Citation : 2026 Latest Caselaw 351 Chatt
Judgement Date : 11 March, 2026
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(Cr. A. No.-550 of 2026)
2026:CGHC:11688
अप्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
दाण्डिक अपील क्रमांक-550/2026
राके श गुप्ता पिता-राजकु मार गुप्ता, उम्र-लगभग 30 वर्ष, निवासी-सन्ना, पुलिस
थाना-सन्ना, जिला-जशपुर, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-आदिम जाति कल्याण, जशपुर, जिला-जशपुर,
छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा : श्री हेमंत गुप्ता, अधिवक्ता ।
आपत्तिकर्ता द्वारा : श्री अकथ कु मार यादव, अधिवक्ता ।
राज्य/उत्तरवादी द्वारा : श्री अमित वर्मा, पैनल अधिवक्ता ।
माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल, न्यायाधीश
!! आदेश पीठ पर पारित !!
11/03/2026
1.
धारा 14(क)(ii) अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण)
अधिनियम, 1989 (जिसे आगे संक्षेप में "विशेष अधिनियम" कहा गया है) के अंतर्गत
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2026.03.12 10:47:57 +0530
(Cr. A. No.-550 of 2026)
प्रस्तुत इस अपील में विचारण न्यायालय-विशेष न्यायाधीश (विशेष अधिनियम), जशपुर,
छत्तीसगढ़ द्वारा पुलिस थाना-आदिम जाति कल्याण, जशपुर, छत्तीसगढ़ के अपराध
क्रमांक-01/2026 अंतर्गत धारा 296, 126(1), 74, 75(1)(i), 75(1)(ii),
75(1)(iv), 351(3) भारतीय न्याय संहिता, 2023 तथा विशेष अधिनियम की धारा
3(1)(द), 3(1)(ध), 3(2)(vक) के तहत प्रस्तुत अग्रिम जमानत आवेदन में पारित
आदेश दिनांक-16/02/2026 को चुनौती दी गई है जिसके तहत अपीलार्थी/अभियुक्त
का अग्रिम जमानत आवेदन निरस्त कर दिया गया । उक्त आदेश को संक्षेप में "प्रश्नाधीन
आदेश" से संबोधित किया जा रहा है ।
2. अभियोजन मामला संक्षेप में इस आशय का है कि अभियोक्त्री, तहसील सन्ना, जिला
जशपुर में तहसीलदार के पद पर पदस्थ एक महिला शासकीय कर्मचारी है, जो उरांव जाति
की होकर अनुसूचित जनजाति वर्ग से संबंधित है । अपीलार्थी/आवेदक राके श गुप्ता जनपद
पंचायत बगीचा, जिला जशपुर का निर्वाचित जनपद सदस्य है । दिनांक 28/10/2025
को अभियोक्त्री ने तहसीलदार के रूप में निरीक्षण के दौरान पाया कि ग्राम सन्ना स्थित
घास/चारागाह तथा सड़क मद की शासकीय भूमि पर वहां के निवासी अशोक गुप्ता द्वारा
मकान का निर्माण किया जा रहा है । इस संबंध में ग्राम पंचायत सन्ना द्वारा उसे उक्त स्थल
से कब्जा हटाने की सूचना दी गई थी, किं तु इसके बावजूद उसने निर्माण कार्य बंद नहीं
किया । जब अभियोक्त्री ग्रामवासियों की उपस्थिति में उक्त निर्माण कार्य को रोकने हेतु
निर्देश दे रही थी, तभी अपीलार्थी राके श गुप्ता वहां पहुंच गया और उसने अशोक गुप्ता के
साथ मिलकर अभियोक्त्री के शासकीय कार्य में व्यवधान उत्पन्न करते हुए उसके साथ
अभद्र व्यवहार किया । अपीलार्थी द्वारा अभियोक्त्री को 'आदिवासी' कहकर उपस्थित
लोगों के समक्ष जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करते हुए गाली-गलौज की गई तथा उसे
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अपमानित किया गया । साथ ही जोर-जोर से बहस करते हुए उसका स्थानांतरण करवा
देने की धमकी भी दी गई । इस संबंध में अभियोक्त्री द्वारा संबंधित थाने में लिखित
शिकायत प्रस्तुत की गई, किं तु थाना प्रभारी द्वारा कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई ।
तत्पश्चात अभियोक्त्री द्वारा दिनांक 31/10/2025 को पुलिस अधीक्षक कार्यालय,
जशपुर में लिखित शिकायत दी, परंतु उस पर भी कोई कार्यवाही नहीं हुई । इसके बाद
