जबलपुर के नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच की इस याचिका में पराली जलाने को अपराध मुक्त के केन्द्र के निर्णय को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम 1986 की धारा 15 में पराली जलाने पर पेनाल्टी लगाने का प्रावधान है. लेकिन केन्द्र सरकार ने हाल ही में आंदोलनकारी किसानों की मांग के कारण उन्हें अधिनियम की धारा 15 के प्रावधानों से मुक्त कर दिया. जिसके बाद केंद्र सरकार ने किसान संगठनों को 8 दिसंबर 2021 को पत्र भी भेजा है.
याचिका में कहा गया है कि पराली जलाने को अपराध की श्रेणी से बाहर करने के केन्द्र सरकार के निर्णय से अब बड़े पैमाने पर पराली जलेगी. वायु प्रदूषण बढ़ेगा और इस कारण पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के लाभ से करोड़ों नागरिक वंचित हो जायेंगे. इससे वायु प्रदूषण से हो रही मौतों की संख्या में भी वृद्धि होगी. अतः यह मानव अधिकार अधिनियम 1993 की धारा दो का घोर उल्लंघन है. इस कारण अधिनियम की धारा 12 के अंतर्गत तत्काल हस्तक्षेप करें. इस प्रार्थना के साथ नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पी.जी. नाजपांडे तथा रजत भार्गव ने एडवोकेट प्रभात यादव के मार्फत याचिका राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग नई दिल्ली को 10 दिसम्बर को भेजी थी. जिसे आयोग ने 24 दिसम्बर को विचारार्थ स्वीकृत कर नम्बर 200582 / CR/2021-HRC Net, NHRC पर रजिस्टर की है. अब इस याचिका पर अनावेदक सचिव, केन्द्रीय विधि मंत्रालय तथा केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के सचिव से जल्द जवाब मांगा जायेगा.
आंकड़े बताते हैं कि साल 2019-2020 में करीब 10 करोड़ टन पराली और कृषि अपशिष्ट जलाया गया था. पूर्व के कानूनों में इसमें पेनाल्टी और सजा का प्रावधान था. लेकिन अब इस कानूनी प्रावधान को बदला जा रहा है. जिससे वायु प्रदूषण और अधिक बढ़ेगा. चिंताजनक बात यह भी है कि लगातार वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या भी बढ़ रही है. याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2020 की रिपोर्ट का हवाला भी दिया है. जो बतलाती है कि वर्ष 2019 में 16 लाख 70 हज़ार लोगों की मृत्यु वायु प्रदूषण से हुई थी
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