गुजरात हाईकोर्ट ने शुक्रवार को एक बेहद भावुक मामले में मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता दी। अदालत ने सूरत की लाजपोर जेल में बंद एक व्यक्ति को उसके पालतू कुत्ते (जर्मन शेफर्ड) के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पुलिस कस्टडी में घर ले जाने का आदेश दिया। सूरत निवासी यह व्यक्ति अपनी पत्नी के साथ चल रहे धोखाधड़ी के एक मामले में जेल में बंद है। शुक्रवार को जब हाईकोर्ट में उसकी जमानत याचिका पर सुनवाई हो रही थी, तभी वकील ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के 14 साल पुराने पालतू कुत्ते की मौत हो गई है। आरोपी अपने वफादार साथी को अंतिम विदाई देना चाहता था।
अदालत का फैसला
हाईकोर्ट के जस्टिस यू।टी। देसाई की बेंच ने मामले की गंभीरता और पालतू जानवर के प्रति व्यक्ति के लगाव को देखते हुए निर्देश दिया कि पुलिस उसे शुक्रवार रात 8 बजे तक उसके घर ले जाए। खासबात यह है कि अदालत ने निर्देश दिया कि पुलिसकर्मी सिविल ड्रेस (सादे कपड़ों) में होंगे ताकि पड़ोसियों को किसी असहज स्थिति का सामना न करना पड़े। साथ ही पुलिस कस्टडी का खर्च सरकार वहन करेगी।
य और संवेदनाओं का संगम
यह फैसला भारतीय न्यायपालिका के उस चेहरे को दर्शाता है जहां कानून की सख्त धाराओं के बीच मानवीय संवेदनाओं के लिए भी जगह है।
1। पशु प्रेम को मान्यता: अदालत ने स्वीकार किया कि 14 साल तक साथ रहने वाला पालतू जानवर परिवार के सदस्य जैसा होता है। उसे अंतिम विदाई देना व्यक्ति का भावनात्मक अधिकार है।
2। गरिमा का ध्यान: पुलिस को सादे कपड़ों में भेजने का निर्देश आरोपी की सामाजिक गरिमा को बचाने का प्रयास है, खासकर तब जब मामला वैवाहिक विवाद से जुड़ा हो।
3। अभूतपूर्व आदेश: आमतौर पर पैरोल या कस्टडी पैरोल करीबी रिश्तेदारों की मृत्यु पर मिलती है, लेकिन पालतू कुत्ते के लिए ऐसा आदेश एक सकारात्मक नजीर पेश करता है।
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