दिनांक 28/01/2026 को रात्रि लगभग 08:00 बजे जब अभियोक्त्री तहसील कार्यालय
से अपने निवास ग्राम कोपा जा रही थी, तब हाई स्कू ल के पास अपीलार्थी ने उसकी गाड़ी
को रोक लिया और उसे गाड़ी से नीचे खींचकर उतार दिया । इस दौरान अपीलार्थी द्वारा
उसे 'नौकरी खा जाऊं गा' कहकर धमकी दी गई तथा अश्लील एवं जातिसूचक गालियां दी
गईं । साथ ही उसके साथ संबंध बनाने की बात कहते हुए उसके कमर एवं छाती को छू कर
अशोभनीय व्यवहार किया गया और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उसे अपमानित किया
गया । तत्पश्चात अभियोक्त्री द्वारा दिनांक 28/01/2026 को थाना आदिम जाति
कल्याण, जशपुर में लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई, जिसके आधार पर दिनांक
10/02/2026 को अपराध क्रमांक 01/2026 का प्रथम सूचना पत्र पंजीबद्ध किया
गया ।
3. अपीलार्थी/आवेदक के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि अपीलार्थी एक जनप्रतिनिधि है ।
अभियोक्त्री, जो कि तहसीलदार के पद पर पदस्थ है, वह अपने पद का दुरुपयोग करते हुए
लोगों के मकानों को तोड़ने की अवैधानिक कार्यवाही कर रही थी, जिसका अपीलार्थी द्वारा
विरोध किया गया । इसी संबंध में अपीलार्थी ने दिनांक 31/10/2025 को अनुविभागीय
अधिकारी (राजस्व) के माध्यम से माननीय मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ शासन को शिकायत
प्रेषित की थी । इसके अतिरिक्त दिनांक 31/10/2025 को चार व्यक्तियों द्वारा उसके
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साथ मारपीट किए जाने के संबंध में उसने थाना प्रभारी, सन्ना को भी लिखित शिकायत दी
थी । दिनांक 01/12/2025 को उसने कलेक्टर, जशपुर के समक्ष भी शिकायत प्रस्तुत
की । दिनांक 06/02/2026 को अनेक ग्रामवासियों के साथ मिलकर माननीय
महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष भी तहसीलदार के विरुद्ध शिकायत प्रेषित की थी । यह भी
तर्क किया गया है कि उक्त शिकायतों से नाराज होकर अभियोक्त्री द्वारा काफी विलंब से,
दिनांक 28/01/2026 को अपीलार्थी के विरुद्ध शिकायत की गई, जबकि कथित घटना
दिनांक 28/10/2025 की बताई गई है, अर्थात लगभग तीन माह के विलंब से शिकायत
प्रस्तुत की गई । साथ ही शिकायत में किसी विशिष्ट जातिसूचक शब्द का स्पष्ट उल्लेख भी
नहीं है । अपीलार्थी एक जनप्रतिनिधि है तथा अवैध कार्यवाहियों का विरोध करता रहा है,
इसलिए उससे रुष्ट होकर अभियोक्त्री तहसीलदार द्वारा उसके विरुद्ध झूठी शिकायत की गई
है, जिसमें उसकी गिरफ्तारी की आशंका है । यह भी तर्क किया गया है कि प्रकरण में
विशेष अधिनियम के प्रावधान आकर्षित नहीं होते हैं । विचारण न्यायालय का "प्रश्नाधीन
आदेश" उचित नहीं है । अतः "प्रश्नाधीन आदेश" अपास्त करते हुए अपीलार्थी/अभियुक्त
को अग्रिम जमानत पर रिहा किया जाये । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में
न्यायदृष्टांत Prathvi Raj Chauhan v. Union of India and others, (2020) 4
SCC 727 एवं Shajan Skaria v. State of Kerala and Another, 2024 SCC
OnLine SC 2249 का हवाला दिया है ।
4. उत्तरवादी/राज्य की ओर से विद्वान अधिवक्ता ने अपील का विरोध करते हुए तर्क किया कि
अपीलार्थी/अभियुक्त के विरुद्ध दर्ज अपराध से प्रथमदृष्टया विशेष अधिनियम के प्रावधान
आकर्षित होते हैं । ऐसी दशा में प्रकरण अग्रिम जमानत योग्य नहीं है । अतः अपील
खारिज की जाए ।
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5. इस अपील के संबंध में अभियोक्त्री को दिनांक-26/02/2026 को सूचना प्रेषित की गई
थी । जिसके अनुपालन में अभियोक्त्री, आज दिनांक 11/03/2026 को संबंधित जिला
