पांडिचेरी (प्रशासन) अधिनियम, 1962
(1962 का अधिनियम संख्यांक 49)
[5 दिसम्बर, 1962]
पांडिचेरी का प्रशासन और उससे
संबद्ध विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के तेरहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पांडिचेरी (प्रशासन) अधिनियम, 1962 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण पांडिचेरी पर है ।
(3) यह 1962 के अगस्त के सोलहवें दिन को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) प्रशासक" से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त पांडिचेरी का प्रशासक अभिप्रेत है;
(ख) नियत दिन" से 1962 के अगस्त का सोलहवां दिन अभिप्रेत है, जो अर्पण-संधि के प्रवृत्त होने की तारीख है;
(ग) भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों" से ऐसे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व पांडिचेरी, कारिकल, माही और यनम के नाम से ज्ञात थे और भारत में फ्रांसीसी बस्तियों में समाविष्ट थे ;
(घ) उच्च न्यायालय" से मद्रास स्थित उच्च न्यायालय अभिप्रेत है;
(ङ) विधि" से विधि का बल रखने वाला कोई अधिनियम, अध्यादेश, विनियम, नियम, आदेश, उपविधि, डिक्री, या अन्य उपबंध (चाहे किसी भी नाम से ज्ञात है) अभिप्रेत है;
(च) पांडिचेरी" से भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों के राज्यक्षेत्रों को समाविष्ट करने वाला संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है;
(छ) अर्पण-संधि" से फ्रांस और भारत के बीच 1956 की मई के अट्ठाइसवें दिन की गई वह संधि अभिप्रेत है, जिसके अधीन फ्रांस ने भारत को फ्रांसीसी बस्तियों की संपूर्ण प्रभुता अर्पण की थी ।
3. पांडिचेरी के सम्बन्ध में अधिकारी और कृत्यकारी-पांडिचेरी के प्रशासन के लिए आवश्यक अधिकारियों और कृत्यकारियों को समय-समय पर नियुक्त करने की केन्द्रीय सरकार की शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे सभी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी और अधिकारी, चाहे भारत में हों या भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों में हों, जो नियत दिन के ठीक पूर्व उन बस्तियों या उनके किसी भाग के प्रशासन के संबंध में, जिसमें सरकार की परिसर और प्रतिनिधि सभा संबंधित हैं, विधिपूर्ण कृत्य करते थे तब तक पांडिचेरी के प्रशासन के संबंध में नियत दिन के यथापूर्व रीति में और विस्तार तक ऐसे परिवर्तित नाम से, यदि कोई हो, जैसा वह सरकार अवधारित करे, अपनी-अपनी शक्तियों और अधिकारिता का प्रयोग और अपने-अपने कर्तव्यों और कृत्यों का पालन करते रहेंगे, जब तक ऐसे न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी के संबंध में केन्द्रीय सरकार या प्रशासक द्वारा किसी भी समय अन्यथा निदेश न दिया जाए या जब तक विधि द्वारा अन्य उपबंध न किया जाए ।
4. विद्यमान विधियों का चालू रहना और उनका अनुकूलन-(1) भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों या उनके किसी भाग में नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त सभी विधियां पांडिचेरी में तब तक प्रवृत्त बनी रहेंगी जब तक सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा उनका संशोधन या निरसन न किया जाए :
परन्तु किसी ऐसी विधि में फ्रांसीसी गणराज्य के अध्यक्ष या सरकार के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे केन्द्रीय सरकार के प्रति निर्देश हैं, भारत में फ्रांसीसी बस्तियों के राज्यपाल, भारत में फ्रांसीसी बस्तियों के गणराज्य के आयुक्त, फ्रांसीसी बस्तियों के मुख्यायुक्त, पांडिचेरी राज्य के मुख्यायुक्त या पांडिचेरी के मुख्यायुक्त के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे पांडिचेरी के प्रशासक के प्रति निर्देश हैं और पांडिचेरी राज्य के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे पांडिचेरी के प्रति निर्देश हैं ।
(2) पांडिचेरी के प्रशासन से संबंधित किसी ऐसी विधि के लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए और किसी ऐसी विधि के उपबन्धों को संविधान के उपबन्धों के अनुरूप बनाने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार, नियत दिन से तीन वर्ष के भीतर, आदेश द्वारा, चाहे निरसन के रूप में या संशोधन के रूप में, ऐसे अनुकूलन और उपान्तर कर सकेगी, जैसे आवश्यक या समीचीन हों और तदुपरि प्रत्येक ऐसी विधि, इस प्रकार किए गए अनुकूलनों और उपान्तरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी ।
