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सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 ( Micro, Small and Medium Enterprises Development Act, 2006 (MSMED Act) )


 

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006

(2006 का अधिनियम संख्यांक 27)

[16 जून, 2006]

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के संवर्धन और विकास को सुकर बनाने

और उनमें प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने तथा उनसे संबंधित या उनके

आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 2 के अधीन संघ द्वारा कतिपय उद्योगों के नियंत्रण की समीचीनता के बारे में एक घोषणा की गई थी;

और यह समीचीन है कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के संवर्धन और विकास को सुकर बनाने और उनमें प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के लिए तथा उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक विषयों के लिए उपबंध किया जाए;

भारत गणराज्य के सतावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास अधिनियम, 2006 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) सलाहकार समिति" से केद्रीय सरकार द्वारा धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन गठित समिति अभिप्रेत है;

(ख) नियत दिन" से प्रदायकर्ता से क्रेता द्वारा किसी माल या किन्हीं सेवाओं की स्वीकृति के दिन या समझी गई स्वीकृति के दिन से पन्द्रह दिन की अवधि की समाप्ति के ठीक बाद का अगला दिन अभिप्रेत है ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, -

(i) स्वीकृति के दिन" से अभिप्रेत है, -

(क) माल के वास्तविक परिदान या सेवाओं के वस्तुतः दिए जाने का दिन;

(ख) जहां माल के परिदान या सेवाओं के दिए जाने के दिन से पन्द्रह दिन के भीतर क्रेता द्वारा माल या सेवाओं की स्वीकृति के संबंध में लिखित में कोई आक्षेप किया जाता है, वहां वह दिन, जिसको प्रदायकर्ता द्वारा ऐसा आक्षेप दूर किया जाता है;

(ii) समझी गई स्वीकृति के दिन" से जहां माल के परिदान या सेवाओं के दिए जाने के दिन से पन्द्रह दिन के भीतर माल या सेवाओं की स्वीकृति के संबंध में क्रेता द्वारा लिखित रूप से कोई आक्षेप नहीं किया जाता है, वहां माल के वास्तविक परिदान या सेवाओं के वस्तुतः दिए जाने का दिन अभिप्रेत है;

(ग) बोर्ड" से धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम बोर्ड अभिप्रेत है;

(घ) क्रेता" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है, जो प्रदायकर्ता से प्रतिफल के लिए कोई माल क्रय करता है या कोई सेवा प्राप्त करता है; 

(ङ) उद्यम" से ऐसा कोई औद्योगिक उपक्रम या कोई कारबार समुत्थान या कोई अन्य स्थापन, अभिप्रेत है चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी उद्योग से संबंधित माल के विनिर्माण या उत्पादन में, किसी रीति से लगा हुआ है या कोई सेवा या सेवाओं को उपलब्ध कराने या उनको देने में लगा हुआ है ;

(च) माल" से हर प्रकार की जंगम संपत्ति अभिप्रेत है जो अनुयोज्य दावों और धन से भिन्न है;

(छ) मध्यम उद्यम" से धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (iii) या खंड (ख) के उपखंड (iii) के अधीन उस रूप में वर्गीकृत कोई उद्यम अभिप्रेत है;

(ज) सूक्ष्म उद्यम" से धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) या खंड (ख) के उपखंड (i) के अधीन उस रूप में वर्गीकृत कोई उद्यम अभिप्रेत है;

(झ) राष्ट्रीय बैंक" से राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 61) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अभिप्रेत है;

(ञ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ट) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ठ) रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;

(ड) लघु उद्यम" से धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (ii) या खंड (ख) के उपखंड (ii) के अधीन उस रूप में वर्गीकृत कोई उद्यम अभिप्रेत है;

(ढ) प्रदायकर्ता" से ऐसा सूक्ष्म या लघु उद्यम अभिप्रेत है, जिसने धारा 8 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी के यहां कोई ज्ञापन फाइल किया है और जिसके अंतर्गत निम्नलिखित हैं-

(i) राष्ट्रीय लघु उद्योग निगम, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत    कंपनी है;

(ii) किसी राज्य या किसी संघ राज्यक्षेत्र का लघु उद्योग विकास निगम, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत कंपनी है; 

(iii) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत या गठित कोई कंपनी, सहकारी सोसाइटी, न्यास या कोई निकाय, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, और जो सूक्ष्म या लघु उद्यम द्वारा उत्पादित माल के विक्रय में लगा हुआ है तथा ऐसे उद्यमों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली सेवाएं दे रहा है;

(ण) लघु उद्योग बैंक" से भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अभिप्रेत है;

