रिजर्व बैंक (लोक स्वामित्व को अन्तरण) अधिनियम, 1948
(1948 का अधिनियम संख्यांक 62)
[23 सितम्बर, 1948
भारतीय रिजर्व बैंक की शेयर पूंजी को लोक स्वामित्व में
लाने और भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934
में पारिणामिक संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारतीय रिजर्व बैंक की शेयर पूंजी को लोक स्वामित्व में लाना, केन्द्रीय सरकार और रिजर्व बैंक के बीच संबंधों की बाबत उपबन्ध करना और भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में पारिणामिक संशोधन करना समीचीन है ;
अंतः इसके एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम रिजर्व बैंक (लोक स्वामित्व को अन्तरण) अधिनियम, 1948 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम मे,-
(क) “नियत दिन" से ऐसा दिन अभिप्रेत है, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ;
(ख) “रिजर्व बैंक" से मूल अधिनियम द्वारा गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है ; और
(ग) “मूल अधिनियम" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) अभिप्रेत है ।
3. रिजर्व बैंक के शेयरों का अन्तरण -(1) नियत दिन को
(क) रिजर्व बैंक की पूंजी के सब शेयरों की बाबत, इस अधिनियम के आधार पर, यह समझा जाएगा कि वे केन्द्रीय सरकार को सभी न्यासों, दायित्वों और विल्लंगमों से मुक्त होकर अन्तरित हो गए हैं, तथा
(ख) केन्द्रीय सरकार ऐसे हर एक व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व ऐसे किन्हीं शेयरों के धारक के रूप में रजिस्ट्रीकृत है, उन शेयरों के लिए पूर्ण प्रतिकर के रूप में, एक सौ अठारह रुपए और दस आने प्रति शेयर की दर से पारिकलित रकम के लिए, तीन प्रतिशत प्रतिवर्ष ब्याज की दर वाले केन्द्रीय सरकार के वचनपत्र देगी, जो ऐसी तारीख को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए, सम-मूल्य पर प्रतिसंदेय होंगे :
परन्तु यदि इस प्रकार परिकलित रकम में एक सौ रुपए की राशि का पूरा-पूरा भाग नहीं जाता है तो भाग देने पर जो राशि शेष बच जाती है उसके बराबर रकम का संदाय रिजर्व बैंक पर लिखे गए चैक द्वारा किया जाएगा :
परन्तु यह और कि नियत दिन के ठीक पहले यथाप्रवृत्त मूल अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (8) के अनुसरण में रिजर्व बैंक के किसी निदेशक द्वारा केन्द्रीय सरकार से सम-मूल्य पर अभिप्राप्त शेयर की बाबत उक्त रकम एक सौ रुपए प्रति शेयर की दर से परिकलित की जाएगी ।
(2) इस धारा द्वारा शेयरों के किए गए अंतरण के होते हुए भी, कोई भी शेयरधारी, जो अपने द्वारा धारित शेयरों पर नियत दिन के ठीक पहले लाभांश पाने का हकदार है, बैंक से निम्नलिखित पाने का हकदार होगा-
(क) वे सब लाभांश, जो उसके शेयरों पर जून, 1948 के तीसवें दिन को समाप्त होने वाले वर्ष या किसी पूर्ववर्ती वर्ष की बाबत देय हैं, और नियत दिन को असंदत्त रह गए हैं ;
(ख) जुलाई, 1948 के प्रथम दिन से नियत दिन तक की कालावधि की बाबत प्रति शेयर चार रुपए प्रतिवर्ष की दर से परिकलित लाभांश ।
4. विद्यमान पदाधिकारियों द्वारा पदों का रिक्त किया जाना-कोई भी व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पहले, रिजर्व बैंक के गर्वनर या डिप्टी गवर्नर के पद से अन्यथा केन्द्रीय बोर्ड के निदेशक या रिजर्व बैंक के स्थानीय बोर्ड के सदस्य के रूप में पद धारण किए हुए था, नियत दिन को अपना पद रिक्त कर देगा, और तत्पश्चात् रिजर्व बैंक के केन्द्रीय बोर्ड या स्थानीय बोर्ड, इस अधिनियम द्वारा यथासंशोधित मूल अधिनियम की धारा 8 और 9 द्वारा विहित रीति से गठित किए जाएंगे ।
5. अन्तरिम व्यवस्था-इस अधिनियम द्वारा यथांशोधित मूल अधिनियम की धारा 8 के अधीन केन्द्रीय बोर्ड का गठन हो जाने तक रिजर्व बैंक का गवर्नर या उसकी अनुपस्थिति में उसके द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से नामनिर्देशित रिजर्व बैंक का डिप्टी गवर्नर, ऐसे निर्बन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर अधिरोपित की जाएं, ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो रिजर्व बैंक द्वारा प्रयोग की जा सकती हैं, और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा जो रिजर्व बैंक द्वारा किए जा सकते हैं या की जा सकती हैं ।
6. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उद्देश्यों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए नियम , राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-
(क) वह रीति जिससे, और वह प्राधिकारी जिसके द्वारा, धारा 3 के अधीन प्रतिकर दिया जाएगा ; और
(ख) ऐसे व्यक्तियों का अवधारण जिन्हें प्रतिकर इस प्रकार संदेय है ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों से पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं, कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
7. 1934 के अधिनियम सं० का संशोधन-[निरसन और संशोधन अधिनियम, 1950 (1950 का 35) द्वारा निरसित ।]
अनुसूची-[निरसन और संशोधन, अधिनियम, 1950 (1950 का 35) द्वारा निरसित ।]
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