स्मिथ, स्टैनीस्ट्रीट एण्ड कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का
अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1977
(1977 का अधिनियम संख्यांक 41)
[17 दिसम्बर, 1977]
लोकहित में मैसर्स स्मिथ, स्टैनीस्ट्रीट एण्ड कम्पनी लिमिटेड,
कलकत्ता के उपक्रमों के अधिकार, हक और हित के अर्जन
और अन्तरण का तथा उससे सम्बन्धित या
उसके आनुषंगिक विषयों का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
मैमर्स स्मिथ, स्टैनीस्ट्रीट एण्ड कम्पनी लिमिटेड, कलकत्ता जनता की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक भेषजों और रसायनों के विनिर्माण और वितरण में लगी हुई थी ;
और कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध ऐसी रीति से किया जा रहा था जो लोकहित के लिए अत्यधिक अहितकर था और जिससे कम्पनी को भारी हानि हुई थी ;
और कम्पनी का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार ने उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18क के अधीन ग्रहण कर लिया था;
और कम्पनी के उपक्रमों के पुनर्गठन और पुनरुद्वार के प्रयोजन के लिए, जिससे कि उक्त कम्पनी द्वारा उत्पादित विभिन्न प्रकार की आवश्यक भेषजों और रसायनों के संवर्धन और वितरण द्वारा जनसाधरण का हित साधन हो और उनका निरन्तर प्रदाय सुनिश्चित करने के लिए, यह आवश्यक है कि मैसर्स स्मिथ, स्टैनीस्ट्रीट एण्ड कम्पनी लिमिटेड, कलकत्ता के उपक्रमों के अधिकार, हक और हित का अर्जन कर लिया जाए;
अतः भारत गणराज्य के अट्ठाईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम स्मिथ, स्टैनीस्ट्रीट एण्ड कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1977 है ।
(2) यह 1 अक्तूबर, 1977 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से 1 अक्तूबर, 1977 अभिप्रेत है;
(ख) कम्पनी" से स्मिथ, स्टैनीस्ट्रीट एण्ड कम्पनी लिमिटेड अभिप्रेत है जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित एक कम्पनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय 18, कान्वेण्ट रोड, कलकत्ता-700014 में है;
(ग) आयुक्त" से धारा 14 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है;
(घ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(च) विनिर्दिष्ट तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के प्रयोजनों के लिए, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी ;
(छ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं;
अध्याय 2
कम्पनी के उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण
3. कम्पनी के उपक्रमों का केन्द्रीय सरकार को अन्तरण और उनका उसमें निहित होना-नियत दिन से कम्पनी के उपक्रम और उपक्रमों के सम्बन्ध में कम्पनी के अधिकार, हक और हित, इस अधिनियम के आधार पर, केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) कम्पनी के उपक्रमों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अन्तर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, पट्टाधृतियां, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार और सभी स्थावर तथा जंगम सम्पत्ति, जिसके अन्तर्गत भूमि, भवन, कर्मशालाएं, स्टोर, उपकरण, मशीनरी और उपस्कर, रोकड़ बाकी, हाथ की रोकड़, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा बही ऋण और ऐसी सम्पत्ति में या उससे उद्भूत होने वाले अन्य अधिकार और हित हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व कम्पनी के कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में, चाहे भारत में या भारत के बाहर, थे और तत्सम्बन्धी सभी लेखा बहियां, रजिस्टर और अन्य सभी प्रकार की दस्तावेजें भी हैं ।
(2) यथापूर्वोक्त समस्त सम्पत्ति, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई हैं, ऐसे निहित होने के बल पर, किसी भी न्यास, बाध्यता, बंधक, भार, धारणाधिकार और उसे प्रभावित करने वाले सभी अन्य विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएगी और किसी न्यायालय की कोई कुर्की, व्यादेश, डिक्री या आदेश को, जो ऐसी सम्पत्ति के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बन्धित करे, या ऐसी सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग की बाबत रिसीवर नियुक्त करे, वापस ले लिया गया समझा जाएगा ।
(3) किसी ऐसे सम्पत्ति का जो इस अधिनियम के अधीन, केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, प्रत्येक बन्धकदार और किसी ऐसी सम्पत्ति में या उसके संबंध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे समय के अन्दर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ऐसे बन्धक, भार, धारणाधिकार और अन्य हित की सूचना आयुक्त को देगा ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी सम्पत्ति का बंधकदार या ऐसी किसी सम्पत्ति में या उसके संबंध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति, धारा 7 में विनिर्दिष्ट रकम में से और धारा 8 के अधीन अवधारित धन में से भी, बंधक धन या अन्य शोध्य रकम के पूर्णतः या भागतः संदाय के लिए अपने अधिकारों और हितों के अनुसार दावा करने का हकदार होगा किन्तु ऐसा कोई बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित किसी ऐसी सम्पत्ति के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है ।
