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राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 ( National Green Tribunal Act, 2010 )


 

राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010

(2010 का अधिनियम संख्यांक 19)

[2 जून, 2010]

पर्यावरणीय संरक्षा और वनों तथा अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से संबंधित मामलों

के जिनके अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित किसी विधिक अधिकार का प्रवर्तन और व्यक्तियों

और संपत्ति को नुकसानियों के लिए अनुतोष और प्रतिकर देना भी है, प्रभावी और

शीघ्र निपटान के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना का तथा उससे

संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

और भारत जून, 1972 में स्टाकहॉम में हुए मानव पर्यावरण से संबंधित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में लिए गए विनिश्चयों का एक पक्षकार है, जिसके द्वारा राज्यों से मानव पर्यावरण की संरक्षा और उन्नयन के लिए समुचित कदम उठाने हेतु कहा गया था;

और जून, 1992 में रियो डे जेनेरो में हुए पर्यावरण और विकास से संबंधित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में विनिश्चय किए गए थे, जिसमें भारत ने भाग लिया था, और जिसके द्वारा राज्यों से न्यायिक और प्रशासनिक कार्यवाहियों में प्रभावी पहुंच प्रदान करने के लिए, जिनके अंतर्गत प्रतितोष और उपचार भी है तथा प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय नुकसान से पीड़ित व्यक्तियों के लिए दायित्व और प्रतिकर से संबंधित राष्ट्रीय विधियों का विकास करने के लिए कहा गया था;

और भारत में एक न्यायिक निर्णय में स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार का अर्थ संविधान के अनुच्छेद 21 के अधीन जीवन के अधिकार के एक भाग के रूप में लगाया गया है;

और पूर्वोक्त सम्मेलनों में लिए गए विनिश्चयों को कार्यान्वित करने के लिए और पर्यावरण से संबंधित बहु प्रकार के विवाद्यकों के अंतर्वलित होने को ध्यान में रखते हुए एक राष्ट्रीय हरित अधिकरण का होना समीचीन समझा गया है ;

भारत गणराज्य के इकसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 है

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

() दुर्घटना" से ऐसी घटना अभिप्रेत है जिसमें किसी परिसंकटमय पदार्थ या उपस्कर या संयंत्र या यान को संभालते समय कोई आकस्िमक या अचानक या अनाशयित घटना अंतर्वलित है जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु का निरंतर या आंतरायिक या बार-बार भय बना रहता है या किसी संपत्ति या पर्यावरण को किसी नुकसान का भय बना रहता है, किन्तु इसके अंतर्गत केवल युद्ध या सिविल उपद्रव के कारण कोई दुर्घटना नहीं आती है;

(ख) अध्यक्ष" से राष्ट्रीय हरित अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ग) पर्यावरण" के अंतर्गत जल, वायु और भूमि तथा ऐसा पारस्परिक संबंध अभिप्रेत है जो जल, वायु और भूमि तथा मनुष्यों, अन्य जीवित प्राणियों, पेड़-पौधों, सूक्ष्म जीव और गुण के बीच विद्यमान होता है;

(घ) विशेषज्ञ सदस्य" से अधिकरण का ऐसा सदस्य अभिप्रेत है जो उस रूप में नियुक्त किया गया है और धारा 5 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अर्हताएं रखता है और न्यायिक सदस्य नहीं है;

(ङ) किसी परिसंकटमय पदार्थ के संबंध में संभालना" से ऐसे परिसंकटमय पदार्थ या उसी तरह के किसी पदार्थ का विनिर्माण, प्रसंस्करण, उपचार, पैकेज, भंडारण, परिवहन, उपयोग, संग्रहण, नाशन, संपरिवर्तन, विक्रय के लिए प्रस्थापना और अंतरण अभिप्रेत है;

(च) परिसंकटमय पदार्थ" से ऐसा कोई पदार्थ या निर्मिति अभिप्रेत है जो पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 का 29) में परिसंकटमय पदार्थ के रूप मे परिभाषित है और ऐसी मात्रा से अधिक है जो लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 (1991 का 6) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट है या विनिर्दिष्ट की जाए;

(छ) क्षति" के अंतर्गत किसी दुर्घटना के परिणामस्वरूप स्थायी, आंशिक या पूर्ण निःशक्तता या रुग्णता भी है;

(ज) न्यायिक सदस्य" से अधिकरण का ऐसा सदस्य अभिप्रेत है जो धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन उस रूप में नियुक्त किए जाने के लिए अर्हित है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है;

(झ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ञ) व्यक्ति" के अंतर्गत निम्नलिखित हैंः-

(i) व्यष्टि,

(ii) हिन्दू अविभक्त कुटुंब,

(iii) कंपनी,

(iv) फर्म,

(v) व्यक्ति-संगम या व्यष्टि-निकाय, चाहे निगमित हो अथवा नहीं,

(vi) किसी न्यास का न्यासी,

(vii) कोई स्थानीय प्राधिकारी, और

(viii) प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति जो पूर्ववर्ती उपखंडों में से किसी के अंतर्गत नहीं आता;

(ट) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ठ) अनुसूची" से इस अधिनियम से संलग्न अनुसूची 1, अनुसूची 2 और अनुसूची 3 अभिप्रेत है;

(ड) पर्यावरण से संबंधित सारवान् प्रश्न" के अंतर्गत ऐसा वाद भी है जिसमें-

(i) किसी व्यक्ति द्वारा किसी विनिर्दिष्ट कानूनी पर्यावरणीय बाध्यता का प्रत्यक्ष उल्लंघन है जिसके द्वारा, -

(अ) किसी व्यष्टि या व्यष्टि समूह से भिन्न बृहत् समुदाय पर्यावरणीय परिणामों से प्रभावित होता है या उसके प्रभावित होने की संभावना है; या

(आ) पर्यावरण या संपत्ति को नुकसान की गंभीरता सारवान् है; या 

(इ) लोक स्वास्थ्य का नुकसान मौटे तौर पर नापने योग्य है;

(ii) पर्यावरणीय परिणाम प्रदूषण के विनिर्दिष्ट क्रियाकलाप या मुख्य स्रोत से संबंधित हैं;

(ढ) अधिकरण" से धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण अभिप्रेत है; 

(ण) कर्मकार" का वही अर्थ है जो कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) में है ।

(2) उन शब्दों और पदों के जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (1974 का 6), जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 (1977 का 36), वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (1980 का 69), वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (1981 का 14), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 का 29), लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 (1991 का 6) और जैव विविधता अधिनियम, 2002 (2003 का 18) तथा पर्यावरण से संबंधित अन्य अधिनियमों में परिभाषित हैं, वही अर्थं होंगे जो क्रमशः उनके उन अधिनियमों   में हैं ।