(त) किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, राज्य सरकार" से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त उसका प्रशासक अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

राष्ट्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम बोर्ड

3. बोर्ड की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राष्ट्रीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम बोर्ड के नाम से ज्ञात एक बोर्ड की स्थापना की जाएगी ।

(2) बोर्ड का प्रधान कार्यालय दिल्ली में होगा ।

(3) बोर्ड निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात्ः-

(क) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केंद्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग का भारसाधक मंत्री, जो बोर्ड का पदेन अध्यक्ष होगा;

(ख) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केंद्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग का राज्यमंत्री या कोई उपमंत्री, यदि कोई हो, जो बोर्ड का पदेन उपाध्यक्ष होगा और जहां कोई ऐसा राज्यमंत्री या उपमंत्री नहीं है वहां ऐसा व्यक्ति, जो केंद्रीय सरकार द्वारा बोर्ड का उपाध्यक्ष होने के लिए नियुक्त किया जाए;

(ग) देश के ऐसे क्षेत्रों का जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किए जाएं, प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किए जाने वाले, यथास्थिति, लघु उद्योगों या सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के विभागों का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाली राज्य सरकारों के छह मंत्री, पदेन;

(घ) तीन संसद् सदस्य, जिनमें से दो सदस्य लोक सभा द्वारा और एक सदस्य राज्य सभा द्वारा निर्वाचित किया जाएगा;

(ङ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाने वाला संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक, पदेन;

(च) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केन्द्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग का भारसाधक सचिव, भारत सरकार, पदेन;

(छ) केन्द्रीय सरकार द्वारा वाणिज्य और उद्योग, वित्त, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, श्रम और नियोजन से संबंधित केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त किए जाने वाले भारत सरकार के चार सचिव, पदेन;

(ज) राष्ट्रीय बैंक के निदेशक बोर्ड का अध्यक्ष, पदेन;

(झ) लघु उद्योग बैंक के निदेशक बोर्ड का अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, पदेन;

(ञ) अध्यक्ष, भारतीय बैंक संगम, पदेन;

(ट) रिजर्व बैंक का प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाने वाला रिजर्व बैंक का एक अधिकारी, जो किसी कार्यपालक निदेशक से नीचे की पंक्ति का न हो;

(ठ) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के संगमों का प्रतिनिधित्व करने के लिए बीस व्यक्ति, जिनके अंतर्गत कम से कम तीन व्यक्ति महिला उद्यम संगमों का प्रतिनिधित्व करने वाले और कम से कम तीन व्यक्ति सूक्ष्म उद्यम संगमों का प्रतिनिधित्व करने वाले होंगे, जो केद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएं;

(ड) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले तीन प्रतिष्ठित व्यक्ति, जिनमें अर्थशास्त्र, उद्योग तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में से प्रत्येक से एक होगा, उनमें कम से कम एक महिला होगी;

(ढ) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले केन्द्रीय व्यवसाय संघ संगठनों के दो प्रतिनिधि; और

(ण) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाने वाला सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केन्द्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग में एक अधिकारी, जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, जो बोर्ड का पदेन सदस्य-सचिव होगा ।

(4) बोर्ड के पदेन सदस्यों से भिन्न बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियों को भरने को रीति और बोर्ड के सदस्यों द्वारा उनके कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए:

परन्तु यह कि बोर्ड के किसी पदेन सदस्य की पदावधि, तब तक जारी रहेगी जब तक वह उस पद को, जिसके कारण वह ऐसा सदस्य है, धारण करता है ।

(5) बोर्ड का कोई कार्य या कार्यवाहियां केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होंगी कि-

(क) बोर्ड के गठन में कोई रिक्ति या कोई त्रुटि है; या

(ख) बोर्ड के सदस्य के रूप में कार्य कर रहे किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या 

(ग) बोर्ड की प्रक्रिया में ऐसी कोई अनियमितता है जो मामले के गुणागुण को प्रभावित न करने वाली हो ।

(6) बोर्ड, किसी वर्ष में प्रत्येक तीन मास में कम से कम एक बार बैठक करेगा ।

(7) बोर्ड, अपने साथ, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को, जिनकी सहायता या सलाह की , वह इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों का अनुपालन करने में वांछा करे, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए जिन्हें वह आवश्यक समझे, सहयोजित कर सकेगा और इस प्रकार सहयोजित व्यक्ति को, ऐसे प्रयोंजनों से, जिनके लिए उसे सहयोजित किया गया है, सुसंगत बोर्ड के विचार-विमर्श में भाग लेने का अधिकार होगा, किन्तु उसे मत देने का अधिकार नहीं होगा ।

