राजस्थान की राजधानी जयपुर में एक बार फिर कोर्ट ने सलमान खान के भ्रामक विज्ञापन के केस में तीखी प्रतिक्रिया दी है। यहां जयपुर द्वितीय जिला उपभोक्ता आयोग बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान को लेकर कहा कि
कानून से ऊपर कोई नहीं है। कंज्यूमर कोर्ट ने जयपुर द्वितीय जिला उपभोक्ता आयोग ने 'राजश्री पान मसाला' के भ्रामक विज्ञापन और अदालती आदेशों की अवहेलना के मामले में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान के खिलाफ तीसरी बार जमानती वारंट जारी किया है। आयोग ने इस बार पुलिस प्रशासन को कड़े लहजे में निर्देश दिए हैं कि वारंट की तामील में किसी भी तरह की ढिलाई नहीं होनी चाहिए।
डीजीपी गठित करेंगे विशेष टास्क फोर्स
उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष ग्यारसी लाल मीणा, सदस्य अजय कुमार और सुप्रिया अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए राजस्थान के पुलिस महानिदेशक (DGP) को तत्काल एक विशेष टास्क फोर्स (STF) गठित करने के निर्देश दिए हैं। आयोग ने स्पष्ट आदेश दिया है कि यह टास्क फोर्स विशेष रूप से मुंबई जाए और वहां व्यक्तिगत रूप से सलमान खान पर वारंट की तामील सुनिश्चित करे। आयोग ने पुलिस को अल्टीमेटम दिया है कि 6 अप्रैल को होने वाली अगली सुनवाई पर सलमान खान को कोर्ट में पेश होना ही होगा।
जानिए क्या है पूरा मामला
यह विवाद तब शुरू हुआ जब परिवादी योगेंद्र सिंह बडियाल ने राजश्री पान मसाला कंपनी और उसके ब्रांड एंबेसडर सलमान खान के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 'केसर युक्त इलायची' और 'केसर युक्त पान मसाला' के नाम पर भ्रामक और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक विज्ञापन किए जा रहे हैं।
केस से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें , यहां पढ़िये
6 जनवरी 2026: आयोग ने इन विज्ञापनों और इनके प्रचार-प्रसार पर अंतरिम रोक लगा दी थी।
अवमानना: अदालती रोक के बावजूद 9 जनवरी को जयपुर, कोटा और अन्य शहरों में बड़े-बड़े होर्डिंग्स के जरिए विज्ञापन जारी रहे।
अवमानना याचिका: परिवादी ने इस पर अवमानना प्रार्थना पत्र पेश किया, जिस पर सुनवाई करते हुए आयोग ने यह सख्त कदम उठाया।
सेलिब्रिटी होना विशेषाधिकार नहीं'
आयोग ने अपने आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का 'सेलिब्रिटी' होना उसे कानून से ऊपर होने का अधिकार नहीं देता। बार-बार वारंट जारी होने के बावजूद कोर्ट में हाजिर न होना और वारंट की तामील में बाधा उत्पन्न करना सीधे तौर पर न्याय व्यवस्था का अपमान है। आयोग ने रेखांकित किया कि ऐसी प्रवृत्तियों से आम उपभोक्ताओं का न्याय प्रणाली में विश्वास डगमगाता है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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