Thursday, 21, May, 2026
 
 
 
Expand O P Jindal Global University
 

विधवा महिलाओं को पैतृक संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं? हाई कोर्ट के फैसले ने बदल दी पुरानी परंपरा


Punjab and Haryana High Court.jpg
31 Jan 2026
Categories: Hindi News

भारतीय संविधान में लैंगिक समानता एक बुनियादी सिद्धांत है, जो अनुच्छेद 14 और 15 के जरिए हर नागरिक को समान अधिकार देता है। फिर भी, कई इलाकों में दशकों पुरानी परंपराएं महिलाओं के हक पर भारी पड़ती रहीं। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इसी कड़ी में एक लंबे चले मामले में बड़ा कदम उठाया। जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल की एकलपीठ ने 44 साल पुराने विवाद को सुलझाते हुए साफ कहा कि किसी महिला के संपत्ति अधिकार जेंडर या वैवाहिक स्थिति के चलते कम नहीं हो सकते। यह फैसला निचली अदालत के पुराने आदेश को पूरी तरह पलट

मामला मेव समुदाय की एक विधवा महिला से जुड़ा है, जिसने 1982 में अपने पति से मिली गैर-पैतृक जमीन बेच दी। पति के रिश्तेदारों ने इसे रिवाज के खिलाफ बताकर कोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने दावा किया कि स्थानीय प्रथा के तहत विधवा को संपत्ति पर सिर्फ जीवनकाल का उपयोग हक मिलता है बिक्री या हस्तांतरण पुरुष रिश्तेदारों की सहमति के बिना अवैध। ट्रायल कोर्ट ने शुरू में उनके पक्ष में फैसला दिया, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगर संपत्ति खुद की कमाई या गैर-पैतृक है, तो महिला को इसे अपनी इच्छा से बेचने या प्रबंधित करने का पूर्ण अधिकार है। रिश्तेदारों का कोई पूर्वाधिकार नहीं बनता।

रिवाज-ए-आम, अब इतिहास का हिस्सा

गुरुग्राम (पहले गुड़गांव) क्षेत्र में प्रचलित ‘रिवाज-ए-आम’ एक पुरानी प्रथा थी, जो ब्रिटिश काल के विल्सन कोड पर आधारित थी। इसके नियम सख्त थे विधवा महिला को संपत्ति पर सीमित हक, जो उसके जीवन तक ही। वह न बेच सकती, न दान दे सकती बिना पुरुष भाई-भतीजों की मंजूरी के। मेव समुदाय में यह प्रथा खासतौर पर महिलाओं को बांधे रखती, जहां पुरुष रिश्तेदार संपत्ति हथियाने के लिए इसका सहारा लेते।

हाईकोर्ट ने इसे सीधे संविधान के खिलाफ बताया। जजमेंट में कहा गया कि कोई रिवाज जो धर्म, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव करता हो, वह कानूनी रूप से शून्य है। संवैधानिक मूल्य हमेशा स्थानीय रस्मों पर हावी होते हैं। इस फैसले से न सिर्फ इस मामले में न्याय मिला, बल्कि पूरे क्षेत्र की महिलाओं को नया आत्मविश्वास। विधवाओं को अब अपनी विरासत पर स्वतंत्र फैसले लेने की ताकत मिली है।

मानता की राह में मील का पत्थर

यह फैसला महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण है। ग्रामीण भारत में संपत्ति विवादों का बड़ा कारण जेंडर पूर्वाग्रह ही रहा है। हाईकोर्ट ने पाया कि विवादित जमीन गैर-पैतृक थी, इसलिए बिक्री वैध। अब ऐसे हजारों मामले प्रभावित होंगे, जहां रिवाज कानून को दबाने की कोशिश करते रहे।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और अन्य कानूनों को मजबूत करेगा। विधवाओं को आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी, जो परिवार और समाज में उनकी स्थिति सुधारेगी। हालांकि, जमीनी स्तर पर बदलाव के लिए जागरूकता अभियान जरूरी। सरकार और एनजीओ को मिलकर ग्रामीण महिलाओं तक यह संदेश पहुंचाना चाहिए। कुल मिलाकर, संविधान की जीत हुई है—समानता अब सिर्फ किताबी नहीं, बल्कि कोर्ट की बेंच से उतरकर हकीकत बन रही।

source link



Download the LatestLaws.com Mobile App
 
 
Latestlaws Newsletter
 

Publish Your Article

 

Campus Ambassador

 

Media Partner

 

Campus Buzz

 

LatestLaws Guest Court Correspondent

LatestLaws Guest Court Correspondent Apply Now!
 

LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026

 

LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!

 
 

LatestLaws Partner Event : IJJ

 

LatestLaws Partner Event : MAIMS

 
 
Latestlaws Newsletter