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प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978 ( Press Council Act, 1978 )


 

प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978

(1978 का अधिनियम संख्यांक 37)

[7 सितम्बर, 1978]

भारत में प्रेस की स्वतंत्रता और समाचारपत्रों तथा समाचार

एजेन्सियों के स्तर को बनाए रखने और उनमें सुधार

करने के प्रयोजन के लिए एक प्रेस परिषद् की

स्थापना के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के उनतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

                (क) अध्यक्ष" से परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;

                (ख) परिषद्" से धारा 4 के अधीन स्थापित भारतीय प्रेस परिषद् अभिप्रेत है ;

                (ग) सदस्य" से परिषद् का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत उसका अध्यक्ष भी है ;

                (घ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

                (ङ) सम्पादक" और समाचारपत्र" पदों के वही अर्थ हैं जो प्रेस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 (1867 का 25) में हैं और श्रमजीवी पत्रकार" पद का वही अर्थ है जो श्रमजीवी पत्रकार और अन्य समाचारपत्र कर्मचारी (सेवा की शर्तें) और प्रकीर्ण उपबन्ध अधिनियम, 1955 (1955 का 45) में है ।

3. उन अधिनियमितियों के संबंध में अर्थान्वयन का नियम जिनका विस्तार जम्मू-कश्मीर और सिक्किम राज्यों पर नहीं है-इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति निर्देश का, जो जम्मू-कश्मीर अथवा सिक्किम राज्यों में प्रवृत्त नहीं है, ऐसे राज्य के सम्बन्ध में अर्थान्वयन ऐसे राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति निर्देश से, यदि कोई हो, किया जाएगा ।

अध्याय 2

प्रेस परिषद् की स्थापना

4. परिषद् का निगमन-(1) उस तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, भारतीय प्रेस परिषद् के नाम से एक परिषद् की स्थापना की जाएगी ।

(2) उक्त परिषद् शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली एक निगमित निकाय होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगी और उस पर वाद लाया जाएगा ।

5. परिषद् की संरचना-(1) परिषद् एक अध्यक्ष और अट्ठाईस अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगी ।

(2) अध्यक्ष, ऐसा व्यक्ति होगा जो समिति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा और यह समिति राज्य सभा के सभापति, लोक सभा के अध्यक्ष और उपधारा (6) के अधीन परिषद् के सदस्यों द्वारा निर्वाचित एक व्यक्ति से मिलकर बनेगी और इस प्रकार किया गया नामनिर्देशन उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किया जाता है ।

(3) अन्य सदस्यों में से,-

(क) तेरह श्रमजीवी पत्रकार, ऐसी प्रक्रिया के अनुसरण में नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जो विहित की जाए, जिनमें से छह समाचारपत्रों के सम्पादक होंगे और शेष सात सम्पादकों से भिन्न श्रमजीवी पत्रकार होंगे, किन्तु भारतीय भाषाओं में प्रकाशित समाचारपत्रों के सम्बन्ध में ऐसे सम्पादकों की और सम्पादकों से भिन्न ऐसे श्रमजीवी पत्रकारों की संख्या क्रमशः तीन और चार से कम नहीं होगी ;

(ख) छह उन व्यक्तियों में से, जो समाचारपत्रों के स्वामी हों या समाचारपत्रों के प्रबंध का कारबार करते हों, ऐसी प्रक्रिया के अनुसरण में नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जो विहित की जाए, किन्तु यह इस प्रकार किया जाएगा कि बड़े समाचारपत्रों, मध्यम समाचारपत्रों और छोटे समाचारपत्रों के प्रत्येक प्रवर्ग में से दो प्रतिनिधि होंगे ;

(ग) एक उन व्यक्तियों में से, जो समाचार एजेंसियों का प्रबन्ध करते हों, ऐसी प्रक्रिया के अनुसरण में नामनिर्दिष्ट किया जाएगा जो विहित की जाए ;

