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IIM छात्र को हाईकोर्ट से बड़ा झटका! बीमारी का बहाना नहीं आया काम; जज बोलीं- 'संस्थान से अहंकार की लड़ाई न लड़ें माता-पिता'


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02 Mar 2026
Categories: Hindi News

कलकत्ता हाई कोर्ट ने IIM के एक छात्र की याचिका को खारिज कर दिया है। छात्र ने अपनी बीमारी का हवाला देकर सेकंड ईयर में प्रमोशन की मांग की थी। अदालत ने साफ कहा कि माता-पिता का काम बच्चों का सहारा बनना होता है। संस्थानों से अहंकार की लड़ाई लड़ना सही रास्ता नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी छात्र के हित में क्या बेहतर है। इसका फैसला करने की सबसे सही स्थिति में वही शिक्षण संस्थान होता है। ये मामला IIM कलकत्ता से जुड़े एक मास्टर ऑफ मैनेजमेंट के छात्र का था। छात्र पहले साल में आवश्यक नंबर हासिल नहीं कर पाया था। इसलिए संस्थान ने उसे फर्स्ट ईयर दोबारा पढ़ने को कहा था।

इस मामले की सुनवाई कर रहीं न्यायाधीश न्यायमूर्ति शम्पा दत्त पॉल ने कहा कि माता-पिता भावनात्मक रूप से जुड़े होते हैं। लेकिन उन्हें संस्थान के फैसले को चुनौती देने की जगह छात्र का मनोबल बढ़ाना चाहिए। अदालत ने कहा कि लंबे समय में बच्चों के लिए यह गलत उदाहरण बन सकता है।

अदालत ने ये भी जोड़ा कि इस तरह की स्थिति में छात्र के कल्याण से जुड़ा फैसला संस्थान ही बेहतर तरीके से कर सकता है। माता-पिता को उसी निर्णय पर भरोसा करना चाहिए। अदालत ने ये टिप्पणी भी की कि विशेष बीमारी से जूझ रहे छात्रों को आम तौर पर ज्यादा ध्यान और सहयोग दिया जाता है।

मानसिक बीमारी से पीड़ित था छात्र

 

छात्र का कहना था कि वह मानसिक बीमारी से पीड़ित है। इसी वजह से वह कई कक्षाओं में शामिल नहीं हो पाया। कुछ परीक्षाएं भी नहीं दे सका। उसका तर्क था कि अस्पताल में भर्ती रहने के कारण पढ़ाई प्रभावित हुई। उसने बताया कि पहले वर्ष में उसके अंकों में बाद में कटौती की गई। उसका दावा था कि अगर बिना समायोजन वाले अंक माने जाएं। तो वह दूसरे वर्ष में जाने के योग्य बनता है। उसने ये भी आरोप लगाया कि संस्थान ने उसकी बीमारी को नजरअंदाज किया। कई बार दिए गए निवेदन पर ध्यान नहीं दिया गया। साथ ही उसकी नियुक्ति से जुड़ी प्रोफाइल भी रोक दी गई।

संस्थान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सौम्य मजूमदार ने अदालत को बताया कि छात्र का प्रदर्शन शुरू से ही कमजोर रहा। बीमारी से जुड़े कागजात देखने के बाद उसे विशेष परीक्षा देने का अवसर दिया गया था। जिन विषयों में वो असफल हुआ था। वहां दोबारा परीक्षा की सुविधा भी दी गई। 

रिजल्ट को लेकर छात्र ने नहीं की थी कोई शिकायत 

दोबारा मूल्यांकन के बाद नियमों के मुताबिक नंबर दिए गए। उन्होंने ये भी बताया कि दूसरे सत्र के परिणाम को लेकर छात्र ने कोई रिजल्ट नहीं की थी। संस्थान ने उपस्थिति रजिस्टर भी पेश किया था। जिससे पता चला कि छात्र लगातार कक्षाओं से अनुपस्थित रहा है। यहां तक कि अदालत से अनुमति मिलने के बाद भी उसकी उपस्थिति में सुधार नहीं हुआ।

अदालत ने कहा कि छात्र डिग्री पाने की जल्दी में दिखाई देता है। जबकि वह नियमित रूप से कक्षाओं में शामिल नहीं हो रहा था। डॉक्टर की रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि उसकी स्थिति दवाओं से कंट्रोल है। इसके बावजूद वह लंबे समय तक पढ़ाई से दूर रहा है। कुछ चिकित्सीय कागजात मामूली बीमारियों से जुड़े थे। 

अदालत ने माना कि ऐसे कागजात के आधार पर शैक्षणिक नियमों में ढील नहीं दी जा सकती। अंत में संस्थान ने यह भरोसा भी दिलाया कि यदि छात्र नया सत्र लेकर फिर से पढ़ाई शुरू करता है। तो उसकी भारी शुल्क राशि पर दोबारा विचार किया जाएगा। अदालत ने इसी आधार पर छात्र की याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

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