्थित है:
परन्तु वह तब जब कि चार से अन्यून सदस्य उपस्थित हों; तथा
परन्तु यह और भी कि यदि कोई सदस्य विचारण के किसी भाग में अनुपस्थित रहा है, तो यह तत्पश्चात् कार्यवाहियों में कोई भाग नहीं लेगा ।
123. सेना-न्यायालयों के विघटन के सम्बन्ध में उपबन्ध-(1) इस अधिनियम के अधीन समवेत किए गए सेना-न्यायालय का विघटन-
(क) उन सदस्यों की संख्या, जिनसे मिलकर न्यायालय बना है, विचारण के प्रारम्भ के पश्चात् चार से कम हो जाने पर हो जाएगा,
(ख) अध्यक्ष, विचारण जज एडवोकेट या अभियुक्त की लम्बी रुग्णता से हो जाएगा,
(ग) अध्यक्ष या विचारण जज एडकोटे की मृत्यु हो जाने से हो जाएगा,
(घ) धारा 143 की उपधारा (2) के अधीन रिपोर्ट की जाने पर हो जाएगा ।
(2) जब कभी सेना-न्यायालय उपधारा (1) के आधार पर विघटित हो जाए, तब अभियुक्त का पुनः विचारण किया जा सकेगा ।
124. न्यायालय की राय का अभिनिश्चित किया जाना-(1) हर प्रश्न का, जिस पर अवधारण सेना-न्यायालय द्वारा किया जाना है, विनिश्चय उपधाराओं (2) और (3) के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए बहुमत के अनुसार किया जाएगा:
परन्तु मत बराबर होने की दशा में, वह विनिश्चय अभिभावी होगा, जो अभियुक्त के सर्वाधिक पक्ष में है ।
(2) मृत्यु का दंडादेश किसी भी अपराधी के विरुद्ध तब के सिवाय पारित नहीं किया जाएगा जब कि उस दशा में, जिसमें सेना-न्यायालय की सदस्य संख्या पांच से अधिक नहीं है, उपस्थित सदस्यों में से कम से कम चार की, और अन्य सब दशाओं में, उपस्थित सदस्यों के दो-तिहाई से अन्यून सदस्यों की बहुसंख्या की दंडादेश के बारे में सहमति न हो ।
(3) जहां कि किसी अपराध के बारे में एकमात्र दंड, जो अधिनिर्णीत किया जा सकता हो, मृत्यु है, वहां यह निष्कर्ष कि ऐसे अपराध का आरोप साबित हो गया है, तब के सिवाय नहीं दिया जाएगा जब कि उस दशा में, जिमसें सेना-न्यायालय की सदस्य संख्या पांच से अधिक नहीं है उपस्थित सदस्यों से कम से कम चार की, और अन्य सब दशाओं में उपस्थित सदस्यों की दो-तिहाई से अन्यून सदस्यों की बहुसंख्या की निष्कर्ष के बारे में सहमति न हो ।
125. यह निष्कर्ष कि अपराध दंड की न्यूनतर मात्रा अन्तर्वलित रखने वाले आशय से किया गया था-जहां कि किसी अपराध के दंड की मात्रा उस आशय पर निर्भर है, जिससे वह अपराध किया गया है, और किसी व्यक्ति पर यह आरोप है कि उसने ऐसा अपराध उस आशय से किया है, जिससे उसे करने पर अधिक दण्ड अधिरोपित किया जाता है, वहां सेना-न्यायालय यह निष्कर्ष निकाल सकेगा कि अपराध ऐसे आशय से किया गया था, जिससे न्यूनतर मात्रा का दण्ड अंतर्वलित होता है और वह तद्नुसार ऐसा दंड दे सकेगा ।
126. आनुकल्पिक निष्कर्ष-यदि अभियुक्त पर किसी एक अपराध का आरोप लगाया गया है और साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि उसने कोई भिन्न अपराध किया है, जिसका आरोप उस पर धारा 91 के अधीन लगाया जा सकता था, तो उसे उस अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जा सकेगा, जिसके बारे में दर्शित किया गया है कि उसने वह किया है, भले ही उस पर उसका आरोप न लगाया गया हो ।
127. गुरुतर अपराध के आरोप पर यह निष्कर्ष कि लघुतर अपराध साबित हुआ है-(1) जब कि किसी व्यक्ति पर ऐसे अपराध का आरोप लगाया गया है, जो ऐसी कई विशिष्टियों से मिलकर गठित होता है, जिनमें से कुछ के समुच्चय से एक सम्पूर्ण लघु अपराध गठित होता है और ऐसा समुच्चय साबित हो जाता है, किन्तु शेष विशिष्टियां साबित नहीं होतीं, तब वह उस छोटे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जा सकेगा, भले ही उस पर उसका आरोप न लगाया गया हो ।
(2) जब कि किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है और ऐसे तथ्य साबित हो जाते हैं, जो उसे घटाकर छोटा अपराध बना देते हैं, तब वह उस छोटे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जा सकेगा, भले ही उस पर उसका आरोप न लगाया गया हो ।
(3) जब कि किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया है, तब वह उस अपराध को करने के प्रयत्न के लिए सिद्धदोष किया जा सकेगा, भले ही उस प्रयत्न का आरोप पृथक्तः न लगाया गया हो ।
128. नौसेना के जज एडवोकेट जनरल को कार्यवाहियों का पारेषण-विचारण जज एडवोकेट ऐसे हर सेना-न्यायालय की, जिसमें वह हाजिर रहा है, मूल कार्यवाहियां या उनकी पूरी और अधिप्रमाणीकृत प्रतिलिपि और मूल दंडादेश, नौसेना के जज एडवोकेट जनरल को, विहित प्रक्रिया के अनुसार यथाशक्य शीघ्र इसलिए पारेषित करेगा कि वह अध्याय 15 के उपबन्धों के अनुसार उसके सम्बन्ध में कार्यवाही करे ।
129. कार्यवाहियों और दंडादेश की प्रतिलिपि पाने का अभियुक्त का अधिकार-सेना-न्यायालय द्वारा विचारित और सिद्धदोष हर व्यक्ति, उस सेना-न्यायालय की कार्यवाहियों और दंडादेश की प्रतिलिपि मांगने पर खर्चे के बिना पाने का हकदार होगा, किन्तु ऐसी कोई मांग ऐसे न्यायालय के अन्तिम विनिश्चय की तारीख से एक वर्ष के व्यतीत हो जाने के पश्चात् मंजूर नहीं की जाएगी ।
साक्ष्य विषयक नियम
130. साक्ष्य अधिनियम का लागू होना-इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872, (1872 का 1) सेना-न्यायालय के समक्ष की सब कार्यवाहियों को लागू होगा ।
131. अभियुक्त का प्रतिरक्षण के लिए सक्षम साक्षी होना-कोई भी व्यक्ति, जो किसी अपराध के लिए किसी सेना-न्यायालय के समक्ष अभियुक्त है, प्रतिरक्षण के लिए सक्षम साक्षी होगा और अपने विरुद्ध या उसी विचारण में उसके साथ आरोपित किसी व्यक्ति के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को नासाबित करने के लिए साक्ष्य शपथ पर दे सकेगा:
परन्तु-
(क) वह स्वयं अपनी लिखित प्रार्थना पर के सिवाय साक्षी के रूप में न बुलाया जाएगा, अथवा
(ख) उसका स्वयं साक्ष्य न देना पक्षकारों में से किसी के द्वारा या न्यायालय द्वारा किसी टीका-टिप्पणी का विषय न बनाया जाएगा और न उससे उसके, या उसी विचारण में उसके साथ आरोपित व्यक्ति के विरुद्ध कोई उपधारणा ही उद्भूत होगी ।
132. न्यायिक अवेक्षा-सेना-न्यायालय किसी ऐसी बात की न्यायिक अवेक्षा कर सकेगा जो सदस्यों के साधरण नौसैनिक, सैनिक या वायु सैनिक अनुभव और ज्ञान में की है ।
133. कतिपय दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएं-(1) जब कभी अभियोजन या प्रतिरक्षण के प्रयोजनों के लिए किसी वाउचर, रसीद, लेखा, मस्टर, पोत-पुस्तक, पत्र, सिगनल, तार की या अन्य ऐसी दस्तावेज की, जो विधान-मण्डल के किसी अधिनियम के, या ऐसे किन्हीं विनियमों के, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए हों, या सेवा रुढ़ि के अनुसरण में बनाई या रखी गई है, विषयवस्तुओं को साबित करना आवश्यक है तब उसकी एक प्रतिलिपि, जो उस आफिसर द्वारा, जो उस पोत का, जिसमें वह बनाई या रखी गई थी, तत्समय समादेशन कर रहा है या केन्द्रीय सरकार के किसी सचिव द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के तौर पर हस्ताक्षरित और प्रमाणित तात्पर्यित है, ऐसी दस्तावेज के और उसमें अभिलिखित बातों, संव्यवहारों और लेखाओं के साक्ष्य के रूप में ली जा सकेगी ।
(2) नौसैनिक सूची या अन्य शासकीय दस्तावेज, जो केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष के प्राधिकार से प्रकाशित तात्पर्यित है, उसमें वर्णित आफिसरों की प्रास्थिति और रैंक का और ऐसे आफिसरों द्वारा धारित किसी नियुक्ति का साक्ष्य होगी जब तक तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए ।
(3) जहां कि यह दर्शित कर दिया जाता है, कि किसी व्यक्ति का नाम भारतीय नौसेना के किसी पोत की पुस्तकों में चढ़ा हुआ है वहां यह तथ्य इस बात का साक्ष्य होगा कि वह व्यक्ति नौसेना विधि के अध्यधीन है, जब तक तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में पोत की पुस्तकों" पद के अन्तर्गत वह शासकीय पुस्तक, दस्तावेज या सूची आती है, जिसकी बाबत यह तात्पर्यित है कि पोत में नियुक्त व्यक्ति का या व्यक्तियों के नाम उसमें अन्तर्विष्ट हैं ।
(4) जहां कि नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी भी व्यक्ति का विचारण, अभित्यजन, अपने पोत को अनुचित रूप से छोड़ने या छुट्टी बिना अनुपस्थिति के आरोप पर हो रहा है और ऐसा व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी व्यक्ति को या नियमित सेना या वायुसेना के शासन से सम्बद्ध विधि के अध्यधीन के व्यक्ति अभ्यर्पित करके उसकी अभिरक्षा में अपने आप को रख चुका है या उसके द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र, जिसका उस व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान कथित है, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा, जब तक तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए ।
(5) जहां कि नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी व्यक्ति का विचारण, अभित्यजन, अपने पोत को अनुचित रूप से छोड़ने, या छुट्टी बिना अनुपस्थिति के आरोप पर हो रहा है, और उस व्यक्ति को गिरफ्तारी या अभ्यर्पण के पश्चात् पुलिस थाने ले जाया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र, जिसका थाने के भारसाधक आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान कथित है, कथित बातों का साक्ष्य होगा, जब तक तत्प्रतिकूल साबित न कर दिया जाए ।
[(6) कोई भी दस्तावेज जो, -
(क) सरकार के किसी रासायनिक परीक्षक या सहायक रासायनिक परीक्षक;
(ख) मुख्य विस्फोटक निरीक्षक;
(ग) अंगुलि छाप ब्यूरो, निदेशक;
(घ) निदेशक, हाफकीन संस्थान, मुम्बई;
(ङ) किसी केन्द्रीय न्यायालयिक प्रयोगशाला या किसी राज्य न्यायलयिक प्रयोगशाला के निदेशक, उपनिदेशक या सहायक निदेशक;
(च) सरकार का सीरम विज्ञानी,
को परीक्षा या विश्लेषण के लिए सम्यक् रूप से भेजे गए किसी पदार्थ या चीज के बारे में उसकी स्वहस्ताक्षरित रिपोर्ट होना तात्पर्यित है, इस अधिनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में उपयोग में लाया जा सकेगा ।]
(7) नौसैनिक, सैनिक या वायुसैनिक चिकित्सक आफिसर का कथन, जो पोत या स्थापन के कमान आफिसर द्वारा लिया और अनुप्रमाणित किया गया है, इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में दिया जा सकेगा:
परन्तु न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, तो वह ऐसे चिकित्सक आफिसर को समन कर सकेगा और उसके कथन की विषयवस्तु के बारे में उसकी परीक्षा कर सकेगा, और अभियोजक या अभियुक्त द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाने की दशा में, उसे ऐसे समन करेगा और उसकी परीक्षा करेगा ।
(8) यदि यह साबित कर दिया जाए कि इस अधिनियम के अधीन का कोई अपराधी फरार हो गया है और उसके गिरफ्तार किए जाने की कोई निकट संभावना नहीं है, तो कमान आफिसर या अन्य विहित व्यक्ति, उसकी अनुपस्थिति में किन्हीं व्यक्तियों की, जो उसे उस मामले से परिचित प्रतीत हों, परीक्षा कर सकेगा और उनका शपथ पर अभिसाक्ष्य अभिलिखित कर सकेगा और यदि अभिसाक्षी मर गया है, या साक्ष्य देने के लिए असमर्थ है या उसकी हाजिरी इतने विलम्ब, व्यय या असुविधा के बिना, जितना कि मामले की परिस्थितियों में अयुक्तियुक्त होगा, उपाप्त नहीं कराई जा सके, तो उस व्यक्ति के गिरफ्तार होने पर ऐसा कोई भी अभिसाक्ष्य इस अधिनियम के अधीन की किसी कार्यवाही में उसके विरुद्ध साक्ष्य में उस दशा में प्रयुक्त किया जा सकेगा ।
134. साक्षियों को समन किया जाना-(1) हर व्यक्ति को, जो सेना-न्यायालय के समक्ष साक्ष्य देने या दस्तावेज पेश करने के लिए अपेक्षित हो, विहित रीति से ऐसे लेख द्वारा समन किया जाएगा, जो नौसेना के जज एडवोकेट जनरल या विचारण जज एडवोकेट द्वारा हस्ताक्षरित होगा ।
(2) हर व्यक्ति को, जिससे किसी कमान आफिसर के या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुसार साक्ष्य का संक्षेप तैयार करने वाले किसी आफिसर के या जांच बोर्ड के समक्ष साक्ष्य देने की अपेक्षा की जाए, विहित रीति से ऐसे लेख द्वारा समन किया जाएगा, जो नौसेना के जज एडवोकेट जनरल या उस स्टेशन में के ज्येष्ठ आफिसर या इस निमित विहित ऐसे अन्य आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होगा ।
(3) नौसैनिक विधि के या ऐसी विधि के, जो नियमित सेना या वायुसेना के शासन से सम्बन्धित है, अध्यधीन के साक्षी की दशा में, समन की तामील विहित रीति से कराई जाएगी ।
(4) किसी अन्य साक्षी की दशा में, समन की तामील या तो विहित रीति से कराई जाएगी या वह समन उस मजिस्ट्रेट को भेजा जाएगा, जिसकी अधिकारिता के अन्दर साक्षी हो या निवास करता है तथा वह मजिस्ट्रेट समन को ऐसे कार्यान्वित कराएगा मानो साक्षी उस मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आने के लिए अपेक्षित हो ।
(5) जब कि कोई साक्षी अपने कब्जे या शक्ति में की किसी विशिष्ट दस्तावेज या वस्तु को पेश करने के लिए अपेक्षित हो, तब समन में युक्तियुक्त प्रमितता के साथ उसका वर्णन किया जाएगा ।
(6) वैसे हर व्यक्ति को, जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है और जिसे यथापूर्वोक्त रूप से समन किया गया हो, ऐसे युक्तियुक्त व्यय अनुज्ञात होंगे और दिए जाएंगे जो विहित किए जाएं ।
(7) इस धारा की कोई भी बात भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धाराओं 123 और 124 के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली अथवा डाक या तार प्राधिकारियों की अभिरक्षा में की किसी दस्तावेज को लागू होने वाली नहीं समझी जाएगी ।
135. साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन-(1) जब कभी सेना-न्यायालय द्वारा किए जा रहे विचारण के अनुक्रम में विचारण जज एडवोकेट को प्रतीत होता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि किसी साक्षी की परीक्षा की जाए और ऐसे साक्षी की हाजिरी इतने विलम्ब, व्यय या असुविधा के बिना, जितना मामले की परिस्थितियों में अयुक्तियुक्त होगा, नहीं कराई जा सके, तब विचारण जज एडवोकेट ऐसी हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकेगा और नौसेना के जज एडवोकेट जनरल से आवेदन कर सकेगा कि वह [किसी महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेटट के नाम, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर वह साक्षी निवास करता है उस साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए कमीशन निकाला जाए ।
(2) ऐसी दशा में, विचारण किसी ऐसे विनिर्दिष्ट समय के लिए स्थगित किया जा सकेगा, जो कमीशन के निष्पादन और लौटाए जाने के लिए युक्तियुक्त रूप से पर्याप्त हो ।
(3) उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर नौसेना का जज एडवोकेट जनरल यदि ठीक समझे तो वह साक्षी की परीक्षा के लिए 1[महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन की प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियों के समतुल्य शक्तियों का उस स्थान में प्रयोग करने वाले प्राधिकारीट के नाम कमीशन निकाल सकेगा ।
(4) वह मजिस्ट्रेट या प्राधिकारी, जिसके नाम कमीशन निकाला गया है, या 1[या यदि वह मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट है, तो वह या ऐसा महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट, जो उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किया गया हैट उस स्थान को जाएगा जहां साक्षी है या साक्षी को अपने समक्ष आने के लिए समन करेगा और उसी रीति से उसका साक्ष्य लिखेगा और इस प्रयोजन के लिए उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो [दंड प्रकिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के अधीन या उस स्थान में, जहां साक्ष्य अभिलिखित किया जाता है, प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि के अधीन वाले वारण्ट-मामलों के विचारणों के लिए हैं ।
136. साक्षियों की कमीशन पर परीक्षा-(1) जहां कि धारा 135 के उपबन्धों के अधीन कमीशन निकाला जाता है, वहां अभियोजक और अभियुक्त क्रमशः कोई ऐसे लिखित परिप्रश्न भेज सकेंगे, जिन्हें विचारण जज एडवोकेट विवाद्यक से सुसंगत समझे और वह मजिस्ट्रेट या प्राधिकारी, जिसे कमीशन निर्दिष्ट किया गया है या जिसे ऐसे कमीशन के निष्पादन का कर्तव्य प्रत्यायोजित किया गया है, साक्षी की परीक्षा ऐसे परिप्रश्नों पर करेगा ।
(2) अभियोजक और अभियुक्त ऐसे मजिस्ट्रेट या प्राधिकारी के समक्ष कांउसेल की मार्फत या उस अभियुक्त की दशा में के सिवाय जो अभिरक्षा में है, स्वयं उपसंजात हो सकेगा और उक्त साक्षी की, यथास्थिति, परीक्षा, प्रतिपरीक्षा या पुनः परीक्षा कर सकेगा ।
(3) धारा 135 के अधीन निकाले गए कमीशन के सम्यक् रूप से निष्पादित किए जाने के पश्चात् वह उस साक्षी के अभिसाक्ष्य के सहित, जिसकी उसके अधीन परीक्षा की गई है, नौसेना के जज एडवोकेट जनरल को, जिसने कमीशन निकाला था, लौटाया जाएगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन लौटाए गए कमीशन और अभिसाक्ष्य की प्राप्ति पर, नौसेना का जज एडवोकेट जनरल उसे उस विचारण जज एडवोकेट को अग्रेषित कर देगा, जिसकी प्रेरणा पर वह कमीशन निकाला गया था ।
(5) वह कमीशन, उसके साथ वाली विवरणी और अभिसाक्ष्य अभियोजक और अभियुक्त द्वारा निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे और सब न्यायसंगत अपवादों के अध्यधीन रहते हुए, या तो अभियोजक या अभियुक्त द्वारा मामले में साक्ष्य में पढ़े जा सकेंगे और विचारण की कार्यवाही का भाग होंगे ।
(6) इस प्रकार लिया गया कोई भी अभिसाक्ष्य, विचारण के किसी भी पश्चात्वर्ती प्रक्रम में, चाहे उसी न्यायालय के समक्ष या, यदि उक्त न्यायालय इस बीच विघटित हो गया हो तो किसी अन्य न्यायालय के समक्ष, जो उन्हीं आरोपों के विषय में अभियुक्त के विचारण के लिए संयोजित किया गया हो, साक्ष्य में लिया जाएगा ।
137. तात्त्विक साक्षियों को बुलाने और उनकी परीक्षा करने की शक्ति-(1) विचारण जज एडवोकेट विचारण के किसी भी प्रक्रम में किसी भी व्यक्ति को साक्षी के तौर पर समन कर सकेगा या किसी भी ऐसे व्यक्ति की, जो हाजिर है यद्यपि वह साक्षी के रूप में समन नहीं किया गया है, परीक्षा कर सकेगा या किसी व्यक्ति को, जिसकी पहले परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुला सकेगा और उसकी पुनः परीक्षा कर सकेगा, और यदि न्यायालय या विचारण जज एडवोकेट को मामले के न्यायसंगत विनिश्चय के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य आवश्यक प्रतीत हो तो, विचारण जज एडवोकेट ऐसे व्यक्ति को समन करेगा और उसकी परीक्षा करेगा या उसे पुनः बुलाएगा और उसकी पुनः परीक्षा करेगा ।
(2) साक्षियों को समन इस अधिनियम के अधीन यथाउपबन्धित रीति में निकाले जाएंगे ।
व्यथित व्यक्तियों को जुर्माने में से प्रतिकर
138. जुर्माने में से प्रतिकर देने की न्यायालय की शक्ति-(1) जब कभी सेना-न्यायालय दंड के रूप में जुर्माना करे, तब न्यायालय निर्णय देते समय, यह आदेश दे सकेगा कि वसूल किए गए पूरे जुर्माने या उसके किसी भाग का उपयोजन-
(क) किसी व्यथित व्यक्ति को उस अपराध द्वारा हुई किसी हानि या क्षति के लिए, प्रतिकर के रूप में संदाय करने में किया जाए;
(ख) उस दशा में, जिसमें कि कोई व्यक्ति किसी सिविल अपराध के लिए, जिसके अन्तर्गत चोरी, आपराधिक दुर्विनियोग, आपराधिक न्यासभंग या छल आता है या चुराई हुई सम्पत्ति को यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि वह चुराई हुई सम्पत्ति है, बेईमानी से प्राप्त करने या रखे रखने के लिए या उसके व्ययन में स्वेच्छया सहायता करने के लिए दोषसिद्ध किया गया है, तब, जब कि ऐसी सम्पत्ति उसके हकदार व्यक्ति के कब्जे को प्रत्यावर्तित कर दी जाती है, उसकी हानि के लिए प्रतिकर ऐसी सम्पत्ति के किसी सद्भावपूर्ण क्रेता को देने में किया जाए ।
(2) किन्तु ऐसा कोई भी संदाय या प्रतिकर दंडादेश की तारीख से पन्द्रह दिन के अवसान के पहले और उस दशा में, जिसमें कि दोषसिद्धि या दंडादेश के विरुद्ध अर्जी उपस्थापित की गई है तब तक, जब तक उक्त अर्जी का निपटारा न कर दिया गया हो, नहीं दिया जाएगा ।
अवमान इत्यादि के विषय में सेना-न्यायालयों की शक्ति
139. नौसैनिक विधि के अध्यधीन के व्यक्ति के द्वारा किए गए न्यायालय के अवमान के लिए संक्षेपतः दंड-जब कि नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति, धारा 69 में यथावर्णित कोई अपराध किसी सेना-न्यायालय की उपस्थिति में या उसके समक्ष की किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में करेगा तब वह सेना-न्यायालय अपराधी को कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी या ऐसे अन्य दंड से, जो धारा 69 के अधीन उस अपराध के लिए अधिनिर्णीत किया जा सकता हो, संक्षेपतः दंडित कर सकेगा ।
