इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में सख्ती दिखाते हुए बस्ती के पुलिस अधीक्षक डॉ। यश वीर सिंह को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने पाया कि हत्या से जुड़े एक मामले में उनके द्वारा दाखिल व्यक्तिगत हलफनामे में गलत तथ्य पेश किए गए थे। इस पर कोर्ट ने उन्हें चेतावनी दी और उसी दिन कोर्ट उठने तक अदालत में रुकने का आदेश दिया।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला हत्या के आरोपी मंजीत कुमार की जमानत याचिका से जुड़ा है। जब अदालत में इस याचिका पर सुनवाई हो रही थी, तब राज्य पक्ष से जरूरी निर्देश मांगे गए थे। लेकिन कई बार याद दिलाने के बावजूद संबंधित अधिकारियों द्वारा समय पर जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। इस लापरवाही को गंभीर मानते हुए अदालत ने बस्ती के एसपी से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल कर देरी का कारण स्पष्ट करने को कहा।
28 मार्च 2026 को दाखिल अपने हलफनामे में एसपी ने देरी की जिम्मेदारी संयुक्त निदेशक (अभियोजन), बस्ती पर डाल दी। उन्होंने कहा कि उन्हें पहले ही निर्देश तैयार करने के लिए कहा गया था, लेकिन समय पर कार्रवाई नहीं हुई।
हालांकि जब संयुक्त निदेशक (अभियोजन) अदालत में पेश हुए, तो उन्होंने बताया कि निर्देश तैयार करना जांच अधिकारी की जिम्मेदारी होती है और उन्हें जरूरी जानकारी काफी देर से मिली थी, जिसे उन्होंने तुरंत आगे भेज दिया। इस तरह दोनों पक्षों के बयान में अंतर सामने आया।
अदालत की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई कर रही अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लिया। अदालत ने कहा कि एसपी का हलफनामा सही तथ्यों पर आधारित नहीं था और ऐसा लगता है कि अपने अधीनस्थ अधिकारी को बचाने के लिए जिम्मेदारी किसी और पर डालने की कोशिश की गई।
कोर्ट ने इसे लापरवाही ही नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी के लिए अनुचित आचरण भी माना और दोनों अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया।
एसपी ने मांगी बिना शर्त माफी
16 अप्रैल को जब इस मामले की सुनवाई हुई, तो एसपी ने अदालत के सामने अपनी गलती स्वीकार कर ली। उन्होंने कहा कि उनका गलत जानकारी देने का कोई इरादा नहीं था और उन्हें अधीनस्थ कर्मचारियों से जो जानकारी मिली, उसी के आधार पर हलफनामा तैयार किया गया था। उन्होंने बिना शर्त माफी मांगते हुए अदालत से नरमी बरतने की अपील की।
अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि किसी भी जिले का प्रमुख अधिकारी होने के नाते एसपी की जिम्मेदारी है कि वह अपने अधीनस्थों द्वारा दी गई जानकारी को परखे और उसकी सत्यता सुनिश्चित करे, खासकर तब जब वही जानकारी हलफनामे के रूप में उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा रही हो।
कोर्ट ने यह भी कहा कि गलत तथ्य पेश करना गंभीर मामला है और इसके लिए आपराधिक अवमानना की कार्रवाई भी हो सकती है। हालांकि एसपी की माफी को देखते हुए अदालत ने सख्त कार्रवाई करने के बजाय उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया और कोर्ट उठने तक अदालत में बैठने का निर्देश दिया।
इसी मामले में अदालत ने आरोपी मंजीत कुमार की जमानत याचिका पर भी फैसला सुनाया। अदालत ने उपलब्ध तथ्यों पर विचार करते हुए पाया कि घटना का कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है और मृतक को आखिरी बार आरोपी के साथ देखा गया था।
दोनों के बीच प्रेम संबंध होने की बात भी सामने आई, साथ ही यह भी तथ्य आया कि दोनों ने जहर का सेवन किया था। अदालत ने यह भी माना कि मृतक को लगी चोटें गिरने से हो सकती हैं और आरोपी के पास से कोई हथियार बरामद नहीं हुआ। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत दे दी।
इस पूरे मामले से साफ है कि अदालत प्रशासनिक अधिकारियों से पूरी जिम्मेदारी और पारदर्शिता की उम्मीद करती है। गलत जानकारी देना या तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
साथ ही, अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि कोई अधिकारी अपनी गलती स्वीकार करता है और सुधार की भावना दिखाता है, तो उसे एक मौका दिया जा सकता है, लेकिन भविष्य में ऐसी गलती दोहराने की गुंजाइश नहीं होगी।
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