केरल हाई कोर्ट ने चुनावी प्रचार के दौरान कथित सांप्रदायिक बयानबाजी को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। साथ ही इस मामले पर इलेक्शन कमीशन और राज्य प्रशासन से जवाब मांगा है। यह मामला बीजेपी के एक नेता के बयान से जुड़ा है, जिन पर एक भाषण के दौरान समाज के एक खास तबके के खिलाफ भड़काऊ टिप्पणी करने का आरोप है।
दरअसल, BJP के एक नेता ने एक जनसभा के दौरान मुस्लिम समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए बहुसंख्यक समुदाय से वोट की अपील की थी। बीजेपी नेता ने दावा किया कि वह जिस धर्म को मानता है वह सच्चा धर्म है। यह मामला केरल हाई कोर्ट तक पहुंचा और याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार और चुनाव आयोग, दोनों को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि सेक्यूलर देश में किसी भी एक धर्म को सच्चा बताना गलत है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बीजेपी नेता ने चुनावी फायदे के लिए सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने की कोशिश की।
याचिकाकर्ता ने लगाया बड़ा आरोप
याचिकाकर्ता ने आगे तर्क दिया कि ऐसे बयान संविधान के मूल सिद्धांतों खासकर धर्मनिरपेक्षता और समानता का उल्लंघन करते हैं। इसके अलावा, यह भी आरोप लगाया गया कि प्रशासन और पुलिस ऐसे मामलों को संभालने में पर्याप्त सख्ती दिखाने में नाकाम रहे हैं। सुनवाई के दौरान केरल हाईको
कोर्ट ने पुलिस को लगाई फटकार
कोर्ट ने राज्य पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में समय पर और कड़ी कार्रवाई न करना एक गलत संदेश देता है और भविष्य में ऐसे बयानों के बढ़ने का कारण बन सकता है। पुलिस की ओर से यह बताया गया कि उक्त नेता के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है और मामले की जांच चल रही है। याचिका में आगे कहा गया कि चुनावी मंचों से सांप्रदायिक टिप्पणी करना न सिर्फ आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है, बल्कि यह कानूनी रूप से दंडनीय अपराध भी है।
चुनाव आयोग से मांग जवाब
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सभी राजनीतिक दलों और नेताओं को संविधान की गरिमा बनाए रखनी चाहिए और समाज में शांति बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि केवल FIR दर्ज करना ही काफी नहीं है। बल्कि, यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि ऐसे मामलों में प्रभावी और समयबद्ध कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह स्पष्ट करे कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए क्या उपाय लागू किए जाएंगे।
कोर्ट ने अपनी नाराजगी जाहिर की और चुनाव आयोग से पूछा कि चुनावी प्रचार के दौरान दिए गए सांप्रदायिक या नफरत भरे बयानों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी बयानबाजी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर असर डालती है और इससे समाज में ध्रुवीकरण हो सकता है।
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