इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अपराध के लिए सजा एक से तीन साल के बीच है तो उसके संज्ञान का समय भी तीन वर्ष ही होगा। यदि मजिस्ट्रेट इस वैधानिक अवधि के बाद संज्ञान लेते हैं तो उन्हें देरी को माफ करने के ठोस कारण और न्याय के हित में अपनी संतुष्टि को आदेश में दर्ज करना होगा।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति पदम नारायण मिश्रा की एकल पीठ ने मुरादाबाद निवासी नरेश व दो अन्य याचिका पर घटना के नौ साल के बाद जारी समन आदेश को रद्द कर दिया। 12 मई 2014 को सिगरेट, जूस के पैसे मांगने पर दुकानदार के भाई के साथ मारपीट और गालीगलौज के आरोप में याचियों के खिलाफ एनसीआर दर्ज की गई थी। घटना के आठ साल बाद 2023 में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की
मजिस्ट्रेट ने 12 अक्तूबर 2023 को समन आदेश जारी किया तो याचियों ने मुकदमे की कार्यवाही रद्द करने की मांग में हाईकोर्ट पहुंचे। अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन ने दलील दी कि याचियों के खिलाफ जिन धाराओं में एनसीआर दर्ज है, उनमें अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान है। ऐसे में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-468 के तहत चार्जशीट का संज्ञान लेने की समय सीमा तीन वर्ष ही थी। यहां संज्ञान नौ साल बाद लिया गया है। इस तर्क पर कोर्ट ने सहमति जता कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा-468 के तहत समय सीमा का प्रावधान स्पष्ट है। इसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता।
हालांकि, मजिस्ट्रेट को देरी माफ करने का अधिकार है पर उसके लिए दो शर्तें अनिवार्य हैं। पहली यह कि देरी को उचित रूप से समझाया गया हो और दूसरी बात कि न्याय के हित में देरी माफ करना आवश्यक हो।
कोर्ट ने कहा-अदालत कानूनी टिप्पणी के आलोक में नया आदेश पारित करे
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में संबंधित आदेश से यह कहीं भी प्रदर्शित नहीं हुआ कि मजिस्ट्रेट ने देरी के कारणों पर विचार किया या उसे माफ करने के लिए कारण दर्ज किया। कोर्ट ने मजिस्ट्रेट की ओर से जारी संज्ञान और समन आदेश को यांत्रिक बताते हुए उसे रद्द कर दिया। साथ ही मुरादाबाद की संबंधित अदालत को निर्देश दिया है कि वह मामले में उच्च न्यायालय की ओर से दी गई कानूनी टिप्पणी के आलोक में नया आदेश पारित करे।
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