Citation : 2026 Latest Caselaw 143 Chatt
Judgement Date : 27 February, 2026
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(Cr. A. No.-428 of 2026)
2026:CGHC:10384
अप्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
दाण्डिक अपील क्रमांक-428/2026
राजेश कु मार शर्मा पिता-हजारी लाल शर्मा, उम्र-लगभग 55 वर्ष, निवासी-वार्ड
संख्या-07, मेन रोड, बिलाईगढ़, जिला-सारंगढ़-बिलाईगढ़, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थी/अभियुक्त
विरूद्घ
1.
छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-बिलाईगढ़, जिला-सारंगढ़-बिलाईगढ़, छत्तीसगढ़
(राज्य)
2. श्रीमती अनुसुईया कहार पति-लीलाम्बर कहार, उम्र-लगभग 30 वर्ष, निवासी-वार्ड
संख्या-02, मेन रोड, बिलाईगढ़, तहसील-बिलाईगढ़, जिला-बिलाईगढ़-सारंगढ़,
छत्तीसगढ़ (शिकायतकर्ता)
-----उत्तरवादीगण
अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा : श्री टी०के ० झा, अधिवक्ता ।
राज्य/उत्तरवादी क्रमांक-1 द्वारा : श्री आकाश अग्रवाल, पैनल अधिवक्ता ।
आपत्तिकर्ता/उत्तरवादी क्रमांक-2 द्वारा : श्री सुनील साहू, अधिवक्ता ।
माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल, न्यायाधीश
!! आदेश पीठ पर पारित !!
27/02/2026
Digitally signed by POMAN POMAN DEWANGAN DEWANGAN Date:
2026.02.28 10:58:02 +0530
(Cr. A. No.-428 of 2026)
1. धारा 14(क)(ii) अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण)
अधिनियम, 1989 (जिसे आगे संक्षेप में "विशेष अधिनियम" कहा गया है) के अंतर्गत
प्रस्तुत इस अपील में, विचारण न्यायालय-विशेष न्यायाधीश (विशेष अधिनियम), रायगढ़,
जिला-रायगढ़, छत्तीसगढ़ द्वारा आरक्षी के न्द्र-बिलाईगढ़, जिला-सारंगढ़-बिलाईगढ़,
छत्तीसगढ़ के अपराध क्रमांक-13/2026 अंतर्गत धारा-79 भारतीय न्याय संहिता एवं
धारा-3(2)(vक) विशेष अधिनियम के तहत प्रस्तुत अग्रिम जमानत आवेदन में पारित
आदेश दिनांक-05/02/2026 को चुनौती दी गई है जिसके तहत अपीलार्थी का अग्रिम
जमानत आवेदन निरस्त कर दिया गया । उक्त आदेश को संक्षेप में "प्रश्नाधीन आदेश" से
संबोधित किया जा रहा है ।
2. अभियोजन का मामला संक्षेप में इस आशय का है कि नगर पंचायत बिलाईगढ़ में पीड़ितगण
स्वच्छता कर्मी के रूप में कार्यरत हैं । उक्त नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक-07 की पार्षद
अपीलार्थी/अभियुक्त की पत्नी श्रीमती कीर्ति शर्मा हैं । पीड़ितगण मार्च, 2025 से "जय
माँ समलाई समूह" के अंतर्गत स्वच्छता दीदी के रूप में कार्य कर रही हैं, जहाँ कु छ समय
से अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा उनके साथ दुर्व्यवहार कर उन्हें परेशान किया जा रहा है ।
दिनांक 02.09.2025 को अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा बैठक के बहाने उन्हें नगर पंचायत
कार्यालय में अलग-अलग बुलाकर अभद्र व्यवहार किया गया । इस दौरान उन्हें
जातिसूचक गालियाँ दी गईं तथा चरित्रहीन एवं 'रंडी' जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित
किया गया । साथ ही उन्हें नीच जाति का बताते हुए जान से मारने एवं नौकरी से निकाल
देने की धमकी भी दी गई । अपीलार्थी, जो कि नगर पंचायत का कोई अधिकृ त प्रतिनिधि
नहीं है, अवैध रूप से कार्यालय में बैठकों का संचालन करता है तथा कर्मियों को धमकाता
है, जिसके कारण वे कार्य करने में असहजता एवं प्रताड़ना का अनुभव कर रही हैं । उक्त
(Cr. A. No.-428 of 2026)
संबंध में पीड़ितगण द्वारा नगर पंचायत बिलाईगढ़ में लिखित शिकायतें प्रस्तुत की गई,
जिनके आधार पर मुख्य नगर पालिका अधिकारी, नगर पंचायत बिलाईगढ़ द्वारा (दिनांक
02.08.2025, 02.09.2025 एवं 11.09.2025 की शिकायतों के संबंध में) थाना
प्रभारी बिलाईगढ़ को दिनांक 12.09.2025 को पत्र प्रेषित किया गया । तत्पश्चात
कार्यालय पुलिस अधीक्षक, जिला सारंगढ़ से दिनांक 27.11.2025 को जांच एवं आवश्यक
निर्देश प्राप्त होने के उपरांत थाना बिलाईगढ़ में अपीलार्थी/अभियुक्त के विरुद्ध धारा 79
भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत दिनांक 14.01.2026 को अपराध क्रमांक 13/2026