विधिक सेवा प्राधिकरण से आभासी रूप से उपस्थित होकर अपीलार्थी/अभियुक्त को
अग्रिम जमानत दिए जाने पर आपत्ति होने की अभिव्यक्ति की गई । अभियोक्त्री की ओर से
उपस्थित विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि घटना दिनांक 28/10/2025 के संबंध में
अभियोक्त्री ने उसी दिन संबंधित थाने में लिखित आवेदन प्रस्तुत करना चाहा था, किं तु
थाना प्रभारी द्वारा उस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई तथा रात्रि लगभग 02:00 बजे
आवेदन की पावती भी उसके हाथों से छीन ली गई । इसके पश्चात अभियोक्त्री द्वारा
दिनांक 31/10/2025 को पुलिस अधीक्षक, जशपुर के समक्ष लिखित शिकायत प्रस्तुत
की गई । दिनांक 28/01/2026 को जब अपीलार्थी द्वारा पुनः घटना कारित की गई,
तब अभियोक्त्री ने पुनः शिकायत प्रस्तुत की, जिसके आधार पर अपीलार्थी के विरुद्ध
भारतीय न्याय संहिता के साथ-साथ विशेष अधिनियम के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया
गया, जिससे प्रथमदृष्टया विशेष अधिनियम के अपराध का कारित होना परिलक्षित होता है ।
अपीलार्थी एक आदतन अपराधी है, जिसके विरुद्ध कु ल 07 आपराधिक प्रकरण रहे हैं,
जिनमें से 04 प्रकरण थाना सन्ना में अपराध क्रमांक 14/2015, 75/2015,
30/2024 एवं 31/2024 के रूप में पंजीबद्ध हैं तथा इसके अतिरिक्त 03 इस्तगासा
प्रकरण क्रमांक 37/2015, 22/2016 एवं 94/2016 भी उसके विरुद्ध हैं ।
अपीलार्थी के राजनीतिक प्रभाव के कारण पुलिस द्वारा समय पर अभियोक्त्री की शिकायत
दर्ज नहीं की गई थी तथा इससे बचने के उद्देश्य से अपीलार्थी द्वारा बार-बार अभियोक्त्री के
विरुद्ध झूठी शिकायतें प्रस्तुत की जाती रही हैं, जबकि शासकीय कार्य में हस्तक्षेप करने का
उसे कोई अधिकार नहीं है । अपीलार्थी द्वारा अभियोक्त्री के अनुसूचित जनजाति वर्ग का
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सदस्य होने की जानकारी होते हुए भी उसे आशयपूर्वक जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर
अपमानित किया गया है । अतः 'विशेष अधिनियम' की धारा 18 के अंतर्गत अग्रिम
जमानत पर लगाए गए प्रतिबंध का प्रावधान वर्तमान प्रकरण में लागू होता है । इसलिए
विचारण न्यायालय द्वारा पारित "प्रश्नाधीन आदेश" उचित एवं विधिसम्मत है, जिसमें किसी
प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है । अतः प्रस्तुत अपील खारिज किया जाए ।
6. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया तथा अभिलेख एवं के स डायरी का परिशीलन किया गया ।
7. विशेष अधिनियम की धारा-18 के अंतर्गत अग्रिम जमानत पर लगाए गए प्रतिबंध के संबंध
में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Kiran v. Rajkumar Jivraj Jain and
Another 2025 SCC OnLine SC 1886 में निम्नानुसार अवधारणा व्यक्त की गई हैः-
"6. In light of the parameters in relation to the applicability of Section 18 of the Act emanating from afore-discussed various decisions of this Court, the proposition could be summarised that as the provision of Section 18 of the Scheduled Caste and Scheduled Tribes Act, 1989 with express language excludes the applicability of Section 438, Cr. P.C., it creates a bar against grant of anticipatory bail in absolute terms in relations to the arrest of a person who faces specific accusations of having committed the offence under the Scheduled Caste and Scheduled Tribe Act. The benefit of anticipatory bail for such an accused is taken off.
