बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि विशेष कानूनों के तहत दोषी ठहराए गए कैदी को फरलो देने से इनकार करना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने मामले को फैसले के लिए एक बड़ी बेंच को सौंप दिया, क्योंकि हाईकोर्ट के पिछले दो फैसलों में अलग-अलग राय थी। जस्टिस अनिल पानसरे और जस्टिस निवेदिता मेहता की बेंच ने 10 अप्रैल के अपने आदेश में यह सवाल उठाया कि कोई यह कैसे मान सकता है कि विशेष कानूनों के तहत गंभीर अपराधों के लिए दोषी कैदियों को जेल में लगातार कैद रहने के बुरे असर का सामना नहीं करना पड़ेगा। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर कैदियों की फरलो की पात्रता केवल किसी खास अपराध पर आधारित हो, तो यह फरलो देने के पीछे के उद्देश्य के खिलाफ होगा।
कोर्ट ने आगे कहा कि इस मामले की सुनवाई और फैसला हाईकोर्ट की एक बड़ी बेंच द्वारा किया जा सकता है, और निर्देश दिया कि इस मामले को उचित आदेशों के लिए हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखा जाए।दरअसल, दिसंबर 2024 में, राज्य सरकार ने महाराष्ट्र जेल (फरलो और पैरोल) नियमों में संशोधन किया, जिसके तहत गंभीर अपराधों या मकोका, पॉक्सो अधिनियम जैसे अन्य विशेष कानूनों के तहत दोषी कैदियों के लिए फरलो को सीमित कर दिया गया था। यह मामला हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के सामने तब आया, जब पत्रकार ज्योतिर्मय डे की हत्या मामले के दोषी व्यक्ति ने फरलो की मांग की। दोषी रोहित तंगप्पा जोसेफ, जिसे गैंगस्टर छोटा राजन का सहयोगी बताया जाता है, ने हाईकोर्ट का रूख किया। अमरावती जेल अधिकारियों ने नियमों का हवाला देते हुए उसकी फरलो की अर्जी खारिज कर दी थी।
Publish Your Article
Campus Ambassador
Media Partner
Campus Buzz
LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026
LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!