Citation : 2026 Latest Caselaw 184 Chatt
Judgement Date : 9 March, 2026
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(Cr. A. No.-2621 of 2025)
2026:CGHC:11156
प्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
निर्णय सुरक्षित दिनांक-21/01/2026
निर्णय उद्घोषित दिनांक-09/03/2026
दाण्डिक अपील क्रमांक-2621/2025
1. आशीष गुप्ता पिता-स्वर्गीय रमेश प्रसाद गुप्ता, उम्र-लगभग 48 वर्ष, निवासी-वार्ड
संख्या-07, राम मंदिर के बगल में, बालोद, जिला-बालोद, छत्तीसगढ़
2. हीरामन कु मार साहू पिता-पुरेन्द्र कु मार साहू, उम्र-लगभग 47 वर्ष, निवासी-वार्ड
जगतरा, नयापारा, बालोद, पुलिस थाना व जिला-बालोद, छत्तीसगढ़
वर्तमान निवासी-वार्ड संख्या-12, गंजपारा, बालोद, जिला-बालोद, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण
विरूद्घ
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-बालोद, जिला-बालोद, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य
अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण द्वारा : श्री हेमंत गुप्ता, अधिवक्ता ।
राज्य/उत्तरवादी द्वारा : श्री अनीश तिवारी, उप शासकीय अधिवक्ता ।
माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल, न्यायाधीश
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POMAN
POMAN DEWANGAN
DEWANGAN Date:
2026.03.09
17:43:26
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!! सी.ए.वी. निर्णय !!
1. धारा 14(क)(i) अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण)
अधिनियम, 1989 (जिसे आगे संक्षेप में "विशेष अधिनियम" कहा गया है) के अंतर्गत
प्रस्तुत इस अपील में, विचारण न्यायालय विशेष न्यायाधीश (विशेष अधिनियम), बालोद,
जिला बालोद (छत्तीसगढ़) द्वारा विशेष सत्र प्रकरण क्रमांक 62/2025 "छत्तीसगढ़ राज्य
विरुद्ध आशीष गुप्ता एवं एक अन्य" में पारित आदेश दिनांक 26/09/2025 को चुनौती
दी गई है ।
2. उक्त आदेश के माध्यम से अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण के विरुद्ध धारा 296 सहपठित धारा
3(5), धारा 351(3)/351(2), धारा 351(3)/351(2) सहपठित धारा 3(5), धारा
115(2) सहपठित धारा 3(5), धारा 115(2) सहपठित धारा 3(5) भारतीय न्याय
संहिता, 2023 तथा धारा 3(1)(द), 3(2)(vक) विशेष अधिनियम के अंतर्गत आरोप
विरचित किए गए ।
3. अभियोजन मामले के अनुसार दिनांक 02/06/2025 को थाना बालोद क्षेत्रांतर्गत
शीतला मंदिर चौपाटी के समीप लोक स्थान पर, यह जानते हुए कि प्रार्थीगण महार जाति
के होकर अनुसूचित जाति वर्ग के सदस्य हैं, अपीलार्थीगण ने सामान्य आशय निर्मित कर
उसके अग्रसरण में प्रार्थी माधवन डोंगरे को अश्लील गालियाँ देकर क्षोभ कारित किया,
प्रार्थी माधवन डोंगरे एवं लता डोंगरे के साथ मारपीट कर स्वेच्छया उपहति कारित की तथा
प्रार्थी माधवन डोंगरे एवं श्रीमती लता डोंगरे को संत्रास करने के आशय से उन्हें जान से
मारने की धमकी देकर आपराधिक अभित्रास कारित किया ।
4. अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि विचारणीय घटना के संबंध
में दिनांक 04/06/2025 को प्रातः 11:00 बजे थाना डौंडी में रिपोर्ट दर्ज कराई गई,
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जिस पर अपराध क्रमांक 01/2025 का प्रथम सूचना पत्र कायम किया गया । तत्पश्चात,
उसी दिन कु छ समय पश्चात उसी आशय की शिकायत थाना बालोद में की गई, जिस पर
अपराध क्रमांक 228/2025 अंतर्गत धारा 115(2), 296, 3(5), 351(2) भारतीय
न्याय संहिता के तहत दर्ज किया गया । दोनों प्रथम सूचना पत्र में कोई मौलिक अंतर नहीं
रहा । बाद में थाना डौंडी में दर्ज प्रथम सूचना पत्र को शून्य क्रमांक (Zero FIR) मानते
