नेताजी सुभाष चंद्र बोस के अस्थि कलश को टोक्यो से भारत लाने की मांग करने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुनी। कोर्ट ने कहा कि यह बातें कई बार उसके सामने लाई जा चुकी हैं। कई लोग नेताजी का वंशज होने की बात कहते हुए ऐसी याचिका दाखिल कर चुके हैं। इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिका वापस ले ली। उन्होंने कहा कि याचिका को नेताजी की बेटी अनीता के नाम से दाखिल किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने जिस याचिका को सुनने से मना किया उसे नेताजी की भांजी के बेटे आशीष रे ने दाखिल किया था। सुनवाई के दौरान जजों ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव की तरफ इशारा करते हुए याचिका दाखिल करने के समय पर भी सवाल उठाया।
याचिकाकर्ता के लिए पेश वरिष्ठ वकील सिंघवी ने जजों को बताया कि नेताजी की बेटी अनीता भी ऑनलाइन सुनवाई से जुड़ी हैं। इस पर कोर्ट ने कहा, 'हम उनकी भावनाओं का सम्मान करते हैं। उन्हें खुद याचिका दाखिल करने दीजिए। उसके बाद हम विचार करेंगे।'
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने की। बेंच में जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल पंचोली भी शामिल थे। जजों ने कहा कि इसी मुद्दे पर पहले भी कई याचिकाएं दायर की जा चुकी हैं और उन्हें खारिज किया जा चुका है। चीफ जस्टिस ने पूछा, 'यह मुद्दा बार-बार हमारे सामने क्यों लाया जा रहा है? आखिर उनके कितने वंशज हैं?'
बेंच ने याद दिलाया कि 2024 में भी इसी तरह की याचिका खारिज की गई थी। इस पर सिंघवी ने कहा कि वह याचिका नेताजी की मृत्यु पर संदेह जताने वाली थी, लेकिन यह याचिका जापान के टोक्यो के रेंकोजी मंदिर से नेताजी की अस्थियों को भारत लाने के लिए है। इस पर बेंच ने कहा, 'क्या वहां वाकई नेताजी की अस्थियां है। इसे लेकर भी विवाद होता रहा है '
सिंघवी ने कहा कि भारत के कई राष्ट्राध्यक्ष इस मंदिर में जाकर नेताजी की अस्थियों को श्रद्धांजलि दे चुके हैं। इस पर चीफ जस्टिस ने कहा, 'नेताजी देश के महानतम नायकों में से एक हैं। हम उन्हें नमन करते हैं लेकिन यह जानना जरूरी है कि इस मांग का समर्थन परिवार के कितने सदस्य कर रहे हैं?' बेंच के सदस्य जस्टिस बागची ने कहा, 'जहां तक हमारी जानकारी है, परिवार में खुद इस विषय को लेकर काफी मतभेद है।'
सिंघवी ने बताया कि नेताजी की एकमात्र संतान उनकी बेटी है। वह इस याचिका का समर्थन करती हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर नेताजी की बेटी अस्थियां भारत लाना चाहती हैं तो उन्हें स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में सामने आना चाहिए। अगर वह सीधे याचिका दायर करेंगी तो कोई कानूनी कदम उठाने पर विचार किया जा सकता है।
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