(5) यदि नियत दिन को, किसी सम्पत्ति के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध कोई वाद, अपील या किसी भी प्रकार की अन्य कार्यवाही लंबित है तो कम्पनी के उपक्रमों के अन्तरण या इस अधिनियम की किसी बात के कारण, उसका उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी रूप में प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी या प्रवर्तित की जा सकेगी ।
5. पूर्व दायित्वों के लिए केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी का दायी न होना-(1) नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि के संबंध में कम्पनी का प्रत्येक दायित्व, कम्पनी का दायित्व होगा और उसी के विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा, न कि केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध, या जहां कम्पनी के उपक्रम, धारा 6 के अधीन किसी सरकारी कम्पनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं, वहां सरकारी कम्पनी के विरुद्ध ।
(2) शंकाओं को दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि,-
(क) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत अपने उपक्रमों के सम्बन्ध में कम्पनी का कोई दायित्व, केन्द्रीय सरकार या जहां कम्पनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी सरकारी कम्पनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं, वहां उस सरकारी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा;
(ख) कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण का कोई अधिनिर्णय, डिक्री या आदेश, जो नियत दिन के पूर्व उत्पन्न हुए किसी ऐसे मामले, दावे या विवाद के बारे में, नियत दिन के पश्चात् पारित किया गया है, केन्द्रीय सरकार या जहां कम्पनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी सरकारी कम्पनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं, वहां सरकारी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा;
(ग) तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबन्ध का नियत दिन के पूर्व किए गए उल्लंघन के लिए कम्पनी का कोई दायित्व केन्द्रीय सरकार या जहां कम्पनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी सरकारी कम्पनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं, वहां सरकारी कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा ।
6. कम्पनी के उपक्रमों को सरकारी कम्पनी में निहित करने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि कोई सरकारी कम्पनी ऐसे निबन्धनों और शर्तों का, जिन्हें अधिरोपित करना केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, अनुपालन करने के लिए रजामन्द है या उसने उनका अनुपालन कर दिया है, तो वह अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि कम्पनी के उपक्रम और कम्पनी के उन उपक्रमों के सम्बन्ध में, जो धारा 3 के अधीन उस सरकार में निहित हो गए हैं, उसके अधिकार, हक और हित, केन्द्रीय सरकार में निहित बने रहने के बजाय या तो अधिसूचना की तारीख को या उससे पहले या बाद की ऐसी तारीख को (जो नियत दिन से पूर्व की तारीख न हो) जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उस सरकारी कम्पनी में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में उसके अधिकार, हक और हित, उपधारा (1) के अधीन सरकारी कम्पनी में निहित हो जाते हैं, वहां वह सरकारी कम्पनी ऐसे निहित होने की तारीख से ही, ऐसे उपक्रमों के सम्बन्ध में स्वामी समझी जाएगी और ऐसे उपक्रमों के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार के समस्त अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, उस सरकारी कम्पनी के क्रमशः अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
अध्याय 3
रकमों का संदाय
7. रकम का संदाय-केन्द्रीय सरकार, कम्पनी के उपक्रमों और ऐसे उपक्रमों के सम्बन्ध में उसके अधिकार, हक और हित धारा 3 के अधीन केंद्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित होने के लिए तीन करोड़ चौहत्तर हजार रुपए की रकम कम्पनी को नकद और अध्याय 6 में विनिर्दिष्ट रीति से, देगी ।
8. अतिरिक्त रकम का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, कम्पनी को उसके उपक्रमों के प्रबन्ध से उसे वंचित किए जाने के लिए, दस हजार रुपए प्रति वर्ष की दर से संगणित रकम उस तारीख से प्रारंभ होकर, जिसको कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण किया गया था, नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, देगी ।