हुए, थाना बालोद के अपराध क्रमांक-228/2025 में समाहित माना गया तथा
विवेचना पूर्ण कर अभियोगपत्र में विशेष अधिनियम की धारा 3(2)(vक) जोड़कर प्रस्तुत
किया गया । विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि प्रथम सूचना पत्र तथा धारा 180 भारतीय
नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अंतर्गत दर्ज प्रार्थीगण के कथन में विशेष अधिनियम के
अंतर्गत किसी अपराध के आवश्यक तत्व परिलक्षित नहीं होते हैं । तथापि विचारण
न्यायालय द्वारा उनके विरुद्ध विशेष अधिनियम की धारा 3(1)(द) एवं 3(2)(Vक) के
तहत आरोप विरचित किया गया है, जो विधि सम्मत नहीं है । विशेष अधिनियम के अंतर्गत
कोई अपराध प्रथम दृष्टया दर्शित नहीं होता है । विवेचक द्वारा मात्र प्रार्थीगण की जाति
प्रमाणपत्र के आधार पर विशेष अधिनियम के अपराधों को अभियोगपत्र में सम्मिलित कर
दिया गया है । संपूर्ण विवेचना में ऐसा कोई तथ्य नहीं आया है जिससे यह स्थापित हो कि
अपीलार्थीगण ने यह जानते हुए अथवा इस आशय से कोई कृ त्य किया हो कि प्रार्थीगण
महार जाति से संबंधित होकर अनुसूचित जाति वर्ग के सदस्य हैं । इस प्रकार विशेष
अधिनियम के अंतर्गत अपराध का गठन नहीं होता । अतः विचारण न्यायालय द्वारा विशेष
अधिनियम के अंतर्गत जो आरोप क्रमांक-4 व 5 विरचित किए गए हैं, वे विधि की दृष्टि में
उचित ना होने से स्थिर रखे जाने योग्य नहीं हैं अतः उन्हें समाप्त किया जाये । विद्वान
अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में न्यायदृष्टांत Hitesh Verma v. State of
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Uttarakhand and Another, (2020) 10 SCC 710 एवं Shajan Skaria v. State
of Kerala and Another, 2024 SCC OnLine SC 2249 का हवाला दिया है ।
5. उत्तरवादी/राज्य के विद्वान अधिवक्ता ने अपील का विरोध करते हुए तर्क किया है कि जो
आरोप विरचित किया गया है वह वैध और उचित है अतः अपील खारिज किया जाये ।
6. प्रार्थीगण की ओर से सूचना तामिल पश्चात कोई उपस्थित नहीं ।
7. उपस्थित पक्ष का तर्क श्रवण किया गया तथा अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया
गया ।
8. विचारणीय मामले में घटना दिनांक-02/06/2025 की है । "विशेष अधिनियम" में
दिनांक-26/01/2016 को प्रभावी हुए संशोधन के पश्चात धारा-3(1)(द) व धारा
3(2)(vक) के प्रावधान निम्नानुसार हैः-
"धारा-3 अत्याचार के अपराधों के लिए दंड.-(1) कोई भी व्यक्ति,
जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है-
(द)-अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के किसी सदस्य को
अवमानित करने के आशय से लोक दृष्टि में आने वाले किसी स्थान
पर अपमानित या अभित्रस्त करेगा;
धारा 3(2) कोई भी व्यक्ति, जो अनुसूचित जाति या अनुसूचित
जनजाति का सदस्य नहीं है-
(vक)-अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई अपराध किसी व्यक्ति या संपत्ति
के विरूद्घ, यह जानते हुए करेगा कि ऐसा व्यक्ति अनुसूचित जाति या
अनुसूचित जनजाति का सदस्य है या वह संपत्ति ऐसे सदस्य की है,
वह ऐसे अपराधों के लिए भारतीय दंड संहिता के अधीन यथा
विनिर्दिष्ट दंड से दंडनीय होगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।"
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9. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Hitesh Verma (पूर्वोंक्त) में निम्नानुसार
अवधारणा व्यक्त की गयी हैः-
"22. The appellant had sought quashing of the charge-
sheet on the ground that the allegation does not
make out an offence under the Act against the
appellant merely because Respondent 2 was a