5. संपत्ति और आस्तियां-शंका के परिवर्जन के लिए यह एतद्द्वारा घोषित किया जाता है कि पांडिचेरी के भीतर की ऐसी सभी सम्पत्ति और आस्तियां, जो नियत दिन के ठीक पूर्व फ्रांसीसी गणराज्य की सरकार में निहित थीं, अर्पण-संधि में अन्यथा अभिव्यक्त रूप से यथा उपबंधित के सिवाय, संघ में निहित होंगी ।
6. अधिकार और बाध्यताएं-अर्पण-संधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए भूतपूर्व फ्रांसीसी बास्तियों के प्रशासन के संबंध में या उससे उद्भूत होने वाले फ्रांसीसी गणराज्य की सरकार के सभी अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं, नियत दिन से, केन्द्रीय सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं होंगी ।
7. विद्यमान करों का चालू रहना-ऐसी सभी कर, शुल्क, उपकर और फीसों का, जो नियत दिन के ठीक पूर्व भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों या उनके किसी भाग में विधियुक्त रीति से उद्गृहीत की जाती थीं तब तक पांडिचेरी में उद्गृहीत किया जाना और वैसे ही प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जाना बना रहेगा जब तक किसी सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्य उपबन्ध न किया जाए ।
8. पांडिचेरी पर अधिनियमितियां विस्तारित करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, कोई भी ऐसी अधिनियमिति, जो अधिसूचना की तारीख को किसी राज्य में प्रवृत्त हो, ऐसे निर्बन्धनों और उपान्तरों सहित, जिन्हें वह ठीक समझे, पांडिचेरी पर विस्तारित कर सकेगी ।
9. मद्रास उच्च न्यायालय की अधिकारिता का पांडिचेरी पर विस्तारण-1962 के नवम्बर के छठे दिन से उच्च न्यायालय की अधिकारिता पांडिचेरी पर विस्तारित होगी ।
10. उच्च न्यायालय की अधिकारिता-(1) धारा 9 के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, पांडिचेरी के बारे में, उच्च न्यायालय को ऐसी सभी अधिकारिता होगी जो नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि के अधीन भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों के बारे में फ्रांस के सर्वोच्च अपील न्यायालय (क्रूर द कासस्यां, cour de cassation), उच्च माध्यस्थम् न्यायालय (क्रूर सुपरयूर दारबीत्राज, cour superior d’ Arbitrage) और फ्रांस की राज्य परिषद् (कांसेय देता, conseil d’ Etat) द्वारा प्रयोक्तव्य थी :
परन्तु पांडिचेरी के न्यायालयों और अधिकरणों के विनिश्चयों से अपीलों का अवधारण करते समय, उच्च न्यायालय यावत्शक्य वैसी ही प्रक्रिया का अनुसरण करेगा और उसे उस पर कोई निर्णय, डिक्री या आदेश पारित करने की वैसी ही शक्ति होगी, जैसी [तमिलनाडु राज्य] में न्यायालयों के विनिश्चयों से अपीलों का अवधारण करते समय वह अनुसरण करता है और जो उसे प्राप्त है ।
(2) नियत दिन के ठीक पूर्व फ्रांस के सर्वोच्च अपील न्यायालय (क्रूर द कासस्यां, cour de cassation) या उच्च माध्यस्थम् न्यायालय (क्रूर सुपरयूर दारबीत्राज, cour superior d’ Arbitrage) अथवा राज्य परिषद् (कांसेय देता, conseil d’ Etat) के समक्ष लम्बित भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों के किसी न्यायालय या अधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश से या उसके बारे में सभी अपीलें और अन्य कार्यवाहियां और नियत दिन के ठीक पूर्व राज्य परिषद् (क्रांसेय देता conseil d’ Etat) के समक्ष लाम्बित उन बास्तियों के संबंध में सभी मूल कार्यवाहियां इस अधिनियम के आधार पर उच्च न्यायालय को अन्तरित हो जाएंगी और इस अधिनियम द्वारा उस पर प्रदत्त अधिकारिता के प्रयोग में उस उच्च न्यायालय द्वारा उनका इस प्रकार व्ययन किया जाएगा मानो ऐसी अपीलें और अन्य कार्यवाहियां उस उच्च न्यायालय के समक्ष फाइल की गई हों ।
स्पष्टीकरण-नियत दिन के पूर्व फाइल की गई किन्तु फ्रांस के सर्वोच्च अपील न्यायालय (क्रूर द कासस्यां), या उच्च माध्यस्थम् न्यायालय (क्रूर सुपरयूर दारबीत्राज,) अथवा राज्य परिषद् (कांसेय देता,) को न भेजी गई सभी अपीलों और अन्य कार्यवाहियों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए उस न्यायालय के समक्ष लम्बित, यथास्थिति, अपीलें या कार्यवाहियां हैं ।
