बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक इमारत में किराएदार और मालिक के बीच मालिकाना हक को लेकर अपने अहम फैसले में कहा कि जब किरायेदार खुद ही संपत्ति (इमारत) का हिस्सा खरीदकर सह-मालिक बन जाता है या कोई सह-मालिक खाली कराने का विरोध करता है, तब उसके (किराएदार) खिलाफ बेदखली की कार्यवाही जारी नहीं रह सकती है। किरायेदार को इमारत से नहीं निकाला जाएगा और उसका जमा किया गया 60 लाख रुपए वापस मिलेगा।
"न्यायमूर्ति राजेश एस. पाटील की एकल पीठ ने कृष्ण कुमार करसनदास आशर की याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि जहां मकान मालिक और किरायेदार के बीच विवाद है और सिविल प्रक्रिया संहिता
"की धारा 115 के तहत कार्यवाही के दौरान किरायेदार ने जमीन का 50 फीसदी हिस्सा खरीद लिया है। इसलिए इस सिविल पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार किया जाना चाहिए। सिविल पुनरीक्षण याचिका स्वीकार किया जाता है। अपीलीय न्यायालय द्वारा पारित आदेश को रद्द या जाता है।
"पीठ ने यह भी कहा कि एक अन्य सह-मालिक ने किराएदार को पहले भी खाली कराने के खिलाफ आपत्ति जताई थी और बाद में भी कहा कि वह किरायेदारों को नहीं निकालना चाहता है। पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ‘महिंदर प्रसाद जैन केस’ पर भरोसा करते हुए कहा कि एक सह-मालिक अकेले खाली कराने केस कर सकता है, लेकिन अगर दूसरा सह-मालिक विरोध करे या किराएदार खुद सह-मालिक बन जाए, तो खाली कराने केस जारी नहीं रह सकता है। इस मामले में किरायेदार अब 50 फीसदी मालिक बन चुका है। दूसरा सह-मालिक भी खाली कराना नहीं चाहता है, तो इसलिए खाली कराने की कार्यवाही जारी रखना गलत है।
"याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील कैलाश देवल ने दलील दी कि सिविल रिवीजन याचिका लंबित रहने के दौरान 22 अप्रैल 2016 के एक कन्वेयन्स डीड (हस्तांतरण पत्र) के जरिए किरायेदार ने उस इमारत का 50 फीसदी हिस्सा खरीद लिया, जिसमें वह जगह स्थित है। यह हिस्सा उसने मृतक वादी के कानूनी वारिसों से खरीदा। इस तरह वह उस जगह के 50 फीसदी हिस्से का मालिक बन गया। यह मामला किरायेदार और मकान-मालिक के बीच मुंबई की एक बिल्डिंग को खाली कराने से संबंधित है। ट्रायल कोर्ट ने पहले मकान-मालिक का केस खारिज कर दिया था। मालिक की याचिका पर अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट का फैसला पलटकर किरायेदार को निकालने का आदेश दे दिया। इसके खिलाफ किरायेदारों ने हाई कोर्ट में रिवीजन याचिका दायर की।
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