पंजीबद्ध कर विवेचना की जा रही है ।
3. अपीलार्थी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि दिनांक 02.09.2025 को नगर पंचायत के
नवनिर्वाचित अध्यक्ष दामोदर प्रसाद दुबे द्वारा गणमान्य नागरिकों की एक बैठक आहूत की
गई थी, जिसमें सम्मिलित होने हेतु अपीलार्थी उपस्थित हुआ था जहां शिकायत में वर्णित
जैसी कोई घटना घटित नहीं हुई । अपने पक्ष के समर्थन में नवनिर्वाचित अध्यक्ष दामोदर
प्रसाद दुबे सहित रमेश जायसवाल, सौभाग्य शरण सिंह, घसिया यादव, भरत जायसवाल,
दिनेश शर्मा, अरुण ग्रेवाल, कन्हैया लाल खुंटे, धनीराम देवांगन, नरेश देवांगन एवं दीपक
सिंघानिया द्वारा शपथपत्र प्रस्तुत किए हैं, जिनमें यह उल्लेखित है कि दिनांक 02.09.
2025 को नगर पंचायत परिसर में ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी । यह भी तर्क प्रस्तुत
किया गया है कि पीड़ितगण विभिन्न जातियों से संबंधित हैं तथा अपीलार्थी को उनके
जातिगत विवरण की जानकारी नहीं । अपीलार्थी द्वारा कोई अपराध कारित नहीं किया
गया है । अपराध विशेष अधिनियम के अंतर्गत पंजीबद्ध नहीं किया गया है तथा यह स्पष्ट
नहीं किया गया कि कथित रूप से कौन-सी जातिसूचक गालियाँ दी गईं । आगे यह भी
तर्क किया गया है कि अपराध की कायमी अत्यधिक विलंब से की गई है, जिससे संपूर्ण
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प्रकरण संदेहास्पद है । अपीलार्थी के विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराध निर्मित नहीं होता ।
विशेष अधिनियम की धारा 18 एवं 18(क) के प्रावधान इस प्रकरण में आकर्षित नहीं होते
हैं । अतः "प्रश्नाधीन आदेश" अपास्त करते हुए अपीलार्थी/अभियुक्त को अग्रिम जमानत
पर रिहा किया जाये । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में न्यायदृष्टांत Prathvi
Raj Chauhan v. Union of India and others, (2020) 4 SCC 727 का हवाला
दिया गया है ।
4. राज्य/उत्तरवादी क्रमांक-1 के विद्वान अधिवक्ता ने अपीलार्थी/अभियुक्त के तर्क का विरोध
करते हुए कहा है कि प्रश्नाधीन अग्रिम जमानत निरस्ती संबंधी आदेश उचित और वैध है ।
अपीलार्थी/अभियुक्त का अग्रिम जमानत आवेदन स्वीकार किए जाने योग्य नहीं है । अतः
जमानत संबंधी प्रस्तुत अपील खारिज किया जाए ।
5. शिकायतकर्ता/आपत्तिकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने उपस्थित होकर अपील का विरोध किया
तथा लिखित आपत्ति पत्र भी अभिलेख पर प्रस्तुत किया है । प्रस्तुत आपत्ति के अनुसार,
पीड़ितगण नगर पंचायत के स्वच्छता कर्मी हैं । विधिक जिम्मेदारी के अनुरूप उन्होंने
सर्वप्रथम अपनी शिकायत नगर पंचायत में दिनांक 02.08.2025, 02.09.2025 एवं
11.09.2025 को प्रस्तुत की, जिनमें अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा जातिसूचक गाली-गलौज
किए जाने, धमकी देने तथा दुर्व्यवहार किए जाने के आरोपों का स्पष्ट उल्लेख है । उक्त
शिकायतों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी, नगर पंचायत बिलाईगढ़ द्वारा दिनांक
12.09.2025 को थाना प्रभारी बिलाईगढ़ को प्रेषित किया गया, जिसके आधार पर पुलिस
अधीक्षक द्वारा की गई जांच एवं निर्देशों के उपरांत अपराध पंजीबद्ध किया गया ।
अपीलार्थी/अभियुक्त द्वारा समय-समय पर जातिगत आधार पर पीड़ितगण को अपमानित
(Cr. A. No.-428 of 2026)
एवं प्रताड़ित किया जाता रहा है । साथ ही यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि अपीलार्थी, जो
कि पार्षद के पति मात्र हैं, नगर पंचायत में बैठकों का आह्वान करने के लिए अधिकृ त नहीं
हैं, तथापि वे अनधिकृ त रूप से कार्यकलापों में हस्तक्षेप करते हुए अपने प्रभाव का उपयोग
कर पीड़ितगण को प्रताड़ित करते रहे हैं । अपीलार्थी के विरुद्ध विशेष अधिनियम के
अंतर्गत भी प्रथमदृष्टया अपराध बनता है । इस प्रकार, "विशेष अधिनियम" की धारा 18
आकर्षित होने के कारण अपीलार्थी का अग्रिम जमानत आवेदन जो विचारण न्यायालय द्वारा
खारिज किया गया है वह उचित है उसमें हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है । अतः जमानत
संबंधी प्रस्तुत अपील खारिज किया जाए । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में