(8) उपधारा (7) पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बोर्ड का अध्यक्ष, एक वर्ष में बोर्ड की कम से कम दो बैठकों के लिए, यथास्थिति, लघु उद्योगों या सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के विभाग का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले राज्य सरकारों के ऐसे मंत्रियों या संघ राज्यक्षेत्रों के प्रशासकों तथा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के ऐसे अन्य संगमों के प्रतिनिधियों को, जिन्हें वह इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक समझे, आमंत्रित करेगा ।

(9) यह घोषित किया जाता है कि बोर्ड के सदस्य का पद उसके धारक को संसद् के किसी भी सदन का सदस्य चुने जाने या होने से निरर्हित नहीं करेगा ।

4. बोर्ड के सदस्य का हटाया जाना-(1) केन्द्रीय सरकार बोर्ड के किसी सदस्य को हटा सकेगी, यदि-

(क) वह न्यायनिर्णीत दिवालिया है या किसी समय वह दिवालिया रहा है; या

(ख) वह विकृतचित्त का है या विकृतचित्त हो गया है और सक्षम न्यायालय द्वारा घोषित कर दिया गया है; या

(ग) वह सदस्य के रूप में कार्य करने से इंकार करता है या कार्य करने के लिए असमर्थ हो गया है; या

(घ) वह किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अतंर्वलित है; या  

(ङ) उसने केन्द्रीय सरकार की राय में बोर्ड के सदस्य के रूप में अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है जिससे उसका बोर्ड में बने रहना साधारण जनता के हित में हानिकारक है ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, किसी सदस्य को उस उपधारा के खंड (ग) से खंड (ङ) में विनिर्दिष्ट आधारों पर उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा, जब तक उसे उस मामले में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया गया हो ।

5. बोर्ड के कृत्य-बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के साधारण निदेशों के अधीन रहते हुए, निम्नलिखित सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन करेगा, अर्थात्ः-

(क) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के संवर्धन और विकास को प्रभावित करने वाली बातों की परीक्षा करना और संवर्धन और विकास सुकर बनाने तथा ऐसे उद्यमों की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और ऐसे उद्यमों पर उसके प्रभाव के संबंध में केन्द्रीय सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों का पुनर्विलोकन करना;

(ख) खंड (क) में निर्दिष्ट विषयों पर या केन्द्रीय सरकार द्वारा उसको निर्दिष्ट किसी अन्य विषय पर, जो उस सरकार की राय में, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के संवर्धन और विकास को सुकर बनाने तथा उनकी प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने के लिए आवश्यक या समीचीन है, सिफारिशें करना; और 

(ग) धारा 12 के अधीन गठित निधि या निधियों के उपयोग के संबंध में केन्द्रीय सरकार को सलाह देना ।

6. बोर्ड के सदस्य-सचिव की शक्तियां और कृत्य-इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, बोर्ड का सदस्य-सचिव ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का पालन करेगा, जो विहित किए जाएं ।

अध्याय 3

उद्यमों का वर्गीकरण, सलाहकार समिति और सूक्ष्म, लघु

और मध्यम उद्यमों का ज्ञापन

7. उद्यमों का वर्गीकरण-(1) केन्द्रीय सरकार, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 11ख में किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अधिसूचना द्वारा और उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, उद्यमों के किन्हीं वर्ग या वर्गों को, चाहे स्वामित्व, हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब, व्यक्ति संगम, सहकारी सोसाइटी, भागीदारी फर्म, कंपनी या उपक्रम हों, चाहे वे जिस नाम से ज्ञात हों, निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत कर सकेगी,-

(क) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी उद्योग से संबंधित माल के विनिर्माण या उत्पादन में लगे उद्यमों की दशा में, -

(i) ऐसा सूक्ष्म उद्यम, जहां संयंत्र और मशीनरी में विनिधान पच्चीस लाख रुपए से अधिक नहीं है;

(ii) ऐसा लघु उद्यम, जहां संयंत्र और मशीनरी में विनिधान पच्चीस लाख रुपए से अधिक है, किन्तु पांच करोड़ रुपए से अधिक नहीं है; या

(iii) ऐसा मध्यम उद्यम, जहां संयंत्र और मशीनरी में विनिधान पांच करोड़ रुपए से अधिक है, किन्तु दस करोड़ रुपए से अधिक नहीं है;

(ख) सेवाएं उपलब्ध कराने या देने में लगे उद्यमों की दशा में, -

(i) ऐसा सूक्ष्म उद्यम, जहां उपस्कर में विनिधान दस लाख रुपए से अधिक नहीं है;

