इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लोकहित याचिका (PIL) के दुरुपयोग पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए, एक अधिवक्ता द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें एक चीनी मिल द्वारा कथित अवैध अतिक्रमण का आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने याचिका को “विधि की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग” करार देते हुए याचिकाकर्ता पर ₹25,000 की लागत भी आरोपित की और कहा कि यह याचिका वास्तविक लोकहित के बजाय व्यक्तिगत उद्देश्यों से प्रेरित थी।
मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की खंडपीठ, संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत दायर उस लोकहित याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसमें मेरठ स्थित दौराला शुगर मिल द्वारा नहर किनारे स्थित मार्ग पर किए गए कथित अतिक्रमण को हटाने हेतु संबंधित प्राधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता, जो एक अधिवक्ता है, ने आरोप लगाया कि दौराला लोअर राजवाहा (मिनी नहर) के दोनों किनारों पर स्थित भूमि पर चीनी मिल ने अवैध कब्जा कर लिया है, जिससे उन ग्रामीणों को असुविधा हो रही है जो आवागमन के लिए इस मार्ग पर निर्भर हैं। यह भी तर्क दिया गया कि वर्ष 2022 में अतिक्रमण हटाने हेतु प्रशासनिक निर्देश जारी होने के बावजूद प्राधिकारियों द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई।
इसके विपरीत, प्रतिवादी चीनी मिल ने इन आरोपों का कड़ा खंडन करते हुए याचिकाकर्ता की सद्भावना पर प्रश्न उठाया। यह प्रस्तुत किया गया कि याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है, जिसमें गन्ना विकास परिषद के अध्यक्ष के रूप में उसकी पूर्व भूमिका तथा उसके विरुद्ध दर्ज आपराधिक मामलों में संलिप्तता शामिल है। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि यह याचिका व्यक्तिगत विवादों के चलते मिल प्रबंधन को परेशान करने के उद्देश्य से दुर्भावनापूर्ण तरीके से दायर की गई है।
मामले के गुण-दोष के आधार पर, प्रतिवादियों ने कहा कि वर्ष 2018 में सिंचाई विभाग से भूमि उपयोग की विधिवत अनुमति प्राप्त की गई थी तथा वर्ष 2024 में किए गए निरीक्षण में किसी प्रकार का अतिक्रमण या जनसुविधा में बाधा नहीं पाई गई। आधिकारिक अभिलेखों से यह भी स्पष्ट हुआ कि किसान बिना किसी बाधा के उक्त मार्ग का उपयोग कर रहे हैं।
उच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि लोकहित याचिका दायर करने वाला याचिकाकर्ता “स्वच्छ हाथों” के साथ न्यायालय के समक्ष आए तथा अपने समस्त तथ्यों एवं पात्रता का पूर्ण और सत्य खुलासा करे। न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया और अपनी स्थिति का भ्रामक प्रस्तुतीकरण किया, जिससे याचिका की विश्वसनीयता प्रभावित हुई।
न्यायालय ने लोकहित याचिकाओं से संबंधित स्थापित सिद्धांतों का परीक्षण करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रकार के क्षेत्राधिकार का उपयोग व्यक्तिगत लाभ या प्रतिशोध हेतु नहीं किया जा सकता। साथ ही, इलाहाबाद उच्च न्यायालय नियमों के अंतर्गत याचिकाकर्ता की पात्रता के प्रकटीकरण की अनिवार्यता जैसे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का भी उल्लेख किया गया।
खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के कई महत्वपूर्ण निर्णयों पर भी भरोसा किया, जिनमें State of Uttaranchal v. Balwant Singh Chaufal (2010), Janata Dal v. H.S. Chowdhary (1992), Dr. B. Singh v. Union of India (2004) तथा K.D. Sharma v. SAIL (2008) शामिल हैं, जिनमें यह प्रतिपादित किया गया है कि न्यायालयों को दुर्भावनापूर्ण या तुच्छ लोकहित याचिकाओं को प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त करना चाहिए।
न्यायालय ने याचिका को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए ₹25,000 की लागत के साथ खारिज कर दिया तथा याचिकाकर्ता को तीन सप्ताह के भीतर उक्त राशि जमा करने का निर्देश दिया। आदेश का पालन न होने की स्थिति में उक्त राशि को भू-राजस्व बकाया के रूप में वसूलने की कार्यवाही करने का निर्देश भी दिया गया।
कड़ी चेतावनी देते हुए न्यायालय ने याचिकाकर्ता को भविष्य में इस प्रकार के आचरण से बचने को कहा और स्पष्ट किया कि लोकहित याचिका का क्षेत्राधिकार वास्तविक जनहित की रक्षा के लिए है, न कि व्यक्तिगत विवादों को निपटाने का माध्यम।
वाद विवरण:
वाद संख्या: PIL No. 331 of 2026
न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
पीठ: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली एवं न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र
याचिकाकर्ता: रविन्द्र अहलावत
प्रतिवादी: उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य 4
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