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लिव-इन रिलेशनशिप अपराध नहीं, चाहे जोड़ा विपरीत धर्म का क्यों न हो; हाई कोर्ट का बड़ा फैसला


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24 Feb 2026
Categories: Hindi News

 उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे वयस्क जोड़ों को लेकर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि वयस्क जोड़े का एक साथ रहना कोई अपराध नहीं है। संविधान वयस्कों को एक साथ रहने की अनुमति देता है, चाहे बालिग जोड़ा विपरीत धर्म का ही क्यों न हो। साथ ही, कोर्ट ने ऐसे जोड़ों की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया । कोर्ट ने कहा कि राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह हर नागरिक के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करे। सभी अधिकारियों को कानून का पालन करना ही होगा।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि केवल अलग-अलग धर्म या सामाजिक पृष्ठभूमि में रहने की वजह से किसी भी वयस्क जोड़े को संविधान से मिले मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है। जाति, धर्म, पंथ या लिंग के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि विपरीत धर्म के बालिग जोड़े का बिना शादी किए लिव इन रिलेशनशिप में अपनी मर्जी से रहना किसी कानून में अपराध नहीं है।

मूल अधिकारों की चर्चा

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हम ट्रायल कोर्ट नहीं हैं, जो उस दशा में यह पता करें कि कोई अपराध हुआ है अथवा नहीं? जब तक मामले में किसी ने एफआइआर या शिकायत न दर्ज कराई हो। कोर्ट ने कहा कि बालिगों को संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 21 के तहत समानता और जीवन स्वतंत्रता का मूल अधिकार प्राप्त है। उन्हें अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने अथवा नहीं करने या बिना शादी किए भी लिव इन में रहने का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है।

कोर्ट ने स्पष्ट करते हुए कहा कि विपरीत धर्म के बालिग का साथ रहना कोई अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर बालिग जोड़े ने साथ रहने का फैसला लिया है तो जीवन खतरे की आशंका पर उनकी सुरक्षा की मांग क्यों न स्वीकार की जाय।

12 याचिका पर सुनवाई के क्रम में फैसला

हाई कोर्ट के जस्टिस सौरभ श्याम शमशेरी की एकलपीठ ने नूरी और अन्य सहित 12 याचिकाओं को स्वीकार करते यह फैसला दिया। कुल 12 महिलाओं में सात मुस्लिम हैं। वे हिंदू युवकों के साथ लिव इन रिलेशनशिप में हैं। वहीं, पांच हिंदू युवतियों की भी याचिका स्वीकार की गई, जो मुस्लिम पुरुष के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रह रही हैं। कोर्ट ने आदेश दिया है कि अगर याचियों को किसी से कोई नुकसान होता है तो वे अपनी शिकायत पुलिस अधिकारियों से करें। पुलिस मामले और उनकी उम्र की जांच करे।

हाई कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपों में कोई सच्चाई मिलती है तो पुलिस याचीगण के जीवन, शरीर और आजादी की सुरक्षा के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई करेगी। अगर कोई उनकी मर्जी के खिलाफ या किसी धोखे, जबरदस्ती, लालच, गलत असर या गलत बयानी से उनका धर्म बदलने की कोशिश करता है तो याची रिपोर्ट या शिकायत दर्ज करा सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि यह आदेश पुलिस अधिकारियों के सामने लंबित किसी भी जांच में रुकावट नहीं डालेगा।

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