भारत को "हिंदू राष्ट्र" बताने और उसकी धर्मनिरपेक्ष पहचान पर सवाल उठाने वाली बहस के बीच अब देश के सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश का बयान चर्चा में आ गया है। उनके शब्द इस पूरे विवाद पर एक अलग नजरिया पेश करते हैं और यह याद दिलाते हैं कि संविधान क्या कहता है? नई दिल्ली में एक प्रोग्राम के दौरान सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस एन.के. सिंह ने साफ कहा कि भारत के संविधान ने कभी भी देश को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल है जहां सभी मजहबों को बराबरी का दर्जा दिया गया है।
जस्टिस सिंह ने "जनसंख्या के प्रभाव से आगे: भारत की कानूनी व्यवस्था पर पश्चिमी प्रभावों का पुनर्मूल्यांकन" विषय पर बोलते हुए कहा कि अगर आप कई देशों के संविधान को देखें, तो वे किसी एक खास मजहब को मान्यता देते हैं। लेकिन भारत जैसे बहुत कम देश हैं, जहां हर मजहब को समान रूप से स्वीकार किया गया है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि भारत ने खुद को कभी भी हिंदू राष्ट्र नहीं कहा है।
अपने संबोधन में जस्टिस एन।के। सिंह ने "हिंदू" शब्द की व्याख्या भी की। उन्होंने बताया कि इस शब्द की शुरुआत मजहबी मायने में नहीं हुई थी। उनके मुताबिक, यह शब्द बाहर से आने वाले लोगों ने उन लोगों के लिए इस्तेमाल किया जो सिंधु नदी के पार रहते थे। उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराएं पहले से मौजूद थीं। इसलिए उनके मुताबिक यह सवाल कि "हिंदू कौन हैं" ज्यादा मायने नहीं रखता। उन्होंने कहा कि कुछ लोग उनके विचार से असहमत हो सकते हैं, लेकिन "हिंदू" शब्द किसी एक खास पहचान को नहीं दर्शाता, बल्कि यह सिर्फ भौगोलिक पहचान से जुड़ा था।
इस मौके पर जस्टिस एन.के. सिंह ने भारतीय दर्शन की समृद्ध परंपरा पर भी रौशनी डाली। उन्होंने कहा कि दुनिया में शायद ही कोई दर्शन इतना विकसित रहा हो, जितना भारत में था। इसके बावजूद पश्चिमी देशों ने अक्सर भारत को अंधविश्वास या सपेरों की भूमि के रूप में पेश किया। उन्होंने यह भी बताया कि जब यूरोप अंधकार के दौर से गुजर रहा था, उस समय भारत सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से आगे बढ़ रही था। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यहूदी और पारसी समुदाय ने भारत में शरण मिली और उन्हें अपने मजहब को पालन करने की पूरी आजादी दी गई।
जस्टिस एन.के. सिंह ने आगे कहा कि आज जिन बिंदुओं को जैसे स्वतंत्रता और समानता को फ्रांसीसी क्रांति से जोड़ा जाता है, वे भारतीय परंपरा में पहले से मौजूद थे। हालांकि, पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव की वजह से इन मूल्यों को नजरअंदाज कर दिया गया। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है, जब देश में धर्म, पहचान और संविधान को लेकर लगातार बहस जारी है।
Publish Your Article
Campus Ambassador
Media Partner
Campus Buzz
LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026
LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!