जेंडर स्टीरियोटाइप (दकियानूसी सोच) से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट में पहले से एक गाइडलाइंस बनी है।इसमें कई रूढ़िवादी धारणाओं के साथ हकीकत को बाकायदे समझाया गया है।जैसे- एक धारणा यह है कि अपर कास्ट के पुरुष निचली जाति की महिला से संबंध नहीं बनाना चाहते इसलिए रेप का आरोप लगे तो वह झूठ होता है।इसकी हकीकत बताते हुए जो कहा गया, उस पर कोर्ट के भीतर आम राय नहीं है।ऐसे कई सवाल उठे तो सुप्रीम कोर्ट ने नई गाइडलाइंस बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी।
जी हां, सुप्रीम कोर्ट ने पिछले महीने जजों के बीच खासतौर से यौन अपराध और ऐसे अन्य पीड़ितों के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ावा देने के लिए नई गाइडलाइंस बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।वैसे, प्रयास पहले ही हुए थे लेकिन कोर्ट के भीतर असहज स्थिति देखी गई।इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 10 फरवरी के एक आदेश में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे।बागची और एन।वी।अंजारिया की तीन जजों की बेंच ने भोपाल में राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के डायरेक्टर जस्टिस अनिरुद्ध बोस से गाइडलाइंस तैयार करने को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट बनाने के लिए विशेषज्ञों की कमेटी बनाने का आग्रह किया।जस्टिस बोस सुप्रीम कोर्ट के जज रहे हैं।
चंद्रचूड़ के समय आई थी हैंडबुक
इस दिशा में 2023 में तत्कालीन CJI डी वाई चंद्रचूड़ की पहल पर जेंडर स्टीरियोटाइप्स (लैंगिक रूढ़िवादी सोच) से निपटने के लिए एक हैंडबुक पब्लिश हुई थी।इसमें कहा गया है कि मकसद जजों और लीगल कम्युनिटी को महिलाओं के बारे में स्टीरियोटाइप्स को पहचानने, समझने और उनसे निपटने में मदद करना है।इसमें जेंडर को लेकर फैली अनुचित धारणा की शब्दावली भी है।इसके लिए दूसरे शब्द या मुहावरे (वाक्यांश) भी सुझाए गए हैं, जिनका इस्तेमाल वाद-विवाद के साथ-साथ ऑर्डर और जजमेंट का ड्राफ्ट बनाते समय किया जा सकता है.
पर ऐसी भाषा कि आम आदमी समझ न पाए
हां, 10 फरवरी के आदेश में बताया गया कि 2023 की हैंडबुक में ऐसी भाषा है जो आम आदमी को समझ में नहीं आती।उच्च पदस्थ सूत्रों ने अखबार को बताया है कि हैंडबुक अपनाने की प्रक्रिया और इसके कुछ कंटेंट को लेकर भी जजों में नाराजगी थी।कुछ जजों को महसूस हो रहा था कि यह स्थिति को सुधारने में मदद के बजाय पूर्वाग्रहों को ही पुष्ट करता है।
अपनाने की प्रक्रिया पर सूत्रों ने कहा, 'हैंडबुक पब्लिश करने का फैसला करने से पहले सभी जजों को भरोसे में लेना जरूरी था क्योंकि उन्हें ही इसका पालन करना है।इसे आदर्श रूप से पूरी कोर्ट के सामने व्यापक चर्चा के लिए रखा जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
अपर कास्ट को लेकर रूढ़िवादी सोच
कंटेंट की बात करें तो सूत्र कहते हैं कि हैंडबुक में जेंडर स्टीरियोटाइप को समझाने की कोशिश में कुछ गलत हिस्से दिखे।जैसे- उन्होंने हैंडबुक के एक हिस्से की ओर इशारा किया जिसमें सेक्स और यौन हिंसा के मामले में पुरुषों और महिलाओं पर अक्सर लागू होने वाले स्टीरियोटाइप की एक लिस्ट है और यह बताती है कि ऐसी सोच गलत क्यों हैं।सूत्रों ने कहा कि इस लिस्ट के अनुसार, 'एक रूढ़िवादी धारणा यह है कि प्रभावशाली जाति के पुरुष निचली जातियों की महिलाओं के साथ सेक्सुअल रिलेशन नहीं बनाना चाहते इसलिए, किसी निचली जाति की महिला का किसी बड़ी जाति के पुरुष के खिलाफ सेक्सुअल असॉल्ट या रेप का कोई भी आरोप झूठा है।
हैंडबुक आगे कहती है - हकीकत यह है कि रेप और यौन हिंसा का इस्तेमाल लंबे समय से सामाजिक नियंत्रण के टूल के तौर पर किया जाता रहा है और दबंग जाति के पुरुषों ने यौन हिंसा का इस्तेमाल जाति के ऊंच-नीच को मजबूत करने या बनाए रखने के टूल के तौर पर किया है।हालांकि सूत्रों का कहना है कि जज मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट को ऐसा सबके लिए सामान्यीकृत और व्यापक बयान नहीं देना चाहिए, जो पूरे समुदायों को टारगेट करने जैसा हो।
तत्कालीन CJI ने हैंडबुक की प्रस्तावना में लिखा था कि इसका कॉन्सेप्ट कोविड-19 महामारी के दौरान आया और शुरू में इसे भारत के सुप्रीम कोर्ट की ई-कमेटी के नॉलेज कंपोनेंट के हिस्से के तौर पर देखा गया था।अब अंग्रेजी अखबार ने पूर्व CJI चंद्रचूड़ से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि वह इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
10 फरवरी के आदेश में कहा गया है कि न्यायपालिका के सदस्यों के नजरिये, कोर्ट के कामों में एक अंदरूनी संवेदनशीलता और समझदारी लाने और उसे बढ़ावा देने के लिए कुछ कदम उठाने की जरूरत है।कोर्ट ने कहा है कि वह पहले क्या किया गया था, यह समझे बिना कोई गाइडलाइंस बनाने की नई और बिना गाइडेंस वाली कोशिश नहीं करना चाहता।ऐसे में कमेटी से पिछले प्रयासों की भी स्टडी करने को कहा गया है।
कोर्ट ने कहा कि कमेटी यह भी सुनिश्चित करेगी कि नई गाइडलाइंस इस तरह से बने कि उसे आम लोग भी आसानी से समझ सकें।उम्मीद है कि गाइडलाइंस में विदेशी भाषाओं के भारी-भरकम, जटिल शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।नई गाइडलाइंस को अपनाने से पहले जजों की राय जानने के लिए इसे कोर्ट के सामने रखा जाएगा।
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