140. जो व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है उसके द्वारा किए गए न्यायालय के अवमान के लिए संक्षेपतः दण्ड-जब कि कोई ऐसा व्यक्ति, जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है, धारा 165 में यथावर्णित अपराध सेना-न्यायालय की उपस्थिति में करेगा, तब वह सेना-न्यायालय उस व्यक्ति को अभिरक्षा में ले सकेगा और उसी दिन न्यायालय के उठने से पूर्व किसी भी समय, यदि वह ठीक समझे, अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को दो सौ रुपए से अनधिक जुर्माने के लिए या संदाय में व्यतिक्रम होने पर, एक मास तक की अवधि के लिए, जब तक कि ऐसा जुर्माना उससे पूर्वतर संदत्त न कर दिया जाए, कारावास के लिए दण्डादिष्ट कर सकेगा ।
141. जब कि कतिपय अपराध ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है, किए जाएं तब नौसैनिक न्यायालयों की शक्तियां-जब कि इस अधिनियम की धारा 165 या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193, धारा 194, धारा 195, धारा 196, धारा 199, धारा 200, धारा 228, धारा 463, या धारा 471 में यथावर्णित कोई अपराध, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है, सेना-न्यायालय में या उसके समक्ष की किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में किया जाता है, तब वह सेना-न्यायालय या यदि वह सेना-न्यायालय विघटित कर दिया गया हो, तो वह आफिसर, जिसने आदेश द्वारा उसका गठन किया था, [दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 340 के अधीन] शक्तियों का प्रयोग ऐसे कर सकेगा, मानो वह सेना-न्यायालय या वह आफिसर उस धारा के अर्थ में दंड न्यायालय हो ।
142. इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों के सम्बन्ध में सेना-न्यायालयों और अनुशासनिक न्यायालयों की शक्तियां-इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किया गया सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय द्वारा कोई भी विचारण भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धाराओं 193 और 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी, और सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय [दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346] के अर्थ में न्यायालय समझा जाएगा ।
अभियुक्त का पागलपन
143. अभियुक्त का विचारण के दौरान उन्मत्त पाया जाना-(1) जहां कि सेना-न्यायालय द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति के विचारण के अनुक्रम में, जिस पर अपराध का आरोप लगाया गया है, यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति उन्मत्त है, वहां न्यायालय उसकी उन्मत्तता के तथ्य के बारे में विशेषतया अपना निष्कर्ष निकालेगा और यह आदेश देगा कि ऐसा व्यक्ति ऐसे स्थान पर ऐसी रीति से, जैसा या जैसी न्यायालय ठीक समझे, कड़ी अभिरक्षा में तब तक रखा जाए, जब तक उस बारे में केन्द्रीय सरकार के निदेशों का ज्ञान न हो जाए ।
(2) ऐसे हर मामले की रिपोर्ट संयोजक प्राधिकारी को न्यायालय द्वारा इसलिए की जाएगी कि केन्द्रीय सरकार के आदेश प्राप्त कर लिए जाएं, और केन्द्रीय सरकार के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह आदेश दे कि वह व्यक्ति ऐसे स्थान में और ऐसी रीति से सुरक्षित अभिरक्षा में रखा जाए जैसा या जैसी केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।
(3) संयोजक प्राधिकारी जब कभी केन्द्रीय सरकार से रिपोर्ट की प्राप्ति पर या अन्यथा यह समझे कि ऐसा व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने के लिए समर्थ है, तब संयोजक प्राधिकारी उस व्यक्ति के विचारणार्थ सेना-न्यायालय का संयोजन करने के लिए कार्रवाई करेगा ।
144. अपराध के समय अभियुक्त का पागलपन-(1) जब कभी नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति इस आधार पर दोषमुक्त किया जाता है कि उस समय, जब यह अभिकथित है कि उसने अपराध किया, वह चित्तविकृति के कारण अपराध गठित करने वाले अभिकथित कार्य की प्रकृति या यह कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है, जानने में असमर्थ था, तब निष्कर्ष में यह विनिर्दिष्टतः कथित होगा कि उसने वह कार्य किया है या नहीं ।
(2) जब कभी उपधारा (1) के अधीन किए गए निष्कर्ष में यह कथित हो कि अभियुक्त व्यक्ति ने अभिकथित कार्य किया है, तब यदि पाई गई असमर्थता की दशा में के सिवाय ऐसा कार्य अपराध गठित करता तो सेना-न्यायालय ऐसे व्यक्ति के ऐसे स्थान में और ऐसी रीति से, जो विहित किया या की जाए, सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध किए जाने का आदेश देगा और की गई कार्यवाही की रिपोर्ट उस आफिसर को देगा जिसने न्यायालय का संयोजन किया है ।
(3) वह आफिसर, जिसने न्यायालय का संयोजन किया है, मामले की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार के आदेशों के लिए देगा और ऐसे आदेशों की प्राप्ति तक उक्त व्यक्ति को सुरक्षित अभिरक्षा में निरुद्ध रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई करेगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन की रिपोर्ट की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार यह आदेश दे सकेगी कि अभियुक्त व्यक्ति मानसिक चिकित्सालय या सुरक्षित अभिरक्षा के अन्य उचित स्थान में निरुद्ध रखा जाए ।
सम्पत्ति का व्ययन
145. विचारण के लम्बित रहते सम्पत्ति का व्ययन-जब कि कोई सम्पत्ति, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो किसी अपराध करने के लिए उपयोग में लाई गई प्रतीत होती है, सेना-न्यायालय के समक्ष पेश की जाए, तब वह न्यायालय विचारण के समाप्त होने तक ऐसी सम्पत्ति की उचित अभिरक्षा के लिए ऐसा आदेश, जैसा वह ठीक समझे, कर सकेगा और यदि वह सम्पत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है तो ऐसा साक्ष्य अभिलिखित करने के पश्चात्, जैसा वह आवश्यक समझे, उसके बेचे जाने या अन्यथा व्ययनित किए जाने के लिए आदेश कर सकेगा ।
146. जिस सम्पत्ति के बारे में अपराध किया गया है उसका व्ययन-(1) जब कि किसी सेना-न्यायालय के समक्ष विचारण समाप्त हो जाए, तब न्यायालय उस सम्पत्ति या दस्तावेज के, जो उसके समक्ष पेश की गई है या उसकी अभिरक्षा में है अथवा जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता या जो किसी अपराध को करने के लिए उपयोग में लाई गई है, विनाश द्वारा, अधिहरण द्वारा या ऐसे किसी व्यक्ति को परिदान द्वारा, जो उस पर कब्जे के हकदार होने का दावा करता हो, या अन्यथा उसका व्ययन करने के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा, जैसा वह ठीक समझे :
परन्तु उस सम्पत्ति के सिवाय, जो शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है, ऐसी सम्पत्ति या दस्तावेज उस दशा में, जिसमें कि इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा ऐसा अपेक्षित है तब तक अभिरक्षा में रखी जाएगी, जब तक नौसेनाध्यक्ष के आदेश ज्ञात न हो जाएं ।
(2) उपधारा (1) के अधीन आदेश का पालन एक मास तक, तब के सिवाय नहीं किया जाएगा जब कि सम्पत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है ।
(3) जब कि इस धारा के अधीन आदेश का कार्यान्वयन नौसैनिक सेवा में के व्यक्तियों द्वारा सुविधापूर्वक नहीं किया जा सकता, तब नौसैनाध्यक्ष या इस निमित्त विहित आफिसर द्वारा ऐसे आदेश की प्रतिलिपि उस मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी, जिसकी अधिकारिता के अन्दर सम्पत्ति तत्समय स्थित है और तदुपरि वह मजिस्ट्रेट उस आदेश को क्रियान्वित कराने के लिए ऐसे कार्रवाई करेगा, मानो वह उसके द्वारा पारित आदेश हो ।
स्पष्टीकरण-उस सम्पत्ति की दशा में, जिसके बारे में अपराध किया गया प्रतीत होता है, इस धारा में सम्पत्ति" शब्द के अन्तर्गत न केवल ऐसी सम्पत्ति आती है जैसी किसी व्यक्ति के मूलतः कब्जे में या नियंत्रणाधीन रह चुकी है वरन् ऐसी कोई सम्पत्ति भी आती है जिसमें या जिसके लिए वह सम्पत्ति संपरिवर्तित या विनियमित की गई हो और ऐसे संपरिवर्तन या विनिमय से, चाहे अव्यवहित चाहे अन्यथा अर्जित कोई चीज भी आती है ।
अध्याय 14
दंडादेशों का निष्पादन
147. मृत्यु दंडादेश का रूप-सेना-न्यायालय मृत्यु का दंडादेश अधिनिर्णीत करने में स्वविवेकानुसार निदेश देगा कि अपराधी की मृत्यु ऐसे घटित की जाए कि जब तक वह मर न जाए तब तक उसे गर्दन में फांसी लगाकर लटकाए रखा जाए या उसे गोली से मार दिया जाए ।
148. जब तक मृत्यु दंड का निष्पादन न हो जाए तब तक अन्तरिम अभिरक्षा-वह व्यक्ति, जिसे मृत्यु का दंडादेश दिया गया है, तब तक नौसैनिक अभिरक्षा में निरुद्ध किया जा सकेगा या अभिरक्षा में रखे जाने के लिए सिविल कारागार को अभिरक्षा में रखे जाने के लिए अपसारित किया जा सकेगा जब तक केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष से, या जिस सेना-न्यायालय द्वारा उसे मृत्यु का दंडादेश दिया गया है उसे गठित करने का आदेश देने वाले आफिसर से या अन्य विहित आफिसर से अपर आदेश प्राप्त न हो जाए और केन्द्रीय सरकार, नौसेनाध्यक्ष या संयोजक प्राधिकारी या ऐसे आफिसर का विहित रूप में दिया हुआ आदेश, उस व्यक्ति को अभिरक्षा में निरुद्ध रखने के लिए पर्याप्त वारण्ट होगा ।
149. मृत्यु दंडादेशों का निष्पादन-(1) जबकि मृत्यु दंडादेश का निष्पादन किया जाना है, तब नौसेनाध्यक्ष या संयोजक प्राधिकारी या विहित आफिसर उस समय, स्थान और रीति के विषय में निदेश देगा, जिसमें ऐसा दंडादेश कार्यान्वित किया जाना है और ऐसे आफिसर या प्राधिकारी का विहित प्ररूप में दिया हुआ आदेश, ऐसे दंडादेश के निष्पादन के लिए पर्याप्त वारण्ट होगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार का यह प्रमाणित करने वाला आदेश कि उस दण्डादेश की संपुष्टि केन्द्रीय सरकार द्वारा कर दी गई है ऐसे सब मामलों में, जिनमें ऐसी संपुष्टि आवश्यक है और जहां ऐसी संपुष्टि आवश्यक नहीं है वहां नौसेनाध्यक्ष का या अन्य विहित आफिसर का यह अभिकथित करने वाला प्रमाणपत्र कि ऐसी सम्पुष्टि आवश्यक नहीं है, विहित प्ररूप से संलग्न किया जाएगा ।
