मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बीना विधायक निर्मला सप्रे से जुड़े दलबदल मामले में हो रही लंबी देरी पर कड़ी नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश संजीव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान साफ कहा कि जब दलबदल प्रकरणों में सुप्रीम कोर्ट 90 दिनों के भीतर निर्णय की समय-सीमा तय कर चुका है, तो फिर 720 दिन बीतने के बाद भी मामले का निपटारा क्यों नहीं हो सका।
सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अदालत को बताया कि विधानसभा अध्यक्ष स्तर पर मामले की विधिवत सुनवाई जारी है और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की जांच प्रक्रिया चल रही है। इस पर अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए महाधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन से विधानसभा स्पीकर को अवगत कराएं।
उधर, याचिकाकर्ता पक्ष की ओर से पेश वकील ने भी कोर्ट से 90 दिन की समय-सीमा का सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने की मांग की। मामले की अगली सुनवाई 18 जून को तय की गई है।
दरअसल, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे का निर्वाचन दलबदल कानून के तहत शून्य घोषित करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि इस संबंध में 30 जून 2024 को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष आवेदन दिया गया था, लेकिन निर्धारित समयसीमा बीतने के बावजूद कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया।
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि विधायक सप्रे पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रही हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान 5 मई 2024 को राहतगढ़ में मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यक्रम में मंच साझा करना इसका उदाहरण बताया गया है।
याचिकाकर्ता का दावा है कि निर्मला सप्रे भाजपा में शामिल हो चुकी हैं, बावजूद इसके उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया। ऐसे में दलबदल कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त की जानी चाहिए।
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