न्यायदृष्टांत Kiran v. Rajkumar Jivraj Jain and Another 2025 SCC OnLine
SC 1886 का हवाला दिया है ।
6. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया तथा अभिलेख एवं के स डायरी का परिशीलन किया गया ।
7. विशेष अधिनियम की धारा-18 के अंतर्गत अग्रिम जमानत पर लगाए गए प्रतिबंध के संबंध
में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा न्यायदृष्टांत Kiran (पूर्वोंक्त) में निम्नानुसार अवधारणा
व्यक्त की गई हैः-
"6. In light of the parameters in relation to the applicability of Section 18 of the Act emanating from afore-discussed various decisions of this Court, the proposition could be summarised that as the provision of Section 18 of the Scheduled Caste and Scheduled Tribes Act, 1989 with express language excludes the applicability of Section 438, Cr. P.C., it creates a bar against grant of anticipatory bail in absolute terms in relations to the arrest of a person who faces specific accusations of having committed the offence under the Scheduled Caste and Scheduled Tribe Act. The benefit of anticipatory bail for such an accused is taken off.
(Cr. A. No.-428 of 2026)
6.1. The absolute nature of bar, however, could be read and has to be applied with a rider. In a given case where on the face of it the offence under Section 3 of the Act is found to have not been made out and that the accusations relating to the commission of such offence are devoid of prima facie merits, the Court has a room to exercise the discretion to grant anticipatory bail to the accused under Section 438 of the Code.
6.2. Non-making of prima facie case about the commission of offence is perceived to be such a situation where the Court can arrive at such a conclusion in the first blush itself or by way of the first impression upon very reading of the averments in the FIR. The contents and the allegations in the FIR would be decisive in this regard. Furthermore, in reaching a conclusion as to whether a prima facie offence is made out or not, it would not be permissible for the Court to travel into the evidentiary realm or to consider other materials, nor the Court could advert to conduct a mini trial."
8. अभिलेख के समग्र परिशीलन से यह स्पष्ट होता है कि पीड़ितगण नगर पंचायत में सफाई
कर्मी के रूप में कार्यरत हैं, जबकि अपीलार्थी/अभियुक्त न तो नगर पंचायत का कर्मचारी है,
न ही पार्षद है और न ही ऐसी कोई विधिक हैसियत रखता है जिससे वह नगर पंचायत के
कार्यों में हस्तक्षेप कर सके । तथापि, मुख्य नगर पालिका अधिकारी द्वारा दिनांक
12/09/2025 को थाना प्रभारी बिलाईगढ़ को प्रेषित पत्र तथा उसके साथ संलग्न
पीड़ितगण द्वारा विभिन्न तिथियों पर प्रस्तुत शिकायतों के अवलोकन, साथ ही अपराध की
की गई कायमी को दृष्टिगत रखते हुए यह परिलक्षित होता है कि शिकायतों में अपीलार्थी/
अभियुक्त द्वारा जातिगत आधार पर गाली-गलौज करने, धमकी देने एवं प्रताड़ित करने के
आरोप लगाए गए हैं ।
9. ऐसी दशा में, उपरोक्त विधिक प्रावधान तथा न्यायदृष्टांत के प्रकाश में यह न्यायालय पाती है
कि विशेष अधिनियम की धारा 18 एवं 18(क) के प्रावधान वर्तमान प्रकरण में आकर्षित
(Cr. A. No.-428 of 2026)
होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप अपीलार्थी/अभियुक्त का मामला अग्रिम जमानत हेतु
उपयुक्त नहीं पाया जाता । इसलिए विचारण न्यायालय द्वारा पारित "प्रश्नाधीन आदेश" में
कोई अवैधता अथवा अशुद्घता परिलक्षित नहीं होती है । अतः उसमें हस्तक्षेप किए जाने
की आवश्यकता नहीं पाई जाती । अतः अपील खारिज की जाती है ।
10. रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है कि इस आदेश की प्रति यथाशीघ्र विचारण न्यायालय
को सूचनार्थ प्रेषित किया जाए ।
सही/-
(संजय कु मार जायसवाल) न्यायाधीश
पोमन
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