सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में उच्च न्यायालयों द्वारा अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की सार्वजनिक रूप से आलोचना करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि उच्च न्यायालय को जिला न्यायपालिका के अधिकारियों के लिए एक 'अभिभावक' या 'संरक्षक' के रूप में कार्य करना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में कहा कि हाल के दिनों में यह एक चलन बन गया है कि उच्च न्यायालय अपने पर्यवेक्षी या अपीलीय क्षेत्राधिकार का उपयोग करते समय न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां दर्ज करते हैं।
न्यायालय ने आगाह किया कि ''ऐसी अपमानजनक टिप्पणियां न केवल संबंधित अधिकारी के करियर को बर्बाद कर सकती हैं, बल्कि पूरी जिला न्यायपालिका का मनोबल भी गिरा सकती हैं।''
न्यायिक आदेश में खामियों पर तत्काल प्रतिक्रिया से बचें
न्यायालय ने कहा कि यदि किसी न्यायिक आदेश में खामियां पाई जाती हैं, तो तत्काल प्रतिक्रिया के रूप में अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी करना उचित नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद करते हुए यह बात कही, जिसमें तकनीकी आधार पर एक आरोपित की जमानत आठ साल बाद रद कर दी गई थी।
न्यायालय ने याद दिलाया कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत उच्च न्यायालयों को दी गई अधीक्षण की शक्ति का उपयोग उत्पीड़न के उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि न्यायिक अधिकारियों को सुधारने और मार्गदर्शन देने के तंत्र के रूप में किया जाना चाहिए। न्यायालय ने सुझाव दिया कि उच्च न्यायालयों को एक 'इन-हाउस' तंत्र विकसित करना चाहिए।
पीठ ने कहा कि यदि किसी ट्रायल कोर्ट के न्यायाधीश के आदेश में कोई त्रुटि पाई जाती है, तो उसे एक 'रिमार्क स्लिप' में दर्ज किया जाना चाहिए। इस स्लिप को प्रशासनिक न्यायाधीश या प्रधान न्यायाधीश के समक्ष आवश्यक अनुवर्ती कार्रवाई के लिए रखा जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश न्यायिक पदानुक्रम में सम्मान और सुधार की संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
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