150. कारावास और निरोध का स्थान-(1) कारावास की हर अवधि, चाहे कारावास मूल दंड के रूप में चाहे लघुकृत दंड के रूप में अधिनिर्णीत किया गया हो, नौसैनिक कारागार, नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों या सिविल कारागार, सुधारगृह या सैनिक या वायुसैनिक कारागार या निरोध बैरकों में भोगी जा सकेगी ।
(2) निरोध की हर अवधि, चाहे निरोध मूल दंड के रूप में चाहे लघुकृत दण्ड के रूप में अधिनिर्णीत किया गया हो, किसी नौसैनिक निरोध-क्वार्टर या सैनिक या वायुसैनिक निरोध बैरकों में भोगी जा सकेगी ।
(3) जहां कि इस अधिनियम के अनुसरण में, किसी व्यक्ति को कारावास या निरोध का दंडादेश दिया गया है, या उसका दंडादेश कारावास या निरोध में लघुकृत किया गया है, वहां केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष का या उस आफिसर का, जिसने वह सेना-न्यायालय आदेश द्वारा गठित किया था, जिसके द्वारा उस व्यक्ति को दंडादिष्ट किया गया है, या पत्तन में उपस्थित ज्येष्ठ आफिसर का विहित प्ररूप में दिया गया आदेश, अथवा यदि वह उस पोत के कमान आफिसर द्वारा या अन्य ऐसे आफिसर द्वारा, जो वैसी ही शक्तियों का प्रयोग करने के लिए इस अधिनियम के अधीन सशक्त है, दंडादिष्ट किया गया था तो उस कमान आफिसर या अन्य आफिसर का विहित प्ररूप में दिया गया आदेश, उस व्यक्ति को, यथास्थिति, कारावास या निरोध के स्थान में इसलिए भेजने के लिए कि वह आदिष्ट दंड को विधि के अनुसार वहां भोगे या कारावास या निरोध के उस स्थान में उसके न पहुंचने तक उसे नौसैनिक अभिरक्षा में या उस व्यक्ति की दशा में, जिसे कारावास का दंडादेश दिया गया है, किसी सिविल कारागार या परिरोध स्थान में निरुद्ध रखने के लिए पर्याप्त वारण्ट होगा ।
151. दण्डादेश का प्रारंभ-(1) [उपधारा (2) और उपधारा (3)] के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि इस अधिनियम के अनुसरण में अधिनिर्णीत कारावास या निरोध की हर अवधि उस दिन प्रारंभ हुई समझी जाएगी, जिस दिन दंडादेश अधिनिर्णीत किया गया था ।
(2) जहां कि किसी पोत के समुद्र में होने के कारण या किसी ऐसे स्थान के निकट होने के कारण, जहां कोई उचित कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टर नहीं है, यथास्थिति, कारावास या निरोध का दंडादेश सम्यक् रूप से निष्पादित नहीं किया जा सकता, वहां इसमें इसके पश्चात् वर्णित के अध्यधीन रहते हुए वह व्यक्ति जो, यथास्थिति, कारावास या निरोध के दंडादेश के अधीन है, पूर्ण युक्तियुक्त शीघ्रता से किसी ऐसे स्थान को, जहां उचित कारागार या नौसैनिक निरोध स्थान है, या उस अपराधी की दशा में, जो निरोध के दंडादेश के अधीन है, किसी ऐसे स्थान की जहां कोई ऐसे नौसैनिक निरोध क्वार्टर हैं, जिनमें दंडादेश सम्यक् रूप से निष्पादित किया जा सकता है, भेजा जा सकेगा और वहां पहुंचने पर अपराधी अपने दण्डादेश को उसी रीति से भोगेगा मानो ऐसे पहुंचने की तारीख ही वह दिन हो जिस दिन दंडादेश अधिनिर्णीत किया गया था, भले ही वह उस बीच अपने कर्तव्य पर लौट आया हो या अपनी उन्मुक्ति का हकदार हो गया हो और, यथास्थिति, कारावास या निरोध की अवधि की गणना तद्नुसार की जाएगी, किन्तु इस बात के अध्यधीन रहते हुए कि उसमें से उतना समय काट दिया जाएगा जितने समय वह उक्त अपराध के बारे में परिरोध में रखा गया है ।
(3) जब कभी किसी सेना न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अनुसरण में किसी अपराधी को कारावास से, जो जुर्माने के संदाय के व्यतिक्रम में कारावास नहीं हैं, दंडादिष्ट किया जाता है, तब उसी मामले के अन्वेषण, जांच या विचारण के दौरान और ऐसे दंडादेश के आदेश की तारीख से पहले उसके द्वारा सिविल या नौसैनिक अभिरक्षा में बिताई गई कालावधि का, उस पर अधिरोपित कारावास की अवधि के विरुद्ध मुजरा किया जाएगा और दंडोदश के ऐसे आदेश पर कारावास भुगतने के लिए ऐसे अपराधी का दायित्व, उस पर अधिरोपित कारावास की शेष अवधि तक, यदि कोई है, निर्बंधित होगा ।]
152. उस अपराधी का कारावास जो पहले से ही दण्डादेश के अधीन है-जब कभी सेना-न्यायालय द्वारा कोई दण्डादेश किसी ऐसे अपराधी के विरुद्ध पारित किया जाए, जो पहले से ही या तो निरोध या कारावास के किसी ऐसे दण्डादेश के अधीन है, जो किसी पूर्ववर्ती अपराध के लिए उसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन पारित किया गया था तब न्यायालय उस अपराध के लिए, जिसके लिए उसका विचारण हो रहा है, निरोध या कारावास का ऐसा दण्डादेश अधिनिर्णीत कर सकेगा जो उस निरोध या कारावास के, जिसके लिए वह पहले दण्डादिष्ट किया गया था, दण्डादेश का अवसान हो जाने के पश्चात् प्रारंभ हो :
परन्तु किसी ऐसे निरोध की अवधि में से, जो इस धारा के अनुसरण में अधिनिर्णीत दण्डादेश द्वारा किसी व्यक्ति पर अधिरोपित किया गया है, इतनी का परिहार हो गया समझा जाएगा जितनी निरोध की कुल अवधि को दो वर्ष से अधिक लम्बी बना देती है ।
153. निरोध-स्थान का बदला जाना-जब कभी यह समीचीन समझा जाता है, तब केन्द्रीय सरकार, नौसेनाध्यक्ष या उपस्थित ज्येष्ठ आफिसर के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह किसी भी ऐसे अपराधी के, जो इस अधिनियम के अधीन कारावासित है या कारावासित या निरुद्ध किए जाने के लिए दण्डादिष्ट है, या किसी भी ऐसे अपराधी के, जो निरोध भोग रहा है या निरोध भोगने के लिए दण्डादिष्ट है, परिरोध का स्थान विहित प्ररूप में लिखित आदेश द्वारा समय-समय पर बदले, और जेलर या अन्य व्यक्ति, जो ऐसे अपराधी की अभिरक्षा रखता है, ऐसे आदेश की प्राप्ति पर तुरन्त ऐसे अपराधी को जेल, कारागार या सुधारगृह को या किसी ऐसे अपराधी की दशा में, जो निरोध में है या निरुद्ध किए जाने के लिए दण्डादिष्ट है उन नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों को, जो उक्त आदेश में वर्णित हैं, अपसारित कर देगा या अपराधी को नौसैनिक अभिरक्षा को इस प्रयोजन से परिदत्त कर देगा कि वह अपराधी ऐसे कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टर को अपसारित कर दिया जाए और ऐसे हर अपराधी को, जो ऐसे अन्तिम वर्णित कारागार, जेल या सुधारगृह या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों का हर जेलर या पालक अपसारण का आदेश दिए जाने पर अपनी अभिरक्षा में लेगा और उस दंडादेश या आदेश के अनुसरण में परिरुद्ध करेगा ।
154. कैदियों का उन्मोचन या अपसारण-जब कभी कोई अपराधी इस अधिनियम के अनुसरण में कारावास या निरोध भोग रहा है, तब केन्द्रीय सरकार या नौसैनाध्यक्ष के लिए या जहां कि अपराधी अपने कमान आफिसर के आदेश से कारावास या निरोध भोग रहा है, वहां ऐसे कमान आफिसर या केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह यह निदेश देने वाला कि अपराधी उन्मुक्त किया जाए, विहित प्ररूप में लिखित आदेश दे, और केन्द्रीय सरकार और नौसेनाध्यक्ष के लिए यह भी विधिपूर्ण होगा कि वह विहित प्ररूप में लिखित आदेश द्वारा यह निदेश दे कि ऐसे अपराधी को सेना-न्यायालय के समक्ष या तो साक्षी के रूप में या विचारण के लिए या अन्यथा लाए जाने के प्रयोजनार्थ नौसैनिक अभिरक्षा के लिए परिदत्त कर दिया जाए और वह अपराधी ऐसे किसी आदेश के पेश किए जाने पर तदनुसार उन्मोचित कर दिया जाएगा या ऐसी अभिरक्षा के लिए परिदत्त कर दिया जाएगा ।
155. नौसैनिक अभिरक्षा में के निरोध का समय-वह समय, जिसके दौरान कोई ऐसा अपराधी, जो कारावास या निरोध के दण्डादेश के अधीन है, नौसैनिक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाता है, चाहे वह किसी भी प्रयोजन के लिए ऐसे निरुद्ध किया गया है, उसके दंडादेश के अधीन के कारावास या निरोध का समय गिना जाएगा, और शासक, जेलर, या पालक या अधीक्षक, जिसने ऐसे किसी अपराधी को परिदत्त किया था, उसे नौसैनिक अभिरक्षा में से इसलिए पुनः प्राप्त करेगा कि वह अपने दण्ड का शेष भाग भोगे ।
156. उन्मत्त कैदियों का अपसारण-यदि कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के आधार पर कारावासित है या निरोध भाग रहा है, उन्मत्त हो जाता है, और उस आशय का प्रमाणपत्र दो चिकित्सकों या शल्य-चिकित्सकों द्वारा दे दिया जाता है, तो केन्द्रीय सरकार, ऐसे व्यक्ति को भारत में के ऐसे पागलखाने को या पागलों को रखने के अन्य उचित स्थान को, जो उसके कारावास या निरोध की अनवसित अवधि के लिए उसके विचार में उचित हो, अपसारित किए जाने का आदेश विहित प्ररूप में वारण्ट द्वारा दे सकेगी, और ऐसे किसी भी व्यक्ति की बाबत उसी रीति से यह प्रमाणित किया जाता है कि वह पुनःस्वस्थचित हो गया है, तो केन्द्रीय सरकार उसे ऐसे कारागार या परिरोध के स्थान को या उस व्यक्ति की दशा में, जो निरोध के लिए दण्डादिष्ट है, ऐसे नौसैनिक निरोध-क्वार्टर को, जैसा समीचीन समझा जाए, अपने कारावास का शेष भाग भोगने के लिए, अपसारित किए जाने का विहित प्ररूप में वारण्ट निकाल सकेगी, और कारागार, जेल या सुधारगृह का हर जेलर या पालक उसे तदनुसार प्राप्त करेगा ।
157. नौसैनिक कारागार और नौसैनिक निरोध-क्वार्टर-केन्द्रीय सरकार किन्हीं निर्माणों को या जलयानों को या उनके किन्हीं भागों को नौसैनिक कारागारों या नौसैनिक क्वार्टरों के रूप में काम में लाए जाने के लिए अलग रख सकेगी और, यथास्थिति, नौसैनिक कारागारों या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों के रूप में काम में लाए जाने के लिए ऐसे अलग रखे गए निर्माण, जलयान या निर्माणों या जलयानों के भाग इस अधिनियम के अर्थों में क्रमशः नौसैनिक कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टर समझे जाएंगे ।
158. जुर्माने के दंडादेश का निष्पादन-जब कि जुर्माने का दण्डादेश सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय द्वारा अधिरोपित किया जाता है, तब वह आफिसर, जिसने सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय का आदेश द्वारा गठन किया है, जुर्माना अधिरोपित करने वाले आदेश की अपने हस्ताक्षर से सम्यक् रूप से प्रमाणित प्रतिलिपि, भारत में के किसी मजिस्ट्रेट को पारेषित कर सकेगा तथा ऐसा मजिस्ट्रेट तदुपरि उस जुर्माने को वसूली, [दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)] के या किसी ऐसी तत्स्थानी विधि के, जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त हो, उपबन्धों के अनुसार ऐसे कराएगा, मानो वह ऐसे मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित जुर्माने का दंडादेश हो ।
