मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने प्रेग्नेंट महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि राज्य सरकार 80 दिन काम करने के नियम का हवाला देकर किसी महिला कर्मचारी को मैटरनिटी बेनिफिट देने से मना नहीं कर सकती है। यह मामला एक गेस्ट टीचर से जुड़ा था। उन्हें साल 2023 में मैटरनिटी लीव तो दी गई, लेकिन उस दौरान कोई वेतन (मानदेय) नहीं दिया गया। राज्य सरकार ने कहा था कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 के अनुसार 80 दिन काम करना जरूरी है, तभी पेड लीव मिलेगी।
लेकिन जस्टिस विशाल धगत ने अपने फैसले में कहा कि 12 महीनों में 80 दिन काम करने का नियम केवल प्राइवेट संस्थानों पर लागू होता है। यह नियम राज्य सरकार की संस्थाओं पर लागू नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि राज्य का कर्तव्य है कि वह अपने नागरिकों के लिए भलाई के कदम उठाए। खासकर महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य और सुरक्षा को ध्यान में रखना बहुत जरूरी है। संविधान के अनुसार भी राज्य को सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करना चाहिए।
कोर्ट दिए निर्देश
कोर्ट ने यह भी बताया कि संविधान के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स राज्य को यह निर्देश देते हैं कि वह लोगों के कल्याण के लिए नीतियां बनाए। इसमें महिलाओं के लिए बेहतर सुविधाएं देना भी शामिल है।
इस मामले में कोर्ट ने फैसला दिया कि याचिकाकर्ता टीचर 26 हफ्तों की पेड मैटरनिटी लीव की हकदार हैं। यानी उन्हें इस अवधि की सैलरी मिलेगी। हालांकि, बाकी छुट्टी को बिना वेतन के माना जाएगा। इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ा और अच्छा कदम माना जा रहा है।
इस मामले में कोर्ट ने फैसला दिया कि याचिकाकर्ता टीचर 26 हफ्तों की पेड मैटरनिटी लीव की हकदार हैं। यानी उन्हें इस अवधि की सैलरी मिलेगी। हालांकि, बाकी छुट्टी को बिना वेतन के माना जाएगा। इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों के लिए एक बड़ा और अच्छा कदम माना जा रहा है।
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