ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा तय किए जाने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि ओबीसी क्रीमीलेयर का दर्जा केवल उम्मीदवार के माता-पिता के वेतन से होने वाली आय के आधार पर तय नहीं हो सकता।
उम्मीदवार के माता-पिता की स्थिति और पद की श्रेणी दोनों महत्वपूर्ण हैं। उनके स्टेटस और सेवा श्रेणी पर विचार किए बिना केवल उनकी आय के आधार पर ओबीसी आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का दर्जा निर्धारित नहीं किया जा सकता।
शीर्ष अदालत ने गुरुवार को दिए फैसले में कहा कि 1993 के ऑफिस मेमोरेंडम (कार्यालय ज्ञापन) में दिए गए पदों की श्रेणियों और स्टेटस के मापदंडों के संदर्भ के बगैर केवल उम्मीदवार के माता-पिता की आय के आधार पर क्रीमी लेयर का दर्जा तय करना कानूनन गलत है।
इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ओबीसी आरक्षण की पात्रता का निर्धारण करते समय निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के कर्मचारियों के बच्चों और सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को अलग मानना भेदभावपूर्ण है।
ओबीसी क्रीमीलेयर तय करने के बारे में यह महत्वपूर्ण फैसला जस्टिस पीएस नरसिम्हा और आर. महादेवन की पीठ ने मद्रास और दिल्ली हाई कोर्ट व अन्य के फैसलों को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की अपीलें खारिज करते हुए सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उसे हाई कोर्ट के फैसलों में कोई खामी नजर नहीं आती। इस फैसले से सिविल सेवा परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले ओबीसी श्रेणी के उन उम्मीदवारों को राहत मिली है, जिन्हें क्रीमी लेयर श्रेणी का बताते हुए ओबीसी के आरक्षण लाभ से वंचित कर दिया गया था।
हाई कोर्ट ने उन उम्मीदवारों का यह दावा स्वीकार कर लिया था कि पीएसयू, बैंक या निजी कंपनियों में काम करने वाले उनके माता-पिता की आय को आधार बनाते हुए उन्हें गलत तरीके से क्रीमी लेयर का मानकर आरक्षण के लाभ से वंचित किया गया है। केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि अथारिटी ने ओबीसी क्रीमीलेयर में उम्मीदवारों की पात्रता निर्धारित करने के लिए निर्धारित स्टेटस आधारित मानदंड के बजाय आय/संपत्ति आधारित परीक्षण को गलत तरीके से लागू करके आरक्षण लाभ से बाहर कर दिया है। सिर्फ आय के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि कोई उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है या नहीं।
यह मामला सिविल सेवा परीक्षा के कुछ उम्मीदवारों से जुड़ा हुआ था। उन्होंने ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण का दावा किया था, लेकिन उनकी पात्रता का सत्यापन करते वक्त कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने उनके माता-पिता की आय (वेतन) को ध्यान में रखते हुए उन्हें क्रीमी लेयर में माना था। इनमें से कई के माता-पिता पीएसयू, बैंक या इसी तरह के प्रतिष्ठानों के कर्मचारी थे।
इस मामले में केंद्र सरकार ने 14 अक्टूबर, 2004 को जारी स्पष्टीकरण पत्र का हवाला दिया था। इसमें कहा गया था कि जहां सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के पदों और सरकारी पदों के बीच समानता निर्धारित नहीं की गई है वहां आय/संपत्ति (इनकम वेल्थ टेस्ट) परीक्षण के तहत वेतन आय पर अलग से विचार किया जा सकता है।
इसी आधार पर जिन उम्मीदवारों के माता-पिता की आय निर्धारित आय सीमा से अधिक थी, उन्हें ओबीसी आरक्षण का लाभ नहीं दिया गया। केंद्र का कहना था कि क्रीमी लेयर का नियम इसलिए लागू है, ताकि वास्तविक लोगों को आरक्षण का लाभ मिल सके।
कई उम्मीदवारों ने इसे मद्रास हाई कोर्ट, केरल हाई कोर्ट और कैट में चुनौती दी थी। उनकी दलील थी कि केवल इनकम टेस्ट लागू करना 1993 के आफिस मेमोरेंडम के खिलाफ है, जिसमें क्रीमी लेयर का दर्जा तय करने के लिए माता-पिता के वेतन को शामिल नहीं किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ओबीसी श्रेणी में आरक्षण के लिए क्रीमी लेयर का दर्जा केवल माता-पिता की आय के आधार पर निर्धारित नहीं किया जा सकता, बल्कि उनके संगठनों में उनके पदों और स्टेटस पर भी विचार किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की अपीलें खारिज करते हुए आदेश दिया है कि प्रतिवादी उम्मीदवारों और हस्तक्षेप अर्जीकर्ताओं के दावों पर इस फैसले में तय किए गए सिद्धांतों के मुताबिक विचार किया जाए और उसे छह महीने के भीतर लागू करें।
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