(घ) तीन ऐसे व्यक्ति होंगे, जिन्हें शिक्षा और विज्ञान, विधि और साहित्य तथा संस्कृति के बारे में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो और इनमें से क्रमशः एक विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा, एक भारत की विधिज्ञ परिषद् द्वारा और एक साहित्य अकादमी द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;

(ङ) पांच संसद् सदस्य होंगे जिनमें से तीन लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा लोक सभा के सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और दो राज्य सभा के सभापति द्वारा राज्य सभा के सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे :

परन्तु कोई श्रमजीवी पत्रकार, जो किसी समाचारपत्र का स्वामी हो या उसके प्रबंध का कारबार करता हो, खंड (क) के अधीन नामनिर्देशन का पात्र न होगा :

परन्तु यह और कि खण्ड (क) और (ख) के अधीन नामनिर्देशन इस प्रकार किए जाएंगे कि नामनिर्देशित व्यक्तियों में एक से अधिक ऐसे व्यक्ति न हों जो किसी समाचारपत्र में या एक ही नियंत्रण या प्रबन्ध के अधीन समाचारपत्रों के किसी समूह में हितबद्ध हों ।

स्पष्टीकरण-खण्ड (ख) के प्रयोजनों के लिए कोई समाचारपत्र"-

(i) बड़ा समाचारपत्र" समझा जाएगा यदि उसके सभी संस्करणों का कुल परिचलन हर एक अंक की पचास हजार प्रतियों से अधिक का हो ;

(ii) मध्यम समाचारपत्र" समझा जाएगा यदि उसके सभी संस्करणों का कुल परिचलन हर एक अंक की पन्द्रह हजार प्रतियों से अधिक का हो, किन्तु पचास हजार प्रतियों से अधिक का न हो ;

(iii) छोटा समाचारपत्र" समझा जाएगा यदि उसके सभी संस्करणों का कुल परिचलन हर एक अंक की पन्द्रह हजार प्रतियों से अधिक का न हो ।

                (4) उपधारा (3) के खण्ड (क), खण्ड (ख) या खण्ड (ग) के अधीन कोई नामनिर्देशन करने के पूर्व, प्रथम परिषद् की दशा में, केन्द्रीय सरकार, और किसी पश्चात्वर्ती परिषद् की दशा में पूर्ववर्ती परिषद् का निवृत्त होने वाला अध्यक्ष, उक्त खण्ड (क), खण्ड (ख) या खण्ड (ग) में निर्दिष्ट प्रवर्गों के व्यक्तियों के ऐसे संगमों से, जो प्रथम परिषद् की दशा में केन्द्रीय सरकार द्वारा और पश्चात्वर्ती परिषदों की दशा में स्वयं परिषद् द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किए जाएं, नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले सदस्यों की दुगुनी संख्या में नामों के पेनल विहित रीति से आमंत्रित करेगा :

परन्तु जहां उक्त खण्ड (ग) में निर्दिष्ट प्रवर्ग के व्यक्तियों का कोई संगम नहीं है, वहां ऐसी समाचार एजेंसियों से, जो उपर्युक्त रूप में अधिसूचित की जाएं, नामों के पैनल आमन्त्रित किए जाएंगे ।

(5) केन्द्रीय सरकार उपधारा (3) के अधीन सदस्यों के रूप में नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों के नाम, राजपत्र में अधिसूचित करेगी और ऐसा प्रत्येक नामनिर्देशन उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको वह अधिसूचित किया जाता है

(6) उपधारा (5) के अधीन अधिसूचित परिषद् के सदस्य उपधारा (2) में निर्दिष्ट समिति का सदस्य होने के लिए एक व्यक्ति को अपने में से ऐसी प्रक्रिया के अनुसरण में निर्वाचित करेंगे जो विहित की जाए और ऐसे निर्वाचन के प्रयोजन के लिए परिषद् के सदस्यों के अधिवेशन का सभापतित्व वह व्यक्ति करेगा जो उनके द्वारा अपने में से चुना गया हो ।