11. उच्च न्यायालय के समक्ष विधि व्यवसाय करने के लिए हकदार अधिवक्ता-अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो उच्च न्यायालय द्वारा बनाए जाएं, कोई ऐसा व्यक्ति, जो पांडिचेरी स्थित उच्च अपील अधिकरण (ट्रिब्यूनल सुपरयूर दापेल, च्र्द्धत्डद्वदठ्ठथ् च्द्वद्रड्ढद्धत्हद्वद्ध ड्डऱ् एद्रद्रड्ढथ्) के समक्ष विधि व्यवसाय करने का हकदार है, पांडिचेरी से उच्च न्यायालय के समक्ष आने वाले मामलों के संबंध में उस उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने के हकदार अधिवक्ता के रूप में मान्यताप्राप्त होगा ।
12. उच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति-उच्च न्यायालय समय-समय पर निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध करने हेतु इस अधिनियम से सुसंगत नियम बना सकेगा, अर्थात् :-
(क) उच्च न्यायालय में फाइल किए गए किन्हीं कागज-पत्रों का अनुवाद और सभी अपीलों की सुनवाई के लिए अभिलेख-पुस्तिकाओं का बनाया जाना और किन्हीं ऐसे कागज-पत्रों की प्रतिलिपि करना, टाइप करना या मुद्रण करना अथवा अनुवाद करना और ऐसे व्यक्तियों से, जिनके अनुरोध पर या जिनकी ओर से वे कागज-पत्र फाइल किए गए हैं, उसके संबंध में उपगत खर्च की वसूली;
(ख) उच्च न्यायालय में कार्यवाहियां संस्थित करने के लिए संदेय न्यायालय फीस, उच्च न्यायालय द्वारा या उस न्यायालय के किसी अधिकारी द्वारा जारी की गई आदेशिकाओं के लिए भारित की जाने वाली फीस और उच्च न्यायालय में ऐसी कार्यवाही के किसी पक्षकार के अधिवक्ता की फीस के बारे में किसी कार्यवाही में संदेय रकम;
(ग) उच्च न्यायालय में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया;
(घ) पांडिचेरी के अधिवक्ताओं का अनुमोदन, प्रवेश, नामांकन, हटाया जाना और निलम्बन ।
13. कतिपय आदेशों और डिक्रियों या विधिमान्यकरण-(1) भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश से या उसके बारे में किसी अपील या अन्य कार्यवाही में 1954 के नवम्बर के प्रथम दिन से प्रारम्भ होने वाली और नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान फ्रांस के सर्वोच्च अपील न्यायालय (क्रूर द कासस्यां,) या उच्च माध्यस्थम् न्यायालय (क्रूर सुपरयूर दारबीत्राज,) अथवा राज्य परिषद् (कांसेय देता,) द्वारा किए गए तात्पर्यित प्रत्येक आदेश या डिक्री के बारे में यह समझा जाएगा कि वह विधि के अनुसार विधिमान्य रूप से की गई है, और वह सभी प्रयोजनों के लिए इस प्रकार प्रभावी होगी मानो वह इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त अधिकारिता के प्रयोग में उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया कोई आदेश या की गई कोई डिक्री हो ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां फ्रांस के किसी न्यायालय द्वारा किसी ऐसे मामले में, जिसमें प्रत्यर्थी को भूतपूर्व फ्रांसीसी बस्तियों के प्रशासन के माध्यम से भेजे गए समन की तामील के अभाव में उपस्थित होने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था, 17 मार्च, 1960 के पश्चात् कोई विनिश्चय किया गया है, वहां ऐसा विनिश्चय कदापि नहीं किया गया समझा जाएगा और वह मामला ऐसे न्यायालय के समक्ष लम्बित समझा जाएगा, जिसके द्वारा ऐसा विनिश्चय किया गया था और तदनुसार, यथास्थिति, उच्च न्यायालय को या फ्रांस के न्यायालय के तत्स्थानी पांडिचेरी के न्यायालय को, जिसमें वह मामला लम्बित समझा जाएगा अन्तरित हो जाएगा ।
(3) 1962 के नवम्बर के छठे दिन के पश्चात्, यथाशक्यशीघ्र, प्रशासक, यथास्थिति, उच्च न्यायालय को या तत्स्थानी न्यायालय को प्रत्येक ऐसे मामले का अभिलेख, जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट किया गया है, उस मामले में समन की तामील प्रत्यर्थीं पर नहीं की गई थी इस प्रमाणपत्र सहित भेजेगा ।
14. अपीलों के लिए परिसीमाकाल-(1) उच्च न्यायालय को अपीलों के लिए परिसीमाकाल की अवधि निम्नलिखित के अनुसार होगी :-
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क्र०सं० |
अपील का वर्णन |
परिसीमा काल |