अध्याय 2

अधिकरण की स्थापना

3. अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, उसमें विनिर्दिष्ट तारीख से राष्ट्रीय हरित अधिकरण नामक एक अधिकरण की स्थापना करेगी जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन ऐसे अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा ।

4. अधिकरण की संरचना-(1) अधिकरण निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, -

(क) एक पूर्णकालिक अध्यक्ष;

(ख) दस से अन्यून किन्तु अधिकतम बीस के अधीन रहते हुए पूर्णकालिक न्यायिक सदस्य जो केन्द्रीय सरकार   समय-समय पर अधिसूचित करे;

(ग) दस से अन्यून किन्तु अधिकतम बीस के अधीन रहते हुए पूर्णकालिक विशेषज्ञ सदस्य जो केन्द्रीय सरकार, समय-समय, अधिसूचित करे ।

(2) अधिकरण का अध्यक्ष, यदि आवश्यक समझे, किसी विशिष्ट मामले में अधिकरण की सहायता करने के लिए ऐसे एक या अधिक व्यक्तियों को आमंत्रित कर सकेगा जिनके पास अधिकरण के समक्ष के मामले में विशेषज्ञतायुक्त ज्ञान और अनुभव हो ।

(3) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, अधिकरण के अधिविष्ठ होने के सामान्य स्थान या स्थानों और अधिविष्ठ होने के प्रत्येक ऐसे स्थान के अंतर्गत आने वाली क्षेत्रीय अधिकारिता को विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।

(4) केन्द्रीय सरकार अधिकरण के अध्यक्ष के परामर्श से, अधिकरण की पद्धतियों और प्रक्रिया को सामान्य रूप से विनियमित करने वाले नियम, बना सकेगी जिनमें निम्नलिखित सम्मिलित हैं-

(क) ऐसे व्यक्तियों के बारे में नियम जो अधिकरण के समक्ष उपसंजात होने के लिए हकदार होंगे;

(ख) आवेदनों और अपीलों तथा आवेदनों और अपीलों से संबंधित विषयों की सुनवाई की प्रक्रिया के बारे में नियम [जिसके अंतर्गत उपधारा (3) में निर्दिष्ट अधिकारिता के भीतर आने वाले उसके अधिविष्ठ होने के सामान्य स्थान से भिन्न किसी स्थान पर सुनवाई के लिए सर्किट प्रक्रिया भी है];

(ग) ऐसे सदस्यों की न्यूनतम संख्या जो आवेदनों और अपीलों के किसी वर्ग या वर्गों से संबंधित आवेदनों और अपीलों की सुनवाई करेंगेः

परंतु किसी आवेदन या अपील की सुनवाई में विशेषज्ञ सदस्यों की संख्या ऐसे आवेदन या अपील की सुनवाई करने वाले न्यायिक सदस्यों की संख्या के बराबर होगी;

(घ) अध्यक्ष द्वारा अधिविष्ठ होने के एक स्थान से (जिसके अंतर्गत अधिविष्ठ होने का सामान्य स्थान भी है) अधिविष्ठ होने के अन्य स्थान को मामलों के अंतरण से संबंधित नियम ।

5. अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य की नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति अधिकरण के अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत के उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति है या रहा हैः

परंतु ऐसा व्यक्ति, जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है, न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए भी अर्हित होगा ।

(2) कोई व्यक्ति विशेषज्ञ सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब उसके पास,-

(क) डाक्टरेट उपाधि के साथ (भौतिक विज्ञान या प्राण विज्ञान में) मास्टर ऑफ साइंस या मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग या मास्टर ऑफ टेक्नालाजी में डिग्री और सुसंगत क्षेत्र में पंद्रह वर्ष का अनुभव हो जिसके अंतर्गत किसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर की संस्था में पर्यावरण और वन के क्षेत्र में (जिसके अंतर्गत प्रदूषण नियंत्रण, परिसंकटमय पदार्थ प्रबंधन, पर्यावरण समाघात निर्धारण, जलवायु परिवर्तन प्रबंधन और जैव विविधता प्रबंधन और वन संरक्षण भी हैं) ; पांच वर्ष का अनुभव हो ;

(ख) केन्द्रीय या किसी राज्य सरकार में या किसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय या राज्य स्तर की संस्था में पर्यावरण संबंधी विषयों में पांच वर्ष के अनुभव सहित पंद्रह वर्ष का प्रशासिक अनुभव हो ।

(3) अधिकरण का अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य उस रूप में अपनी पदावधि के दौरान कोई अन्य पद धारण नहीं करेंगे ।

(4) अध्यक्ष और अन्य न्यायिक तथा विशेषज्ञ सदस्य, उस तारीख से जिसको वे पद पर नहीं रहते हैं, दो वर्ष की अवधि के लिए ऐसे किसी व्यक्ति के प्रबंध या प्रशासन में या उसके संबंध में कोई नियोजन स्वीकार नहीं करेंगे जो इस अधिनियम के अधीन अधिकरण के समक्ष किसी कार्यवाही में पक्षकार रहा हैः

परंतु इस धारा की कोई बात केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी के अधीन या किसी केन्द्रीय, राज्य या प्रांतीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित किसी कानूनी प्राधिकारी या किसी निगम में या कंपनी अधिनियम,1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित किसी सरकारी कंपनी में किसी नियोजन को लागू नहीं होगी । 

6. अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य की नियुक्ति-(1) धारा 5 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण के अध्यक्ष, न्यायिक सदस्यों और विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी ।

(2) अध्यक्ष की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से की जाएगी ।

(3) अधिकरण के न्यायिक सदस्यों और विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति ऐसी चयन समिति की सिफारिशों पर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, की जाएगी ।

7. अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य की पदावधि और उनकी सेवा की अन्य शर्तें-अधिकरण का अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य उस तारीख से जिसको वे अपना पदभार ग्रहण करते हैं, पांच वर्ष की पदावधि के लिए उस रूप में पद धारण करेंगे किन्तु वे पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होंगेः

परंतु यदि ऐसा कोई व्यक्ति, जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है, अधिकरण के अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य के रूप में नियुत किया गया है तो वह सत्तर वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् पद धारण नहीं करेगाः

परंतु यह और कि यदि ऐसा कोई व्यक्ति, जो उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति है या रहा है, अधिकरण के अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है तो वह सड़सठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् पद धारण नहीं करेगाः

परंतु यह भी कि यदि ऐसा कोई व्यक्ति, जो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है, अधिकरण के न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया है तो वह सड़सठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् पद धारण नहीं करेगाः