6. सदस्यों की पदावधि और निवृत्ति-(1) इस धारा में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, अध्यक्ष और अन्य सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे :

परन्तु अध्यक्ष, ऐसा पद, धारा 5 के उपबन्धों के अनुसरण में परिषद् के पुनर्गठित होने तक या छह मास की अवधि के लिए, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, धारण करता रहेगा ।

(2) यदि धारा 5 की उपधारा (3) के खंड (), खण्ड () या खण्ड () के अधीन सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट व्यक्ति धारा 14 की उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन परिनिन्दित किया जाता है तो वह परिषद् का सदस्य नहीं रहेगा

(3) धारा 5 की उपधारा (3) के खण्ड (ङ) के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्य की पदावधि उसी समय समाप्त हो जाएगी जब वह उस सदन का सदस्य न रह जाए जिससे वह नामनिर्दिष्ट किया गया था ।

(4) यदि कोई सदस्य किसी ऐसे प्रतिहेतु के बिना, जो परिषद् की राय में पर्याप्त हो, परिषद् के तीन क्रमवर्ती अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है तो यह समझा जाएगा कि उसने अपना स्थान रिक्त कर दिया है ।

(5) अध्यक्ष, केन्द्रीय सरकार को लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और कोई भी अन्य सदस्य अध्यक्ष को लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्यागपत्र, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या अध्यक्ष द्वारा स्वीकार कर लिए जाने पर यह समझा जाएगा कि, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य ने अपना पद त्याग दिया है

(6) उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) या उपधारा (5) के अधीन या अन्यथा होने वाली कोई रिक्ति, यथाशक्यशीघ्र, उसी रीति से नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी जिस रीति से पद रिक्त करने वाले सदस्य को नामनिर्दिष्ट किया गया था और इस प्रकार नामनिर्दिष्ट सदस्य, उस शेष अवधि के लिए पद धारण करेगा जिसके लिए वह सदस्य जिसके स्थान पर वह नामनिर्दिष्ट किया गया है, पद धारण करता ।

(7) निवृत्त होने वाला सदस्य अधिक से अधिक एक पदावधि के लिए पुनः नामनिर्देशित किए जाने का पात्र होगा ।

7. सदस्यों की सेवा की शर्तें-(1) अध्यक्ष पूर्णकालिक अधिकारी होगा और उसे ऐसा वेतन दिया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, और अन्य सदस्य परिषद् के अधिवेशनों में हाजिर होने के लिए ऐसे भत्ते या फीस प्राप्त करेंगे जो विहित की जाए ।

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, सदस्यों की सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि परिषद् के सदस्य का पद उसके धारक को संसद् के दोनों में से किसी भी सदन का सदस्य चुने जाने या रहने के लिए निरर्हित नहीं करेगा ।

8. परिषद् की समितियां-(1) परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन के प्रयोजन के लिए, अपने सदस्यों में से साधारण या विशेष प्रयोजनों के लिए ऐसी समितियों का गठन कर सकेगी जैसी वह आवश्यक समझे और इस प्रकार गठित प्रत्येक समिति ऐसे कृत्यों का पालन करेगी जो परिषद् उसे सौंपे ।

(2) परिषद् को उतनी संख्या में, जितनी वह ठीक समझे, ऐसे अन्य व्यक्तियों को, जो परिषद् के सदस्य नहीं हैं, उपधारा (1) के अधीन गठित किसी समिति के सदस्यों के रूप में सहयोजित करने की शक्ति होगी ।

(3) किसी भी ऐसे सदस्य को उस समिति के किसी भी अधिवेशन में, जिसमें उसे इस प्रकार सहयोजित किया गया है, हाजिर होने का और वहां पर चर्चा में भाग लेने का अधिकार होगा, किन्तु उसे मतदान का अधिकार नहीं होगा और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा ।