वह समय जिससे अवधि शुरू होती है |
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1. |
किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध सिविल अपील । |
90 दिन |
उस निर्णय या आदेश की तारीख । |
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2. |
मृत्यु-दण्डादेश के विरुद्ध दाण्डिक अपील । |
7 दिन |
दण्डादेश की तारीख । |
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3. |
मृत्यु-दण्डादेश से भिन्न किसी दण्डादेश या आदेश के विरुद्ध दाण्डिक अपील । |
30 दिन |
उस दण्डादेश या आदेश की तारीख । |
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4. |
दोषमुक्ति के आदेश के विरुद्ध दाण्डिक अपील । |
90 दिन |
दोषमुक्ति के आदेश की तारीख । |
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5. |
फ्रांसीसी श्रम संहिता, 1952 की धारा 207 के अधीन श्रम अपील । |
30 दिन |
उस निर्णय या आदेश की तारीख । |
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6. |
फ्रांसीसी श्रम संहिता, 1952 की धारा 216 के अधीन श्रम अपील । |
30 दिन |
वह तारीख जिसको अपील करने वाले पक्षकार को विशेषज्ञ की रिपोर्ट और सिफारिश संसूचित की जाती है । |
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7. |
पांडिचेरी के प्रशासनिक अधिकरण के किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध अपील । |
90 दिन |
उस निर्णय या आदेश की तारीख । |
(2) परिसीमाकाल की संगणना करने में मृत्यु-दंडादेश के विरुद्ध किसी दाण्डिक अपील के मामले में के सिवाय जिस मामले के विरुद्ध अपील की गई है, यथास्थिति, उस निर्णय, आदेश, रिपोर्ट और सिफारिश की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने का समय अपवर्जित किया जाएगा ।
(3) दण्डादेश के अधीन और अभिरक्षा में के किसी अभियुक्त व्यक्ति द्वारा की गई किसी अपील के मामले में, जिस तारीख को वह उस जेल के अधीक्षक के पास, जिसमें वह निरुद्ध रखा गया है, अपील का ज्ञापन देता है, वह तारीख उच्च न्यायालय में अपील की प्रस्तुति की तारीख समझी जाएगी ।
(4) कोई भी अपील उसके लिए विहित परिसीमाकाल के पश्चात् तब स्वीकृत की जा सकेगी, जब अपीलार्थी न्यायालय का यह समाधान कर देता है कि ऐसी अवधि के भीतर अपील न करने के लिए उसके पास पर्याप्त हेतुक था ।
15. कतिपय मामलों में परिसीमाकाल की व्यावृत्ति-धारा 14 के अधीन या किसी अन्य विधि के अधीन परिसीमकाल की संगणना करने में, कोई ऐसी अवधि, जिसके दौरान कोई अपील इसलिए फाइल नहीं की जा सकी या कार्यवाही संस्थित नहीं की जा सकी कि उस उच्च न्यायालय की अधिकारिता पांडिचेरी को विस्तारित नहीं थी, अपवर्जित की जाएगी ।
16. अर्थान्वयन का नियम-पांडिचेरी में प्रवृत्त किसी विधि में सर्वोच्च अपील न्यायालय (क्रूर द कासस्यां,) या उच्च माध्यस्थम् न्यायालय (क्रूर सुपरयूर दारबीत्राज,) या राज्य परिषद् (कांसेय देता, व़्दृ) के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे उस उच्च न्यायालय के प्रति निर्देश हैं ।
17. विधियों के अर्थान्वयन की शक्ति-पांडिचेरी के संबंध में किसी विधि का लागू होना सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए कोई न्यायालय या अन्य प्राधिकारी, सार पर प्रभाव डाले बिना, किसी ऐसी विधि का, ऐसी रीति से अर्थ लगा सकेगा, जो उस न्यायालय या अन्य प्राधिकारी के समक्ष विषय को उसके अनुकूल बनाने के लिए आवश्यक या उचित हो ।
18. अन्य विधियों का प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध, पांडिचेरी में प्रवृत्त किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
19. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में यदि कोई कठिनाई उत्पन्न हो तो, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी जो कठिनाइयों को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।
(2) उपधारा (1) के अधीन का कोई भी आदेश इस प्रकार बनाया जा सकेगा कि वह नियत दिन से पूर्वतर किसी तारीख से भूतलक्षी न हो ।
20. निरसन और व्यावृत्ति-(1) पांडिचेरी (प्रशासन) अध्यादेश, 1962 (1962 का 8) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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