परंतु यह भी कि कोई विशेषज्ञ सदस्य, उसके पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् पद धारण नहीं करेगा ।

8. पदत्याग-अधिकरण का अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा, अपने पद त्याग सकेंगे ।

9. वेतन, भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें-अधिकरण के अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदों सहित) वे होंगी जो विहित की जाएंः

परंतु अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य के न तो वेतन और भत्तों में और न उनकी सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में, उनकी नियुक्ति के पश्चात्, उनके लिए कोई अलाभकारी परिवर्तन ही किया जाएगा ।

10. अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य का पद से हटाया जाना और उनका निलम्बन-(1) केन्द्रीय सरकार, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से, अधिकरण के ऐसे अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य को पद से हटा सकेगी, -

(क) जिसे दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या

(ख) जिसे ऐसे अपराध के लिए दोषससिद्ध किया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या

(ग) जो शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है; या

(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है जिससे उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

(ङ) जिसने अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है जिससे उसके पद पर बने रहने से लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ।

(2) अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य को केन्द्रीय सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा की गई ऐसी जांच के पश्चात्, जिसमें ऐसे अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य को उसके विरुद्ध आरोपों की सूचना दे दी गई है और उन आरोपों की बाबत सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर दिया गया है, किए गए किसी आदेश के सिवाय उसके पद से नहीं हटाया जाएगा ।

(3) केन्द्रीय सरकार ऐसे अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य को पद से उस समय तक निलंबित कर सकेगी जिसके संबंध में उपधारा (2) के अधीन उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को जांच किए जाने का निर्देश भेजा गया है, जब तक केन्द्रीय सरकार ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा की गई जांच की रिपोर्ट की प्राप्ति पर कोई आदेश पारित नहीं करती ।

(4) केन्द्रीय सरकार, नियमों द्वारा, उपधारा (2) में निर्दिष्ट जांच की प्रक्रिया को विनियमित कर सकेगी ।

(5) विशेषज्ञ सदस्य को उसके पद से उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट आधारों पर और ऐसी प्रक्रिया के अनुसार जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित की जाए, केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा हटाया जा सकेगाः

परंतु विशेषज्ञ सदस्य को तभी पद से हटाया जाएगा जब उसे उस विषय में सुने जाने का अवसर प्रदान कर दिया गया हो

11. कतिपय परिस्िथतियों में अधिकरण के अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन करना-अधिकरण के अध्यक्ष के पद में उसकी मृत्यु, पद त्याग के कारण या अन्यथा कोई रिक्ति होने की दशा में, अधिकरण का ऐसा न्यायिक सदस्य, जिसे केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, अध्यक्ष के रूप में उस तारीख तक कार्य करेगा जिसको इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नए अध्यक्ष की नियुक्ति की जाए ।

12. अधिकरण के कर्मचारिवृंद-(1) केन्द्रीय सरकार अधिकरण के कृत्यों के निर्वहन में उसकी सहायता करने के लिए अपेक्षित अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की प्रकृति और प्रवर्ग अवधारित करेगी ।

(2) अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की भर्ती अध्यक्ष द्वारा ऐसी रीति से की जाएगी, जो विहित की जाए

(3) अधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारी अपने कर्तव्यों का निर्वहन अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन करेंगे

(4) अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं

13. अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासिक शक्तियां-अधिकरण का अध्यक्ष ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन उसमें निहित की जाएंः

परन्तु अध्यक्ष अपनी ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों को, जिन्हें वह ठीक समझे, अधिकरण के किसी न्यायिक सदस्य या विशेषज्ञ सदस्य या अधिकारी को इस शर्त के अधीन रहते हुए प्रत्यायोजित कर सकेगा कि सदस्य या ऐसा अधिकारी, ऐसी प्रत्यायोजित शक्ति का प्रयोग करते समय, अध्यक्ष के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करता रहेगा ।

अध्याय 3

अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और कार्यवाहियां

14. अधिकरण द्वारा विवादों का हल-(1) अधिकरण को, ऐसे सभी सिविल मामलों पर अधिकारिता होगी जिनमें पर्यावरण से संबंधित कोई सारभूत प्रश्न अंतर्वलित है (जिसके अंतर्गत पर्यावरण से संबंधित किसी विधिक अधिकार का प्रवर्तन भी है) और ऐसा प्रश्न अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियों के कार्यान्वयन से उद्भूत हुआ हो

(2) अधिकरण उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रश्नों से उद्भूत विवादों की सुनवाई करेगा और ऐसे विवादों का हल करेगा तथा उन पर आदेश पारित करेगा ।

(3) इस धारा के अधीन विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए कोई आवेदन अधिकरण द्वारा तभी ग्रहण किया जाएगा जब वह उस तारीख से, जिसको ऐसे विवाद के लिए वाद हेतुक पहले उद्भूत हुआ है, छह मास की अवधि के भीतर दिया गया होः

परंतु यदि अधिकरण का यह समाधान को जाता है कि आवेदक उक्त अवधि के भीतर आवेदन फाइल करने से पर्याप्त हेतुक द्वारा निवारित हुआ था, तो अधिकरण साठ दिन से अनधिक की और अवधि के भीतर आवेदन फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।

15. अनुतोष, प्रतिकर और प्रत्यास्थापन-(1) अधिकरण, आदेश द्वारा, -

(क) अनसूची 1 में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियों के अधीन उद्भूत प्रदूषण और अन्य पर्यावरणीय नुकसान के (जिसके अंतर्गत किसी परिसंकटमय पदार्थ के हथालने के समय घटित दुर्घटना भी है) पीड़ित व्यक्तियों को अनुतोष और प्रतिकर का;

(ख) क्षतिग्रस्त संपत्ति के प्रत्यास्थापन के लिए;

(ग) ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए, जिन्हें अधिकरण ठीक समझे, पर्यावरण के प्रत्यास्थापन के लिए,

उपबंध कर सकेगा

(2) उपधारा (1) के खंड (क), खंड (ख) और खंड (ग) में निर्दिष्ट संपत्ति और पर्यावरण का अनुतोष और प्रतिकर तथा प्रत्यास्थापन, लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 (1991 का 6) के अधीन संदत्त या संदेय अनुतोष के अतिरिक्त होगा । 

(3) इस धारा के अधीन किसी प्रतिकर या अनुतोष के अनुदान या संपत्ति अथवा पर्यावरण के प्रत्यास्थापन के लिए कोई आवेदन अधिकरण द्वारा तभी ग्रहण किया जाएगा जब वह ऐसे प्रतिकर या अनुतोष के लिए वाद हेतुक के पहली बार उद्भूत होने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के भीतर किया जाएः