159. नौसैनिक कारागारों और निरोध-क्वार्टरों के बारे में विनियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, निम्नलिखित बातों के लिए उपबन्ध करने वाले विनियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी-
(क) नौसैनिक कारागारों और निरोध-क्वार्टरों का शासन, प्रबन्ध और विनियमन;
(ख) उनके निरीक्षकों, परिदर्शकों और आफिसरों की नियुक्ति और हटाया जाना और शक्तियां;
(ग) उनमें के कैदियों या उनमें निरोध भोग रहे व्यक्तियों के भोजन, बिस्तर और कपड़े;
(घ) उनमें के कैदियों या व्यक्तियों का श्रम और ऐसे कैदियों या व्यक्तियों को समर्थ बनाने के लिए विशेष उद्योग और अच्छे आचरण, जिससे वे अपने दण्डादेश के प्रभाग का परिहार उपार्जित कर सकें; तथा
(ङ) ऐसे कैदियों या व्यक्तियों की देख-रेख, उनकी सुरक्षित अभिरक्षा और उनमें अच्छी व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना और ऐसे कैदियों या व्यक्तियों को उनके द्वारा किए गए अपराधों के लिए दंड का शारीरिक सजा द्वारा, अवरोध द्वारा या अन्यथा दिया जाना ।
(2) इस धारा के अधीन बनाए जाने वाले विनियम कारागार अधिनियम, 1894 (1894 का 9) और तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों में से किन्हीं ऐसों को, जो किन्हीं व्यक्तियों पर, जो कैदी नहीं हैं, दण्ड अधिरोपित करते हैं या जेलरों, कारागारों के चिकित्सक आफिसरों और अन्य आफिसरों के कर्तव्य के सम्बन्ध में हैं, नौसैनिक कारागारों या निरोध क्वार्टरों पर लागू कर सकेंगे ।
(3) इस धारा के अधीन बनाए जाने वाले विनियम किसी अपराध के लिए किसी शारीरिक दण्ड का दिया जाना प्राधिकृत नहीं करेंगे ।
अध्याय 15
सेना-न्यायालयों की कार्यवाहियों का न्यायिक पुनर्विलोकन
160. नौसेना के जज एडवोकेट जनरल द्वारा न्यायिक पुनर्विलोकन-(1) सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालयों द्वारा किए गए विचारणों की सब कार्यवाहियों का पुनर्विलोकन नौसेना के जज एडवोकेट जनरल द्वारा या तो स्वप्रेरणा से या किसी ऐसे व्यक्ति के, जो किसी दण्डादेश या निष्कर्ष से व्यथित है, विहित समय के अन्दर उससे किए गए आवेदन पर, किया जाएगा, और नौसेना का जज एडवोकेट जनरल ऐसे पुनर्विलोकन की रिपोर्ट ऐसी सिफारिशों के सहित, जो न्यायसंगत और उचित प्रतीत हों, नौसेनाध्यक्ष को उसके विचारर्थ और ऐसी कार्रवाई के लिए, जैसी नौसेनाध्यक्ष ठीक समझे, पारेषित करेगा ।
(2) जहां कि किसी व्यथित व्यक्ति ने उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन किया है, वहां यदि मामले की परिस्थितियों में ऐसा अपेक्षित हो, जज एडवोकेट जनरल सुनवाई या तो स्वयं उसी द्वारा या किसी विधि-व्यवसायी या नौसेना के किसी आफिसर के माध्यम से की जाने का उसे अवसर दे सकेगा ।
161. नौसेनाध्यक्ष द्वारा विचार-(1) नौसेनाध्यक्ष धारा 160 के अधीन रिपोर्ट की और सिफारिशों की प्राप्ति पर, यदि कोई हों, मृत्यु दण्डादेश के सब मामलों में, और उन सब मामलों में, जिनमें कि सेना-न्यायालय राष्ट्रपति के आदेश द्वारा गठित किया जाता है, कार्यवाहियों और रिपोर्ट ऐसी रिफारिशों के सहित, जिन्हें करना वह ठीक समझे, केन्द्रीय सरकार को पारेषित करेगा, और अन्य मामलों में पारेषित कर सकेगा ।
(2) धारा 160 में की या इस धारा में की कोई भी बात इस अधिनियम के अधीन दिए गए दोषमुक्ति के आदेश को अपास्त करने की कोई सिफारिश करने के लिए नौसेना के जज एडवोकेट या नौसेनाध्यक्ष को या आदेश को अपास्त करने के लिए केन्द्रीय सरकार को प्राधिकृत नहीं करेगी ।
अध्याय 16
निष्कर्षों और दण्डादेशों का उपान्तरण, क्षमा और दण्डादेशों का लघुकरण, परिहार और निलंबन
162. निष्कर्षों या दण्डादेशों के विरुद्ध केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष को अर्जियां-नौसैनिक विधि के अध्यधीन का जो भी व्यक्ति किसी सेना-न्यायालय के निष्कर्ष या दण्डादेश से अपने को व्यथित समझता है वह केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष के समक्ष अर्जी उपस्थित कर सकेगा, और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष उस पर ऐसा आदेश दे सकेगा जैसा ठीक समझा जाए ।
163. निष्कर्षों और दण्डादेशों के बारे में केन्द्रीय सरकार और नौसेनाध्यक्ष की शक्तियां-(1) जहां कि किसी व्यक्ति का इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन विचारण किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष, उस मामले में, जिसमें दोषसिद्धि की गई है-
(क) निष्कर्ष और दंडादेश को अपास्त कर सकेगा और अभियुक्त को दोषमुक्त या उन्मोचित कर सकेगा या यह आदेश दे सकेगा कि उसका पुनः विचारण किया जाए, अथवा
(ख) दंडादेश को बनाए रखते हुए निष्कर्ष को बदल सकेगा (परन्तु यह तब जब कि ऐसा दंडादेश, परिवर्तित निष्कर्ष पर वैध रूप से पारित किया जा सकता हो), अथवा
(ग) निष्कर्ष को परिवर्तित करते हुए या किए बिना, दंडादेश को घटा सकेगा या अधिनिर्णीत दंड को मापमान में उससे नीचे के दण्ड में लघुकृत कर सकेगा, अथवा
(घ) शर्तों के सहित या बिना, व्यक्ति को क्षमा कर सकेगा या अधिनिर्णीत सम्पूर्ण दंड का या उसके किसी भाग का परिहार कर सकेगा, अथवा
। । । । । ।
परन्तु कारावास का दंडादेश अधिनिर्णीत कारावास की अवधि से अधिक अवधि के निरोध के दण्डादेश में लघुकृत नहीं किया जाएगा, और सकलंक पदच्युति का दण्डादेश, जिसके साथ कारावास का दण्डादेश नहीं है, निरोध के दण्डादेश में लघुकृत नहीं किया जाएगा:
परन्तु यह और भी कि इस धारा की कोई भी बात, केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष को दंडादेश में वृद्धि करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन उपांतरित दंडादेश ऐसे निष्पादित किया जाएगा, मानो वह मूलतः पारित किया गया था ।
(3) यदि वह शर्त, जिस पर किसी व्यक्ति को क्षमा किया गया है या परोल पर निर्मुक्त किया गया है या दण्ड का परिहार किया गया है, उस प्राधिकारी की राय में पूरी नहीं की गई है, जिसने क्षमा, निर्मुक्ति, या परिहार अनुदत्त किया था तो वह प्राधिकारी क्षमा या निर्मुक्ति या परिहार को रद्द कर सकेगा और अधिनिर्णीत दण्डादेश तदुपरि ऐसे क्रियान्वित किया जाएगा, मानो वह क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार अनुदत्त नहीं किया गया था:
परन्तु ऐसे व्यक्ति के मामले में, जिसे कारावास या निरोध का दंडादेश दिया गया है, वह व्यक्ति दंडादेश का अनवसित प्रभाग ही भोगेगा ।
[163क. पैरोल से संबंधित उपबंध-जहां इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किसी व्यक्ति को विचारण किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष या नौसैनिक कमान का फ्लैग आफिसर कमांडिंग-इन-चीफ दोषसिद्धि की दशा में, व्यक्ति को शर्तों पर या उनके बिना पैरोल पर छोड़ सकेगा ।]
164. दंडादेशों का निलंबन-(1) जहां कि किसी व्यक्ति को कारावास या निरोध का दंडादेश दिया गया है, वहां केन्द्रीय सरकार या पूर्वगामी धारा या धारा 150 की उपधारा (3) के आधार पर सुपुर्दगी का आदेश निकालने की शक्ति रखने वाला आफिसर (जो इसमें इसके पश्चात् इस धारा में सुपुर्दगीकार प्राधिकारी के रूप में निर्दिष्ट है) ऐसा आदेश देने के बदले यह आदेश दे सकेगा कि दंडादेश सुपुर्दगी का आदेश निकाले जाने तक निलंबित रहे और ऐसी दशा में-
(क) दंडादेश की अवधि, इस अधिनियम में किसी भी बात के होते हुए तब तक प्रारम्भ हुई न गिनी जाएगी जब तक सुपुर्दगी का आदेश न निकाल दिया गया हो;
(ख) मामले पर केन्द्रीय सरकार या सुपुर्दगीकार प्राधिकारी या विहित आफिसर द्वारा पुनः विचार किसी भी समय किया जा सकेगा और तीन मास से अनधिक अन्तरालों पर किया जाएगा, और यदि ऐसे किसी पुनः विचार पर केन्द्रीय सरकार या सुपुर्दगीकार प्राधिकारी या ऐसे विहित आफिसर को यह प्रतीत होता है कि अपराधी का आचरण दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसा रहा है, कि दण्डादेश का परिहार करना न्यायसंगत होगा, तो केन्द्रीय सरकार या सुपुर्दगीकार प्राधिकारी या ऐसा विहित आफिसर उस संपूर्ण दण्ड का या उसके किसी भाग का परिहार कर सकेगा;
(ग) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि केन्द्रीय सरकार या सुपुर्दगीकार प्राधिकारी या ऐसा विहित आफिसर, किसी भी समय जब दण्डादेश निलंबित है, सुपुर्दगी का आदेश निकाल सकेगा और दण्डादेश तदुपरि निलंबित नहीं रह जाएगा;
(घ) जहां कि नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति उस समय के दौरान, जब उसका दण्डादेश ऐसे निलंबित है, किसी अन्य अपराध के लिए कारावास या निरोध से दण्डादिष्ट किया जाता है, वहां यदि वह किसी समय निलंबित दण्डादेश के अधीन, या ऐसे किसी पश्चात्वर्ती दण्डादेश के अधीन सुपुर्द किया जाता है, और कोई ऐसा पश्चात्वर्ती दण्डादेश भी चाहे निलंबित किया गया हो या वहीं सुपुर्दगीकार प्राधिकारी यह निदेश दे सकेगा कि दोनों दण्डादेश साथ-साथ या क्रमवर्ती चलेंगे, किंतु ऐसे कि कुल दो क्रमवर्ती वर्षों से अधिक कालावधि के लिए निरोध किसी भी व्यक्ति को न भोगना पड़े ।
(2) जब कि कोई व्यक्ति कारावास या निरोध से दण्डादिष्ट किया गया है और सुपुर्दगी का आदेश निकाला जा चुका है तब केन्द्रीय सरकार या सुपुर्दगीकार प्राधिकारी या विहित आफिसर यह आदेश दे सकेगा कि दंडादेश निलंबित कर दिया जाए और ऐसे मामलों में वह व्यक्ति, जिसका दंडादेश निलंबित किया गया है, उन्मोचित कर दिया जाएगा और जब तक वह उसी दण्डादेश के अधीन पुनःसुपुर्द न कर दिया जाए, तब तक उस दण्डादेश का चलना निलंबित रहेगा, और उपधारा (1) के खण्ड (ख), (ग) और (घ) के उपबंध उसी रीति से लागू होंगे, जैसे वे उस दशा में लागू होते हैं, जिसमें कि दण्डादेश का निलंबन सुपुर्दगी का आदेश निकाले जाने से पूर्व कर दिया गया है ।
(3) जहां कि किसी दण्डादेश को चाहे सुपुर्दगी के पहले चाहे पश्चात् इस धारा के अधीन निलंबित किया जाता है वहां केन्द्रीय सरकार या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अध्यधीन रहते हुए, वह सुपुर्दगीकार प्राधिकारी या आफिसर, जिसके द्वारा दण्डादेश निलंबित किया गया है, निदेश दे सकेगा कि कारावास या निरोध के दण्ड में अन्तवर्लित किसी शास्ति का परिहार या निलंबन किया जाएगा या नहीं ।
अध्याय 17
सेना-न्यायालयों, अनुशासनिक न्यायालयों और कारागारों के संबंध में अपराध