(ii) ऐसा लघु उद्यम, जहां उपस्कर में विनिधान दस लाख रुपए से अधिक है, किन्तु दो करोड़ रुपए से अधिक नहीं है; या 

(iii) ऐसा मध्यम उद्यम, जहां उपस्कर में विनिधान दो करोड़ रुपए से अधिक है, किन्तु पांच करोड़ रुपए से अधिक नहीं है ।

स्पष्टीकरण 1-शंकाओं को दूर करने के लिए यह स्पष्ट किया जाता है कि संयंत्र और मशीनरी में विनिधान की संगणना करने में प्रदूषण नियंत्रण, अनुसंधान और विकास, औद्योगिक सुरक्षा युक्तियों और ऐसी अन्य मदों की लागत को, जो अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, अपवर्जित कर दिया जाएगा ।

स्पष्टीकरण 2-यह स्पष्ट किया जाता है कि उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 29ख के उपबंध, इस धारा की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) और उपखंड (ii) में विनिर्दिष्ट उद्यमों को लागू होंगे ।

(2) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा एक सलाहकार समिति का गठन करेगी जो निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्ः-

(क) लघु और मध्यम उद्यमों का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले केन्द्रीय सरकार के मंत्रालय या विभाग में भारत सरकार का सचिव जो पदेन अध्यक्ष होगा;

(ख) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों से संबंधित विषयों में आवश्यक विशेषज्ञता रखने वाले केन्द्रीय सरकार के पांच से अनधिक अधिकारी, सदस्य, पदेन;

(ग) राज्य सरकारों के तीन से अनधिक प्रतिनिधि, सदस्य, पदेन; और

(घ) सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के प्रत्येक संगम का एक प्रतिनिधि, सदस्य, पदेन ।

(3) बोर्ड का सदस्य-सचिव सलाहकार समिति का पदेन सदस्य-सचिव भी होगा ।

(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन उद्यमों के किन्हीं वर्ग या वर्गों को वर्गीकृत करने से पूर्व सलाहकार समिति की सिफारिशें अभिप्राप्त करेगी ।

(5) सलाहकार समिति, धारा 5 में निर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में बोर्ड द्वारा इसे निर्दिष्ट विषयों की परीक्षा करेगी और बोर्ड को अपनी सिफारिशें देगी ।

(6) केन्द्रीय सरकार अध्याय 4 की धारा 9, धारा 10, धारा 11, धारा 12 या धारा 14 में विनिर्दिष्ट किसी विषय पर सलाहकार समिति से भी सलाह ले सकेगी ।

(7) राज्य सरकार धारा 30 के अधीन बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट किसी विषय पर सलाहकार समिति से सलाह ले सकेगी ।

(8) सलाहकार समिति, निम्नलिखित विषयों पर विचार करने के पश्चात्, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या बोर्ड को अपनी सिफारिशें या सलाह संसूचित करेगी, अर्थात्ः-

(क) उद्यमों के किसी वर्ग या वर्गों में नियोजन का स्तर;

(ख) उद्यमों के किसी वर्ग या वर्गों में संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर में विनिधानों का स्तर;

(ग) उद्यमों के किसी वर्ग या वर्गों के प्रौद्योगिकी उन्नयन के लिए संयंत्र और मशीनरी या उपस्कर में उच्चतर विनिधान, नियोजन के सृजन और बढ़ाई गई प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता;

(घ) सूक्ष्म, लघु या मध्यम उद्यमों में उद्यमता के संवर्धन और विस्तार करने की संभाव्यता;

(ङ) लघु और मध्यम उद्यमों के वर्गीकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक ।

(9) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 11ख और खादी और ग्रामोद्योग आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 61) की धारा 2 के खंड (ज) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन उद्यमों के किसी वर्ग या वर्गों को वर्गीकृत करते समय, विनिधान के मानदंड में समय-समय पर फेरफार कर सकेगी और उद्यमों के नियोजन या आवर्त के संबंध में मानदंड या मानकों  पर भी विचार कर सकेगी तथा ऐसे वर्गीकरण में सूक्ष्म या छोटे उद्यमों या ग्राम उद्यमों को लघु उद्यमों के भाग के रूप में सम्मिलित कर सकेगी ।

8. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का ज्ञापन-(1) कोई व्यक्ति, जो- 

(क) अपने विवेकानुसार कोई सूक्ष्म या लघु उद्यम, या

(ख) अपने विवेकानुसार सेवाएं उपलब्ध कराने या देने में लगा हुआ कोई मध्यम उद्यम; अथवा