परंतु यदि अधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक उक्त अवधि के भीतर आवेदन फाइल करने से पर्याप्त हेतुक द्वारा निवारित हुआ था, तो अधिकरण साठ दिन से अनधिक की और अवधि के भीतर आवेदन फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।

(4) अधिकरण, लोक स्वास्थ्य, संपत्ति और पर्यावरण के नुकसान को ध्यान में रखते हुए अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट पृथक् शीर्ष के अधीन संदेय प्रतिकर या अनुतोष को विभाजित कर सकेगा जिससे दावेदारों के प्रतिकर या अनुतोष का और क्षतिग्रस्त संपत्ति या पर्यावरण के सत्यापन के लिए, जो वह ठीक समझे, उपबंध किया जा सके ।

(5) इस अधिनियम के अधीन प्रतिकर या अनुतोष का प्रत्येक दावेदार अधिकरण को किसी अन्य न्यायालय या प्राधिकरण को किए गए, यथास्थिति, प्रतिकर या अनुतोष के लिए आवेदन या उसे प्राप्त अनुतोष के बारे में इत्तिला देगा ।

16. अधिकरण को अपीली अधिकारिता का होना-(क) जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974(1974 का 6) की धारा 28 के अधीन अपील प्राधिकारी द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किए गए किसी आदेश या विनिश्चय से;

(ख) जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (1974 का 6) की धारा 29 के अधीन राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किए गए किसी निदेशों से;

(ग) जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 (1974 का 6) की धारा 33क के अधीन किसी बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् जारी किए गए निदेशों से;

(घ) जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 (1977 का 36) की धारा 13 के अधीन अपील प्राधिकारी द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किए गए किसी आदेश या विनिश्चय से;

() वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 (1980 का 69) की धारा 2 के अधीन राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किए गए किसी आदेश या विनिश्चय से;

(च) वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 (1981 का 14) की धारा 31 के अधीन अपील प्राधिकारी द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किए गए किसी आदेश या विनिश्चय से;

(छ) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 का 29) की धारा 5 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् जारी किए गए किसी निदेश से;

(ज) ऐसे क्षेत्र में, जिसमें कोई उद्योग, संक्रियाएं या प्रसंस्करण या उद्योगों का वर्ग, संक्रियाएं और प्रसंस्करण, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 का 29) के अधीन कतिपय सुरक्षोपायों के अधीन रहते हुए नहीं किए जाएंगे या उनके अधीन रहते हुए किए जाएंगे, पर्यावरणीय अनापत्ति मंजूर करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किए गए किसी आदेश से;

(झ) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 का 29) के अधीन कोई क्रियाकलाप या संक्रिया या प्रसंस्करण करने के लिए पर्यावरणीय अनापत्ति मंजूर करने से इंकार करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् किए गए किसी आदेश से;

(ञ) जैव विविधता अधिनियम, 2002 (2003 का 18) के उपबंधों के अधीन राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण या किसी राज्य जैव विविधता बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् फायदे में हिस्सा बंटाने का कोई अवधारण या किए गए किसी आदेश से,

व्यथित कोई व्यक्ति उस तारीख से जिसको कोई आदेश या विनिश्चय या निदेश या अवधारण उसे संसूचित किया जाता है तीस दिन की अवधि के भीतर अधिकरण को कोई अपील कर सकेगाः

परंतु अधिकरण, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी, उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित था तो उसे साठ दिन से अनधिक की और अवधि के भीतर इस धारा के अधीन फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा ।

17. कतिपय मामलों में अनुतोष या प्रतिकर का संदाय करने का दायित्व-(1) जहां किसी व्यक्ति की (किसी कर्मकार से भिन्न) मृत्यु हो जाती है या क्षति हो जाती है या किसी दुर्घटना के परिणामस्वरूप किसी संपत्ति या पर्यावरण का नुकसान हो जाता है या अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट किसी अधिनियमिति के अधीन किसी क्रियाकलाप या संक्रिया या प्रसंस्करण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है वहां उत्तरदायी व्यक्ति अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट सभी या किसी शीर्ष के अधीन ऐसी मृत्यु, क्षति या नुकसान के लिए ऐसा अनुतोष या प्रतिकर का संदाय करने का दायी होगा

(2) यदि अनुसूची 1 में विनिर्दिष्ट किसी अधिनियमिति के अधीन किसी दुर्घटना के कारण मृत्यु, क्षति या नुकसान होता है अथवा किसी क्रियाकलाप या संक्रिया या प्रसंस्करण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तो उसे किसी एकल क्रियाकलाप या संक्रिया या प्रसंस्करण के कारण नहीं समझा जा सकता किन्तु वह विभिन्न ऐसे क्रियाकलापों या संक्रिया या प्रसंस्करण के संयुक्त या पारिणमिक प्रभाव है तो अधिकरण, ऐसे क्रियाकलापों, संक्रियाओं और प्रसंस्करण के लिए उत्तरदायी उन व्यक्तियों के बीच प्रतिकर के दायित्व का साम्यता के आधार पर आबंटन कर सकेगा ।

(3) अधिकरण, किसी दुर्घटना के मामले में, दोष न होने का सिद्धांत लागू करेगा ।

18. अधिकरण को आवेदन या अपील-(1) अधिकरण को, धारा 14 या धारा 15 के अधीन किया गया प्रत्येक आवेदन या धारा 16 के अधीन की गई अपील ऐसे प्ररूप में होगी और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी तथा उसके साथ ऐसे दस्तावेज और ऐसी फीस लगी होगी, जो विहित की जाए ।

(2) धारा 16 में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना अधिकरण को अनुतोष या प्रतिकर मंजूर करने या विवाद के परिनिर्धारण के लिए निम्नलिखित द्वारा कोई आवेदन किया जा सकेगा-

(क) व्यक्ति, जिसको क्षति हुई; या

(ख) उस संपत्ति का स्वामी जिसको नुकसान कारित हुआ है; या

(ग) जहां पर्यावरणीय नुकसान के परिणामस्वरूप मृत्यु हुई है, वहां मृतक के सभी या किसी विधिक प्रतिनिधि; या

(घ) यथास्िथति, ऐसे व्यक्ति द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत कोई अभिकर्ता या ऐसी संपत्ति का स्वामी या मृतक के सभी या किसी विधिक प्रतिनिधि; या