6.1. The absolute nature of bar, however, could be read and has to be applied with a rider. In a given case where on the face of it the offence under Section 3 of the Act is found to have not been made out and that the accusations relating to the commission of such offence are devoid of prima facie merits, the Court has a room to exercise the discretion to grant anticipatory bail to the accused under Section 438 of the Code.
6.2. Non-making of prima facie case about the
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commission of offence is perceived to be such a situation where the Court can arrive at such a conclusion in the first blush itself or by way of the first impression upon very reading of the averments in the FIR. The contents and the allegations in the FIR would be decisive in this regard. Furthermore, in reaching a conclusion as to whether a prima facie offence is made out or not, it would not be permissible for the Court to travel into the evidentiary realm or to consider other materials, nor the Court could advert to conduct a mini trial."
8. अभिलेख के समग्र परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि दिनांक 28/10/2025 की जो
घटना बताई गई है, उस संबंध में अपराध की कायमी भले ही पश्चात में दिनांक
10/02/2026 को की गई हो, किं तु अभियोक्त्री द्वारा पुलिस अधीक्षक, जशपुर को
प्रस्तुत प्रथम लिखित शिकायत दिनांक 31/10/2025 की है, जिसमें अपीलार्थी द्वारा
जातिसूचक अश्लील गाली-गलौज करते हुए उसे अपमानित एवं प्रताड़ित किए जाने का
स्पष्ट उल्लेख है । वहीं अपीलार्थी द्वारा अभियोक्त्री के विरुद्ध जो शिकायतें प्रस्तुत की गई
हैं, वे दिनांक 31/10/2025 अथवा उसके पश्चात की हैं । यह भी उल्लेखनीय है कि
अपीलार्थी के विरुद्ध पूर्व में 07 आपराधिक प्रकरण रहे हैं ।
9. उपरोक्त समस्त परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए प्रथम सूचना पत्र के अवलोकन से यह
परिलक्षित होता है कि प्रकरण में विशेष अधिनियम के प्रावधान प्रथमदृष्टया आकर्षित होते
हैं । अतः 'विशेष अधिनियम' की धारा 18 के अंतर्गत अग्रिम जमानत पर लगाए गए
प्रतिबंध का प्रावधान वर्तमान प्रकरण में लागू होता है । मामले के तथ्यों की भिन्नता के
कारण अपीलार्थी/आवेदक पक्ष द्वारा उल्लेखित न्यायदृष्टांत का समर्थन उसे नहीं मिलता ।
10. विधिक प्रावधान के प्रकाश में यह न्यायालय पाती है कि विशेष अधिनियम के प्रावधान इस
प्रकरण में आकर्षित होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अपीलार्थी/अभियुक्त का मामला अग्रिम
(Cr. A. No.-550 of 2026)
जमानत हेतु उपयुक्त नहीं पाया जाता । इसलिए विचारण न्यायालय द्वारा पारित "प्रश्नाधीन
आदेश" में कोई अवैधता अथवा अशुद्घता परिलक्षित नहीं होती है । अतः उसमें हस्तक्षेप
किए जाने की आवश्यकता नहीं पाई जाती । अतः अपील खारिज की जाती है ।
11. रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है कि इस आदेश की प्रति यथाशीघ्र विचारण न्यायालय
को सूचनार्थ प्रेषित किया जाए ।
सही/-
(संजय कु मार जायसवाल) न्यायाधीश
पोमन
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