(ग) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी उद्योग से संबंधित माल के विनिर्माण या उत्पादन में लगा हुआ कोई मध्यम उद्यम,

स्थापित करने का आशय रखता हो, ऐसे प्राधिकारी के पास, जो उपधारा (4) के अधीन राज्य सरकार द्वारा या उपधारा (3) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, यथास्थिति, सूक्ष्म, लद्यु या मध्यम उद्यम का ज्ञापन फाइल करेगा:

परंतु कोई व्यक्ति, जिसने इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व-

(क) कोई लघु उद्योग स्थापित किया है और उसने स्वविकेकानुसार रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्राप्त किया है; और 

(ख) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट एक करोड़ रुपए से अधिक किन्तु दस करोड़ रुपए से अनधिक के संयंत्र और मशीनरी में विनिधान वाले किसी उद्योग से संबंधित माल के विनिर्माण या उत्पादन में लगा कोई उद्योग स्थापित किया है और उसने भारत सरकार के तत्कालीन उद्योग मंत्रालय (औद्योगिक विकास विभाग) की अधिसूचना सं० का० आ० 477(अ), तारीख 25 जुलाई, 1991 के अनुसरण में कोई औद्योगिक उद्यम ज्ञापन फाइल किया था,

इस अधिनियम के प्रारंभ से एक सौ अस्सी दिन के भीतर, इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ज्ञापन फाइल करेगा ।

(2) ज्ञापन का प्ररूप, उसे फाइल करने की प्रक्रिया और उससे आनुषंगिक अन्य विषय वे होंगे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त सलाहकार समिति की सिफारिशों को अभिप्राप्त करने के पश्चात् अधिसूचित किए जाएं ।

(3) वह प्राधिकारी, जिसके पास किसी मध्यम उद्यम द्वारा ज्ञापन फाइल किया जाएगा, ऐसा होगा जो केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।

(4) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा उस प्राधिकारी को विनिर्दिष्ट करेगी, जिसके पास कोई सूक्ष्म या लघु उद्यम ज्ञापन फाइल कर सकेगा ।

(5) उपधारा (3) और उपधारा (4) के अधीन विनिर्दिष्ट प्राधिकारी, इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित प्रक्रिया का पालन करेंगे ।

अध्याय 4

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की प्रतिस्पर्धा के संवर्धन, विकास और वृद्धि के उपाय

9. संवर्धन और विकास के उपाय-केन्द्रीय सरकार, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के विशिष्ट रूप से सूक्ष्म और लघु उद्यमों में, कर्मचारियों, प्रबंध तंत्र और उद्यमियों में कार्यकौशल के विकास, पिछड़े और उन्नत संयोजनों को सुदृढ़ करने की दृष्टि से ऐसे उद्यमों में विपणन सहायता या अवसंरचनात्मक सुविधाओं और उनके सामूहिक विकास की प्रौद्योगिक उन्नति के लिए व्यवस्था करके उनके संवर्धन और विकास को सुकर बनाने के तथा उनकी प्रतिस्पर्धा में वृद्धि करने के प्रयोजनों के लिए, समय-समय पर, अधिसूचना द्वारा ऐसे कार्यक्रम, मार्गदर्शी सिद्धांत या अनुदेश विनिर्दिष्ट कर सकेगी, जो वह ठीक समझे ।

10. उधार सुविधाएं-सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को उधार देने के संबंध में नीतियां और पद्धतियां प्रगामी और ऐसी होंगी, जो रिजर्व बैंक द्वारा, ऐसे उद्यमों को उधार के समय पर और सुचारू प्रवाह, उनके बीच रुग्णता के संपात को कम करने और ऐसे उद्यमों की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए, समय-समय पर, रिजर्व बैंक द्वारा, जारी किए गए मार्गदर्शक सिद्धांतों या अनुदेशों में विनिर्दिष्ट की जाएं ।

11. उपापन अधिमान नीति-सूक्ष्म और लघु उद्यमों के संवर्धन और विकास को सुकर बनाने के लिए केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार, समय-समय पर, आदेश द्वारा, ऐसे माल और सेवाओं के, जिनका सूक्ष्म और लघु उद्यमों द्वारा, यथास्थिति, उसके मंत्रालयों या विभागों या उसकी सहायता प्राप्त संस्थाओं और पब्लिक सेक्टर उद्यमों द्वारा उत्पादन और व्यवस्था की गई हो, उपापन के संबंध में, अधिमानी नीतियां, अधिसूचित कर सकेगी ।