(2) धारा 7 में निर्दिष्ट रकम और उपधारा (1) के अधीन अवधारित रकम पर, चार प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज, नियत दिन से प्रारम्भ होकर उस तारीख को, जिसको ऐसी रकम का संदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि के लिए दिया जाएगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) और (2) के उपबन्धों के अनुसार अवधारित रकम कम्पनी को उस रकम के अतिरिक्त देगी जो धारा 7 में विनिर्दिष्ट है ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कम्पनी के उन उपक्रमों के सम्बन्ध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, दायित्वों का निर्वहन धारा 7 में निर्दिष्ट रकम से और उपधारा (1) और (2) के अधीन अवधारित रकम से भी, कम्पनी के लेनदारों के अधिकारों और हितों के अनुसार, किया जाएगा ।
अध्याय 4
कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध, आदि
9. कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध, आदि-(1) कम्पनी के किन्हीं उपक्रमों के, जिनके सम्बन्ध में अधिकार, हक और हित धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन, नियन्त्रण और प्रबन्ध,-
(क) जहां केन्द्रीय सरकार ने धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया है वहां, उस निदेश में विनिर्दिष्ट सरकारी कम्पनी में निहित होगा; या
(ख) जहां केन्द्रीय सरकार ने ऐसा कोई निदेश नहीं दिया है, वहां उपधारा (2) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त एक या अधिक अभिरक्षकों में निहित होगा,
और तब, यथास्थिति, इस प्रकार विनिर्दिष्ट सरकारी कम्पनी या इस प्रकार नियुक्त अभिरक्षक ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग करने का और ऐसे सभी कार्य करने का हकदार होगा जिन शक्तियों का प्रयोग करने और जिन कार्यों को करने के लिए कम्पनी अपने उपक्रमों के सम्बन्ध में प्राधिकृत हे ।
(2) केन्द्रीय सरकार एक या अधिक व्यक्तियों को या किसी सरकारी कम्पनी को कम्पनी के ऐसे उपक्रमों का अभिरक्षक नियुक्त कर सकेगी जिनके सम्बन्ध में धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन उसने कोई निदेश नहीं दिया है ।
10. कम्पनी के उपक्रमों के प्रबन्ध के भारसाधक व्यक्तियों का सभी आस्तियां आदि परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध किसी सरकारी कम्पनी में निहित हो जाने पर या अभिरक्षक की नियुक्ति हो जाने पर, ऐसे निहित होने या ऐसी नियुक्ति के ठीक पहले ऐसी कम्पनी के उपक्रमों के प्रबन्ध के भारसाधक सभी व्यक्ति, यथास्थिति, सरकारी कम्पनी या अभिरक्षक को कम्पनी के उपक्रमों से सम्बन्धित सभी आस्तियां, लेखा बहियां, रजिस्टर या अन्य दस्तावेजें जो उनकी अभिरक्षा में हैं, परिदत्त करने के लिए आबद्ध होंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार, सरकारी कम्पनी या अभिरक्षक को उसकी शक्तियों और कर्तव्यों के बारे में ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह मामले की परिस्थितियों में वांछनीय समझे और सरकारी कम्पनी या अभिरक्षक भी, यदि वह चाहे तो, केन्द्रीय सरकार को किसी भी समय उस रीति के बारे में, जिसमें कम्पनी के उपक्रमों का प्रबन्ध उसके द्वारा संचालित किया जाएगा या किसी अन्य ऐसे विषय के बारे में जो ऐसे प्रबन्ध के दौरान उद्भूत हो, अनुदेश देने के लिए आवेदन कर सकता है ।
(3) अभिरक्षक कम्पनी के उपक्रमों की निधियों में से उतना पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जितना केन्द्रीय सरकार नियत करे और केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।
11. लेखा और लेखा-परीक्षा-कम्पनी के उपक्रमों का अभिरक्षक कम्पनी के उपक्रमों का लेखा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रखेगा जो विहित की जाए, और कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबन्ध इस प्रकार रखे गए लेखाओं की लेखापरीक्षा को वैसे ही लागू होंगे जैसे कि वे कम्पनी के लेखाओं की लेखापरीक्षा को लागू होते हैं ।
अध्याय 5
कम्पनी के कर्मचारियों के बारे में उपबन्ध
12. कर्मचारियों के नियोजन का जारी रहना-प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व कम्पनी द्वारा उसके उपक्रमों के संबंध में नियोजित रहा है, नियत दिन से ही, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार का या धारा 6 में निर्दिष्ट सरकारी कम्पनी का कर्मचारी हो जाएगा और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी में वैसे ही पारिश्रमिक पर और वैसे ही निबंधनों तथा शर्तों पर, और पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद या सेवा धारण करेगा जो उसे तब अनुज्ञेय होते जब ऐसा निधान न हुआ होता और वह तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी के अधीन उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक उसका पारिश्रमिक, सेवा के निबंधन और शर्तें, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर देती ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कम्पनी के उपक्रमों में नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अन्तरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा कोई न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण ग्रहण नहीं करेगा ।
