सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में संपत्ति गिफ्ट करने (हिबा) पर रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी से मिली छूट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से साफ मना कर दिया है। गुरुवार को जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने मामले का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को दो टूक कहा कि अगर वे नियमों में बदलाव चाहते हैं, तो इसके लिए भारतीय विधि आयोग के पास जाएं।
क्या है पूरा विवाद?
वकील हरिशंकर जैन और अन्य याचिकाकर्ताओं ने 1882 के 'ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट' की धारा 129 और 1937 के शरिया कानून (मुस्लिम व्यक्तिगत कानून) को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अगर कोई अपनी संपत्ति गिफ्ट (हिबा) करता है, तो उसे रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी नहीं देनी पड़ती। जबकि गैर-मुसलमानों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। याचिका में कहा गया कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और इससे सरकारी खजाने को भी नुकसान हो रहा है।
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सीधा दखल देने के बजाय याचिकाकर्ताओं को एक नया रास्ता दिखाया है। कोर्ट ने कहा कि आप इस मुद्दे को लेकर लॉ कमीशन' (विधि आयोग) के पास जा सकते हैं। अदालत का मानना है कि लॉ कमीशन इस मामले की गहराई से जांच कर सकता है और अगर उसे लगता है कि कानून में बदलाव की जरूरत है, तो वह सरकार को अपना सुझाव दे सकता है। फिलहाल के लिए, वक्फ या हिबा के जरिए दी जाने वाली संपत्ति पर जो टैक्स छूट मिल रही है, वह वैसी ही बनी रहेगी।
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