नागरिकों के गैरकानूनी पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाने के अधिकार की रक्षा करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में दो आरोपितों के विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अस्पष्ट एवं सर्वव्यापी आरोप, जिनमें अपराध के आवश्यक वैधानिक तत्व न हों, आपराधिक मुकदमे में परिणत नहीं हो सकते।

यह मामला रामनाथपुरम जिले के परमाकुडी तालुक पुलिस थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 2/2023 से उत्पन्न हुआ। दिनांक 01.01.2023 की रात प्रथम याचिकाकर्ता थॉमस @ धमास परमाकुडी के इन्फेंट जीसस चर्च में नव वर्ष की पवित्र प्रार्थना सभा में सम्मिलित हुए थे। प्रार्थना के उपरांत लगभग 1.30 बजे वे और उनके मित्र चर्च के बाहर उत्सव मना रहे थे। वास्तविक शिकायतकर्ता, एक पुलिस अधिकारी वेंकटेश्वरन, पुलिस कर्मियों के साथ वहाँ आए, जाँच की और उपस्थित लोगों को घर भेज दिया। किंतु इसके पश्चात उसी दिन सुबह वे बिना किसी समन, नोटिस या जाँच पर्ची के सीधे प्रथम याचिकाकर्ता के घर पहुँचे और उन्हें उसी रात करीब 800 मीटर दूर हुई एक कथित चोरी के संबंध में पूछताछ के लिए उठा ले गए। द्वितीय याचिकाकर्ता लिंगाबालन बाद में वहाँ पहुँचे और आरोपी-1 की मनमानी गिरफ्तारी पर सवाल उठाया। तत्पश्चात दोनों याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध धारा 294(ब), 341, 353 एवं 506(ii) IPC के अंतर्गत मामला दर्ज कर, जाँच उपरांत न्यायिक मजिस्ट्रेट, परमाकुडी के समक्ष सी.सी. क्रमांक 209/2023 के रूप में अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गई।

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता श्री एस. सिल्वेस्टर राज ने तर्क दिया कि FIR और अंतिम रिपोर्ट में लगाए गए आरोप सर्वव्यापी, अस्पष्ट और उद्देश्यपूर्ण हैं — जो केवल वास्तविक शिकायतकर्ता की पूर्व में की गई गैरकानूनी हिरासत और जबरदस्ती पूछताछ को उचित ठहराने के लिए दर्ज किए गए। धारावार तर्क प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि: धारा 294(ब) हेतु कोई अश्लील शब्द उल्लिखित नहीं; धारा 341 हेतु कोई शारीरिक अवरोध नहीं; धारा 353 हेतु कोई हमला या आपराधिक बल प्रयोग नहीं; और धारा 506(ii) हेतु कोई गंभीर या वास्तविक धमकी नहीं।

राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता श्री एम. शक्ति कुमार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोप संज्ञेय अपराध प्रकट करते हैं और उनकी सत्यता की जाँच केवल विचारण के दौरान हो सकती है।

न्यायमूर्ति एल. विक्टोरिया गौरी ने FIR और अंतिम रिपोर्ट का सूक्ष्म परीक्षण करने के उपरांत कहा कि पुलिस अधिकारी से मात्र मौखिक विवाद या कानूनी कार्रवाई पर सवाल उठाना, बिना किसी आपराधिक कृत्य के, IPC की गंभीर धाराओं के अंतर्गत स्वतः अपराध नहीं बन सकता। न्यायालय ने यह भी दृढ़ता से कहा कि अंतिम रिपोर्ट दाखिल होना किसी अभियोजन को धारा 528 BNSS के तहत न्यायिक परीक्षण से मुक्त नहीं करता। न्यायालय का सबसे महत्वपूर्ण अवलोकन यह रहा कि आपराधिक विधि का उपयोग किसी नागरिक को इसलिए चुप कराने के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि उसने पुलिस कार्रवाई की वैधानिकता पर प्रश्न उठाया।

निर्णय

न्यायालय ने याचिका स्वीकार कर सी.सी. क्रमांक 209/2023 में दोनों याचिकाकर्ताओं के विरुद्ध सम्पूर्ण आपराधिक कार्यवाही निरस्त कर दी और कहा कि इसे जारी रखना विधि की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

Case Details:

Case No.: Crl.O.P.(MD) No. 1289 of 2026

Court: Madurai Bench of Madras High Court

Bench: Hon'ble Mrs. Justice L. Victoria Gowri

Petitioners/Accused: Thomas @ Dhamas & Lingabalan

Respondents: State of Tamil Nadu (rep. by Inspector of Police, Paramakudi Taluk PS) & Vengateswaran (De-facto Complainant) 

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