9. परिषद् और समितियों के अधिवेशन-परिषद् या उसकी किसी समिति का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के सम्बन्ध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा उपबन्धित किए जाएं ।

10. परिषद् के सदस्यों में रिक्तियां होने या उसके गठन में त्रुटि होने से परिषद् के कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-परिषद् का कोई भी कार्य या उसकी कोई भी कार्यवाही परिषद् में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि के कारण ही अविधिमान्य नहीं समझी जाएगी ।

11. परिषद् के कर्मचारिवृन्द-(1) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, परिषद् एक सचिव और ऐसे अन्य कर्मचारी नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण पालन के लिए आवश्यक समझे ।

(2) कर्मचारियों की सेवा के निबन्धन और शर्तें वे होंगी जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।

12. परिषद् के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन-परिषद् के सभी आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन अध्यक्ष या परिषद् द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी भी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से होगा और परिषद् द्वारा निकाली गई अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन सचिव या परिषद् के किसी ऐसे अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से होगा जो इस निमित्त उसी रीति से प्राधिकृत हो ।

अध्याय 3

परिषद् की शक्तियां और कृत्य

13. परिषद् के उद्देश्य और कृत्य-(1) परिषद् का उद्देश्य भारत में प्रेस की स्वतन्त्रता और समाचारपत्रों तथा समाचार एजेन्सियों के स्तर बनाए रखना तथा उनमें सुधार करना होगा ।

(2) परिषद् अपने उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए निम्नलिखित कृत्यों का पालन कर सकेगी, अर्थात् :-

(क) समाचारपत्रों तथा समाचार एजेन्सियों द्वारा अपनी स्वतन्त्रता बनाए रखने में उनकी सहायता करना ;

() समाचारपत्रों, समाचार एजेन्सियों और पत्रकारों के लिए उच्च वृत्तिक स्तर के अनुसार एक आचार-संहिता बनाना ;

(ग) यह सुनिश्चित करना कि समाचारपत्रों, समाचार एजेन्सियों और पत्रकारों की ओर से लोक-रुचि के उच्च स्तर बनाए रखे जाएं, और नागरिक अधिकारों और उत्तरदायित्वों दोनों की सम्यक् भावना का पोषण करना ;

() उन सब व्यक्तियों में जो पत्रकारिता की वृत्ति में लगे हुए हैं उत्तर-दायित्व और लोक-सेवा की भावना प्रोत्साहित करना ;

(ङ) ऐसी किसी भी बात पर जिससे लोकहित और लोक-महत्व के समाचार के प्रदाय और प्रसार का निर्बन्धन सम्भाव्य हो, विचार करते रहना ;

(च) भारत में किसी समाचारपत्र या समाचार एजेन्सियों द्वारा किसी विदेशी स्रोत से प्राप्त सहायता के मामलों का, जिनके अन्तर्गत वे मामले भी हैं जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे निर्देशित किए जाएं या किसी व्यष्टि, व्यक्तियों के संगम या अन्य संगठन द्वारा उसकी जानकारी में लाए जाएं, पुनर्विलोकन करते रहना :

परन्तु इस खंड की कोई बात भारत के किसी भी समाचारपत्र या समाचार एजेन्सी द्वारा किसी विदेशी स्रोत से प्राप्त सहायता के किसी मामले में किसी अन्य ऐसी रीति से, जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, कार्रवाई करने से केन्द्रीय सरकार को प्रवारित न करेगी ;

(छ) विदेशी समाचारपत्रों के, जिनके अन्तर्गत किसी राजदूतावास द्वारा या भारत में विदेशी राज्य के किसी प्रतिनिधि द्वारा निकाली गई पत्रिकाएं भी हैं, अध्ययन का भार अपने ऊपर लेना, उनका परिचलन और प्रभाव ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजन के लिए, विदेशी राज्य" पद का वही अर्थ होगा जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908(1908 का 5) की धारा 87क में है ;