165. जो व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं हैं उनके द्वारा सेना-न्यायालयों और अनुशासनिक न्यायालयों के संबंध में अपराध-जो व्यक्ति नौसैनिक विधि के अध्यधीन नहीं है वैसा हर व्यक्ति, जो-
(क) किसी सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय के समक्ष साक्षी के रूप में हाजिर होने के लिए, सम्यक् रूप से समन किए जाने या आदेश दिए जाने पर हाजिर होने में सम्यक् हेतुक के बिना असफल रहेगा, अथवा
(ख) वह शपथ, जिसका लिया जाना या वह जिसका प्रतिज्ञान किया जाना सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय द्वारा वैध रूप से अपेक्षित किया गया है लेने या करने से इंकार करेगा, अथवा
(ग) शपथ ग्रहण या प्रतिज्ञान करके सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय द्वारा या के समक्ष पूछे गए किन्हीं भी ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने से इंकार करेगा जिनका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा आबद्ध है, अथवा
(घ) अपनी शक्ति में की किसी दस्तावेज को, जिसे सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय वैध रूप से मांगे, पेश या परिदत्त करने से इंकार करेगा, अथवा
(ङ) सेना-न्यायालय या अनुशासनिक न्यायालय के अवमान का दोषी होगा,
कारावास से, ऐसी अवधि के लिए, जो दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडित किया जाएगा ।
166. कैदियों के निकल भागने या उनके निकल भागने का प्रयत्न करने में सहायता देने के लिए और कारागार विनियमों को भंग करने के लिए शास्तियां-(1) हर व्यक्ति, जो-
(क) किसी नौसैनिक कारागार या किन्हीं नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों में किसी आयुध, औजार, या उपकरण का या किसी नकाब या भेष बदलने की अन्य वस्तु का इसलिए प्रवहण करेगा या प्रवहण किया जाना कारित करेगा, कि किसी कैदी का या ऐसे व्यक्ति का, जो निरोध भोग रहा है, निकल भागना सुकर हो जाए, अथवा
(ख) किसी कैदी की या ऐसे व्यक्ति की, जो निरोध भोग रहा है, ऐसे कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों से निकल भागने या निकल भागने का प्रयत्न करने में, किसी भी साधन द्वारा सहायता करेगा, चाहे वह वास्तव में निकल भाग सका हो या नहीं,
कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा ।
(2) हर व्यक्ति, जो नौसैनिक कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों में कोई मादक या खमीर चढ़ा आसव इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के उल्लंघन में लाएगा या लाने का प्रयत्न करेगा, ऐसे हर अपराध के लिए दो सौ रुपए से अनधिक और एक सौ रुपए से अन्यून जुर्माने से दंडित किया जाएगा ।
(3) हर व्यक्ति, जो-
(क) नौसैनिक कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों में या किसी कैदी के पास या ऐसे व्यक्ति के पास, जो निरोध भोग रहा है या उसके लिए उस आफिसर के ज्ञान के बिना, जो उस कारागार या निरोध-क्वार्टरों का भारसाधन या समादेशन धारण करता है, कोई धन, कपड़े, रसद, तम्बाकू, पत्ते, कागज या अन्य वस्तुएं लाएगा, जिसका कैदी के या उस व्यक्ति के, जो निरोध भोग रहा है, कब्जे में होना कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों के नियमों द्वारा अनुज्ञात नहीं है, अथवा
(ख) उक्त कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों में ऐसी कोई वस्तुएं फेंकेगा, या पूर्वोक्त वस्तुओं में से कोई भी वस्तु किसी कैदी की या उस व्यक्ति की, जो निरोध भोग रहा है, वांछा से कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों में से उक्त आफिसर की मंजूरी के बिना बाहर ले जाएगा,
ऐसे हर अपराध के लिए दो सौ रुपए से अनधिक जुर्माने से दण्डित किया जाएगा ।
(4) हर व्यक्ति, जो-
(क) नौसैनिक कारागार या नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों के किसी आफिसर को उसके कर्तव्य के निष्पादन में विघ्न डालेगा, अथवा
(ख) किसी ऐसे आफिसर पर हमला करने, उसका प्रतिरोध करने या उसको विघ्न डालने में किसी व्यक्ति की सहायता करेगा या उसका दुष्प्रेरण करेगा,
ऐसे हर अपराध के लिए कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा ।
(5) इस धारा की पूर्वगामी उपधाराओं के अधीन वसूल किया गया हर जुर्माना किसी तत्प्रतिकूल विधि, चार्टर या रूढ़ि के होते हुए भी ऐसे उपयोजित किया जाएगा, जैसे करने का निदेश केन्द्रीय सरकार द्वारा दिया जाए ।
167. जेलरों आदि के विषय में शास्ति-किसी कारागार या जेल या सुधारगृह का या किन्हीं नौसैनिक निरोध-क्वार्टरों का हर शासक, जेलर या पालक, और किसी स्थान, पोत या जलयान का भारसाधक या समादेशन धारण करने वाला हर व्यक्ति, जो विधिपूर्ण प्रतिहेतु के बिना इस अधिनियम के उपबन्धों या उनमें से किसी के विरुद्ध किसी अपराधी को प्राप्त या परिरूद्ध करने, अपसारित करने, उन्मोचित करने या परिदत्त करने से इन्कार या उपेक्षा करेगा, ऐसे हर इन्कार या उपेक्षा के लिए एक हजार रुपए से अनधिक शास्ति उपगत करेगा और किसी तत्प्रतिकूल विधि, चार्टर या रूढ़ि के होते हुए भी ऐसा हर शास्ति-धन ऐसे उपयोजित किया जाएगा, जैसा केन्द्रीय सरकार निदेश दे ।
अध्याय 18
नौसेना का जज एडवोकेट जनरल और उसके विभाग के आफिसर
168. नौसेना के जज एडवोकेट जनरल और उसके अधीनस्थ आफिसरों की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा नौसैनिक का एक जज एडवोकेट जनरल और नौसेना के जज एडवोकेट जनरल के विभाग में इतने जज एडवोकेट, जितने केन्द्रीय सरकार आवश्यक समझे, नियुक्त किए जाएंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार इस प्रकार नियुक्त किए गए जज एडवोकेटों में से किसी एक को नौसेना का डिप्टी जज एडवोकेट जनरल पदाभिहित कर सकेगी ।
(3) कोई भी व्यक्ति नौसेना के जज एडवोकेट जनरल के रूप में नियुक्ति के लिए तब के सिवाय अर्हित न होगा, जब कि वह-
(क) भारत का नागरिक है, तथा
(ख) कम से कम दस वर्ष तक भारत के राज्यक्षेत्र में न्यायिक पद धारण कर चुका है, अथवा
(ग) किसी उच्च न्यायालय का अथवा ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का एक दूसरे के बाद कम से कम दस वर्ष अधिवक्ता रहा है:
[परन्तु, यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि सेवा की अभ्यावश्यकताओं में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, खण्ड (ख) अथवा खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट अर्हता को किसी व्यक्ति के संबंध में शिथिल कर सकेगी ।]
(4) कोई भी व्यक्ति नौसेना के डिप्टी एडवोकेट जनरल के रूप में नियुक्ति के लिए तब के सिवाय अर्हित न होगा जब कि वह-
(क) भारत का नागरिक है, तथा
(ख) कम से कम सात वर्ष तक भारत के राज्यक्षेत्र में न्यायिक पद धारण कर चुका है, अथवा
(ग) किसी उच्च न्यायालय का अथवा ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का एक दूसरे के बाद कम से कम सात वर्ष अधिवक्ता रहा है:
1[परन्तु, यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि सेवा की अभ्यावश्यकताओं में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, खण्ड (ख) अथवा खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट अर्हता को किसी व्यक्ति के संबंध में शिथिल कर सकेगी ।]
(5) कोई भी व्यक्ति जज एडवोकेट के रूप में नियुक्ति के लिए तब के सिवाय अर्हित न होगा जब कि वह-
(क) भारत का नागरिक है, तथा
(ख) उच्च न्यायालय के अधिवक्ता या प्लीडर के रूप में तालिकांकित किए जाने के लिए अर्हित है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) उस कालावधि की गणना करने में, जिसके दौरान कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय का अधिवक्ता है या रहा है, यह कालावधि भी सम्मिलित कर ली जाएगी, जिसके दौरान उस व्यक्ति ने अधिवक्ता बनने के पश्चात् न्यायिक पद धारण किया है,
(ख) उस कालावधि की गणना करने में, जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने भारत के राज्यक्षेत्र में न्यायिक पद धारण किया है या वह उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा है, संविधान के प्रारम्भ से पूर्व की कोई ऐसी कालावधि भी सम्मिलित कर ली जाएगी, जिसके दौरान उसने किसी ऐसे क्षेत्र में, जो अगस्त 1947 के 15वें दिन से पहले गवर्नमेंट आफ इंडिया ऐक्ट 1935 में यथापरिभाषित भारत में समाविष्ट था, न्यायिक पद धारण किया है, या, यथास्थिति, किसी ऐसे क्षेत्र में किसी उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में व्यवसाय किया है,
(ग) न्यायिक पद" अभिव्यक्ति के अन्तर्गत फ्लीट के जज एडवोकेट का या उसके उपपदियों या सहायकों में से किसी का पद और फ्लीट के जज एडवोकेट विभाग में का कोई अन्य विधि या न्यायिक पद और इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् धारण किया गया नौसेना के जज एडवोकेट जनरल का या किसी जज एडवोकेट का पद आता है, यह समझा जाएगा ।
169. नौसेना के जज एडवोकेट जनरल के कृत्य-नौसेना के जज एडवोकेट जनरल का यह कर्तव्य होगा कि वह नौसेना से सम्बद्ध विधि या न्यायिक प्रकार के ऐसे कर्तव्यों का पालन करे, जो केन्द्रीय सरकार या नौसेनाध्यक्ष द्वारा उसे समय-समय पर निदेशित या समनुदिष्ट किए जाएं, और इस अधिनियम या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के द्वारा या अधीन उसे प्रदत्त कृत्यों का निर्वहन करे ।
170. नौसेना के जज एडवोकेट जनरल के कृत्यों का उसकी अनुपस्थिति में निर्वहन-नौसेना के जज एडवोकेट जनरल के छुट्टी पर या अन्यथा अनुपस्थित होने पर उसके कृत्यों का निवर्हन, उसके विभाग के जज एडवोकेटों में से किसी ऐसे जज एडवोकेट द्वारा किया जाएगा, जो नौसेनाध्यक्ष द्वारा इस निमित्त पदाभिहित किया जाए ।
अध्याय 19
मृत, लापता आदि व्यक्तियों की प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन
171. मृत नाविकों की सम्पत्ति का व्ययन-(1) किसी नाविक की मृत्यु नौसैनिक विधि के अध्यधीन उसके रहते हुए हो जाने पर उस पोत का कमान आफिसर, जिसका वह [नौसैनिक] था, यथाशक्य शीघ्र-
(क) मृतक की सब जंगम सम्पत्ति, जो पोत या क्वार्टरों में है, सुप्राप्त करेगा और उसकी एक तालिका बनवाएगा;
(ख) वे वेतन और भत्ते लेगा, जो ऐसे व्यक्तियों को शोध्य हैं;