13. भविष्य निधि और अन्य निधियां-(1) जहां कम्पनी ने, कम्पनी के उपक्रमों में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य-निधि, अधिवार्षिकी-निधि, कल्याण-निधि या अन्य निधि स्थापित की है वहां ऐसे कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन अन्तरित हो गई है, संबंधित धनराशियां ऐसी भविष्य-निधि, अधिवार्षिकी-निधि, कल्याण-निधि या अन्य निधि में नियत दिन को जमा धनराशियों में से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगी ।
(2) उन धनराशियों के संबंध में, जो उपधारा (1) के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी को अन्तरित हो जाती हैं, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी ऐसी रीति से कार्रवाई करेगी जो विहित की जाए ।
अध्याय 6
संदाय आयुक्त
14. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 7 और धारा 8 के अधीन कम्पनी को संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा संदाय आयुक्त नियुक्त करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार आयुक्त की सहायता के लिए ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे, और तब आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से एक या अधिक को भी इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी या किसी शक्ति का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जा सकेगा ।
(3) कोई व्यक्ति, जो किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए आयुक्त द्वारा प्राधिकृत किया गया है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उनका वही प्रभाव होगा मानो वे उस व्यक्ति को सीधे इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदान की गई हैं प्राधिकार रूप में प्राप्त नहीं हुई हैं ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे ।
15. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार कम्पनी को संदाय करने के लिए आयुक्त को, विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के अन्दर, निम्नलिखित रकमें नकद देगी: -
(क) धारा 7 में विनिर्दिष्ट रकम के बराबर रकम, और
(ख) धारा 8 के अधीन कम्पनी को संदेय रकम के बराबर रकम ।
(2) केन्द्रीय सरकार भारत के लोक खाते में आयुक्त के नाम एक निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई प्रत्येक रकम उक्त खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकम पर प्रोद्भूत होने वाला ब्याज उक्त खाते के लिए काम आएगा ।
16. केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी की कुछ शक्तियां-(1) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी, नियत दिन के पश्चात् वसूल किया गया ऐसा कोई धन, जो कम्पनी को, अपने उन उपक्रमों के संबंध में शोध्य है जो केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी में निहित हो गए हैं, अन्य सभी व्यक्तियों का अपवर्जन करके, विनिर्दिष्ट तारीख तक प्राप्त करने की हकदार इस बात के होते हुए भी होगी कि ऐसी वसूली नियत दिन के पूर्व की अवधि से संबंधित है ।
(2) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी आयुक्त को ऐसे प्रत्येक संदाय के संबंध में दावा कर सकेगी जो नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि के संबंध में कम्पनी के किसी दायित्व का उन्मोचन करने के लिए केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी ने नियत दिन के पश्चात् किया है और ऐसे प्रत्येक दावे को उन पूर्विकताओं के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी जो उस विषय को इस अधिनियम के अधीन प्राप्त है, जिसके संबंध में ऐसे दायित्व का उन्मोचन केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा किया गया है ।
(3) इस अधिनियम में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, नियत दिन के पूर्व के किसी संव्यवहार के संबंध में कम्पनी के ऐसे दायित्व, जिनका विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व उन्मोचन नहीं किया गया है, कम्पनी के दायित्व होंगे ।
17. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना-प्रत्येक व्यक्ति, जिसका कम्पनी के विरुद्ध कोई दावा है, ऐसा दावा विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के अन्दर आयुक्त के समक्ष करेगा:
परन्तु यदि आयुक्त का समाधान हो जाता है कि दावेदार पर्याप्त कारण से तीस दिन की उक्त अवधि के अन्दर दावा करने से निवारित रहा था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के अन्दर दावा ग्रहण कर सकेगा किन्तु उसके पश्चात् नहीं ।
18. दावों की पूर्विकता-अनुसूची में विनिर्दिष्ट विषयों से उद्भूत होने वाले दावों को निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी, अर्थात्: -
(क) प्रवर्ग ख्र् को अन्य सभी प्रवर्गों पर अग्रता दी जाएगी और प्रवर्ग ख्र्ख्र् को प्रवर्ग ख्र्ख्र्ख्र् पर अग्रता दी जाएगी, और इसी प्रकार आगे भी;
(ख) प्रत्येक वर्ग में विनिर्दिष्ट दावे समान पंक्ति के होंगे और पूर्णतः संदत्त किए जाएंगे किन्तु यदि रकम ऐसे दावों को पूर्णतः चुकाने के लिए अपर्याप्त है तो वे आनुपातिक रूप में कम कर दिए जाएंगे और तदनुसार संदत्त किए जाएंगे;
(ग) किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट विषय की बाबत किसी दायित्व के उन्मोचन का प्रश्न केवल तब उठेगा जब उसके ठीक उच्चतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट सभी दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अधिशेष रह जाए ।
19. दावों की परीक्षा-(1) आयुक्त, धारा 17 के अधीन किए गए दावों की प्राप्ति पर, उन्हें अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकता के अनुसार कम्रबद्ध करेगा और उक्त पूर्विकता क्रम से उनकी परीक्षा करेगा ।
(2) यदि दावों की परीक्षा करने पर आयुक्त की यह राय है कि इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त रकम किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावों को चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह ऐसे निम्नतर प्रवर्ग की बाबत दायित्वों की परीक्षा करे ।
20. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) अनुसूची में उपवर्णित पूर्विकता के प्रति निर्देश से दावों की परीक्षा करने के पश्चात्, आयुक्त, ऐसी कोई तारीख नियत करेगा जिसको या जिससे पूर्व प्रत्येक दावेदार अपने दावे का सबूत फाइल करेगा अन्यथा उसे आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरणों के फायदे से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(2) इस प्रकार नियत की गई तारीख के बारे में कम से कम चौदह दिन की सूचना अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में और प्रादेशिक भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में, जो आयुक्त उपयुक्त समझे, विज्ञापन द्वारा दी जाएगी और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने दावे का सबूत विज्ञापन में विनिर्दिष्ट समय के अन्दर आयुक्त के समक्ष फाइल करे ।
(3) प्रत्येक दावेदार, जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट समय के अन्दर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहता है, आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरण से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) आयुक्त, ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात् जो उसकी राय में आवश्यक है और कम्पनी को दावे का खण्डन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदारों को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात् लिखित रूप में दावे को पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार करेगा ।
(5) आयुक्त को, अपने कृत्यों के निर्वहन से उद्भूत होने वाले सभी मामलों में, जिनके अन्तर्गत वह या वे स्थान भी हैं जहां वह अपनी बैठकें करेगा, अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए उसे वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य तात्त्विक पदार्थ का जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य है, प्रकटीकरण और पेश किया जाना;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(6) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(7) कोई दावेदार, जो आयुक्त के विनिश्चय से असंतुष्ट है, उस विनिश्चय के विरुद्ध अपील आरम्भिक अधिकारिता वाले उस प्रधान सिविल न्यायालय में कर सकता है, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कम्पनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है:
परन्तु जहां कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी न्यायालय का न्यायाधीश है, आयुक्त नियुक्त किया जाता है वहां अपील उच्च न्यायालय को होगी और वह अपील उस उच्च न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा सुनी और निपटाई जाएगी ।
21. आयुक्त द्वारा दावेदारों को धन का संवितरण-इस अधिनियम के अधीन दावा स्वीकार करने के पश्चात्, ऐसे दावे की बाबत शोध्य रकम आयुक्त ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को संदत्त करेगा जिसे या जिन्हें ऐसी धनराशियां शोध्य हैं और ऐसे संदाय कर दिए जाने पर ऐसे दावे की बाबत कम्पनी अपने दायित्व से उन्मोचित हो जाएगी ।
