पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने एक महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए फैसला सुनाया कि करेवा प्रथा के तहत शादी करने वाली विधवा को पुनर्विवाह के आधार पर फैमिली पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने साफ किया कि करेवा विवाह को सामान्य पुनर्विवाह जैसा नहीं माना जा सकता। जज हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा कि करेवा विवाह एक सामाजिक परंपरा है। इसका उद्देश्य नाबालिग बच्चों की देखभाल करना, विधवा की गरिमा की रक्षा और बुजुर्ग माता-पिता की जिम्मेदारी को बनाए रखना है। ऐसे विवाह में बच्चे परिवार के भीतर ही रहते हैं और उनका पालन-पोषण अपने ही रिश्तेदारों के बीच होता है।
जानें क्या है पूरा मामला
हाईकोर्ट ने यह फैसला उमा देवी की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुनाया है।। उमा देवी के पति आलम सिंह उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड (यूएचबीवीएन) में सहायक लाइनमैन थे। उनका 1988 में निधन हो गया था। पति के निधन के दो साल बाद परिवार ने स्थानीय परंपरा के अनुसार उमा देवी की उनके देवर आनंद सिंह के साथ शादी करवा दी। यह फैसला इसलिए लिया गया ताकि बच्चों और परिवार की देखभाल हो सके।
पेंशन देने से किया इनकार
शादी के कुछ समय बाद तक उमा देवी को फैमिली पेंशन मिलती रही, लेकिन बाद में यह पेंशन उनके बच्चों के नाम कर दी गई। जब बच्चे उम्र और विवाह के कारण पेंशन के पात्र नहीं रहे, तो अधिकारियों ने यह कहकर उमा देवी को पेंशन देने से इनकार कर दिया कि पुनर्विवाह के बाद विधवा का अधिकार खत्म हो जाता है। इसके बाद उमा देवी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
हाईकोर्ट ने उमा के हक में सुनाया फैसला
मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि करेवा प्रथा के तहत हुआ विवाह विधवा को पेंशन से अयोग्य नहीं बनाता। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैमिली पेंशन का अधिकार केवल विधवा का नहीं होता, बल्कि मृत कर्मचारी के आश्रितों का भी होता है। इसलिए किसी एक को अयोग्य ठहराने से बाकी आश्रितों के अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं।
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