अयोध्या के राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये केस अलग है इसपर भूमि विवाद पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अयोध्या विवाद और आज का केस अलग-अलग हैं। फारुकी केस की टिप्पणी से अयोध्या मामला अलग है। ऐसा मानना गलता है कि सुप्रीम कोर्ट ने नमाज को इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं माना था। यह मामला संविधान पीठ को नहीं सौंपा जाएगा। तथ्यों के आधार पर भूमि विवाद सुना जाएगा। राम मंदिर विवाद का मुकदमा अब नहीं टलेगा। 3 में से 2 जजों ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाया है।  तीन जजों की बेंच में से सबसे पहले चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा व जस्टिस अशोक भूषण ने संयुक्त फैसला सुनाया।चीफ जस्टिस और जस्टिस भूषण के बाद जस्टिस अब्दुल नजीर अलग फैसला सुना रहे हैं। राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद मालिकाना हक विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के 1994 के फैसले पर बड़ी पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की मांग लेकर दायर याचिकाओं पर गुरुवार को आए फैसले की मुख्‍य बातें यहां जानिए।

  1. जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि पुराना फैसला उस वक्‍त के तथ्‍यों के मुताबिक था। इस्‍माइल फारूकी का फैसला मस्जिद की जमीन के मामले में था।
  2. जस्टिस भूषण ने कहा कि फैसले में दो राय, एक मेरी और एक चीफ जस्टिस की, दूसरी जस्टिस नजीर की। मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्‍लाम का अटूट हिस्‍सा नहीं. पूरे मामले को बड़ी बेंच में नहीं भेजा जाएगा।
  3. पूरे मामले को बड़ी बेंच में नहीं भेजा जाएगा। इस्‍माइल फारूकी के फैसले पर दोबारा विचार की जरूरत नहीं। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 29 अक्‍टूबर से राम मंदिर मामले पर सुनवाई शुरू होगी।
  4. जस्टिस नजीर ने फैसला सुनाते समय कहा कि यह मामला बड़ी बेंच को भेजा जाना चाहिए।
  5. जस्टिस नजीर ने कहा कि मस्जिद में नमाज पर दोबारा विचार की जरूरत है। पुराने फैसलों में सभी तथ्‍यों पर विचार नहीं हुआ है।
  6. जस्टिस भूषण ने कहा कि सभी धर्मों और धार्मिक स्थानों को समान रूप से सम्मान देने की जरूरत है।
  7. सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला करना था कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है या नहीं और क्या इस मसले को बड़ी संवैधानिक बेंच को भेजा जाए।

क्या था इस्‍माइल फारुखी केस मुद्दा:

  1. अयोध्या मामले के एक मूल वादी एम सिद्दीक ने एम इस्माइल फारूकी के मामले में 1994 के फैसले में इन खास निष्कर्षों पर ऐतराज जताया था जिसके तहत कहा गया था कि मस्जिद इस्लाम के अनुयायियों द्वारा अदा की जाने वाली नमाज का अभिन्न हिस्सा नहीं है। सिद्दीक की मृत्यु हो चुकी है और उनका प्रतिनिधित्व उनके कानूनी वारिस कर रहे हैं।
  2. वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने सिद्दीक के कानूनी प्रतिनिधि की ओर से पेश होते हुए कहा था कि मस्जिदें इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है, यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने बगैर किसी पड़ताल के या धार्मिक पुस्तकों पर विचार किए बगैर की।
  3. मुस्लिम समूहों ने चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष यह दलील दी थी कि इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट के अवलोकन पर पांच सदस्यीय पीठ द्वारा पुनर्विचार करने की जरूरत है क्योंकि इसका बाबरी मस्जिद-राम मंदिर भूमि विवाद मामले पर असर पड़ेगा।
  4. हालांकि इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने शीर्ष न्यायालय से कहा था कि कुछ मुस्लिम समूह ‘इस्लाम का अभिन्न हिस्सा मस्जिद के नहीं होने’ संबंधी 1994 की टिप्पणी पर पुनर्विचार करने की मांग कर लंबे समय से लंबित अयोध्या मंदिर-मस्जिद भूमि विवाद मामले में विलंब करने की कोशिश कर रहे हैं। अतिरिक्त सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने उप्र सरकार की ओर से पेश होते हुए कहा था कि यह विवाद करीब एक सदी से अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहा है।

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