जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने पुलवामा एक व्यक्ति की जनसुरक्षा अधिनियम पीएसए के तहत हिरासत को रद्द करते हुए वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के एक उद्धरण जो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में सच के प्रति लापरवाह होता है, उस पर बड़े मामलों में भरोसा नहीं किया जा सकता, का भी उल्लेख किया है।
आइंस्टीन का उद्धरण संबधित जिला मजिस्ट्रेट के आचरण पर टिप्पणी के दौरान किया गया है। अदालत ने पीएसए लागू करने के मामले में बरती गई लापरवाही पर कड़ा एतराज जताया है।
श्रीनगर स्थित जम्मू कश्मीर व लद्दाख उच्च न्यायालय में पुलवामा निवासीय मुदस्सर अहमद बट की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राहुल भारती ने राज्य प्रशासन की लापरवाही पर एतराज जातया। उन्होंने अपने 15 पृष्ठों के फैसले की शुरुआत वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के एक उद्धरण से की, ताकि कानूनी मामलों में सटीकता के महत्व को रेखांकित किया जा सके।
न्यायमूर्ति भारती ने लिखा कि जो व्यक्ति छोटी-छोटी बातों में सच के प्रति लापरवाह होता है, उस पर बड़े मामलों में भरोसा नहीं किया जा सकता। याचिकाकर्ता मुदस्सर अहमद बट पुलवामा का रहने वाला है और एक स्थानीय टिन की दुकान में सेल्समैन के रूप में काम करता था। बट को मई 2025 से सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत हिरासत में रखा गया था।
उस पर पुलवामा के मित्रीगाम गांव में आतंकी गतिविधियों का समर्थन करने का आरोप लगाया गया था।उसके मामले की पैरवी एडवोकेट जमीर अब्दुल्ला और जहिर अब्दुल्ला ने की। एडवोकेट जमीर अब्दुल्ला और जहीर अब्दुल्ला दोनो सगे भाई हैं और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बेटे हैं।
अदालत ने रिकार्ड में कई “स्पष्ट त्रुटियों” की ओर ध्यान दिलाया। जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए हिरासत के आधार में 23 फरवरी 2025 को पुलिस समन का उल्लेख किया गया था, जबकि पुलिस दस्तावेजों में ऐसी कोई तारीख मौजूद नहीं थी।
इससे भी अधिक गंभीर बात यह सामने आई कि जिला जेल उधमपुर के अधीक्षक के एक पत्र में कहा गया था कि बट पांच दिसंबर 2024 से हिरासत में हैं, जबकि आधिकारिक हिरासत आदेश 30 अप्रैल 2025 को जारी किया गया था। यानी कथित हिरासत की तारीख आदेश से कई महीने पहले की बताई गई।
न्यायमूर्ति भारती ने इस स्थिति को “ऐसा मामला बताया जिसमें प्रतिवादियों का दायां हाथ यह नहीं जानता कि बायां हाथ क्या कर रहा है।” उन्होंने कहा कि इस तरह की हिरासत “संवैधानिक संवेदनशीलता के लिए पीड़ादायक और चिंताजनक” है। अदालत ने यह भी कहा कि यह समझ से परे है कि गृह विभाग या जिला प्रशासन ने इन गलतियों को ठीक क्यों नहीं किया।
अदालत ने अंततः हिरासत को अवैध घोषित करते हुए पुलवामा के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी आदेशों को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति भारती ने जिला जेल उधमपुर के अधीक्षक को निर्देश दिया कि मुदासिर अहमद बट को तुरंत रिहा किया जाए।
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