Scheduled Caste since the property dispute was not on account of the fact that Respondent 2 was a Scheduled Caste. The property disputes between a vulnerable section of the society and a person of upper caste will not disclose any offence under the Act unless, the allegations are on account of the victim being a Scheduled Caste. Still further, the finding that the appellant was aware of the caste of the informant is wholly inconsequential as the knowledge does not bar any person to protect his rights by way of a procedure established by law.
23. This Court in a judgment reported as Ishwar Pratap Singh v. State of U.P. [Ishwar Pratap Singh v. State of U.P., (2018) 13 SCC 612 : (2018) 3 SCC (Cri) 818] held that there is no prohibition under the law for quashing the charge-sheet in part. In a petition filed under Section 482 of the Code, the High Court is required to examine as to whether its intervention is required for prevention of abuse of process of law or otherwise to secure the ends of justice. The Court held as under : (SCC p. 618, para 9)
"9. Having regard to the settled legal position on external interference in investigation and the specific facts of this case, we are of the view that the High Court ought to have exercised its jurisdiction under Section 482 CrPC to secure the ends of justice. There is no prohibition under law for quashing a charge-sheet in part. A person may be accused of several offences under different penal
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statutes, as in the instant case. He could be aggrieved of prosecution only on a particular charge or charges, on any ground available to him in law. Under Section 482, all that the High Court is required to examine is whether its intervention is required for implementing orders under the Criminal Procedure Code or for prevention of abuse of process, or otherwise to secure the ends of justice. A charge-sheet filed at the dictate of somebody other than the police would amount to abuse of the process of law and hence the High Court ought to have exercised its inherent powers under Section 482 to the extent of the abuse. There is no requirement that the charge-sheet has to be quashed as a whole and not in part. Accordingly, this appeal is allowed. The supplementary report filed by the police, at the direction of the Commission, is quashed."
10. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Shajan Skaria (पूर्वोंक्त) में निम्नानुसार
अवधारणा व्यक्त की गयी हैः-
"80. At the cost of repetition, the words in Section 3(1)
(r) of the Act, 1989 are altogether different. Mere knowledge of the fact that the victim is a member of the Scheduled Caste or Scheduled Tribe is not sufficient to attract Section 3(1)(r) of the Act, 1989.
As discussed earlier, the offence must have been committed against the person on the ground or for the reason that such person is a member of Scheduled Caste or Scheduled Tribe. When we are considering whether prima facie materials exist, warranting arrest of the appellant, there is nothing to indicate that the allegations/statements alleged to have been made by the appellant were for the reason that the complainant is a member of a Scheduled Caste."