(ज) समाचारपत्र निकालने या उनके प्रकाशन में या समाचार एजेन्सियों में लगे हुए व्यक्तियों के सभी वर्गों में उचित कृत्यिक सम्बन्ध की अभिवृद्धि करना :

परन्तु इस खंड की कोई बात परिषद् पर उन विवादों की बाबत कोई कृत्य सौंपने वाली नहीं समझी जाएगी जिन्हें औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) लागू है ;

(झ) समाचारपत्रों और समाचार एजेन्सियों के स्वामित्व के संकेन्द्रण या उनके अन्य पहलुओं से सम्बन्धित ऐसी घटना पर निगाह रखना जिनका प्रेस की स्वतन्त्रता पर प्रभाव पड़ सकता हो ;

(ञ) ऐसे अध्ययन-कार्य हाथ में लेना जो परिषद् को सौंपे जाएं और किसी ऐसे विषय के बारे में अपनी राय प्रकट करना जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे निर्दिष्ट किया जाए ;

(ट) ऐसे अन्य कार्य करना जो उपर्युक्त कृत्यों के निर्वहन में आनुषंगिक या साधक हों ।

14. परिनिन्दा करने की शक्ति-(1) जहां परिषद् को, उससे किए गए परिवाद के प्राप्त होने पर या अन्यथा, यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी समाचारपत्र या समाचार एजेंसी ने पत्रकारिक सदाचार या लोक-रुचि के स्तर का अतिवर्तन किया है या किसी संपादक या श्रमजीवी पत्रकार ने कोई वृत्तिक अवचार किया है, वहां परिषद् सम्बद्ध समाचारपत्र या समाचार एजेन्सी, संपादक या पत्रकार को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उस रीति से जांच कर सकेगी जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा उपबंधित हो और यदि उसका समाधान हो जाता है कि ऐसा करना आवश्यक है तो, वह ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यथास्थिति, उस समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, सम्पादक या पत्रकार को चेतावनी दे सकेगी, उसकी भर्त्सना कर सकेगी या उसकी परिनिन्दा कर सकेगी, या उस सम्पादक या पत्रकार के आचरण का अननुमोदन कर सकेगी :

परन्तु यदि अध्यक्ष की राय में जांच करने के लिए कोई पर्याप्त आधार नहीं है तो परिषद् किसी परिवाद का संज्ञान नहीं कर सकेगी ।

(2) यदि परिषद् की यह राय है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह किसी समाचारपत्र से यह अपेक्षा कर सकेगी कि वह समाचारपत्र, या समाचार एजेंसी, सम्पादक या उसमें कार्य करने वाले पत्रकार के विरुद्ध इस धारा के अधीन किसी जांच से संबंधित किन्हीं विशिष्टियों को, जिनके अंतर्गत उस समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, संपादक या पत्रकार का नाम भी है, उसमें ऐसी रीति से जैसी परिषद् ठीक समझे, प्रकाशित करे ।

(3) उपधारा (1) की किसी भी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह परिषद् को किसी ऐसे मामले में जांच करने की शक्ति प्रदान करती है जिसके बारे में कोई कार्यवाही किसी न्यायालय में लम्बित हो ।

(4) यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन परिषद् का विनिश्चय अन्तिम होगा और उसे किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

15. परिषद् की साधारण शक्तियां-(1) इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन या कोई जांच करने के प्रयोजन के लिए परिषद् को निम्नलिखित बातों के बारे में सम्पूर्ण भारत में वे ही शक्तियां होंगी जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निहित हैं, अर्थात् :-

(क) व्यक्तियों को समन करना और हाजिर कराना तथा उनकी शपथ पर परीक्षा ;

(ख) दस्तावेजों का प्रकटीकरण और उनका निरीक्षण ;

(ग) साक्ष्य का शपथ पर लिया जाना ;

(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपियों की अध्यपेक्षा करना ;

(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ;