(ङ) व्यथित कोई व्यक्ति, जिसके अंतर्गत कोई प्रतिनिधि निकाय या संगठन भी है; या

(च) केन्द्रीय सरकार या कोई राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन या पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 (1986 का 29) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन गठित या स्थापित केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या कोई प्रदूषण नियंत्रण समिति या कोई स्थानीय प्राधिकरण या कोई पर्यावरणीय प्राधिकरणः

परंतु जहां मृतक के सभी विधिक प्रतिनिधि किसी ऐसे आवेदन में प्रतिकर या अनुतोष या विवाद के हल के लिए सम्मिलित नहीं हुए हैं, वहां आवेदन मृतक के सभी विधिक प्रतिनिधियों की ओर से या उनके फायदे के लिए किया जाएगा और ऐसे विधिक प्रतिनिधि जो इस प्रकार सम्मिलित नहीं हुए हैं, आवेदन के प्रत्यर्थियों के रूप में पक्षकार होंगेः

परंतु यह और कि, व्यक्ति, स्वामी, विधिक प्रतिनिधि, अभिकर्ता, प्रतिनिधि निकाय या संगठन, अनुतोष या प्रतिकर को मंजूर करने के लिए या विवाद के हल के लिए कोई आवेदन करने का हकदार नहीं होगा, यदि ऐसे व्यक्ति, स्वामी या विधिक प्रतिनिधि, अभिकर्ता, प्रतिनिधि निकाय या संगठन ने धारा 16 के अधीन कोई अपील की है

(3) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण के समक्ष, यथास्िथति, आवेदन या अपील का उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से निपटान किया जाएगा और उसके द्वारा, यथास्िथति, आवेदन या अपील का संबंधित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् फाइल करने की तारीख से छह मास के भीतर अंतिम रूप से निपटान करने का प्रयास किया जाएगा ।

19. अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया द्वारा बाध्य नहीं होगा किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होगा ।

(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए अधिकरण को अपनी स्वयं की प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी ।

(3) अधिकरण, भारतीय साक्ष्य अधिनियम,1872 (1872 का 1) में अंतर्विष्ट साक्ष्य के नियमों द्वारा भी बाध्य नहीं होगा

(4) अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए वही शक्तियां होंगी जो उसे निम्नलिखित विषयों की बाबत किसी वाद का विचारण करने के दौरान सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्ः-

(क) किसी व्यक्ति को समन कराना और हाजिर करना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

(ख) दस्तावेजों का पता लगाने और प्रस्तुत करने की अध्यपेक्षा करना;

(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य स्वीकार करना;

(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज या किसी कार्यालय से ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अध्यपेक्षा करना;

(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

(च) अपने विनिश्चय का पुनर्विलोकन करना;

(छ) व्यतिक्रम के लिए किसी आवेदन को खारिज करना या उसका एकपक्षीय विनिश्चय करना;

(ज) व्यतिक्रम के लिए किसी आवेदन को खारिज करने के किसी आदेश या उसके द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना;

(झ) इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आवेदन या फाइल की गई किसी अपील पर संबंधित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् कोई अंतरिम आदेश (जिसके अंतर्गत कोई व्यादेश या रोक मंजूर करना भी है) पारित करना;

(ञ) अनुसूची 1 मे विनिर्दिष्ट किसी अधिनियमिति के किसी उल्लंघन को न करने या कारित न करने तथा उससे प्रविरत रहने के लिए किसी व्यक्ति से अपेक्षा करते हुए कोई आदेश पारित करना;

(ट) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।

(5) अधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 196 के प्रयोजनों के लिए धारा 193, धारा 219 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी तथा अधिकरण को, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए एक सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

20. अधिकरण द्वारा कतिपय सिद्धांत लागू करना-अधिकरण, कोई आदेश या विनिश्चय या अधिनिर्णय पारित करते समय, पोषणीय विकास के सिद्धांतों, पूर्वावधानी सिद्धांत और प्रदूषक द्वारा क्षतिपूर्ति सिद्धांत लागू करेगा

21. विनिश्चय का बहुमत द्वारा किया जाना-सदस्यों के बहुमत द्वारा अधिकरण का विनिश्चय आबद्धकर होगाः

परंतु यदि किसी आवेदन या अपील की सुनवाई करने वाले सदस्यों के बीच राय की भिन्नता है और राय बराबर विभाजित होती है तो अध्यक्ष (यदि उसने ऐसे आवेदन या अपील की पूर्व में सुनवाई नहीं की है) ऐसे आवेदन या अपील की सुनवाई करेगा और उसका विनिश्चय करेगाः

परंतु यह और कि जहां अध्यक्ष ने अधिकरण के अन्य सदस्यों के साथ उस आवेदन या अपील की स्वयं सुनवाई की है और यदि ऐसे मामले में सदस्यों के बीच राय की भिन्नता है और राय बराबर विभाजित होती है तो वह उस मामले को अधिकरण के अन्य सदस्य को भेजेगा, जो उस आवेदन या अपील की सुनवाई करेगा और उसका विनिश्चय करेगा ।

22. उच्चतम न्यायालय को अपील-अधिकरण के किसी अधिनिर्णय, विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, अधिकरण के अधिनिर्णय, विनिश्चय या आदेश की उसको संसूचना की तारीख से नब्बे दिन के भीतर, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 100 में विनिर्दिष्ट किसी एक या अधिक आधारों पर उच्चतम न्यायालय में अपील फाइल कर सकेगाः

परंतु उच्चतम न्यायालय नब्बे दिन की समाप्ति के पश्चात् किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त कारण से अपील करने से निवारित रहा था ।

23. लागत-(1) इस अधिनियम के अधीन किसी आवेदन या किसी अपील का निपटान करते समय अधिकरण को लागत के संबंध में ऐसा आदेश करने की शक्ति होगी जो वह आवश्यक समझे ।

(2) जहां अधिकरण यह अभिनिर्धारित करता है कि कोई दावा पोषणीय नहीं है या मिथ्या है या तंग करने वाला है और ऐसे दावे को पूर्णतः यह या भागतः अननुज्ञात किया जाता है वहां अधिकरण, यदि वह ऐसा उपयुक्त समझता है, ऐसे दावे को मिथ्या या तंग करने वाला अभिनिर्धारित करने के लिए कारणों को अभिलिखित करने के पश्चात् लागत का निर्णय करने का आदेश कर सकेगा जिसके अंतर्गत किसी अंतरिम व्यादेश के कारण के कारण गुम हो गए फायदे भी हैं ।