12. निधियां-अधिसूचना द्वारा ऐसे नाम से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ज्ञात होने वाली एक या अधिक निधियां गठित की जा सकेंगी और उनमें धारा 13 के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा किए गए कोई अनुदान जमा किए जाएंगे ।

13. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केंद्रीय सरकार, संसद् की विधि द्वारा इस निमित्त सम्यक् विनियोग करने के पश्चात्, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अनुदानों के रूप में निधि या निधियों में ऐसी धनराशियां, जमा कर सकेगी, जिन्हें वह सरकार प्रदान करने के लिए आवश्यक समझे ।

 14. निधि या निधियों का प्रशासन और उपयोग-(1) केंद्रीय सरकार को उस रीति में, जो विहित की जाए, निधि या निधियों का प्रशासन करने की शक्ति होगी ।

(2) निधि या निधियों का उपयोग अनन्य रूप से धारा 9 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट उपायों के लिए किया जाएगा ।

(3) केंद्रीय सरकार उस मानदंड के अनुसार, जो विहित किया जाए, राशियों के समन्वय और समय पर उपयोग तथा निर्मोचन को सुनिश्चित करने के लिए उत्तरदायी होगी ।

अध्याय 5

सूक्ष्म और लघु उद्यमों को विलंबित संदाय

15. संदाय करने का क्रेता का दायित्व-जहां कोई प्रदायकर्ता, किसी क्रेता को किसी माल का प्रदाय करता है या कोई सेवा देता है, वहां क्रेता अपने और प्रदायकर्ता के बीच लिखित रूप में करार पाई गई तारीख को या उसके पूर्व अथवा जहां इस निमित्त कोई करार नहीं है, वहां नियत दिन के पूर्व, उसके लिए संदाय करेगा:

परन्तु किसी भी दशा में, प्रदायकर्ता और क्रेता के बीच लिखित रूप में करार पाई गई अवधि, स्वीकृति की तारीख या समझी गई स्वीकृति की तारीख से पैंतालीस दिन से अधिक नहीं होगी ।

16. वह तारीख जिससे और वह दर जिस पर ब्याज संदेय है-जहां कोई क्रेता प्रदायकर्ता को धारा 15 की अपेक्षानुसार रकम का संदाय करने में असफल रहता है, वहां क्रेता, अपने और प्रदायकर्ता के बीच किसी करार में या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी प्रदायकर्ता को, यथास्थिति, नियत दिन से या करार पाई गई तारीख के ठीक बाद की तारीख से उस रकम पर रिजर्व बैंक द्वारा अधिसूचित बैंक दर पर मासिक अवशेष के साथ तीन गुणा चक्रवृद्धि ब्याज का संदेय करने के लिए दायी होगा । 

17. देय रकम की वसूली-क्रेता, प्रदायकर्ता द्वारा प्रदाय किए गए किसी माल या दी गई सेवाओं के लिए धारा 16 के अधीन यथा उपबंधित ब्याज सहित रकम का संदाय करने का दायी होगा । 

18. सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् को निर्देश-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी किसी विवाद का कोई पक्षकार धारा 17 के अधीन देय किसी रकम के संबंध में सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् को निर्देश कर सकेगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन कोई निर्देश प्राप्त होने पर, परिषद् या तो स्वयं मामले में सुलह कार्य करेगी या ऐसी किसी संस्था या केन्द्र से सहायता लेगी जो ऐसी किसी संस्था या केन्द्र को ऐसा सुलह कार्य करने संबंधी निर्देश करके आनुकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं उपलब्ध कराती हो और माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (1996 का 26) की धारा 65 से धारा 81 के उपबंध ऐसे विवाद को ऐसे लागू होंगे मानो सुलह उस अधिनियम के भाग 3 के अधीन आरंभ की गई हो ।

(3) जहां उपधारा (2) के अधीन आरंभ की गई सुलह सफल नहीं होती है और पक्षकारों के बीच कोई समझौता हुए बिना समाप्त हो गई है वहां परिषद् या तो विवाद पर स्वयं माध्यस्थम् कार्रवाई करेगी या उसे ऐसे माध्यस्थम् के लिए आनुकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं उपलब्ध कराने वाली किसी संस्था या केन्द्र को निर्दिष्ट करेगी और तब माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (1996 का 26) के उपबंध ऐसे विवाद को ऐसे लागू होंगे मानो वह उस अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी माध्यस्थम् करार के अनुसरण में हो ।

