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"'अगर घर टूटा, तो हम दोबारा बनवाएंगे', विधवा की गुहार पर CJI सख्त; लेकिन नहीं दिया आदेश"


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27 Mar 2026
Categories: Hindi News

"सुप्रीम कोर्ट से एक बेहद अहम और मानवीय पहलू को छूने वाली खबर सामने आई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की बेंच के सामने एक ऐसा मामला आया जिसमें बुलडोजर कार्रवाई को तुरंत रोकने की अपील की गई थी। लेकिन CJI सूर्यकांत ने मामले पर तुरंत सुनवाई या कोई आदेश जारी करने से इनकार कर दिया। आइए पूरा मामला समझते हैं।"

क्या है पूरा मामला?

सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने CJI की बेंच के सामने एक मामले को 'अत्यंत आवश्यक' बताते हुए तुरंत सुनवाई की गुहार लगाई। वकील ने अदालत के सामने जो तथ्य रखे, वे बेहद संवेदनशील थे। वकील ने कहा कि जिस घर को तोड़ा जाना है, उसकी मालकिन एक विधवा महिला है। यह महिला अपनी 35 वर्षीय अविवाहित और दृष्टिबाधित बेटी की इकलौती देखभाल करने वाली है। सबसे अहम बात यह थी कि महिला का यह दो कमरों का घर सरकार की 'प्रधानमंत्री आवास योजना' के तहत ही बनवाया गया था।"

CJI और वकील के बीच जिरह

"मामले की संवेदनशीलता के बावजूद, कानूनी प्रक्रिया और समय की कमी के चलते अदालत ने तुरंत सुनवाई से इनकार कर दिया। मामले की तत्काल सुनवाई की मांग पर CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि आज इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, 'आज कुछ नहीं किया जा सकता। अगर आप सहमत हों, तो हम...' CJI की बात पूरी होने से पहले ही वकील ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए 'यथास्थिति' बनाए रखने की मांग की। वकील ने बताया कि अगर आज कोई आदेश नहीं आया, तो कल (अगले दिन) उस महिला का दो कमरों का आशियाना जमींदोज कर दिया जाएगा।"

CJI का कड़ा आश्वासन

"इस पर CJI ने एक बेहद सख्त और भरोसा देने वाली टिप्पणी की। उन्होंने प्रशासन को एक प्रकार की चेतावनी देते हुए कहा, 'हम उसे दोबारा बनवाएंगे।' CJI ने संकेत दिया कि अगर प्रशासन या संबंधित प्राधिकरण बिना उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए उस घर को तोड़ता है, तो सुप्रीम कोर्ट न सिर्फ इस कार्रवाई को अवैध ठहराएगा, बल्कि प्रशासन को ही उस घर का फिर से निर्माण करने का आदेश देगा।"

"सुप्रीम कोर्ट पिछले कई वर्षों से 'बुलडोजर जस्टिस' यानी मनमानी ढंग से मकान ढहाने की प्रथा पर सख्त रुख अपनाए हुए है। कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि बिना उचित प्रक्रिया के किसी भी मकान को नहीं ढहाया जा सकता। अधिकारियों को 15 दिन का नोटिस देना, सुनवाई का अवसर देना और प्रभावित परिवारों के हितों का ध्यान रखना अनिवार्य है।"

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