22. कम्पनी को रकमों का संवितरण-(1) यदि कम्पनी के उपक्रमों के सम्बन्ध में आयुक्त को संदत्त धन में से, अनुसूची में यथाविनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अतिशेष रह जाता है तो वह ऐसे अतिशेष का संवितरण कम्पनी को करेगा ।
(2) जहां कोई मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या किसी सरकारी कम्पनी में निहित हो गई है किन्तु ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति ऐसी कम्पनी की नहीं है वहां केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति को उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर कब्जे में रखे रहे जिनके अधीन वे 4 मई, 1972 से ठीक पूर्व कम्पनी के कब्जे में थी ।
23. असंवितरित या दावा न की गई रकम का साधारण राजस्व खाते में निक्षिप्त किया जाना-यदि आयुक्त को संदत्त कोई धन, जो उस अन्तिम दिन से जिस दिन संवितरण किया गया था, तीन वर्ष की अवधि तक असंवितरित या दावा न किया गया रहता है, तो वह उसे केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अन्तरित करेगा किन्तु इस प्रकार अन्तरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकता है और उस सम्बन्ध में कार्यवाही इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अन्तरण नहीं किया गया था और दावे के संदाय के लिए किया गया आदेश, यदि कोई है, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश समझा जाएगा ।
24. दायित्व का ग्रहण किया जाना-(1) जहां अनुसूची के प्रवर्ग i, प्रवर्ग ii, प्रवर्ग iii या प्रवर्ग iv में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं मदों से उत्पन्न होने वाले कम्पनी के किसी दायित्व का, आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई रकम में से पूर्णतया उन्मोचन नहीं कर पाता है वहां वह दायित्व की वह सीमा जिसका उन्मोचन नहीं हो पाया है, केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में संसूचित करेगा और वह दायित्व केन्द्रीय सरकार ग्रहण कर लेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा सरकारी कम्पनी को यह निदेश दे सकेगी कि वह उपधारा (1) के अधीन उस सरकार द्वारा ग्रहण किए गए किसी दायित्व को स्वयं ग्रहण कर ले और ऐसे निदेश की प्राप्ति पर सरकारी कम्पनी का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे दायित्व का उन्मोचन करे ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
25. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में, उनसे अंसगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
26. केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा अनुसमर्थन के अभाव में संविदाओं का प्रभावहीन हो जाना-(1) किसी सेवा, विक्रय या प्रदाय के लिए कम्पनी द्वारा अपने उपक्रमों के सम्बन्ध में की गई और नियत दिन के पूर्व प्रवृत्त प्रत्येक संविदा, उस दिन से एक सौ अस्सी दिन की समाप्ति के पश्चात् प्रभावी नहीं रहेगी जब तक कि ऐसी संविदा का ऐसी अवधि की समाप्ति के पूर्व, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी अनुसमर्थन नहीं कर देती और केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी ऐसी संविदा का अनुसमर्थन करने में उसमें ऐसा परिवर्तन या उपान्तर कर सकेगी जो वह ठीक समझे :
परन्तु केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी किसी संविदा का अनुसमर्थन करने में लोप और किसी संविदा में कोई परिवर्तन या उपान्तर तब तक नहीं करेगी जब तक उसका यह समाधान नहीं हो जाता कि ऐसी संविदा अनुचित रूप से दुर्भर है या असद्भावपूर्वक की गई है या केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी के लिए अहितकर है ।
(2) केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी संविदा का अनुसमर्थन करने में लोप और उसमें कोई परिवर्तन या उपान्तर तब तक नहीं करेगी जब तक कि उस संविदा के पक्षकारों को सुनवाई का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता और संविदा का अनुसमर्थन या उसमें कोई परिवर्तन या उपान्तर करने के कारणों को लेखबद्ध नहीं कर दिया जाता ।
27. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति, -
(क) कम्पनी के उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी से या उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय से सदोष विधारित करेगा, या