(ग) मृतक द्वारा किसी बैंककारी कंपनी में, जिसके अन्तर्गत कोई डाकघर-बचत बैंक, सहकारी बैंक या सोसाइटी या धन के रूप में निक्षेप करने वाली किसी भी नाम की कोई अन्य संस्था आती है, जमा छोड़े हुए सब धन उस दशा में, जिसमें वह यह करना ठीक समझे और इस निमित्त बनाए गए किन्हीं विनियमों के अध्यधीन रहते हुए, संगृहीत कर लेगा और उस प्रयोजन के लिए ऐसी बैंककारी कंपनी, सोसाइटी, या अन्य संस्था के अभिकर्ता, प्रबन्धक या अन्य उचित प्राधिकारी से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस बैंककारी कंपनी से, नियमों में किसी बात के होते हुए भी, वे धन कमान आफिसर को तत्क्षण संदत्त कर दे, और ऐसा अभिकर्ता, प्रबन्धक या अन्य प्राधिकारी, किसी भी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी उस अपेक्षा का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(2) जहां कि उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन की गई अपेक्षा के अनुपालन में बैंककारी कंपनी, सोसाइटी या अन्य संस्था द्वारा किसी धन का संदाय कर दिया गया है, वहां ऐसे धन के बारे में किसी भी व्यक्ति का कोई भी दावा उक्त बैंककारी कंपनी, सोसाइटी या अन्य संस्था के विरुद्ध नहीं होगा ।
(3) यदि कमान आफिसर की राय में उस पोत और सेवा ऋणों का और पोत या मृतक के क्वार्टरों में के अन्य ऋणों का और मृतक की संपदा के विषय में कमान आफिसर द्वारा उपगत व्ययों, का यदि कोई हों, संदाय सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए ऐसा करना आवश्यक है, तो वह मृतक की जंगम संपत्ति को बिकवा देगा या धन में संपरिवर्तित करेगा ।
(4) यदि मृतक का प्रतिनिधि मौके पर ही है और उन पोत और सेवा ऋणों का और पोत या क्वार्टरों में के अन्य ऋणों का, जो मृतक द्वारा शोध्य हैं, संदाय कर देता है या करने के लिए प्रतिभूति दे देता है तो कमान आफिसर उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन या उपधारा (3) के अधीन कार्यवाही नहीं करेगा ।
(5) कमान आफिसर मृतक के पोत और सेवा ऋणों और पोत या क्वार्टरों में अन्य ऋणों और मृत व्यक्ति को उपधारा (1) और (3) के अधीन ऐसे प्राप्त, संगृहीत या आप्त धनों में से आस्तियों के आपन के संबंध में उपगत व्ययों का संदाय करेगा ।
(6) जो सम्पत्ति उपधारा (5) में उपदर्शित खर्चे की पूर्ति करने के पश्चात् बचे वह सम्पत्ति या जहां कि प्रतिनिधि ने मृतक के पोत और सेवा ऋणों और पोत या क्वार्टरों में के अन्य ऋणों का संदाय कर दिया हो, या करने के लिए प्रतिभूति दे दी हो, वहां मृतक की कुल सम्पत्ति कमान आफिसर द्वारा मृतक के प्रतिनिधि को परिदत्त कर दी जाएगी; ऐसा होने पर मृतक की संपदा के प्रशासन के बारे में उसका उत्तरदायित्व समाप्त हो जाएगा ।
(7) यदि उक्त अधिशेष के बारे में मृतक के प्रतिनिधि द्वारा कोई दावा मृत्यु के बारह मास के अन्दर नहीं किया जाता है तो कमान आफिसर सम्पत्ति को विहित व्यक्ति को सौंपने के लिए कार्रवाई करेगा, जो मृतक की सम्पदा का प्रशासन धारा 176 में उपबन्धित रीति से चलाता रहेगा ।
172. मृत आफिसरों की सम्पत्ति का व्ययन-धारा 171 के उपबन्ध किसी आफिसर की, जिसकी मृत्यु नौसैनिक विधि के अध्यधीन रहते हुए हो जाए, सम्पत्ति के व्ययन को भी किन्तु निम्नलिखित उपान्तरों के साथ लागू होंगे, अर्थात्: -
(i) धारा 171 के अधीन कमान आफिसर के कृत्यों का पालन उस समायोजन समिति द्वारा किया जाएगा, जो विहित रीति से इस निमित गठित हो, तथा
(ii) धारा 171 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट ऋणों और व्ययों के संदाय के पश्चात् अधिशेष, यदि कोई हो, इस निमित्त विहित व्यक्ति को दे दिया जाएगा ।
173. पोत और सेवा ऋणों और पोत या क्वार्टरों में के अन्य ऋणों की बाबत प्रश्नों का विनिश्चय-यदि किसी मामले में इस बाबत की कि मृत आफिसर या [नौसैनिक] के पोत ऋण या सेवा ऋण और पोत या क्वार्टरों में के ऋण क्या हैं इस बारे में कि उनके बारे में कितनी राशि संदेय है, कोई शंका या मतभेद उत्पन्न हो, तो विहित व्यक्ति का विनिश्चय अन्तिम होगा और सभी व्यक्तियों पर सभी प्रयोजनों के लिए आबद्धकर होगा ।
174. कमान आफिसर या समायोजन समिति की शक्तियों की प्रकृति-अन्य सभी व्यक्तियों और प्राधिकारियों का अपवर्जन करके, यथास्थिति, कमान आफिसर या समायोजन समिति को, यथास्थिति, धारा 171 या 172 के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग के प्रयोजन के लिए वही अधिकार और शक्तियां प्राप्त होंगी, जो यदि कमान आफिसर या समिति ने मृतक की संपदा का प्रतिनिधित्व प्राप्त कर लिया होगा, तो उसे प्राप्त होती और, यथास्थिति, ऐसे कमान आफिसर या समिति द्वारा दी गई रसीद तदनुसार प्रभाव रखेगी ।
स्पष्टीकरण-प्रतिनिधित्व" के अन्तर्गत आता है सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा दिया गया प्रोबेट, उपाबद्ध विल सहित या रहित प्रशासनपत्र और उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, जो किसी व्यक्ति को मृत व्यक्ति की संपदा का निष्पादक या प्रशासक बनाता है या मृत व्यक्ति की आस्तियों को प्राप्त या आप्त करने के लिए उसे प्राधिकृत करता है ।
175. मृत व्यक्ति की सम्पदा महाप्रशासक के हवाले करने की केन्द्रीय सरकार की शक्तियां-(1) महाप्रशासक अधिनियम, 1913 (1913 का 3) में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी महाप्रशासक मृतक की किसी ऐसी सम्पत्ति के संबंध में, जिसके बारे में धारा 171 या धारा 172 के अधीन कार्रवाई की जा चुकी है, किसी प्रकार से वहां तक के सिवाय अन्तःक्षेप नहीं करेगा, जहां तक ऐसा करने के लिए वह इस अधिनियम के उपबन्धों के द्वारा या अधीन अभिव्यक्ततः अपेक्षित या सक्षम है ।
(2) केन्द्रीय सरकार किसी भी समय और ऐसी परिस्थितियों में, जिन्हें वह ठीक समझे, निदेश दे सकेगी कि किसी मृत नौसैनिक या आफिसर की संपदा, यथास्थिति, कमान आफिसर या समायोजन समिति द्वारा राज्य के महाप्रशासक को प्रशासन के लिए सौंप दी जाए और तदुपरि ऐसा कमान आफिसर या समिति वह संपदा उस महाप्रशासक को सौंपे देगी ।
(3) जहां कि महाप्रशासक को कोई संपदा इस धारा के अधीन सौंपी जाती है, वहां महाप्रशासक ऐसी संपदा का प्रशासन महाप्रशासक अधिनियम, 1913 (1913 का 3) के उपबन्धों के अनुसार करेगा:
परन्तु जहां कि मृतक के पोत और सेवा ऋणों और पोत या क्वार्टरों में के अन्य ऋणों का संदाय किए जाने से पूर्व संपदा महाप्रशासक को सौंप दी जाती है, वहां महाप्रशासक का यह कर्तव्य होगा कि वह इन ऋणों को मृत व्यक्ति द्वारा शोध्य किन्हीं अन्य ऋणों की अपेक्षा पूर्विकता देकर संदत्त करे ।
(4) महाप्रशासक सभी ऋणों और भारों को उन्मोचित करने के पश्चात् अपने पास अवशिष्ट अधिशेष, यदि कोई हो, मृतक के वारिसों को संदत्त कर देगा, और यदि किसी भी वारिस का पता नहीं चलता तो वह अतिशेष इस निमित्त विहित व्यक्ति को सौंप देगा ।
(5) महाप्रशासक इस धारा के अधीन के अपने कर्तव्यों के बारे में उस कुल रकम के तीन प्रतिशत से अधिक कोई फीस नहीं लेगा, जो पोत और सेवा ऋणों और पोत या क्वार्टरों में के अन्य ऋणों को संदत्त करने के पश्चात् उसके हाथ में आती है, या अवशिष्ट रहती है ।
176. विहित व्यक्तियों द्वारा अधिशेष का व्ययन-विहित व्यक्ति, धारा 171 की उपधारा (7) या धारा 172 के खण्ड (ii) या धारा 175 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट अधिशेष की प्राप्ति पर-
(क) उस दशा में, जिसमें कि उसे मृतक के किसी विधिक प्रतिनिधि का पता है, वह अधिशेष उस प्रतिनिधि को संदत्त कर देगा;
(ख) उस दशा में, जिसमें, अधिशेष [मूल्य में एक लाख रुपए से अनधिक विहित रकम से अधिक नहीं हैट उस अधिशेष को, यदि वह ऐसा करना ठीक समझे किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसे पाने का हकदार प्रतीत होता है, उसे यह अपेक्षा किए बिना, कि वह कोई प्रोबेट, प्रशासनपत्र, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र या हक का अन्य निश्चायक साक्ष्य पेश करे, संदत्त या परिदत्त कर सकेगा;
(ग) उस दशा में, जिसमें कि विहित व्यक्ति किसी ऐसे प्रतिनिधि को नहीं जानता है, जिसे अधिशेष खण्ड (क) के अधीन संदत्त किया जा सकता है, या जिसमें कि अधिशेष का खण्ड (ख) के अधीन व्ययन नहीं किया गया है, विहित प्ररूप में और विहित रीति से छह क्रमवर्ती वर्षों तक प्रतिवर्ष एक सूचना प्रकाशित करेगा; और यदि मृत व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधि द्वारा अतिशेष के लिए कोई दावा ऐसी सूचनाओं में से अन्तिम सूचना के प्रकाशन के पश्चात् भी छह मास के अन्दर नहीं किया जाता तो विहित व्यक्ति अधिशेष को, उससे प्रोद्भूत किसी आय या आय के संचय सहित, केन्द्रीय सरकार के जमाखाते में निक्षिप्त कर देगा :
परन्तु ऐसा निक्षेप ऐसे अधिशेष पर या उसके किसी भाग पर के किसी व्यक्ति के दावों पर, यदि वह अन्यथा उसका हकदार है, प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा ।
177. जो चीजबस्त धन में संपरिवर्तित नहीं की गई है उसका व्ययन-जहां कि किसी मृत आफिसर या [नौसैनिक] की संपदा का कोई भाग ऐसी चीजबस्त, प्रतिभूतियों या अन्य सम्पत्ति के रूप में है, जो धन में संपरिवर्तित नहीं की गई है, वहां धारा 171 की उपधारा (7) या धारा 172 के खण्ड (ii) और धारा 176 के अधिशेष के संदाय विषयक उपबन्धों का विस्तार उसके सिवाय, जैसा विहित किया जाए, ऐसी चीजबस्त, प्रतिभूतियों या सम्पत्ति के परिदान, पारेषण या अन्तरण पर होगा, और विहित व्यक्ति को उसे धन में संपरिवर्तन करने की वही शक्ति प्राप्त होगी जो मृतक के विधिक प्रतिनिधि को प्राप्त होती है ।
178. कमान आफिसर समिति विहित व्यक्ति और केन्द्रीय सरकार के दायित्व का पर्यवसान-धन का कोई ऐसा संदाय या उपयोजन या किसी सम्पत्ति का ऐसा परिदान, विक्रय, या अन्य व्ययन जो कमान आफिसर, समिति या विहित व्यक्ति द्वारा धाराओं 171 से 176 तक के अनुसरण में सद्भावपूर्वक किया गया है या किया गया तात्पर्यित है, विधिमान्य होगा और, यथास्थिति, कमान आफिसर, समिति या विहित व्यक्ति को, और केन्द्रीय सरकार को भी उस धन या सम्पत्ति के बारे में के सब दायित्व के पूर्णतः सम्मुक्त कर देगा, जिसका इस प्रकार संदाय, उपयोजन या व्ययन किया गया है किन्तु इसमें अन्तर्विष्ट कोई भी बात किसी निष्पादक या प्रशासक या अन्य विधिक प्रतिनिधि के या मृतक के किसी लेनदार के किसी ऐसे अधिकार पर प्रभाव न डालेगी, जो किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध हो, जिसे कोई यथापूर्वोक्त संदाय या परिदान किया गया है ।