24. पर्यावरण के नुकसान के लिए संदेय रकम का जमा किया जाना-(1) जहां पर्यावरण को हुए किसी नुकसान के आधार पर अधिकरण द्वारा दिए गए किसी अधिनिर्णय या आदेश के अधीन प्रतिकर या अनुतोष के रूप में किसी रकम को संदत्त किए जाने के लिए आदेश दिया जाता है, वहां उस रकम को उस धारा के अधीन स्थापित पर्यावरण अनुतोष निधि में जमा करने के लिए, लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 (1991 का 6) की धारा 7क की उपधारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट प्राधिकरण को विप्रेषित किया जाएगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन पर्यावरण अनुतोष निधि में जमा की गई प्रतिकर या अनुतोष की रकम का, लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 (1991 का 6) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी ऐसे व्यक्तियों या प्राधिकारी द्वारा ऐसी रीति में और पर्यावरण के संबंध में ऐसे प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जा सकेगा, जो विहित किए जाएं ।

25. अधिकरण के अधिनिर्णय या आदेश या विनिश्चय का निष्पादन-(1) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण के किसी अधिनिर्णय या आदेश या विनिश्चय को अधिकरण द्वारा किसी सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादित किया जाएगा और इस प्रयोजन के लिए अधिकरण को किसी सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अधिकरण, अपने द्वारा किए गए किसी आदेश या अधिनिर्णय को स्थानीय अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को पारेषित कर सकेगा और ऐसा सिविल न्यायालय उस आदेश या अधिनिर्णय को इस प्रकार निष्पादित करेगा मानो वह उस न्यायालय द्वारा की गई कोई डिक्री हो ।

(3) जहां किसी व्यक्ति की मृत्यु या क्षति के लिए अथवा किसी संपत्ति और पर्यावरण को हुए नुकसान के लिए उत्तरदायी व्यक्ति, जिसके विरुद्ध अधिकरण द्वारा अधिनिर्णय या आदेश किया गया है, अधिनिर्णय या आदेश में यथाविनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अधिकरण द्वारा यथानिदेशित रकम का संदाय या निक्षेप करने में असफल रहता है, वहां ऐसी रकम, इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी अपराध के अभियोजन के लिए शिकायत फाइल करने पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उपर्युक्त व्यक्ति से, भू-राजस्व या लोक मांग की बकाया के रूप में वसूलनीय होगी ।

अध्याय 4

शास्ति

26. अधिकरण के आदेशों का अनुपालन करने में असफलता के लिए शास्ति-(1) जो कोई इस अधिनियम के अधीन किसी अधिकरण के किसी आदेश या अधिनिर्णय या विनिश्चय का अनुपालन करने में असफल रहता है तो वह ऐसी अवधि के कारावास से, जो तीन वर्ष तक की सकेगी या जुर्माने से जो दस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से और यदि असफलता या उल्लंघन जारी रहता है तो अतिरिक्त जुर्माने से जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान, पहली ऐसी असफलता या उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि के पश्चात्, ऐसी असफलता या उल्ंलघन जारी रहता है, पच्चीस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगाः

परंतु यदि कोई कंपनी इस अधिनियम के अधीन अधिकरण के किसी आदेश या अधिनिर्णय या विनिश्चय का पालन करने में असफल रहती है तो ऐसी कंपनी जुर्माने से जो पच्चीस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा और यदि असफलता या उल्लंघन जारी रहता है, तो अतिरिक्त जुर्माने से जो ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान, पहली ऐसी असफलता या उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसी असफलता या उल्लंघन जारी रहता है एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगी ।

(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (194 का 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक अपराध, उक्त संहिता के अर्थान्तर्गत अंसज्ञेय अपराध समझा जाएगा । 

27. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध होने के समय, कंपनी के कारबार का संचालन करने के लिए कंपनी का प्रत्यक्ष रूप से भारसाधक था और उत्तरदायी था, और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा कार्यवाही किए जाने के लिए दायी होंगे और तदनुसार दंडित किए जाएंगेः

परंतु इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात इस अधिनियम में उपबंधित किसी अपराध के लिए ऐसे किसी व्यक्ति को दायी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

() कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसमें फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम सम्मिलित है; और

(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

28. सरकारी विभाग द्वारा अपराध-जहां कोई सरकारी विभाग इस अधिनियम के अधीन अधिकरण के किसी आदेश या अधिनिर्णय या विनिश्चय का अनुपालन करने में असफल रहता है वहां विभागाध्यक्ष ऐसी असफलता का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन अपराध करने के लिए कार्यवाही किए जाने और तद्नुसार दंडित किए जाने का भागी होगाः

परंतु इस धारा की कोई बात ऐसे विभागाध्यक्ष को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी सरकारी विभाग द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध विभागाध्यक्ष से भिन्न किसी अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

अध्याय 5

प्रकीर्ण

29. अधिकारिता का वर्जन-(1) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण की स्थापना की तारीख से किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे विषय की बाबत कोई अपील ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी, जिसको अपील अधिकरण अपनी अपीली अधिकारिता के अधीन अवधारित करने के लिए सशक्त है ।

(2) किसी भी सिविल न्यायालय को क्षतिग्रस्त संपत्ति के लिए कोई अनुतोष या प्रतिकर या क्षतिग्रस्त पर्यावरण के प्रत्यास्थापन के लिए किसी दावे से संबंधित किसी विवाद को निपटाने या किसी प्रश्न को ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी जिसका न्यायनिर्णयन अधिकरण द्वारा किया जा सकेगा और क्षतिग्रस्त संपत्ति के लिए कोई अनुतोष या प्रतिकर या क्षतिग्रस्त पर्यावरण के प्रत्यास्थापन के लिए ऐसे विवाद या किसी ऐसे दावे के निपटान की बाबत अधिकरण द्वारा या अधिकरण के समक्ष की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत कोई भी व्यादेश सिविल न्यायालय द्वारा प्रदान नहीं किया जाएगा ।

30. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान-

(क) केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी प्राधिकारी या अधिकारी द्वारा; या 

(ख) किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिसने केन्द्रीय सरकार या यथापूर्वोक्त प्राधिकृत प्राधिकारी या अधिकारी को अभिकथित अपराध की और परिवाद करने के अपने आशय की ऐसी रीति में जो विहित की जाए, साठ दिन से अन्यून की सूचना दे दी है, किए गए परिवाद के सिवाय नहीं लेगा ।

(2) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

31. अधिकरण के सदस्यों और कर्मचारिवृंद का लोक सेवक होना-अधिकरण का अध्यक्ष, न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्य, अधिकारी और अन्य कर्मचारियों को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।

32. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या किसी कानूनी प्राधिकरण के कर्मचारियों के विरुद्ध नहीं होगी ।

(2) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही अधिकरण के अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य या विशेषज्ञ सदस्य अथवा अध्यक्ष अथवा न्यायिक सदस्य या विशेषज्ञ सदस्य द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।

33. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या इस अधिनियम से अन्यथा किसी अन्य विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में असंगत बात के होते हुए भी इस अधिनियम के उपबंध प्रभावी होंगे ।

34. अनुसूची 1 में संशोधन करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा अनुसूची 1 का पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संसद् द्वारा अधिनियमित किसी अन्य अधिनियम को उसमें सम्मिलित करके या उसमें पहले से विनिर्दिष्ट किसी अधिनियम का उसमें से लोप करके संशोधन कर सकेगी और ऐसी अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख को, ऐसा अधिनियम अनुसूची 1 में, यथास्िथति, सम्मिलित किया गया या उसमें से लोप किया गया समझा जाएगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन जारी की जाने वाली प्रत्येक अधिसूचना की प्रति, प्रारूप में संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना को जारी करने का अननुमोदन करने के लिए सहमत हो जांए या दोनों सदन अधिसूचना में उपांतरण करने के लिए सहमत हो जाएं तो अधिसूचना, यथास्िथति, जारी नहीं की जाएगी या ऐसे उपान्तरित रूप में जारी की जाएगी जिन पर दोनों सदनों की सहमति हुई है ।

35. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) ऐसे व्यक्तियों के लिए नियम जो धारा 4 की उपधारा (4) के खंड (क) के अधीन अधिकरण के समक्ष हाजिर होने के लिए हकदार होंगे;

(ख) धारा 4 की उपधारा (4) के खंड (ख) के अधीन आवेदनों और अपीलों तथा आवेदनों और अपीलों से संबंधित अन्य विषयों की सुनवाई की प्रक्रिया;

(ग) सदस्यों की न्यूनतम संख्या जो धारा 4 की उपधारा (4) के खंड (ग) के अधीन आवेदनों के वर्ग या वर्गों और अपीलों की बाबत आवेदनों और अपीलों की सुनावाई करेंगे;

(घ) अध्यक्ष द्वारा अधिविष्ठ होने के एक स्थान (जिसमें अधिविष्ठ होने का सामान्य स्थान सम्मिलित है) से अधिविष्ठ होने के दूसरे स्थान को मामलों का अन्तरण;

(ङ) ऐसी चयन समिति और धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन अधिकरण के न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य की नियुक्ति की रीति;

(च) धारा 9 के अधीन अधिकरण के अध्यक्ष, न्यायिक सदस्य और विशेषज्ञ सदस्य के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिसके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे भी हैं) ;

() धारा 10 की उपधारा (4) के अधीन अधिकरण के अध्यक्ष या न्यायिक सदस्य के विरुद्ध आरोपों की जांच की प्रक्रिया;

() धारा 12 की उपधारा (2) के अधीन अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की भर्ती; और उस धारा की उपधारा (4) के अधीन अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें;

(झ) धारा 13 के अधीन अधिकरण के अध्यक्ष द्वारा प्रयोग की जाने वाली वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां;

(ञ) धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन या अपील का प्ररूप, ऐसी विशिष्टियां जो उसमें अंतर्विष्ट होंगी और उसके साथ संलग्न किए जाने वाले दस्तावेज और संदेय फीस;

(ट) ऐसा कोई अन्य विषय जिसकी बाबत अधिकरण को धारा 19 की उपधारा (4) के खंड (ट) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियां होंगी;

(ठ) वह रीति और वे उद्देश्य जिनके लिए धारा 24 की उपधारा (2) के अधीन पर्यावरण अनुतोष निधि में जमा प्रतिकर या अनुतोष की रकम का उपयोग किया जाएगा;

(ड) धारा 30 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन परिवाद करने की सूचना देने की रीति;

(ढ) कोई अन्य विषय जिसका नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित है या जो नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए अथवा जिसकी बाबत नियमों द्वारा उपबंध किया जाना है ।

(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से  उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

36. कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन-इस अधिनियम की अनुसूची 3 में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियों का, उसमें विनिर्दिष्ट रीति में संशोधन किया जाएगा और ऐसे संशोधन अधिकरण की स्थापना की तारीख को प्रभावी होंगे

37. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो और जो कठिनाइयों को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत होः

परंतु इस धारा के अधीन कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

38. निरसन और व्यावृत्तियां-(1) राष्ट्रीय पर्यावरण अधिकरण, 1995 (1995 का 27) और राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण अधिनियम, 1997 (1997 का 22) (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् निरसित अधिनियम कहा गया है) इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं ।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी उक्त अधिनियमों के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

(3) राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकारण अधिनियम, 1997 (1997 का 22) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण, राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना पर समाप्त हो जाएगा ।

(4) राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण अधिनियम, 1997 (1997 का 22) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण के विघटन पर उक्त राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति और सदस्य के रूप में नियुक्त प्रत्येक अन्य व्यक्ति, जो राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना से ठीक पूर्व उस रूप में पद धारण कर रहे हैं, अपने-अपने पद रिक्त कर देगें और ऐसा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य के रूप में नियुक्त प्रत्येक अन्य व्यक्ति अपनी पदावधि के या सेवा की किसी संविदा के समय पूर्व पर्यवसान के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने के लिए हकदार होगा ।

(5) राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना पर या उससे पूर्व राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण अधिनियम, 1997 (1997 का 22) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण के समक्ष लंबित सभी मामले ऐसी स्थापना पर उक्त राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अंतरित हो जाएंगे और राष्ट्रीय हरित अधिकरण ऐसे मामलों का निपटारा इस प्रकार करेगा, मानो वे मामले उस अधिनियम के अधीन फाइल किए गए थे।

(6) ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी, जो राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण के विघटन के ठीक पूर्व राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण में प्रतिनियुक्ति के आधार पर नियुक्त किए गए थे, ऐसे विघटन पर, यथास्िथति, अपने मूल काडर, मंत्रालय या विभाग को प्रत्यावर्तित हो जाएंगे ।

(7) राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण के विघटन पर राष्ट्रीय पर्यावरण अपील प्राधिकरण के अधीन संविदा के आधार पर नियुक्त अधिकारी और अन्य कर्मचारी और जो ऐसे विघटन के ठीक पूर्व उस रूप में पद धारण किए हुए हैं, अपने पदों को रिक्त कर देंगे और ऐसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी अपनी पदावधि के या सेवा की संविदा के समय पूर्व पर्यवसान के लिए तीन मास का वेतन और भत्ते, या सेवा की शेष अवधि का वेतन और भत्ते इनमें से जो भी कम हो, का प्रतिकर का दावा करने के लिए हकदार होंगे ।