(ख) कम्पनी के उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा या उसे सदोष प्रतिधारित करेगा या ऐसे उपक्रम से सम्बन्धित किसी दस्तावेज को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, जानबूझकर विधारित करेगा अथवा केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी या उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने में असफल रहेगा अथवा कम्पनी के उपक्रमों से सम्बन्धित किन्हीं आस्तियों, लेखाबहियों या रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, केन्द्रीय सरकार या सरकारी कम्पनी या उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने में असफल रहेगा, या
(ग) कम्पनी के उपक्रमों की भागरूप किसी सम्पत्ति को सदोष हटाएगा या नष्ट करेगा अथवा इस अधिनियम के अधीन कोई ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वह मिथ्या या बिल्कुल गलत है,
तो वह कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
28. कम्पनी द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध कम्पनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी उस अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह सबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी, उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
29. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के या उस सरकार के किसी अधिकारी के या कम्पनी के उपक्रमों के अभिरक्षक के या सरकारी कम्पनी के या उस सरकार या सरकारी कम्पनी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध, न होगी ।
30. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य धारा 31 द्वारा प्रदत्त शक्ति से भिन्न सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी किया जा सकेगा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) जब कभी उपधारा (1) के अधीन शक्ति का कोई प्रत्यायोजन किया जाता है तब वह व्यक्ति, जिसे ऐसी शक्ति प्रत्यायोजित की गई है, केन्द्रीय सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगा ।
31. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) वह समय जिसके अन्दर और वह रीति जिससे धारा 4 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट सूचना दी जाएगी;
(ख) वह प्ररूप और वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन, अभिरक्षक धारा 11 द्वारा अपेक्षित रूप में लेखा बनाए रखेगा;
(ग) वह रीति जिसमें धारा 13 में निर्दिष्ट किसी भविष्य-निधि या अन्य निधि के धन का उपयोग किया जाएगा;
(घ) कोई अन्य विषय जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व, दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात्, वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
32. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी:
परन्तु ऐसा कोई आदेश उस तारीख से जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
33. राज्य की नीति के संबंध में घोषणा-इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 39 के खण्ड (ख) में उल्लिखित तत्त्वों का प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए राज्य की नीति को प्रभावी करने के लिए है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में राज्य" का वही अर्थ है जो संविधान के अनुच्छेद 12 में उसका है ।
34. निरसन और व्यावृत्ति-(1) स्मिथ, स्टैनीस्ट्रीट एण्ड कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अध्यादेश, 1977 (1977 का 13) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
अनुसूची
(धाराएं 18, 19, 20, 22 और 24 देखिए)
कम्पनी के दायित्वों के उन्मोचन के लिए पूर्विकताओं का क्रम
भाग 'क'
प्रबन्ध-ग्रहण के पश्चात् की अवधि
प्रवर्ग i
(क) कम्पनी के कर्मचारियों को शोध्य मजदूरी, वेतन और अन्य रकमें ।
(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए उधार ।
(ग) इण्डियन ड्रग्स एण्ड फारमास्यूटिकल लिमिटेड द्वारा दिए गए उधार ।
(घ) बैंक द्वारा दिए गए और केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत उधार ।
(ङ) व्यापार या विनिर्माण संक्रियाओं के प्रयोजनार्थ लिए गए ऋण ।
प्रवर्ग ii
(क) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार को शोध्य राजस्व, कर, उपकर, रेट या अन्य शोध्य रकमें ।
(ख) विक्रय कर, रेट और कर, कर्मचारी राज्य बीमा निधि को किए जाने वाले अभिदाय और कर्मचारियों को देय अतिरिक्त मंहगाई भत्ते ।
भाग 'ख'
प्रबन्ध-ग्रहण के पूर्व की अवधि
प्रवर्ग iii
कम्पनी के कर्मचारियों को शोध्य भविष्य निधि, वेतन और मजदूरी और अन्य रकमों के संबंध में बकाया ।
प्रवर्ग iv
सभी प्रतिभूति उधारों के संबंध में देय मूल रकम ।
प्रवर्ग v
प्रवर्ग iv में निर्दिष्ट प्रतिभूत उधारों के संबंध में देय ब्याज के रूप में देय रकम ।
प्रवर्ग vi
केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार, किसी स्थानीय प्राधिकरण या किसी राज्य विद्युत बोर्ड को शोध्य राजस्व, कर, उपकर, रेट या कोई अन्य रकम ।
प्रवर्ग vii
(क) व्यापार या विनिर्माण संक्रियाएं करने के प्रयोजनार्थ लिया गया कोई ऋण ।
(ख) कोई अन्य शोध्य रकम ।
------------