11. उपरोक्त विधिक प्रावधानों तथा न्यायदृष्टांतों के आलोक में विचार करने पर यह स्पष्ट होता है
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कि विचाराधीन घटना दिनांक 02/06/2025 की है, जो विशेष अधिनियम के संशोधन
के पश्चात की है । संशोधित प्रावधानों के अनुसार धारा 3(1)(द) के अपराध के लिए
विशेष आशय तथा धारा 3(2)(vक) के अपराध के लिए यह ज्ञान आवश्यक है कि प्रार्थी
पक्ष अनुसूचित जाति वर्ग का सदस्य है । विचाराधीन प्रकरण में प्रथम सूचना पत्र में इस
संबंध में कोई तथ्य उल्लेखित नहीं है । यहां तक कि पुलिस द्वारा अपराध पंजीबद्ध करने के
पश्चात धारा 180 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अंतर्गत प्रार्थी तथा साक्षियों
के जो कथन लिए गए हैं, उनमें भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं है जिससे यह परिलक्षित हो कि
अपीलार्थीगण ने उक्त अपराध इस विशेष आशय से किया हो कि प्रार्थी पक्ष महार जाति के
होकर अनुसूचित जाति वर्ग के सदस्य हैं । इसके अतिरिक्त ऐसा कोई तथ्य भी अभिलेख
पर उपलब्ध नहीं है जिससे प्रथमदृष्टया यह प्रकट हो सके कि घटना के समय अपीलार्थीगण
को इस बात का ज्ञान था कि प्रार्थी पक्ष विशेष जाति वर्ग के सदस्य हैं । मात्र विवेचक द्वारा
विवेचना पूर्ण होने के पश्चात प्रार्थी पक्ष का जाति प्रमाणपत्र संकलित कर अभियोगपत्र में
विशेष अधिनियम की धाराओं का उल्लेख करते हुए अभियोगपत्र प्रस्तुत कर दिया गया है ।
आरोप के निर्धारण के लिए विवेचना में संकलित साक्ष्य से प्रथमदृष्टया अपराध दर्शित होना
चाहिए, किं तु अभियोगपत्र के परिशीलन से यह तथ्य परिलक्षित नहीं होता कि अपीलार्थीगण
को इस बात का ज्ञान था कि प्रार्थी पक्ष महार जाति के होकर अनुसूचित जाति वर्ग के
सदस्य हैं, अथवा उन्होंने जाति विशेष को लक्ष्य कर उक्त अपराध कारित किया ।
12. उपरोक्त परिस्थितियों में यह न्यायालय पाती है कि अभियोगपत्र में विशेष अधिनियम के
अपराध से संबंधित आवश्यक तत्व एवं साक्ष्य प्रथमदृष्टया प्रकट नहीं होते, जिनसे विशेष
अधिनियम के अंतर्गत कोई अपराध कारित होना प्रथमदृष्टया स्थापित हो सके । अतः
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विशेष न्यायालय द्वारा अपीलार्थीगण के विरुद्ध विशेष अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित
आरोप क्रमांक 04 एवं 05 उचित नहीं पाये जाते तथा स्थिर रखे जाने योग्य नहीं हैं ।
13. अतः अपील स्वीकार की जाती है । "प्रश्नाधीन आदेश" के तहत अपीलार्थीगण के विरुद्ध
विशेष अधिनियम के अंतर्गत विरचित आरोप क्रमांक 04 एवं 05 अपास्त किए जाते हैं ।
उक्त आरोपों के निरस्तीकरण के पश्चात शेष आरोपों के संबंध में प्रकरण को सक्षम
न्यायालय में विचारण हेतु प्रेषित किया जाना उपयुक्त है । अतः प्रश्नाधीन विशेष मामला,
न्यायालय-मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बालोद, जिला बालोद को विधिवत विचारण एवं
निराकरण हेतु प्रेषित हो ।
14. रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है कि इस निर्णय की प्रति यथाशीघ्र विचारण न्यायालय
को पालनार्थ एवं सूचनार्थ प्रेषित किया जाए ।
15. उपरोक्तानुसार, इस अपील का निराकरण किया जाता है ।
सही/-
(संजय कु मार जायसवाल)
न्यायाधीश
पोमन
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