(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।

(2) उपधारा (1) की कोई बात किसी समाचारपत्र, समाचार एजेंसी, सम्पादक या पत्रकार को, उस समाचारपत्र द्वारा प्रकाशित या उस समाचार एजेंसी, सम्पादक या पत्रकार द्वारा प्राप्त या रिपोर्ट किए गए किसी समाचार या सूचना का स्रोत प्रकट करने के लिए विवश करने वाली नहीं समझी जाएगी ।

(3) परिषद् द्वारा की गई प्रत्येक जांच भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी ।

(4)  यदि परिषद् अपने उद्देश्यों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए या इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए आवश्यक समझती है तो वह अपने किसी विनिश्चय में या रिपोर्ट में किसी प्राधिकरण के, जिसके अन्तर्गत सरकार भी है, आचरण के सम्बन्ध में ऐसा मत प्रकट कर सकेगी जो वह ठीक समझे

16. फीसों का उद्ग्रहण-(1) परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के प्रयोजन के लिए फीस ऐसी दर पर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, रजिस्ट्रीकृत समाचारपत्रों तथा समाचार एजेंसियों से उद्गृहीत कर सकेगी और विभिन्न समाचारपत्रों के लिए विभिन्न दरें, उनके प्रचार और अन्य बातों को ध्यान में रखते हुए, विहित की जा सकेंगी ।

(2) परिषद् को उपधारा (1) के अधीन संदेय कोई फीस, भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल की जा सकेगी ।

17. परिषद् को संदाय-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, परिषद् को ऐसी धनराशियों का संदाय अनुदानों के रूप में कर सकेगी जो केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के अधीन परिषद् के कृत्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।

18. परिषद् की निधि-(1) परिषद् की अपनी निधि होगी और परिषद् द्वारा संगृहीत फीस, और ऐसी सब राशियां, जो   समय-समय पर उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा संदत्त की जाएं और सभी अनुदान तथा अग्रिम धन, जो उसे किसी अन्य प्राधिकरण या व्यक्ति द्वारा दिए गए हैं, निधि में जमा किए जाएंगे, और परिषद् द्वारा सभी संदाय उस निधि में से किए जाएंगे ।

(2) परिषद् का सब धन ऐसे बैंकों में निक्षिप्त किया जाएगा या ऐसी रीति से विनिहित किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से परिषद् विनिश्चय करे ।

(3) परिषद् ऐसी राशियां व्यय कर सकेगी जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के पालन के लिए ठीक समझे और ऐसी राशियां परिषद् की निधि में से संदेय व्यय मानी जाएंगी ।

19. बजट-प्रत्येक वर्ष में परिषद् ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष के बारे में एक बजट तैयार करेगी, जिसमें प्राक्कलित आय और व्यय दर्शित होंगे और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित की जाएंगी ।

20. वार्षिक रिपोर्ट-परिषद् प्रत्येक वर्ष में एक बार ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी, जिसमें पूर्व वर्ष में किए गए अपने कार्यकलापों का संक्षेप और समाचारपत्रों तथा समाचार एजेंसियों के स्तर और उन पर प्रभाव डालने वाली बातों का लेखा होगा और उसकी प्रतियां धारा 22 के अधीन विहित संपरीक्षित लेखा विवरण सहित केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित की जाएंगी और सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

21. अन्तरिम रिपोर्ट-धारा 20 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिषद् एक वर्ष में किसी भी समय, उस वर्ष के दौरान अपने ऐसे क्रियाकलापों का संक्षेप देते हुए रिपोर्ट तैयार कर सकेगी जिन्हें वह लोक-महत्व का समझे और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित की जाएंगी और सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी

22. लेखा और संपरीक्षा-परिषद् के लेखे ऐसी रीति से रखे और संपरीक्षित किए जाएंगे जो भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित की जाए ।

अध्याय 4

प्रकीर्ण

23. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, परिषद् या उसके किसी भी सदस्य या परिषद् के निदेश के अधीन कार्य करने वाले किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।