(8) उपधारा (2) से उपधारा (7) में निर्दिष्ट विशिष्ट विषयों का उल्लेख निरसन के प्रभाव के संबंध में साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 को साधारण लागू करने के प्रतिकूल या उसे प्रभावी करने वाला नहीं समझा जाएगा ।

अनुसूची 1

[धारा 14 (1), धारा 15(1), धारा 17(1)(क), धारा 17(2), धारा 19(4)(ञ) और धारा 34 (1) देखिए]

1.            जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 ।

2.            जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 ।

3.            वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 ।

4.            वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 ।

5.            पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 ।

6.            लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 । 

7.            जैव विविधता अधिनियम, 2002 ।

अनुसूची 2

[धारा 15(4) और धारा 17 (1) देखिए]

शीर्ष जिनके अधीन नुकसान के लिए प्रतिकर या अनुतोष हेतु दावा किया जा सकता है-

(क) मृत्यु;

(ख) स्थायी, अस्थायी, पूर्ण या आंशिक निःशक्तता या अन्य क्षति या बीमारी;

(ग) पूर्ण या आंशिक निःशक्तता या स्थायी अथवा अस्थायी निःशक्तता के कारण मजदूरी की हानि;

(घ) क्षतियों या बीमारी के उपचार के लिए उपगत चिकित्सा व्यय;

(ङ) प्राइवेट संपत्ति को नुकसान;

(च) प्रभावित व्यक्तियों को अनुतोष, सहायता और पुनर्वास प्रदान करने में सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उपगत व्यय;

(छ) किसी प्रशासनिक या विधिक कार्रवाई या किसी अपहानि अथवा नुकसान की भरपाई करने में सरकार द्वारा उपगत व्यय, जिसमें पर्यावरण क्षरण और पर्यावरण की क्वालिटी के पुनर्भरण के लिए प्रतिकर सम्मिलित है;

(ज) नुकसान करने वाले किसी क्रियाकलाप से उद्भूत या उससे संबंधित सरकार या स्थानीय प्राधिकारी को हानि;

(झ) दुधारू और भार ढ़ोने वाले पशुओं तथा जलीय जीवों सहित जन्तुओं को होने वाली किसी क्षति, नुकसान या विनाश के मद्दे दावे;

(ञ) जलीय वनस्पति, फसलों, सब्जियों, वृक्षों और फलोद्यानों सहित वनस्पति को होने वाली किसी क्षति, नुकसान या विनाश के मद्दे दावे;

(ट) मृदा प्रदूषण, वायु प्रदुषण, भूमि प्रदूषण तथा पारिस्थतिकी-तंत्रों के प्रदूषण सहित पर्यावरण को होने वाली किसी क्षति या नुकसान के मद्दे पुनर्भरण की लागत सहित दावे;

(ठ) प्राइवेट संपत्ति से भिन्न किसी संपत्ति की हानि और विनाश;

(ड) कारबार या नियोजन या दोनों की हानि;

(ढ) परिसंकटमय पदार्थ के हथालने के किसी क्रियाकलाप से उद्भूत या उससे संबंधित कोई अन्य दावा ।

अनुसूची 3

[धारा 36 देखिए]

कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन

भाग 1

जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का संशोधन

(1974 का 6)

नई धारा 33का अंतःस्थापन-धारा 33क के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-

33ख. राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपील-कोई व्यक्ति जो-,

(क) राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात् धारा 28 के अधीन किए गए अपील प्राधिकारी के किसी आदेश या विनिश्चय;

(ख) राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात्, धारा 29 के अधीन राज्य सरकार द्वारा पारित किसी आदेश; या

(ग) राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात्, धारा 33क के अधीन किसी बोर्ड द्वारा जारी निदेश,

से व्यथित है, वह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण को, उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार अपील फाइल कर सकेगा ।"। 

भाग 2

जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) उपकर अधिनियम, 1977 का संशोधन (1977 का 36)

1. धारा 13का संशोधन-धारा 13 की उपधारा (4) में, अन्तिम होगा" शब्दों के स्थान पर यदि धारा 13क के अधीन कोई अपील फाइल नहीं की गई है, अन्तिम होगा" शब्द, अंक और अक्षर रखे जाएंगे ।

2. नई धारा 13का अंतःस्थापन-धारा 13 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-

13क. राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपील-कोई व्यक्ति, जो राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात् धारा 13 के अधीन अपील प्राधिकारी के किसी आदेश या विनिश्चय से व्यथित है, वह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण को, उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार अपील फाइल कर सकेगा ।"।

भाग 3

वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 का संशोधन (1980 का 69)

नई धारा 2का अंतःस्थापन-धारा 2 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-

2क. राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपील-कोई व्यक्ति, जो राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात् धारा 2 के अधीन राज्य सरकार या अन्य प्राधिकारी के किसी आदेश या विनिश्चय से व्यथित है, वह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिरकण को, उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार, अपील फाइल कर सकेगा ।"।

 

भाग 4

वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 का संशोधन (1981 का 14)

नई धारा 31का अंतःस्थापन-धारा 31क के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-

31ख. राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपील-राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात् धारा 31 के अधीन अपील प्राधिकारी के आदेश या विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण को, उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार, अपील फाइल कर सकेगा ।"।

भाग 5

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 का संशोधन (1986 का 29)

नई धारा 5का अंतःस्थापन-धारा 5 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-

5राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपील-कोई व्यक्ति जो, राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात् धारा 5 के अधीन जारी किन्हीं निदेशों से व्यथित है, वह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण को, उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार, अपील फाइल पर सकेगा ।"।

भाग 6

जैव विविधता अधिनियम, 2002 का संशोधन (2003 का 18)

1. धारा 52 का संशोधन-धारा 52 में, परन्तुक के पश्चात् निम्नलिखित परन्तुक अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्ः-

परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ से ही लागू नहीं होगीः

परन्तु यह भी कि राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ से पूर्व उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित कोई अपील, उच्च न्यायालय द्वारा उसी प्रकार सुनी जाएगी और उसका निपटान किया जाएगा, मानो राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 3 के अधीन राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना नहीं की गई हो "

2. नई धारा 52का अंतःस्थापन-धारा 52 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्ः-

52क. राष्ट्रीय हरित अधिकरण को अपील-कोई व्यक्ति, जो राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के प्रारंभ होने पर या उसके पश्चात् राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण या राज्य जैव विविधता बोर्ड के किसी लाभ में हिस्सा बंटाने के अवधारण या आदेश से व्यथित है, वह राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय हरित अधिकरण को, उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार अपील फाइल कर सकेगा ।"।

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