सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को पुनः सुदृढ़ करते हुए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एक राज्य कर्मचारी के विरुद्ध जारी संलगन (attachment) आदेश को निरस्त कर दिया तथा यह स्पष्ट किया कि स्थानांतरण एवं संलगन आदेश का उपयोग दंड के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता अशोक सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दिनांक 08.05.2026 को पारित उस आदेश को चुनौती दी, जिसके द्वारा उन्हें जनपद पंचायत, पोरसा, जिला मुरैना में संलग्न किया गया था। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि यह आदेश राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के दिनांक 04.05.2024 के परिपत्र तथा राज्य की स्थानांतरण नीति के विपरीत है, जिसमें संलगन को स्पष्यतः प्रतिबंधित किया गया है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्री प्रतीप विसोरिया ने तर्क दिया कि संलगन आदेश में स्वयं स्वीकार किया गया था कि यह दंड स्वरूप पारित किया गया है, जो विधि में अनुज्ञेय नहीं है। यह भी कहा गया कि प्रारंभिक जांच में याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ। राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता श्री जी.के. अग्रवाल ने विवादित आदेश का समर्थन करते हुए याचिका का विरोध किया।

न्यायमूर्ति आनंद सिंह बहरावत ने प्रथम दृष्टया (prima facie) पाया कि विवादित आदेश GAD परिपत्र दिनांक 04.05.2024 एवं स्थानांतरण नीति के विरुद्ध है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि स्थानांतरण नीति के खण्ड 52 के अंतर्गत सभी प्रकार के संलगन प्रतिबंधित हैं। चूंकि जांच रिपोर्ट में आरोप सिद्ध नहीं हुए, इसलिए संलगन द्वारा कर्मचारी को प्रताड़ित करना विधिसम्मत नहीं है।

न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के सोमेश तिवारी बनाम भारत संघ, (2009) 2 SCC 592 के निर्णय पर आधारित हुआ, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया था कि यदि स्थानांतरण आदेश दंड के स्थान पर या दंड के रूप में पारित किया जाए, तो वह पूर्णतः अवैध होने के कारण निरस्त किए जाने योग्य है।

न्यायालय ने याचिका स्वीकार कर दिनांक 08.05.2026 के संलगन आदेश को निरस्त कर दिया तथा प्रतिवादियों को निर्देशित किया कि याचिकाकर्ता को उनके वर्तमान पदस्थापना स्थल पर कर्तव्य निर्वहन जारी रखने दिया जाए। हालाँकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रतिवादी चाहें तो विधि के अनुसार याचिकाकर्ता के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही करने की स्वतंत्रता उन्हें है।

Case Details:

Case No.: Writ Petition No. 18968 of 2026 

Court: High Court of Madhya Pradesh, Gwalior Bench 

Bench: Hon'ble Justice Anand Singh Bahrawat

Petitioner: Ashok Singh

Respondents: State of Madhya Pradesh & Others 

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