(2) कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी समाचारपत्र में परिषद् के प्राधिकार से प्रकाशित किसी भी विषय के बारे में उस समाचारपत्र के विरुद्ध नहीं होगी ।

24. सदस्य आदि लोक सेवक होंगे-परिषद् का प्रत्येक सदस्य और परिषद् द्वारा नियुक्त प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।

25. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी :परन्तु जब परिषद् स्थापित कर दी गई हो तब ऐसे कोई भी नियम परिषद् से परामर्श किए बिना नहीं बनाए जाएंगे ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सब विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए भी उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-

() धारा 5 की उपधारा (3) के खण्ड (), खण्ड () और खण्ड () के अधीन परिषद् के सदस्यों के नामनिर्देशन की प्रक्रिया ;

                (ख) वह रीति जिससे धारा 5 की उपधारा (4) के अधीन नामों के पैनल आमंत्रित किए जा सकेंगे ;

() धारा 5 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट समिति के सदस्य को उक्त धारा की उपधारा (6) के अधीन निर्वाचित करने की प्रक्रिया ;

(घ) वे भत्ते और फीसें जो परिषद् के सदस्यों को परिषद् के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए संदत्त की जाएं और धारा 7 की उपधारा (1) और (2) के अधीन ऐसे सदस्यों की सेवा की अन्य शर्तें ;

                (ङ) धारा 11 के अधीन परिषद् के सचिव और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति ;

                (च) धारा 15 की उपधारा (1) के खण्ड (च) में निर्दिष्ट विषय ;

                (छ) वे दरें जिन पर परिषद् द्वारा धारा 16 के अधीन फीस उद्गृहीत की जा सकेगी और वह रीति जिससे ऐसी फीस उद्गृहीत की जा सकेगी ;

(ज) वह प्ररूप जिसमें और वह समय जिसके भीतर बजट और वार्षिक रिपोर्ट क्रमशः धारा 19 और धारा 20 के अधीन परिषद् द्वारा तैयार किए जाने हैं ;

                (झ) वह रीति जिसमें परिषद् के लेखे रखे जाएंगे और धारा 22 के अधीन उनकी संपरीक्षा की जाएगी ।

(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

26. विनियम बनाने की शक्ति-परिषद् निम्नलिखित के लिए ऐसे विनियम बना सकेगी जो इस अधिनियम तथा इसके अधीन बनाए गए नियमों से असंगत न हों, अर्थात् :-

() परिषद् या उसकी किसी समिति के अधिवेशनों और उनमें कामकाज की प्रक्रिया का धारा 9 के अधीन विनियमन ;

() परिषद् द्वारा नियुक्त किए गए कर्मचारियों की सेवा के निबन्धनों और शर्तों का धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन विनिर्देश ;

                (ग) इस अधिनियम के अधीन कोई भी जांच करने की रीति का विनियमन ;

                (घ) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जिन्हें वह अधिरोपित करना ठीक समझे, परिषद् के अध्यक्ष या सचिव को धारा 18 की उपधारा (3) के अधीन अपनी शक्तियों में से किसी का प्रत्यायोजन ;

(ङ) कोई अन्य विषय जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन विनियमों द्वारा उपबन्ध किया जा सकता है :

                परन्तु खण्ड (ख) के अधीन बनाए गए विनियम केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से ही बनाए जाएंगे ।

30. 1867 के अधिनियम 25 का संशोधन-प्रेस और पुस्तक रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1867 की धारा 8ग की उपधारा (1) में, केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले अध्यक्ष तथा एक अन्य सदस्य से मिलकर बनेगा" शब्दों के स्थान पर प्रेस परिषद् अधिनियम, 1978 की धारा 4 के अधीन स्थापित भारतीय प्रेस परिषद् द्वारा अपने सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले अध्यक्ष तथा एक अन्य सदस्य से मिलकर बनेगा" शब्द और अंक रखे जाएंगे ।

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