मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने शराब निर्माता कंपनी सोम डिस्टिलरीज को बड़ा झटका देते हुए उनके लाइसेंस निलंबन को बरकरार रखा है। कोर्ट ने साफ लहजे में कहा कि शराब का व्यापार करना नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह सरकार द्वारा दिए गए नियमों और शर्तों के अधीन है। जस्टिस विवेक अग्रवाल की बेंच ने आबकारी विभाग की कारवाई को कानूनी रूप से सही ठहराते हुए कंपनी की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें देरी से हुई कारवाई को अवैध बताया गया था।
एक्सपायरी डेट वाला पैंतरा हुआ फेल
सोम डिस्टिलरीज ने अदालत में दलील दी थी कि साल 2024 में जारी किए गए 'कारण बताओ नोटिस' के आधार पर 2026 में कारवाई करना गलत है। कंपनी का तर्क था कि जिस साल का लाइसेंस था, वह 31 मार्च 2024 को ही खत्म हो चुका है, इसलिए पुराना नोटिस अब प्रभावी नहीं होना चाहिए। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तकनीकी दांव को यह कहकर फेल कर दिया कि किसी भी शो कॉज नोटिस की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती है।
नियमों के उल्लंघन पर कोर्ट की सख्ती
अदालत ने पाया कि शराब बनाने, ब्रीविंग और बॉटलिंग से जुड़े नियमों का उल्लंघन बेहद गंभीर मामला है। राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि आबकारी विभाग के पास लाइसेंस की शर्तों के उल्लंघन पर कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है, चाहे वह देरी से ही क्यों न हो। कोर्ट ने माना कि आबकारी आयुक्त द्वारा लिया गया लाइसेंस निलंबन का निर्णय पूरी तरह कानूनी है।
क्या बोले जस्टिस
सुनवाई करते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल बोले कि शराब का व्यापार करना कोई फंडामेंटल राइट नहीं है। अगर लाइसेंस की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, तो देरी से हुई कारवाई भी पूरी तरह कानूनी और न्यायसंगत है।
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