(4) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् या आनुकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं उपलब्ध कराने वाली किसी संस्था या केन्द्र को उसकी अधिकारिता के भीतर अवस्थित प्रदायकर्ता और भारत में किसी भी स्थान पर अवस्थित क्रेता के मध्य किसी विवाद में इस धारा के अधीन मध्यस्थ या सुलहकर्ता के रूप में कार्य करने की अधिकारिता होगी ।

(5) इस धारा के अधीन किए गए प्रत्येक निर्देश का विनिश्चय ऐसा निर्देश किए जाने की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर किया जाएगा ।

19. डिक्री, पंचाट या आदेश अपास्त करने के लिए आवेदन-(1) परिषद् द्वारा स्वयं या आनुकल्पिक विवाद समाधान सेवाएं उपलब्ध कराने वाली किसी ऐसी संस्था या केन्द्र द्वारा, जिसे परिषद् द्वारा निर्देश किया गया है, पारित की गई किसी डिक्री, पंचाट या अन्य आदेश को अपास्त करने के लिए कोई आवेदन किसी न्यायालय द्वारा तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि अपीलार्थी (जो प्रदायकर्ता नहीं है) ने ऐसे न्यालालय द्वारा निदेशित रीति में, यथास्थिति, डिक्री, पंचाट या अन्य आदेश के निबंधनानुसार उस रकम का पचहत्तर प्रतिशत उसके पास जमा न कर दिया हो :

परंतु डिक्री, पंचाट या आदेश को अपास्त करने संबंधी आवेदन का निपटारा लंबित रहने तक न्यायालय यह आदेश करेगा कि जमा की गई रकम की ऐसी प्रतिशतता का जो वह मामले की परिस्थितियों में ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो वह अधिरोपित करना आवश्यक समझे, युक्तियुक्त विचार करे और प्रदायकर्ता को संदाय किया जाएगा ।

20. सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् की स्थापना-राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसे स्थानों पर ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए और ऐसे क्षेत्रों के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, एक या अधिक सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् की स्थापना करेगी ।

21. सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् की संरचना-(1) सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् ऐसे तीन से अन्यून, किंतु पांच से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी, जो निम्नलिखित प्रवर्गों में से नियुक्त किए जाएंगे, अर्थात्ः-

(i) यथास्थिति, लघु उद्योगों या सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों का प्रशासनिक नियंत्रण रखने वाले राज्य सरकार के विभाग में उद्योग निदेशक, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, या ऐसे अन्य अधिकारी, जो ऐसे निदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो; और

(ii) राज्य में सूक्ष्म या लघु उद्योग अथवा उद्यमों के संगमों के एक या अधिक पदाधिकारी या प्रतिनिधि; और

(iii) सूक्ष्म या लघु उद्यमों को उधार देने वाले बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के एक या अधिक प्रतिनिधि; और

(iv) उद्योग, वित्त, विधि, व्यापार या वाणिज्य के क्षेत्र में विशेष ज्ञान रखने वाले एक या अधिक व्यक्ति । 

(2) उपधारा (1) के खंड (i) के अधीन नियुक्त व्यक्ति सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् का अध्यक्ष होगा ।

(3) सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् की संरचना, उसके सदस्यों में रिक्तियां भरे जाने की रीति और सदस्यों द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया वह होगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।

22. वार्षिक लेखा विवरण में ब्याज सहित असंदत्त रकम विनिर्दिष्ट करने की अपेक्षा-जहां किसी क्रेता से, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन अपने वार्षिक लेखाओं की संपरीक्षा करवाने की अपेक्षा की जाती है, वहां ऐसा क्रेता अपने वार्षिक लेखा के विवरण में निम्नलिखित अतिरिक्त जानकारी देगा, अर्थात्ः-

(i) किसी प्रदायकर्ता को प्रत्येक लेखा वर्ष के अंत में शेष असंदत्त मूल रकम और उस पर देय ब्याज (पृथक् रूप से दर्शित किया जाएगा);

(ii) प्रत्येक लेखा वर्ष के दौरान नियत दिन के पश्चात् प्रदायकर्ता को किए गए संदाय की रकम सहित धारा 16 के निबंधनों के अनुसार क्रेता द्वारा संदत्त ब्याज की रकम;

(iii) संदाय करने में हुए विलंब की अवधि के लिए देय और संदेय ब्याज की रकम (जिसका संदाय वर्ष के दौरान किंतु नियत दिन के पश्चात् किया गया है) किंतु इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट ब्याज जोड़े बिना; 

(iv) ऐसे ब्याज की रकम, जो प्रत्येक लेखा वर्ष के अंत में प्रोद्भूत और असंदत्त रह गई रकम; और

