इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने यह निर्णय दिया है कि ट्रांसजेंडर (किन्नर) समुदाय द्वारा “बधाई” (परंपरागत धनराशि/उपहार) की वसूली को, विधिक आधार के अभाव में, न तो मौलिक अधिकार माना जा सकता है और न ही इसे विधिक रूप से प्रवर्तनीय अधिकार के रूप में मान्यता दी जा सकती है। न्यायालय ने इस प्रकार की गतिविधियों के लिए क्षेत्रीय संरक्षण की मांग करने वाली रिट याचिका को खारिज कर दिया।
न्यायमूर्ति आलोक माथुर एवं न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ, संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर उस याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसे गोंडा जनपद की किन्नर समुदाय की एक सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया गया था। याचिकाकर्ता ने “बधाई” संग्रह हेतु क्षेत्राधिकार के सीमांकन का निर्देश देने की मांग की थी, यह कहते हुए कि लंबे समय से प्रचलित “जजमानी” प्रथा के अंतर्गत यह उनका परंपरागत अधिकार है। साथ ही, एक ही क्षेत्र को लेकर विभिन्न समूहों के बीच हिंसक झड़पों की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि यह प्रथा वर्षों से प्रचलित है और अब एक प्रथागत अधिकार का रूप ले चुकी है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 एवं 21 के तहत संरक्षण मिलना चाहिए। यह भी कहा गया कि औपचारिक रूप से क्षेत्रीय सीमांकन करने से विवादों की रोकथाम होगी तथा समुदाय के भीतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
राज्य की ओर से इस प्रार्थना का विरोध करते हुए कहा गया कि किसी भी व्यक्ति या समूह को बिना विधिक प्राधिकरण के अन्य व्यक्तियों से धन वसूलने का कोई अधिकार नहीं है। यह भी तर्क दिया गया कि भले ही कोई प्रथा प्रचलित हो, किन्तु विधिक मान्यता के अभाव में न्यायालय उसे वैध नहीं ठहरा सकता।
उच्च न्यायालय ने यह प्रमुख प्रश्न निर्धारित किया कि क्या इस प्रकार की प्रथागत गतिविधि को मौलिक अधिकार माना जा सकता है तथा क्या न्यायालय इसके लिए क्षेत्रीय विशिष्टता प्रदान कर सकता है। याचिकाकर्ता के दावों को अस्वीकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि विधि के अनुरूप प्राधिकरण के बिना किसी भी व्यक्ति से धन वसूलने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
न्यायालय ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 का भी परीक्षण किया और यह स्पष्ट किया कि यद्यपि यह अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान और गरिमा की रक्षा करता है, किन्तु यह उन्हें इस प्रकार धन संग्रह करने का कोई अधिकार प्रदान नहीं करता। साथ ही, पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि बिना अनुमति धन वसूली करना भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत दंडनीय हो सकता है।
रिट क्षेत्राधिकार की सीमाओं पर बल देते हुए न्यायालय ने कहा कि केवल प्रथा के आधार पर, बिना विधिक मान्यता के, किसी गतिविधि को वैध नहीं ठहराया जा सकता। न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि यदि इस प्रकार की राहत प्रदान की जाती है, तो इससे अन्य समान दावों का मार्ग प्रशस्त हो सकता है, जिससे अवैध वसूली को बढ़ावा मिलेगा।
याचिका को निराधार पाते हुए न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया और पुनः यह स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों का उपयोग उन प्रथाओं को वैध ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता जिनका विधि में कोई आधार नहीं है। यह निर्णय इस बात को रेखांकित करता है कि न्यायालय संवैधानिक संरक्षण प्रदान करते समय विधिक प्रावधानों के विपरीत प्रथागत दावों को स्वीकार करने में संयम बरतता है।
वाद विवरण:
वाद संख्या: WRIT - C No. 3495 of 2026
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ पीठ
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति आलोक माथुर एवं न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय
याचिकाकर्ता: रेखा देवी
प्रतिवादी: उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव (गृह विभाग), लखनऊ एवं अन्य 6
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