179. प्रतिनिधि के अधिकारों की व्यावृत्ति-इस अध्याय की कोई भी बात किसी मृत 2[नौसैनिक] या आफिसर के प्रतिनिधि के या किसी महाप्रशासक के उन अधिकारों और कर्तव्यों पर प्रभाव नहीं डालेगी जो मृत 2[नौसैनिक] या आफिसर की उस सम्पत्ति के बारे में है, जो, यथास्थिति, कमान आफिसर या समिति द्वारा संगृहीत नहीं की गई है और उस अधिशेष का भाग नहीं है, जो विहित व्यक्ति को धारा 171 की उपधारा (7) के अधीन या धारा 172 के खण्ड (ii) के अधीन सौंपा गया है ।
180. धाराओं 171 से 179 का विकृतचित व्यक्तियों को लागू होना-धारा 171 से 179 तक के उपबन्ध भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 (1912 का 4) में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, नौसैनिक विधि के अध्यधीन के किसी ऐसे आफिसर या 2[नौसैनिक] को भी, जिसके बारे में यह बात कि वह विकृतचित का है, विहित रीति से अभिनिश्चित कर ली गई है, तथा नौसैनिक विधि के अध्यधीन किसी ऐसे आफिसर या 2[नौसैनिक] को भी, जिसकी बात शासकीय तौर पर यह रिपोर्ट दी गई है कि वह सक्रिय सेवा पर होते हुए लापता है वहां तक, जहां तक कि वे लागू किए जा सकते हों, ऐसे लागू होंगे, मानो उक्त आफिसर या 2[नौसैनिक] यथास्थिति, उस दिन मर गया था, जिस दिन उसकी चित-विकृति इस प्रकार अभिनिश्चित की गई या जिस दिन शासकीय तौर पर यह रिपोर्ट की गई कि वह लापता है :
परन्तु ऐसे किसी आफिसर या 2[नौसैनिक] की दशा में, जिसके लापता होने की रिपोर्ट ऐसे की गई है कि वह लापता है, सम्पत्ति का व्ययन करने की कोई भी कार्रवाई धाराओं 171, 172 और 175 के अधीन उस समय तक नहीं की जाएगी, जब तक नौसेनाध्यक्ष या अन्य विहित व्यक्ति द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन यह प्रमाणपत्र इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन नहीं दे दिया जाता कि उसकी मृत्यु होने की पृष्टि या उपधारणा की जाती है ।
181. कतिपय दशाओं में स्थायी समायोजन समिति की नियुक्ति-जब कि कोई आफिसर उस समय के दौरान, जब कि वह नौसैनिक विधि के अध्यधीन है, मर जाता है या उसका विकृतचित होना विहित रीति से अनिश्चित कर दिया जाता है या जिसकी बाबत शासकीय तौर पर यह रिपोर्ट दी गई है कि वह सक्रिय सेवा पर होते हुए लापता है, तब इस अध्याय के पूर्वगामी उपबन्धों में समिति के प्रति निर्देश उस स्थायी समायोजन समिति के प्रति (यदि कोई हो), निर्देश समझे जाएंगे जो विहित रूप से इस निमित्त गठित हो, और यदि ऐसी स्थायी समिति गठित की गई हो, तो तब तक नौसेनाध्यक्ष द्वारा अन्यथा निदेश न दिया जाए, वह स्थायी समिति ही ऐसी समिति के सभी कृत्यों का पालन करने की हकदार होगी ।
182. अन्य व्यक्तियों द्वारा शक्तियों का प्रयोग-कमान आफिसर के जो कृत्य और शक्तियां इस अध्याय में बताई गई हैं उनका किसी मामले में पालन या प्रयोग नौसेनाध्यक्ष द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया जा सकेगा ।
183. छुट्टी बिना अनुपस्थिति के कारण चीजबस्त का समपहरण-यदि नौसैनिक विधि के अध्यधीन का कोई व्यक्ति छुट्टी बिना एक मास की कालावधि पर्यन्त अनुपस्थित है (चाहे वह अभित्यजन का या अपने पोत या कर्तव्य स्थान को अनुचित रूप से छोड़ने का दोषी हो या नहीं) किन्तु अपने अपराध के लिए पकड़ा नहीं गया है या विचारित नहीं किया गया है, तो वह इस दायित्व के अधीन होगा कि उसके वेतन, भत्तों और अन्य फायदों का, जिन्हें केन्द्रीय सरकार समय-समय पर विनियमों द्वारा उपबन्धित करे, समपहरण कर लिया जाए और केन्द्रीय सरकार, नौसेनाध्यक्ष या विहित आफिसर, छुट्टी बिना अनुपस्थिति के तथ्य का कथन अन्तर्विष्ट रखने वाले आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि उसके द्वारा पोत के फलक पर या उसके कर्तव्य स्थान पर छोड़े गए कपड़ों और चीजबस्त का, यदि कोई हो, समपहरण कर लिया जाए, और उन्हें बेच दिया जाए, और उनके आगमों का व्ययन इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों में उपबन्धित रीति से कर दिया जाए, और समपहरण विक्रय का हर आदेश, जो इस उपबन्ध के अधीन हुआ है, उसमें नामित व्यक्ति की उसमें यथाकथित छुट्टी बिना अनुपस्थिति के तथ्य के बारे में इस धारा के प्रयोजन के लिए निश्चायक होगा, किन्तु किसी भी मामले में केन्द्रीय सरकार यदि समपहरण के पश्चात् और विक्रय से पूर्व किसी भी समय पर्याप्त हेतु दर्शित किए जाने पर यह ठीक समझे तब वह समपहरण का परिहार कर सकेगी, या विक्रय के पश्चात् उस विक्रय के आगम या उनका कोई भाग उस व्यक्ति को या के उपयोग के लिए, जिसके कपड़े या चीजबस्त थी, या उसके प्रतिनिधियों को या के उपयोग के लिए संदत्त या व्ययनित कर सकेगी ।
अध्याय 20
विनियम
184. विनियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार नौसैनिक बलों के शासन, समादेशन, अनुशासन, भर्ती, सेवा की शर्तों और विनियमन के लिए और साधारणतः इस अधिनियम के उपबंधों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए विनियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे-
(क) नौसैनिक सेवा में के आफिसरों और [नौसैनिकों] का रैंक, अग्रता, समादेशन, शक्तियां और प्राधिकार;
(ख) नियमित सेना और वायुसेना के सदस्यों की तुलना में नौसैनिक सेवा में के आफिसरों और [नौसैनिकों] का आपेक्षिक रैंक, अग्रता, समादेशन, शक्तियां और प्राधिकार;
[(ग) वे मामले जिनमें, और वे शर्तें जिनके अध्यधीन रहते हुए, दण्ड देने की शक्तियों का प्रयोग धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन किया जा सकेगा;
(गक) नौसैनिक सेवा में के व्यक्तियों की निवृत्ति, उन्मोचन और पदच्युति;
(गख) वह प्राधिकारी, जिसको धारा 19क में निर्दिष्ट कोई मामला निर्देशित किया जा सकेगा और वह रीति, जिसमें उस प्राधिकारी द्वारा जांच की जा सकेगी ।]
(घ) सेना-न्यायालयों का संयोजन और गठन और सेना-न्यायालय द्वारा किए जाने वाले विचारणों के लिए अभियोजकों की नियुक्ति;
(ङ) सेना-न्यायालयों का स्थगन, विद्यटन और बैंठकें;
(च) सेना-न्यायालयों द्वारा विचारण में अनुपालनीय प्रक्रिया, वे व्यक्ति, जिनके द्वारा किसी अभियुक्त की ऐसे विचारणों में प्रतिरक्षा की जा सकेगी और ऐसे व्यक्तियों की उसमें उपसंजाति;
(छ) आदेशों के प्ररूप, जो इस अधिनियम के उन उपबन्धों के अधीन किए जाने हैं, जो सेना-न्यायालयों और अधिनियमों से और मृत्यु, कारावास और निरोध का दण्ड देने से संबंधित हैं;
(ज) सेना-न्यायालयों के दण्डादेशों का क्रियान्वित किया जाना;
(झ) जहां तक कि वह, इस अधिनियम के अधीन विचारणीय या दण्डनीय अपराधों के अन्वेषण, गिरफ्तारी, अभिरक्षा, विचारण और दण्ड के सम्बन्ध में है, वहां तक इस अधिनियम के क्रियान्वयन के प्रयोजन के लिए आवश्यक कोई बात;
(ञ) नौसैनिक सेवा में के व्यक्तियों की सेवा के निबन्धन और शर्तें, वेतन, पेंशन, भत्ते और अन्य फायदे, जिनके अन्तर्गत सक्रिय सेवा के दौरान के इस निमित्त किए गए विशेष उपबंध आते हैं;
(ट) नौसैनिक सेवा में अनुपालनीय औपचारिकताएं और प्रकट किए जाने वाले समान का स्वरूप;
(ठ) जांच बोर्डों का संयोजन, गठन, प्रक्रिया और पद्धति, उसके समक्ष साक्षियों को समन करना और ऐसे बोर्डों द्वारा शपथ ग्रहण कराया जाना;
(ड) छुट्टी बिना अनुपस्थिति के समय की गणना या अभित्याजकों की और छुट्टी बिना अनुपस्थित व्यक्तियों की अभिरक्षा;
(ढ) उन आफिसरों या [नौसैनिकों] की, जो मर गए हैं या जिनका विकृतचित होना अभिनिश्चित कर दिया गया है या जिनकी बाबत यह रिपोर्ट दी गई है कि वे सक्रिय सेवा पर होते हुए लापता हैं, संपदाओं के आपन और व्ययन सम्बन्धी कोई भी बात;
(ण) युद्ध कैदियों के आचरण की जांच, और उनके वेतन और भत्ते;
(त) युद्ध कैदियों या लापता व्यक्तियों की पत्नियों और सन्तान के लिए किया जाने वाला उपबंध;
(थ) धारा 163 के अधीन की शक्तियों के प्रयोग सम्बन्धी प्रक्रिया;
[(थक) धारा 176 के खंड (ख) के अधीन विहित की जाने के लिए अपेक्षित रकम;]
(द) कोई अन्य बात, जो इस अधिनियम के अधीन विहित की जानी है, की जा सकती है या जिसका किया जाना अपेक्षित है ।
[184क. भूतलक्षी प्रभाव देकर विनियम बनाने की शक्ति-इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त विनियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत विनियमों को या उनमें से किसी विनियम को, ऐसी तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से पूर्वतर न हो, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति भी है, किन्तु किसी विनियम को इस प्रकार भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा, जिससे किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसको ऐसा विनियम लागू होता हो, हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े ।]
[185. विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
अध्याय 21
निरसन और व्यावृत्तियां
186. [निरसित ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 50) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
187. वर्तमान नौसैनिक बलों, नियुक्तियों आदि के बारे में उपबंध-(1) इस अधिनियम के प्रारंभ के समय वर्तमान नौसेना इस अधिनियम के अधीन समुत्थापित, नियमित नौसैनिक बल समझी जाएगी ।
(2) इस अधिनियम के प्रारंभ के समय वर्तमान भारतीय नौसैनिक रिजर्व, भारतीय नौसैनिक वालण्टियर रिजर्व और भारतीय फ्लीट रिजर्व इस अधिनियम के अधीन समुत्थापित भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल समझे जाएंगे ।
(3) इस अधिनियम के प्रारम्भ के समय भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बलों के आफिसरों की बाबत यह समझा जाएगा कि वे इस अधिनियम के अधीन उस रूप में नियुक्त किए गए हैं ।
(4) उस व्यक्ति की बाबत, जो फ्लीट के जज एडवोकेट के रूप में अपना पद इस अधिनियम के प्रारंभ पर धारण कर रहा है, यह समझा जाएगा कि वह नौसेना के जज एडवोकेट जनरल के रूप में इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किया गया है ।
(5) जो [नौसैनिक] इस अधिनियम के प्रारम्भ के समय भारतीय नौसेना या भारतीय नौसैनिक रिजर्व बल में है उनकी बाबत यह समझा जाएगा कि वे इस अधिनियम के अधीन इस रूप में सम्यक् रूप से अभ्यावेशित किए गए हैं ।
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