(v) धारा 23 के अधीन कटौती योग्य खर्च के रूप में नामंजूर करने के प्रयोजन के लिए ऐसी अतिरिक्त ब्याज की रकम जो पश्चात्वर्ती वर्षों में भी ऐसी तारीख तक जब तक यथा उपरोक्त देय ब्याज का वस्तुतः लघु उद्यम को संदाय नहीं कर दिया जाता, देय और संदेय रह गई है । 

23. ब्याज का आय से कटौती के रूप में अनुज्ञात किया जाना-आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) में किसी बात के होते हुए भी, किसी क्रेता द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन या उसके अनुसार संदेय या संदत्त ब्याज की रकम, आय-कर अधिनियम, 1961 के अधीन आय की संगणना करने के प्रयोजन के लिए कटौती के रूप में अनुज्ञात नहीं की जाएगी ।

24. अध्यारोही प्रभाव-धारा 15 से धारा 23 तक के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में उससे अंसगत किसी बात के होते भी, प्रभावी होंगे ।

25. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के कारबार की बंदी के लिए स्कीम-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार किसी ऐसे सूक्ष्म, लघु या मध्यम उद्यम द्वारा, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत कंपनी नहीं है, कारबार बंद करने को सुकर बनाने की दृष्टि से इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से एक वर्ष के भीतर एक स्कीम अधिसूचित कर सकेगी ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

26. अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार ऐसे पदनामों वाले उतने अधिकारियों और उतने अन्य कर्मचारियों को, जितने वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ठीक समझे, नियुक्त कर सकेगी और उन्हें इस अधिनियम के अधीन ऐसी शक्तियां और कृत्य सौंप सकेगी, जो वह ठीक समझे ।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त अधिकारी, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आदेश द्वारा, किसी व्यक्ति से ऐसे प्ररूप में, ऐसी जानकारी देने की अपेक्षा कर सकेंगे, जो विहित की जाए ।

27. धारा 8 या धारा 22 या धारा 26 के उल्लंघन के लिए शास्ति-(1) जो कोई धारा 8 की उपधारा (1) या धारा 26 की उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी उपबंध का साशय उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयत्न करेगा अथवा उल्लंघन के लिए दुष्प्ररेण करेगा, वह-

(क) प्रथम उल्लंघन की दशा में ऐसे जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा; और

(ख) द्वितीय या पश्चात्वर्ती उल्लंघन की दशा में, ऐसे जुर्माने से, जो एक हजार रुपए से कम का न होगा किंतु दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

(2) जहां कोई क्रेता धारा 22 के उपबंधों का उल्लंघन करता है वहां वह ऐसे जुर्माने से, जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा, दंडनीय होगा ।

28. न्यायालयों की अधिकारिता-किसी महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

29. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-

(क) बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियां भरने की रीति और धारा 3 की उपधारा (4) के अधीन बोर्ड के सदस्यों द्वारा कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;

(ख) धारा 6 के अधीन सदस्य-सचिव की शक्तियां और कृत्य;

(ग) वह रीति, जिसमें धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन निधि प्रशासित की जा सकेगी;

(घ) वह मानदंड जिस पर धारा 14 की उपधारा (3) के अधीन रकमें निर्मोचित की जा सकेंगी;

(ङ) धारा 26 की उपधारा (2) के अधीन दी जाने वाली जानकारी और वह प्ररूप, जिसमें वह दी जाएगी; और

(च) ऐसा कोई अन्य विषय, जिसे इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए ।

(3) धारा 9 के अधीन जारी प्रत्येक अधिसूचना और इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन अधिसूचना या नियम अथवा दोनों में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना या नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसी अधिसूचना या नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस अधिसूचना या नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

30. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति-(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टता और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः-

(क) सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् की संरचना, सदस्यों की रिक्तियों को भरने की रीति और धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन सूक्ष्म और लघु उद्यम सुकरीकरण परिषद् के सदस्यों द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;

(ख) कोई अन्य विषय, जिसे इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

(3) इस धारा के अधीन बनाया गया नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, जहां राज्य विधान-मंडल के दो सदन हैं, वहां प्रत्येक सदन के समक्ष और जहां राज्य विधान-मंडल का एक सदन है, वहां उस सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

31. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:

परंतु इस धारा के अधीन कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा । 

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

32. अधिनियम का निरसन-(1) लघु और आनुषंगिक औद्योगिक उपक्रमों को विलंबित संदाय पर ब्याज अधिनियम, 1993 (1993 का 32) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन इस प्रकार निरसित किए गए अधिनियम के अधीन की गई कोई बात या कोई कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थायी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

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